बाबा मातंग ने वानर की गति से पहाड़ की चोटी से अपने गाँव की तरफ का रास्ता तय किया | और सुचेता-विचेता इस गति से नीचे उतरी जैसे कोई पत्थर गिर रहा हो | वे सब श्री हनुमान जी के आगमन की सुचना अपने कुटुंब को देने के लिए उत्सुक थे | बाबा मातंग खुद को बहुत भाग्यशाली महसूस कर रहे थे | 41 साल पहले जब श्री हनुमान जी का मातंग समाज में आगमन हुआ था तब बाबा मातंग एक युवा थे | अब उन्हें अपने जीवन में पुनः साक्षात् हनुमान जी के दर्शन का सौभाग्य मिल रहा था | इस उत्सुकता और प्रसन्नता में उन्हें पहाड़ से नीचे उतरते हुए समय का बोध ही नहीं हो रहा था | वे थकान तथा निद्रा भी नहीं महसूस कर रहे थे | वे खुशियों के गीत गुनगुनाते हुए तथा मन ही मन अगले दिन होने वाली श्री हनुमान चरण पूजा की तैयारियों का खाका खींचते हुए नीचे उतर रहे थे |
बाबा मातंग सोच रहे थे कि जब वे अपने डेरे में पहुंचेंगे तो अन्य लोग खुशियाँ मना रहे होंगे क्योंकि सुचेता और विचेता उनसे पहले पहुंचकर सबको यह खुशखबरी दे चुकी होंगी | लेकिन जब बाबा मातंग वहां पहुंचे तो पूरी तरह सन्नाटा छाया हुआ था | सब सोये हुए थे | उनका कुत्ता उन्हें देखकर जरूर थोडा रिरियाया | सुचेता और विचेता वानारियां बेचैनी में वहां से कुछ दूरी पर इधर उधर कूद रहीं थी | बाबा मातंग उन पर चिल्लाये- “अरे ओ अज्ञानी आत्माओं , क्या तुम लोगों ने श्री हनुमान जी के आगमन की सुचना इन सबको नहीं दी? देखो सब लोग कैसे चैन से सो रहे हैं | यह श्री हनुमान जी का अपमान है |”
यद्यपि बाबा मातंग चिल्लाये थे लेकिन उन्हें आभास हुआ कि उनकी आवाज उनके कानों तक भी नहीं पहुंची | उन्हें ऐसा लगा जैसे वो मूक व बधिर हो गए हों | सुचेता और विचेता भी ठीक इसी कारण इधर उधर बेचैनी से कूद रहीं थी | वे अपने सहचरों को श्री हनुमान जी के आगमन की सूचना नहीं दे पा रहीं थी | बाबा मातंग ने अधीर होने की बजाये कुछ पल शांति से सोचा | उन्होंने अनुमान लगाया कि उनके बोलने की शक्ति श्री हनुमान जी के अलावा किसी और ने नहीं खींची होगी | लेकिन उन्हें ऐसा कोई कारण ध्यान नहीं आ रहा था कि हनुमान जी उन्हें इस तरह विकलांग करें |
उन्होंने अपनी आँखें बंद की और प्रार्थना करने लगे – “हे संचार की देवी ! मेरी जिह्वा आपका निवास स्थान है | अगर आप रूठ जाएँ तो कोई भी मूक बधिर हो जाए | कृपा मुझे बताये , आप मुझसे नाराज क्यों हैं |”
[सेतु की टिपण्णी: मातंगों के अनुसार हर कार्य या तो किसी देवता द्वारा निर्देशित होता है अथवा किसी असुर के द्वारा | वे हर कार्य से पहले उस कार्य से सम्बंधित देवताओं का आह्वान करते हैं और उनकी उपासना करते हैं | उनकी उपासना एकतरफा नहीं होती | न केवल वे देवताओं से बोलते हैं अपितु देवता भी उनसे बोलते हैं | यह उनकी सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है | जैसे जैसे आप आगे पढेंगे , यह पहलु आपको और भी साफ़ होता चला जाएगा]
संचार की देवी बाबा मातंग के समक्ष प्रकट हुई और बोली – “हे बाबा मातंग , आप विश्व की महाज्ञानी आत्माओं में से एक हैं | भला मै आपसे कैसे नाराज हो सकती हूँ ? मै तो आपके बोले हुए शब्द पवन देव तक भली भांति पहुंचा रही हूँ | यह तो पवन देव ही बता सकते हैं कि आपके शब्द आगे क्यों नही जा रहे हैं |”
बाबा मातंग ने संचार की देवी को धन्यवाद दिया और पवन देव को आह्वान किया | बाबा मातंग ने पवन देव से अपनी उपासना इस तरह आरम्भ की – “हे पवन देव , भगवान हनुमान आपके पुत्र हैं | वे 41 साल बाद मातंगों की इस भूमि पर पधारे हैं | मै यह सुचना अपने समाज के अन्य सदस्यों को देना चाह रहा हूँ लेकिन किसी कारण से मेरी आवाज मेरे कानों तक भी नहीं पहुँच रही है | आप ही हैं जो शब्दों के संचरण के माध्यम हैं | अगर आप हमारे शब्दों को एक स्थान से दुसरे स्थान तक ले जाना बंद कर दें तो हम मूक और बधिर हो जाएँ | कृपा हमें बाताएं कि आप हमसे क्यों क्रोधित हैं?”
पवन देव ने उत्तर दिया –“बाबा मातंग, क्या आपको तनिक भी आभास है कि आपने कुछ समय पहले अपनी आँखों से क्या देखा है ? आप एक नश्वर जीव हैं | आपकी एक दिन मृत्यु निश्चित है | लेकिन कुछ मिनट पहले आपने अपने नश्वर शरीर की इन्द्रियों के माध्यम से अनश्वर चिरंजीवी श्री हनुमान से वार्तालाप किया है | वे कोई साधारण मेहमान नहीं है जो आपकी धरती पर पधारे हैं | वे चिरंजीवी हनुमान हैं | उनके आगमन की सूचना का भार वहन करने की क्षमता शब्दों में नहीं है | आप मूक एवं बधिर नहीं हुए है | कुछ ऐसे शब्द बोलने का प्रयास करो जिनमे श्री हनुमान जी के आगमन की सूचना न हो | आप बखूबी बोल पायेंगे वे शब्द | लेकिन आप हनुमान जी के आगमन के बारे में नहीं बोल सकते | श्री हनुमान मातंग समाज के सदस्यों के सामने स्वयं उपस्थित होंगे तभी उनको सुचना मिलेगी | जब तक वे अन्य मातंगों को दिखाई दें तब तक आप अपने जीवन कार्य पहले की तरह करते रहें | अब आप जाइये और सो जाइये |”
बाबा मातंग को समझ आ गया कि क्यों वे श्री हनुमान जी के आगमन के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं बोल पा रहे थे | उन्होंने पवन देव को धन्यवाद् दिया | उन्होंने वहां उपस्थित बेचैन सुचेता एवं विचेता को भी इस बात से अवगत कराया कि वे मूक बधिर नहीं हुई हैं |
उसके पश्चात् बाबा मातंग ने हमेशा की तरह सोने से पहले अपने पैर और हाथ धोये | वे हमेशा दो पेड़ों के बीच बंधी चद्दर को झूला बनाकर सोते हैं | उन्होंने झूले में लेटे हुए आसमान की तरफ निहारा | आधी रात से ऊपर का समय हो चुका था | उन्होंने आँखे बंद की और निद्रा की देवी का आह्वान किया , “हे निद्रा की देवी , मुझे क्षमा करें | हमारी धरा पर श्री हनुमान पधारे हैं और कल मुझे चरण पूजा की भी तैयारियां करनी हैं | मै यहाँ लेटकर केवल थोडा आराम करना चाहता हूँ , मै सोना नहीं चाहता | कृपा मेरे मस्तिष्क में प्रवेश न करें |”
निद्रा की देवी बोली , “हे बाबा मातंग , आप अभी अभी पहाड़ की चोटी से वापिस आये हैं | थकान की राक्षसी ने आपके तन मन को जकड रखा है | अगर आपने मुझे आपके मस्तिष्क में प्रवेश नहीं करने दिया तो यह थकान की राक्षसी अपने भाई बंधू राक्षसों को भी आपके तन मन में डेरा डालने के लिए बुला लेगी | आपके तन मन को कुछ घंटे की निद्रा की आवश्यकता है |”
बाबा मातंग मान गए | बोले – “ हे निद्रा की देवी, कृपा मेरे मस्तिष्क में प्रवेश करें | सूर्योदय से कुछ समय पहले जागृति की देवी फिर से मेरे मस्तिष्क में प्रवास करने आयेंगी | तब तक आप मेरे मस्तिष्क को अपना घर बनाएं |”
इसके तुरंत बाद बाबा मातंग नींद में चले गए | सुबह उन्होंने चरण पूजा की तैयारियां प्रारंभ की (श्री हनुमान जी के पवित्र चरणों की अराधना) | पूजा का स्थान पहले से ही निश्चित किया जा चुका था | हर सुबह बाबा मातंग कुछ अनुष्ठान करके उस स्थान को पवित्र करते थे | चरण पूजा में प्रयुक्त होने वाली सामग्री उन्होंने पवित्र कुंड में रखी थी | मातंगों को मालुम था कि हनुमान जी का आगमन किसी भी समय संभव है | वे लम्बे समय से जंगल से पूजा की सामग्री एकत्रित कर रहे थे.
बाबा मातंग के शिष्य “उर्वा मातंग” भी उनके साथ चरण पूजा के स्थान को पवित्र करने के अनुष्ठान में शामिल थे | उर्वा मातंग बाबा मातंग के लगभग हर कार्य में उनके साथ होते हैं | उनकी उम्र यहीं कोई बीस से तीस बरस के बीच में है | बाबा मातंग के शरीर छोड़ने से पहले उर्वा को मातंगों के सभी अनुष्ठान सीखने हैं | उर्वा को अपने पूर्वजों की परंपरागत विरासत को आगे बढ़ाना है | वह बाबा मातंग का पुत्र नहीं है | उसे देवताओं ने बाबा मातंग का उतराधिकारी चुना है |
जब बाबा और उर्वा मातंग चरण पूजा के स्थान को पवित्र करने का अनुष्ठान कर रहे थे तब उर्वा ने कहा – “आज सूर्य बहुत ही सौम्यता से चमक रहा है | हवाएं भी मंद हैं | बादल ऐसे लग रहे हैं मानो आकाश में फूल बिखरे पड़े हों | मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हनुमान जी हमारी धरा पर आ चुके हैं |
बाबा मातंग उर्वा की तरफ देखकर मुस्कुराये | उन्होंने मन ही मन सोचा – “तुम धन्य हो बालक | तुम्हारी इन्द्रियां ईश्वर से जुडी हुई हैं | तुम उचित ही मेरे उतराधिकारी हो |” बाबा मातंग ने उर्वा को कोई जवाब नहीं दिया और अनुष्ठान में लगे रहे |
कुछ समय पश्चात् उर्वा पुनः बोला –“बाबा आज आप मौन क्यों हैं ? आप क्या सोच रहे हैं ? अनुष्ठानों के मध्य में ज्ञान वार्तालाप हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग हैं | हम पवित्र भूमि पर खड़े हुए हैं | अगर आप श्री हनुमान जी के बारे में बोलेंगे तो वह मेरे लिए बहुत ज्ञानप्रद होगा |”
अगर बाबा मातंग श्री हनुमान जी के आगमन के विषय में बोलने की कोशिश करते तो वे मूक व बधिर प्रतीत होते | अतः उन्होंने पुरानी बातें छेड़ना उचित समझा – “उर्वा , 41 साल पहले जब श्री हनुमान जी इस धरती पर आये थे तो मै तुम्हारी उम्र का था | उस समय उत्सव बहुत ही बड़े स्तर पर होता था | श्री हनुमान जी की पूजा में सभी ३३ लाख देवता आते थे | बहुत बड़ी मात्रा में फल व मायाज़े देवताओं को अर्पित की जाती थी | लेकिन इस बार तो हम खुद जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं | जंगल छोटे हो गए है | फल और मायाज़े उगाने के लिए अब जमीन भी नहीं बची है | हर चीज का अभाव है | इन अज्ञानी और अहंकारी जंगल से बाहर रहने वाले लोगों ने हमारी जमीन को हड़प लिया है | हमारे अनुष्ठान अब मात्र प्रतीकात्मकता तक सीमित रह गए हैं |
उर्वा खुश था कि वार्तालाप शुरू हो गया है | बोला – “बाबा मै 41 साल आगे की सोचकर परेशान हूँ | 41 साल बाद मै आपकी उम्र का हो जाऊँगा | उस समय मै “बाबा मातंग” कहलाऊंगा | सारे जंगल ख़त्म हो जायेंगे | माय्ज़े और फल उगाने के लिए एक हाथ जितनी भी जमीन न होगी | क्या उन हालातों में श्री हनुमान जी हमारी धरा पर आयेंगे ? मुझे तो लगता है कि अभी उनका आखिरी बार आगमन होगा |”
बाबा मातंग को उर्वा के मुख से ये शब्द सुनकर बहुत पीड़ा हुई | वे बोले – “इससे पहले कि ऐसी कोई परिस्थिति आये यह संसार ही नष्ट हो जाएगा | हम मातंग भविष्य में नहीं जीते | हमारा इतिहास वैभवशाली है और हमारा भविष्य भी समय के अंत तक वैभवशाली रहेगा |”
उर्वा वार्तालाप को जारी रखना चाहता था लेकिन अनुष्ठान समाप्त हो गया | उसके बाद सभी मातंगों ने सदियों से चली आ रही दैनिक हनुमान पूजा की विधियाँ संपन्न की |”
उसके पश्चात् सभी मातंग भोजन के लिए एक साथ बैठे | भोजन करते समय भी ज्ञानप्रद वार्तालाप हुआ | उसके बाद उन्होंने अपना दिन का कार्य विभाजित किया | बाबा मातंग , उर्वा और अन्य दो मातंगों को शहद की तलाश का कार्य मिला | भोजन के पश्चात् सभी मातंग अपने अपने कार्य में लग गए | बाबा मातंग , उर्वा और अन्य दो मातंगों ने आवश्यक चीजे लेकर शहद की खोज के लिए यात्रा आरम्भ की |
गाँव से ठीक बाहर उन्होंने देखा की 3 लोग वानरों को फल खिला रहे थे | ये तीनों लोगो मातंगों की वेश भूषा में थे | लेकिन वे न तो मातंग थे और न ही अन्य जंगल वासी | उनकी नाजुक और साफ़ त्वचा यह दर्शा रही थी कि वे तीनो बाहरी समाज के लोग हैं | बाबा मातंग उन्हें देखते ही थोड़े चिडचिडे हो गए | ये तीनों लोग मातंगों के गाँव के आस पास पिछले कई दिनों से मंडरा रहे थे | उन्होंने बाबा मातंग से मिलने की कोशिश भी की थी लेकिन बाबा मातंग ने मिलने से इनकार कर दिया था | बाबा ने अन्य मातंगों से भी इन बाहरी लोगों से न मिलने के निर्देश जारी कर रखे थे | बाबा ने हमेशा से ही बाहरी समाज के लोगों के प्रति यह सख्त रवैया अपनाया है | मातंग हमेशा बाहरी लोगों से दूर ही रहते हैं | वे कभी उनके साथ मेल जोल नहीं करते | लेकिन उर्वा इन बाहर वालों के जीवन के बारे में जानने के लिए उत्सुक था |
जब इन तीन लोगों ने बाबा मातंग, उर्वा तथा अन्य 2 मातंगों को आते देखा तो उन्होंने हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया | वे मातंगों के साथ कुछ बाते करना चाहते थे लेकिन बाबा मातंग ने कोई रूचि नहीं दिखाई और चलते रहे | उर्वा को यह असभ्य लगा | वह उन बाहर वालों के साथ बातचीत करना चाहता था लेकिन बाबा मातंग की मर्जी के खिलाफ नहीं जा सकता था | वह उन बाहर वालों की तरफ मुस्कुराया और चलता रहा |
उर्वा ने बाबा मातंग से पूछा – “बाबा आप उनसे इतने क्रोधित क्यों हैं? क्या हमें उनसे कम से कम बात करके उनसे ये नहीं जानना चाहिए कि वे क्या चाहते हैं ? मै मानता हूँ की इन बाहर वालों ने हमारे जंगल का नाश कर दिया है और हमें अपनी रोज मर्रा की चीजों के लिए भी तरसा दिया है | लेकिन उससे हमारी दिव्यता का तो ह्रास नहीं होना चाहिए | हमें उन पर इस तरह क्रोधित नहीं होना चाहिए |”
बाबा मातंग ने उत्तर दिया –“उर्वा , अगर राक्षस मेरी संस्कृति पर आक्रमण करने आयेंगे तो मै यहाँ मुस्कुराते हुए सब कुछ नहीं देख सकता | मुझे राक्षसों को दूर रखने के लिए क्रोध दिखाना जरूरी है |”
“लेकिन वे राक्षस नहीं हैं बाबा | और वे दुसरे बाहर वालों की तरह नहीं हैं | उनके पास कोई यन्त्र भी नहीं है (कैमरा आदि) | वे हमारी रीति के अनुसार ही वस्त्र पहने हुए हैं |” उर्वा ने अपनी दृष्टि से बाबा मातंग को समझाने की कोशिश की |
लेकिन बाबा मातंग बाहर वालों के सम्बन्ध में कोई वार्तालाप नहीं करना चाहते थे | उन्होंने अपने अंतिम शब्द कहे – “उर्वा , जंगल वासियों जैसे वस्त्र पहनने से कोई जंगल वासी नहीं हो जाता | सत्य यह है कि बाहरी समाज के लोगों के मस्तिष्क में लालच का राक्षस रहता है | ये लोग प्रकृति के शत्रु होते हैं | उन्होंने अपने लाभ के लिए जंगलों को काट डाला है | ये लोग अपने लालच के लिए कुछ भी कर सकते हैं | मुझे इन बाहर वालों से कोई शिकायत नहीं है | मुझे इनके मस्तिष्क में बैठे लालच के राक्षस से परहेज है |”
[सेतु की टिपण्णी : मातंगों को दैनन्दिनी में वर्णित ये तीन बाहर वाले दरअसल सेतु के संत हैं | हम उस समय मातांगो से मेल जोल करने की कोशिश कर रहे थे ताकि हम उनके इतिहास और संस्कृति को समझ सकें | बाबा मातंग बाहरी समाज के लोगों के लिए बहुत सख्त है लेकिन अपने समाज के लिए वे पिता की भांति हैं | बाद में आप देखेंगे कैसे उन्होंने सेतु के संतों को आत्मसात कर लिया | ]
जब उर्वा ने देखा कि बाबा बाहर वालों के सम्बन्ध में कोई बात नहीं करना चाहते हैं तो उसने बातचीत बंद कर दी और शहद खोजने में अपना ध्यान केन्द्रित कर लिया |
जब मधु मक्खियाँ विभिन्न स्थानों से अपने छाते की तरफ जाती हैं तो वे एक विशेष खुशबू बिखेरती हुई चलती हैं | हम मातंगों में ही वह खुशबू महसूस करने की क्षमता है | बाबा मातंग , उर्वा और अन्य 2 मातंग उसी खुशबू का पीछा करते हुए किसी नजदीकी मधु के छाते की तरफ बढ़ रहे थे | एकाध मील की दूरी तय करने के पश्चात् वह खुशबू आनी बंद हो गई | उस खुशबू का स्थान एक अजीब सी दुर्गन्ध ने ले लिया | जब उन्होंने आस पास देखा तो एक बीमार कुतिया एक पेड़ के नीचे पड़ी हुई थी |
वह कुतिया इसलिए दुर्गन्ध से भरी थी क्योंकि उसके शरीर में कीड़े पड़े हुए थे | पेट के ऊपर वाले स्थान और सिर में कीड़े बिलबिला रहे थे | वह लगभग अचेत थी और मृत्यु के निकट थी | मातंगों के लिए वह बहुत ही दर्दनाक दृश्य था |
“ओह !” बाबा मातंग के मुख से पीड़ा की आह निकल पड़ी | वे कुतिया के नजदीक आकर बैठे और बोले –“मैंने हाल ही में किसी जीव को इतना तड़पते हुए नहीं देखा है|”
उर्वा भी नजदीक बैठ गया और बोला – “बाबा हमें शीघ्र ही इसको बचाने के लिए कुछ करना होगा |”
बाबा मातंग ने अन्य दो मातंगों को जंगल से जहरीली जड़ी बूटियाँ और जल लाने के लिए भेजा ताकि जहरीली बूटियों से कीड़ों को बाहर निकाला जाए | वे दोनों मातंग बाबा के निर्देशानुसार बूटियाँ व जल लाने निकल गए |
बाबा मातंग ने चिकित्सा के देवताओं का आह्वान किया – “हे जुड़वाँ देवताओं, कृपा मेरे मस्तिष्क को अपना घर बनाओ ताकि मै इस प्राणी की चिकित्सा कर सकूँ|” फिर उन्होंने उर्वा की और मुड़कर कहा – “उर्वा, हम अपने गाँव से मधु की खोज में निकले थे | हमें नहीं भूलना चाहिए कि यही हमारा प्राथमिक कार्य है | तुम इस प्राणी की चिंता मत करो | इसकी चिकित्सा मेरी जिम्मेदारी है | तुम मधु की खोज जारी रखो | जब तुम्हे मधु मिल जाये तो ध्वनि सन्देश भेजकर हमें भी सूचित करो |”
उर्वा मधु की तलाश में निकल पड़ा और बाबा मातंग अपनी आँखे बंद करके उस कुतिया की आत्मा से संपर्क साधने लगे ताकि आत्मा कुतिया का शरीर छोड़कर तब तक न जाये जब तक औषधियां और जल न आ जाएँ | उन्होंने प्रार्थना की – “हे आत्मा, अपनी इस कुत्तिया की देह को बनाए रखो | जब मेरे साथी औषधियां ले आयेंगे तो मै इन घावों को ठीक कर दूंगा | आपकी यह देह पुनः स्वस्थ हो जायेगी |”
लेकिन दो मातंग जो औषधियां लाने गए थे वे बहुत समय पश्चात् भी वापिस नहीं लौटे | बाबा ने खड़े होकर उन्हें जोर से पुकारा –“ हे मातंगो, तुम लोग कहाँ हो? क्या तुम्हे औषधियां मिल गई हैं? इतना विलम्ब क्यों है?”
कोई जवाब नहीं आया | बाबा मातंग ने जंगल के पक्षियों से आग्रह किया कि वे उनका सन्देश उनके बिछुड़े हुए दो मातंग साथियों तक पहुंचाएं| पक्षियों ने चहचहाना शुरू किया | एक पक्षी से दुसरे पक्षी तक , दुसरे से तीसरे पक्षी तक सन्देश पहुंचा और अंत में दोनों मातंगों का पता लग गया | पक्षियों ने सूचित किया कि उन दो मातंगों के साथ कुछ असाधारण घटित हो रहा है | वे दोनों करीब डेढ़ मील दूर या तो मरे हुए पड़े हैं या अचेत हैं|”
बाबा मातंग यह सुचना पाकर चकित रह गए | वे उस स्थान की तरफ तुरंत दौड़ना चाहते थे लेकिन कुतिया को भी उस हालत में छोड़कर जाना उन्हें उचित नहीं लगा | उन्होंने उर्वा को जोर से पुकारा – “अरे उर्वा ... उर्वा ... “ लेकिन अब भी कोई जवाब नहीं आया | फिर से पक्षियों की सहायता ली गई लेकिन वे भी उर्वा का पता नहीं लगा सके|
यह बाबा मातंग के लिए तीन तरफ़ा त्रासदी थी | पहला , उनका शिष्य उर्वा कही गुम गया था | दुसरे, दो मातंग जंगल में कहीं अचेत पड़े हुए थे और तीसरा एक कुतिया मौत की कगार पर थी और बाबा मातंग बेबस थे | चाहे वो एक आवारा कुत्ता हो या उनका अपना पुत्र , एक मातंग जंगल के सब प्राणियों से समान रूप से प्रेम करता है | बाबा मातंग के लिए उस कुतिया को उन हालातों में छोड़कर जाना आसान नहीं था | उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे वे अपने पुत्र को मृत्यु शैया पर छोड़कर जा रहे हों | लेकिन अन्य कोई रास्ता भी नहीं था |
बाबा मातंग ने कुतिया की आत्मा से क्षमा मांगी और उस स्थान की तरफ दौड़े जहाँ दो मातंग बेहोश पड़े हुए थे | पक्षियों ने चहचहाते हुए बाबा मातंग को रास्ता दिखाया | जब वे उस स्थान पर पहुंचे तो सबसे पहले उनकी नजर वहां पड़ी हुई उन औषधियों पर पड़ी जो उन्होंने मातंगों से मंगवाई थी | उन औषधियों के पास पानी का पात्र भी पड़ा हुआ था | वही पर दो मातंग बेहोश पड़े हुए थे |
बाबा मातंग ने उनका निरिक्षण किया तो पता चला कि उन्हें किसी विषैले सरीसृप ने काटा है | उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी से मातंगों के शरीर के उन स्थानों पर चीरा लगाया जहाँ पर सरीसृप ने उन्हें काटा था और वहां से जहर चूसकर बाहर निकालने की प्रक्रिया आरम्भ की | लेकिन खून अन्दर नसों में पहुँच चुका था | बाबा मातंग को ज्ञात हुआ कि अगर शीघ्र ही उन मातांगो की नसों में प्रति-विष औषधियां नहीं दी गई तो उनकी मृत्यु निश्चित है |
क्या भीषण विपदा थी | वहां पर विषैली औषधियां पड़ी हुई थी जिनसे कुतिया का इलाज किया जाना था लेकिन कुतिया वहां से डेढ़ मील दूर थी | अतः वे औषधियां किसी काम की नहीं थी | उन मातांगो के लिए ऐसी प्रति-विष औषधियां चाहिए थी जो उनके शरीर में फ़ैल चुके विष के प्रभाव को कम कर पाती | जिस मरीज के लिए औषधियां उपलब्ध थी वो मरीज वहां से दूर था और जो मरीज पास थे उनके लिए औषधियां नहीं थी ! बाबा मातंग के हाथ कांपने लगे | उन्होंने जहर चूसकर बाहर निकालना जारी रखा लेकिन उतना काफी नहीं था | बीच बीच में उन्होंने उर्वा मातंग को भी आवाज लगाने की कोशिश की लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला |
बाबा मातंग जानते थे कि झील के दुसरे किनारे पर प्रति-विष औषधियां मिल सकती थी | लेकिन उन दो मातंगों को उस हालात में छोड़कर जाना खतरनाक था | उनका जहर चूसकर बाहर निकालते रहना और उन्हें कृत्रिम साँसे उपलब्ध कराते रहना जरुरी था |
इसी समय एक वानर ने उनकी सहायता करने का प्रस्ताव किया | बाबा मातंग ने वानर को उन ओषधियों की पहचान बताई | वानर तुरंत ओषधियाँ लाने के लिए झील के दूसरी तरफ चला गया |
निर्णायक समय बीतता जा रहा था लेकिन वानर ओषधियाँ लेकर वापिस नहीं लौटा | बाबा मातंग उन दो मातंगों को जीवित रखने के सभी तरीके आजमा रहे थे | उन्होंने सतह से पूरी तरह जहर सोख डाला था लेकिन जो विष उनके रक्त में घुस चुका था वह उनके शरीर को नीला करता जा रहा था | बाबा मातंग एक एक करके उन दोनों को कृत्रिम साँसे उपलब्ध करा रहे थे | लेकिन ओषधियों के बिना वे ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह सकते थे | चिंताओं के राक्षस पहले ही बाबा मातंग के दिमाग में घुस चुके थे | भय और चिंता के मारे उनके पसीने छूट रहे थे | उनका शरीर कांप रहा था | अंत में उन्होंने खुद ही झील के दूसरी तरफ जाकर जड़ी बूटियाँ लाने की ठानी | वे झील के किनारे जितनी तेजी से दौड़ सकते थे , दौड़े |
झील के दूसरी तरफ उन्होंने उसी वानर को एक वृक्ष से दुसरे वृक्ष के बीच मस्ती में उछलते हुए देखा | वह वानर एक हाथ में वे ओषधियाँ लिए हुए था और दुसरे हाथ से मजे से केले खा रहा था | जब बाबा ने वानर को बेपरवाह केले खाते देखा तो वे अपना आपा खो बैठे | वे चिल्लाये – “अरे वानर , तुम राक्षस हो | दो लोग अपनी जिंदगी के लिए लड़ रहे हैं और तुम बेचिंत यहाँ केले खा रहे हो ? मैंने तुम्हे ओषधियाँ लाने के लिए कहा और तुम अपनी इन्द्रियों को संतुष्ट कर रहे हो? तुम अपने समाज के लिए शर्म का कारण हो | तुम हमारे भगवान् श्री हनुमान की उन गौरव पूर्ण कार्यों पर भी कलंक हो जब उन्होंने हिमालय के जंगलों से भगवान् राम के भ्राता श्री लक्षमण के लिए ओषधियाँ लाकर उनकी जान बचाई थी |”
वानर पर बाबा मातंग के शब्दों का कोई असर नहीं हुआ | वह मजे से केले खाता रहा | जो ओषधियाँ उसके पास थी उनको भी उसने बाबा मातंग की तरफ फेंक दिया | वानर के इस व्यवहार से बाबा मातंग अत्यंत क्रोधित हो गए | उन्होंने एक छड़ी उठाई और वानर की तरफ मारने के लिए दौड़े | वानर भाग उठा | बाबा उसके पीछे दौड़े | वे वानर के प्रति कटु शब्द प्रयोग करते जा रहे थे और जो भी चीज उनके रास्ते में आ रही थी वे उसको वानर की तरफ फेंक रहे थे | एक के बाद एक तीन त्रासदियों ने बाबा मातंग को अन्दर से हिलाकर रख दिया था | उनमे संत के सारे गुण मानो ख़त्म हो गए थे | अन्यथा क्या कारण था कि बाबा मातंग जैसे महात्मा एक वानर को पीटने के लिए उसके पीछे दौड़ रहे थे?”
अंत में बाबा मातंग थक गए | वे वानर को नहीं पकड़ सके | वानर रुक गया और एक पेड़ पर जा बैठा |
फिर वहां से एक जानी पहचानी आवाज़ आई – “बाबा आपको ये क्या हो गया है? आप बेचारे वानर के पीछे क्यों पड़े हैं ?” यह उर्वा की आवाज थी जो उस पेड़ के नीचे शांति से बैठा हुआ था |
बाबा मातंग चिल्लाये – “तुम यहाँ क्या कर रहे हो उर्वा? मै तुम्हे पुकार रहा था .... तुमने उत्तर क्यों नहीं दिया ? तुम्हारे 2 मातंग भाई मृत्यु से लड़ रहे हैं और तुम यहाँ शांति से बैठे हो?”
“मै श्री हनुमान जी के पवित्र चरणों में बैठा हूँ बाबा, क्या आप उन्हें नहीं देख सकते ? मृत्यु से कौन लड़ रहा है? आप यह क्या बोल रहे हैं बाबा?” उर्वा ने पूछा |
बाबा मातंग का मस्तिष्क क्रोध , प्रतिशोध , चिंता आदि राक्षसों के नियंत्रण में था | यही कारण था कि वे श्री हनुमान को अपनी आँखों के सामने होते हुए भी नहीं देख पा रहे थे | लेकिन श्री हनुमान जी की कृपा से उन्होंने शीघ्र ही अपने मस्तिष्क में बैठे विभिन्न राक्षसों को पहचान लिया |
बाबा मातंग कटे वृक्ष की भांति गिर पड़े | उनके पैर मृत से हो गए | अपने दोनों हाथों को सामने की तरफ फैलाकर वे जमीन पर गिर पड़े और साष्टांग मुद्रा में गिरे हुए रोने लगे | जैसे ही उन्होंने श्री हनुमान जी के चरणों में स्वयं को समर्पित किया , सारे राक्षस उनके मस्तिष्क को छोड़कर भाग खड़े हुए | अंततः उन्हें श्री हनुमान जी की आवाज़ सुनाई दी – “उठो बाबा मातंग , उठो !”
बाबा मातंग ने अपना सिर उठाया | श्री हनुमान वहां खड़े खड़े मुस्कुरा रहे थे | उनका एक हाथ वृक्ष के तने पर था | उर्वा उनके चरणों में नीचे धरती पर बैठा हुआ था | बाबा मातंग ने पुनः साष्टांग प्रणाम किया और बोले –“हे श्री हनुमान ! मेरे दो मातंग भाइयों को किसी विषैले सरीसृप ने काटा है | कृपा उनकी जान बचाइए | उस कुतिया की भी जान बचाइए जो भयानक घावों से कराह रही मृत्यु की प्रतीक्षा कर रही है | कृपा करो प्रभु कृपा करो |”
हनुमान जी की मुस्कराहट और घनी हो गई | उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया |
उधर उर्वा श्री हनुमान जी के दैवीय रूप से प्रस्फुटित हो रही असीम उर्जा की धारा में खोया हुआ था | वह आस पास जो कुछ हो रहा था उससे अनभिज्ञ था | बाबा मातंग के शब्द सुनकर उसे आश्चर्य हुआ | बोला – “बाबा कुतिया को क्या हुआ? क्या आपने उसकी चिकित्सा नहीं की? लेकिन उन्होंने तो मुझे बताया कि कुतिया अब ठीक है?”
“ऐसा तुम्हे किसने बताया?” बाबा मातंग ने पूछा |
उर्वा ने कुछ दूरी पर स्थित दुसरे वृक्ष की और इशारा किया | दोनों मातंग जो कुछ देर पहले सरीसृप के काटे जाने से बेहोश पड़े थे वे अब उस वृक्ष पर लगे मधुमक्खी के छाते से मधु निकाल रहे थे | बाबा मातंग को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ |
अब हनुमान जी बोले –“हे बाबा मातंग , आज आप मधु खोजने के लिए अपने गाँव से निकले थे | लेकिन रास्ते में कुछ और काम आपको मिल गए जिनके कारण आप विचलित हो गए | उन विचलनो को निभाने के पश्चात् आप पुनः अपने मधु खोज के रास्ते पर वापिस आ सकते थे लेकिन आप अचानक आये कामों को पूरा करने की बजाये उनमे उलझते चले गए | अरे भाई ! जब वानर ने आपकी तरफ ओषधियाँ फेंक दी तो उस पर क्रोधित होकर उसके पीछे भागने की बजाये आपको ओषधियाँ उठाकर वापिस जाना चाहिए था | आप आसानी से अपने दो साथियों को ठीक कर सकते थे | फिर उन मातंगों के पास पड़ी विषैली ओषधियों और पानी को लेकर आप कुतिया के पास जा सकते थे और उसे भी ठीक कर सकते थे | और उसके बाद आप फिर से अपने मधु खोजने के कार्य में लग सकते थे |”
“मुझे माफ़ कर दीजिये प्रभु , मै आपकी परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर सका |” बाबा मातंग अपने बारे में दोष और हीनता की भावना से घिर गए |
“आपने कुछ नहीं किया बाबा मातंग , आपके कार्य राक्षसों द्वारा नियंत्रित किये जा रहे थे | क्रोध के राक्षस ने आपको वानर का पीछा करने के लिए प्रेरित किया और आप भटक गए|” भगवान हनुमान ने उत्तर दिया |
“लेकिन राक्षसों ने मेरे शरीर के माध्यम से जो कार्य किये मै ही उसके लिए जिम्मेदार हूँ प्रभु|” बाबा मातंग बोले –“ हम मनुष्य कुछ नहीं करते | हमारे कार्य या तो देवताओं द्वारा निर्देशित होते हैं या असुरों द्वारा | देवताओं द्वारा निर्देशित एक कार्य हमें मोक्ष की तरफ एक कदम नजदीक ले जाता है लेकिन राक्षसों द्वारा नियंत्रित कार्य हमें मोक्ष से 10 कदम और पीछे की और ले जाता है |”
स्वाभाविक रूप से श्री हनुमान मुस्कुरा रहे थे | कुछ क्षण पहले जो बाबा मातंग एक साधारण मनुष्य की भांति रो रहे थे अब वे विद्वतापूर्ण बाते कर रहे थे | हनुमान जी शरारत के लहजे में बोले –“लेकिन बाबा मातंग आपके मस्तिष्क में असुरों ने डेरा कैसे डाला | भला आप तो मातंग हैं और मातंगों में भी श्रेष्ट बाबा मातंग हैं | कैसे आये क्रोध और प्रतिशोध के असुर आपके मस्तिष्क में ?”
बाबा मातंग बोले – “परिस्थितियों पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है प्रभू! मै तो परिस्थितियों की भूल भूलैया में भटक गया था | एक परिस्थिति दूसरी में बदलती चली गई | कोई भी चिंतित हो सकता था | और जब चिंता नाम का असुर मस्तिष्क में आ बैठता है तो अन्य असुर अपने आप आ जाते हैं | क्रोध , प्रतिशोध और भय के असुर परिस्थितियों के कारण आ घुसे थे ...”
भगवान् हनुमान ने पूछा – “तो आपके मन में उन लोगों के प्रति कटु भावनाएं क्यों हैं जो जंगल से बाहर रहते हैं? उनके मस्तिष्क में लालच और स्वार्थ का असुर भी तो परिस्थितियों के कारण कुंडली मारे हुए हो सकता है ? क्या आपने ऐसा सोचा है ?”
उर्वा जो यह वार्तालाप बड़ी तन्मयता और जिज्ञासा से सुन रहा था वह बीच में ही बोल पड़ा | मासूम उच्चारण में बोला – “हे प्रभु हनुमान जी , मै भी ऐसे ही सोच रहा था | जन्म के समय तो हर मनुष्य एक समान ही होता है | स्वयं बाबा मातंग ने मुझे सिखाया है कि आत्मा मोक्ष प्राप्त करने के लिए देह धारण करती है | अगर मनुष्य का हर कार्य देवताओं द्वारा निर्देशित हो तो मोक्ष प्राप्त होता है | हम मातंग यहाँ एकांत में शांति से रहते हैं | लेकिन जंगल से बाहर के लोग उथल पुथल भरे माहौल में रहते हैं | यही कारण है कि हमारे ज्यादातर कार्य देवताओं द्वारा निर्देशित होते हैं किन्तु उनके कार्य स्वार्थ और लालच के असुरों द्वारा निर्देशित होते हैं | लेकिन वे लोग भी आपके भक्त हैं | मैंने उन 3 मनुष्यों के हाथ में आपकी और भगवान राम की मूर्ति देखी है | मैंने उनके चेहरे पर दिव्यता के दर्शन किये हैं | मै भी बाबा मातंग को कह रहा था कि हमें उनसे इतनी कठोरता से व्यवहार नहीं करना चाहिए |”
“हे प्रभु , अगर आप चाहते हैं कि हम मातंग उन लोगों के साथ मेल जोल करें तो हम करेंगे | मै आपके भक्तों के प्रति इतना कठोर व्यवहार करने के लिए आपसे क्षमा मांगता हूँ | मै उन्हें हमारे दैनिक कार्यों में सम्मिलित होने का आमंत्रण दूंगा | मै उनके द्वारा चरण पूजा के लिए दी जा रही भेंट भी स्वीकार करूँगा |” बाबा मातंग ने दोनों हाथ जोड़कर कहा |
भगवान हनुमान ने यह वार्तालाप इन शब्दों के साथ समाप्त किया – “हे बाबा मातंग , मै आपको अपना एकांत त्यागने के लिए नहीं कह रहा हूँ | अपने समाज के लिए पिता स्वरुप होने के नाते आपका कठोर व्यवहार उचित भी है | सभी मातंग अपने जीवन में मोक्ष प्राप्त करते हैं क्योंकि उन्हें इस शांत, एकांत और अनुकूल वातावरण में अपनी जीवन साधना का अवसर मिलता है | यह आपका कर्त्तव्य है कि आप इस अनुकूल वातावरण की रक्षा करें | लेकिन बदलते समय में आपको हर वस्तु को पूर्णता के परिपेक्ष्य में देखना चाहिए| दैवीय योजनाये और आपका मस्तिष्क एकरस होने चाहियें | आपका हर निर्णय आपके अनुभवों के आधार पर होना चाहिए जिसमे आज के अनुभव भी सम्मिलित हैं |”
बाबा मातंग और उर्वा बाद में मधु इकठ्ठा करने के अपने कार्य में लग गए | इस घटना के बाद 4 मातंगों (बाबा, उर्वा और अन्य दो जो मधु की खोज में आये थे) और 3 वानरों (सुचेता , विचेता और उनका बालक) को श्री हनुमान जी के आगमन का बोध हो गया था |
हनुमान जी की लीलाओं का यह अध्याय यही समाप्त होता है |
बाबा मातंग सोच रहे थे कि जब वे अपने डेरे में पहुंचेंगे तो अन्य लोग खुशियाँ मना रहे होंगे क्योंकि सुचेता और विचेता उनसे पहले पहुंचकर सबको यह खुशखबरी दे चुकी होंगी | लेकिन जब बाबा मातंग वहां पहुंचे तो पूरी तरह सन्नाटा छाया हुआ था | सब सोये हुए थे | उनका कुत्ता उन्हें देखकर जरूर थोडा रिरियाया | सुचेता और विचेता वानारियां बेचैनी में वहां से कुछ दूरी पर इधर उधर कूद रहीं थी | बाबा मातंग उन पर चिल्लाये- “अरे ओ अज्ञानी आत्माओं , क्या तुम लोगों ने श्री हनुमान जी के आगमन की सुचना इन सबको नहीं दी? देखो सब लोग कैसे चैन से सो रहे हैं | यह श्री हनुमान जी का अपमान है |”
यद्यपि बाबा मातंग चिल्लाये थे लेकिन उन्हें आभास हुआ कि उनकी आवाज उनके कानों तक भी नहीं पहुंची | उन्हें ऐसा लगा जैसे वो मूक व बधिर हो गए हों | सुचेता और विचेता भी ठीक इसी कारण इधर उधर बेचैनी से कूद रहीं थी | वे अपने सहचरों को श्री हनुमान जी के आगमन की सूचना नहीं दे पा रहीं थी | बाबा मातंग ने अधीर होने की बजाये कुछ पल शांति से सोचा | उन्होंने अनुमान लगाया कि उनके बोलने की शक्ति श्री हनुमान जी के अलावा किसी और ने नहीं खींची होगी | लेकिन उन्हें ऐसा कोई कारण ध्यान नहीं आ रहा था कि हनुमान जी उन्हें इस तरह विकलांग करें |
उन्होंने अपनी आँखें बंद की और प्रार्थना करने लगे – “हे संचार की देवी ! मेरी जिह्वा आपका निवास स्थान है | अगर आप रूठ जाएँ तो कोई भी मूक बधिर हो जाए | कृपा मुझे बताये , आप मुझसे नाराज क्यों हैं |”
[सेतु की टिपण्णी: मातंगों के अनुसार हर कार्य या तो किसी देवता द्वारा निर्देशित होता है अथवा किसी असुर के द्वारा | वे हर कार्य से पहले उस कार्य से सम्बंधित देवताओं का आह्वान करते हैं और उनकी उपासना करते हैं | उनकी उपासना एकतरफा नहीं होती | न केवल वे देवताओं से बोलते हैं अपितु देवता भी उनसे बोलते हैं | यह उनकी सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है | जैसे जैसे आप आगे पढेंगे , यह पहलु आपको और भी साफ़ होता चला जाएगा]
संचार की देवी बाबा मातंग के समक्ष प्रकट हुई और बोली – “हे बाबा मातंग , आप विश्व की महाज्ञानी आत्माओं में से एक हैं | भला मै आपसे कैसे नाराज हो सकती हूँ ? मै तो आपके बोले हुए शब्द पवन देव तक भली भांति पहुंचा रही हूँ | यह तो पवन देव ही बता सकते हैं कि आपके शब्द आगे क्यों नही जा रहे हैं |”
बाबा मातंग ने संचार की देवी को धन्यवाद दिया और पवन देव को आह्वान किया | बाबा मातंग ने पवन देव से अपनी उपासना इस तरह आरम्भ की – “हे पवन देव , भगवान हनुमान आपके पुत्र हैं | वे 41 साल बाद मातंगों की इस भूमि पर पधारे हैं | मै यह सुचना अपने समाज के अन्य सदस्यों को देना चाह रहा हूँ लेकिन किसी कारण से मेरी आवाज मेरे कानों तक भी नहीं पहुँच रही है | आप ही हैं जो शब्दों के संचरण के माध्यम हैं | अगर आप हमारे शब्दों को एक स्थान से दुसरे स्थान तक ले जाना बंद कर दें तो हम मूक और बधिर हो जाएँ | कृपा हमें बाताएं कि आप हमसे क्यों क्रोधित हैं?”
पवन देव ने उत्तर दिया –“बाबा मातंग, क्या आपको तनिक भी आभास है कि आपने कुछ समय पहले अपनी आँखों से क्या देखा है ? आप एक नश्वर जीव हैं | आपकी एक दिन मृत्यु निश्चित है | लेकिन कुछ मिनट पहले आपने अपने नश्वर शरीर की इन्द्रियों के माध्यम से अनश्वर चिरंजीवी श्री हनुमान से वार्तालाप किया है | वे कोई साधारण मेहमान नहीं है जो आपकी धरती पर पधारे हैं | वे चिरंजीवी हनुमान हैं | उनके आगमन की सूचना का भार वहन करने की क्षमता शब्दों में नहीं है | आप मूक एवं बधिर नहीं हुए है | कुछ ऐसे शब्द बोलने का प्रयास करो जिनमे श्री हनुमान जी के आगमन की सूचना न हो | आप बखूबी बोल पायेंगे वे शब्द | लेकिन आप हनुमान जी के आगमन के बारे में नहीं बोल सकते | श्री हनुमान मातंग समाज के सदस्यों के सामने स्वयं उपस्थित होंगे तभी उनको सुचना मिलेगी | जब तक वे अन्य मातंगों को दिखाई दें तब तक आप अपने जीवन कार्य पहले की तरह करते रहें | अब आप जाइये और सो जाइये |”
बाबा मातंग को समझ आ गया कि क्यों वे श्री हनुमान जी के आगमन के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं बोल पा रहे थे | उन्होंने पवन देव को धन्यवाद् दिया | उन्होंने वहां उपस्थित बेचैन सुचेता एवं विचेता को भी इस बात से अवगत कराया कि वे मूक बधिर नहीं हुई हैं |
उसके पश्चात् बाबा मातंग ने हमेशा की तरह सोने से पहले अपने पैर और हाथ धोये | वे हमेशा दो पेड़ों के बीच बंधी चद्दर को झूला बनाकर सोते हैं | उन्होंने झूले में लेटे हुए आसमान की तरफ निहारा | आधी रात से ऊपर का समय हो चुका था | उन्होंने आँखे बंद की और निद्रा की देवी का आह्वान किया , “हे निद्रा की देवी , मुझे क्षमा करें | हमारी धरा पर श्री हनुमान पधारे हैं और कल मुझे चरण पूजा की भी तैयारियां करनी हैं | मै यहाँ लेटकर केवल थोडा आराम करना चाहता हूँ , मै सोना नहीं चाहता | कृपा मेरे मस्तिष्क में प्रवेश न करें |”
निद्रा की देवी बोली , “हे बाबा मातंग , आप अभी अभी पहाड़ की चोटी से वापिस आये हैं | थकान की राक्षसी ने आपके तन मन को जकड रखा है | अगर आपने मुझे आपके मस्तिष्क में प्रवेश नहीं करने दिया तो यह थकान की राक्षसी अपने भाई बंधू राक्षसों को भी आपके तन मन में डेरा डालने के लिए बुला लेगी | आपके तन मन को कुछ घंटे की निद्रा की आवश्यकता है |”
बाबा मातंग मान गए | बोले – “ हे निद्रा की देवी, कृपा मेरे मस्तिष्क में प्रवेश करें | सूर्योदय से कुछ समय पहले जागृति की देवी फिर से मेरे मस्तिष्क में प्रवास करने आयेंगी | तब तक आप मेरे मस्तिष्क को अपना घर बनाएं |”
इसके तुरंत बाद बाबा मातंग नींद में चले गए | सुबह उन्होंने चरण पूजा की तैयारियां प्रारंभ की (श्री हनुमान जी के पवित्र चरणों की अराधना) | पूजा का स्थान पहले से ही निश्चित किया जा चुका था | हर सुबह बाबा मातंग कुछ अनुष्ठान करके उस स्थान को पवित्र करते थे | चरण पूजा में प्रयुक्त होने वाली सामग्री उन्होंने पवित्र कुंड में रखी थी | मातंगों को मालुम था कि हनुमान जी का आगमन किसी भी समय संभव है | वे लम्बे समय से जंगल से पूजा की सामग्री एकत्रित कर रहे थे.
बाबा मातंग के शिष्य “उर्वा मातंग” भी उनके साथ चरण पूजा के स्थान को पवित्र करने के अनुष्ठान में शामिल थे | उर्वा मातंग बाबा मातंग के लगभग हर कार्य में उनके साथ होते हैं | उनकी उम्र यहीं कोई बीस से तीस बरस के बीच में है | बाबा मातंग के शरीर छोड़ने से पहले उर्वा को मातंगों के सभी अनुष्ठान सीखने हैं | उर्वा को अपने पूर्वजों की परंपरागत विरासत को आगे बढ़ाना है | वह बाबा मातंग का पुत्र नहीं है | उसे देवताओं ने बाबा मातंग का उतराधिकारी चुना है |
जब बाबा और उर्वा मातंग चरण पूजा के स्थान को पवित्र करने का अनुष्ठान कर रहे थे तब उर्वा ने कहा – “आज सूर्य बहुत ही सौम्यता से चमक रहा है | हवाएं भी मंद हैं | बादल ऐसे लग रहे हैं मानो आकाश में फूल बिखरे पड़े हों | मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हनुमान जी हमारी धरा पर आ चुके हैं |
बाबा मातंग उर्वा की तरफ देखकर मुस्कुराये | उन्होंने मन ही मन सोचा – “तुम धन्य हो बालक | तुम्हारी इन्द्रियां ईश्वर से जुडी हुई हैं | तुम उचित ही मेरे उतराधिकारी हो |” बाबा मातंग ने उर्वा को कोई जवाब नहीं दिया और अनुष्ठान में लगे रहे |
कुछ समय पश्चात् उर्वा पुनः बोला –“बाबा आज आप मौन क्यों हैं ? आप क्या सोच रहे हैं ? अनुष्ठानों के मध्य में ज्ञान वार्तालाप हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग हैं | हम पवित्र भूमि पर खड़े हुए हैं | अगर आप श्री हनुमान जी के बारे में बोलेंगे तो वह मेरे लिए बहुत ज्ञानप्रद होगा |”
अगर बाबा मातंग श्री हनुमान जी के आगमन के विषय में बोलने की कोशिश करते तो वे मूक व बधिर प्रतीत होते | अतः उन्होंने पुरानी बातें छेड़ना उचित समझा – “उर्वा , 41 साल पहले जब श्री हनुमान जी इस धरती पर आये थे तो मै तुम्हारी उम्र का था | उस समय उत्सव बहुत ही बड़े स्तर पर होता था | श्री हनुमान जी की पूजा में सभी ३३ लाख देवता आते थे | बहुत बड़ी मात्रा में फल व मायाज़े देवताओं को अर्पित की जाती थी | लेकिन इस बार तो हम खुद जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं | जंगल छोटे हो गए है | फल और मायाज़े उगाने के लिए अब जमीन भी नहीं बची है | हर चीज का अभाव है | इन अज्ञानी और अहंकारी जंगल से बाहर रहने वाले लोगों ने हमारी जमीन को हड़प लिया है | हमारे अनुष्ठान अब मात्र प्रतीकात्मकता तक सीमित रह गए हैं |
उर्वा खुश था कि वार्तालाप शुरू हो गया है | बोला – “बाबा मै 41 साल आगे की सोचकर परेशान हूँ | 41 साल बाद मै आपकी उम्र का हो जाऊँगा | उस समय मै “बाबा मातंग” कहलाऊंगा | सारे जंगल ख़त्म हो जायेंगे | माय्ज़े और फल उगाने के लिए एक हाथ जितनी भी जमीन न होगी | क्या उन हालातों में श्री हनुमान जी हमारी धरा पर आयेंगे ? मुझे तो लगता है कि अभी उनका आखिरी बार आगमन होगा |”
बाबा मातंग को उर्वा के मुख से ये शब्द सुनकर बहुत पीड़ा हुई | वे बोले – “इससे पहले कि ऐसी कोई परिस्थिति आये यह संसार ही नष्ट हो जाएगा | हम मातंग भविष्य में नहीं जीते | हमारा इतिहास वैभवशाली है और हमारा भविष्य भी समय के अंत तक वैभवशाली रहेगा |”
उर्वा वार्तालाप को जारी रखना चाहता था लेकिन अनुष्ठान समाप्त हो गया | उसके बाद सभी मातंगों ने सदियों से चली आ रही दैनिक हनुमान पूजा की विधियाँ संपन्न की |”
उसके पश्चात् सभी मातंग भोजन के लिए एक साथ बैठे | भोजन करते समय भी ज्ञानप्रद वार्तालाप हुआ | उसके बाद उन्होंने अपना दिन का कार्य विभाजित किया | बाबा मातंग , उर्वा और अन्य दो मातंगों को शहद की तलाश का कार्य मिला | भोजन के पश्चात् सभी मातंग अपने अपने कार्य में लग गए | बाबा मातंग , उर्वा और अन्य दो मातंगों ने आवश्यक चीजे लेकर शहद की खोज के लिए यात्रा आरम्भ की |
गाँव से ठीक बाहर उन्होंने देखा की 3 लोग वानरों को फल खिला रहे थे | ये तीनों लोगो मातंगों की वेश भूषा में थे | लेकिन वे न तो मातंग थे और न ही अन्य जंगल वासी | उनकी नाजुक और साफ़ त्वचा यह दर्शा रही थी कि वे तीनो बाहरी समाज के लोग हैं | बाबा मातंग उन्हें देखते ही थोड़े चिडचिडे हो गए | ये तीनों लोग मातंगों के गाँव के आस पास पिछले कई दिनों से मंडरा रहे थे | उन्होंने बाबा मातंग से मिलने की कोशिश भी की थी लेकिन बाबा मातंग ने मिलने से इनकार कर दिया था | बाबा ने अन्य मातंगों से भी इन बाहरी लोगों से न मिलने के निर्देश जारी कर रखे थे | बाबा ने हमेशा से ही बाहरी समाज के लोगों के प्रति यह सख्त रवैया अपनाया है | मातंग हमेशा बाहरी लोगों से दूर ही रहते हैं | वे कभी उनके साथ मेल जोल नहीं करते | लेकिन उर्वा इन बाहर वालों के जीवन के बारे में जानने के लिए उत्सुक था |
जब इन तीन लोगों ने बाबा मातंग, उर्वा तथा अन्य 2 मातंगों को आते देखा तो उन्होंने हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया | वे मातंगों के साथ कुछ बाते करना चाहते थे लेकिन बाबा मातंग ने कोई रूचि नहीं दिखाई और चलते रहे | उर्वा को यह असभ्य लगा | वह उन बाहर वालों के साथ बातचीत करना चाहता था लेकिन बाबा मातंग की मर्जी के खिलाफ नहीं जा सकता था | वह उन बाहर वालों की तरफ मुस्कुराया और चलता रहा |
उर्वा ने बाबा मातंग से पूछा – “बाबा आप उनसे इतने क्रोधित क्यों हैं? क्या हमें उनसे कम से कम बात करके उनसे ये नहीं जानना चाहिए कि वे क्या चाहते हैं ? मै मानता हूँ की इन बाहर वालों ने हमारे जंगल का नाश कर दिया है और हमें अपनी रोज मर्रा की चीजों के लिए भी तरसा दिया है | लेकिन उससे हमारी दिव्यता का तो ह्रास नहीं होना चाहिए | हमें उन पर इस तरह क्रोधित नहीं होना चाहिए |”
बाबा मातंग ने उत्तर दिया –“उर्वा , अगर राक्षस मेरी संस्कृति पर आक्रमण करने आयेंगे तो मै यहाँ मुस्कुराते हुए सब कुछ नहीं देख सकता | मुझे राक्षसों को दूर रखने के लिए क्रोध दिखाना जरूरी है |”
“लेकिन वे राक्षस नहीं हैं बाबा | और वे दुसरे बाहर वालों की तरह नहीं हैं | उनके पास कोई यन्त्र भी नहीं है (कैमरा आदि) | वे हमारी रीति के अनुसार ही वस्त्र पहने हुए हैं |” उर्वा ने अपनी दृष्टि से बाबा मातंग को समझाने की कोशिश की |
लेकिन बाबा मातंग बाहर वालों के सम्बन्ध में कोई वार्तालाप नहीं करना चाहते थे | उन्होंने अपने अंतिम शब्द कहे – “उर्वा , जंगल वासियों जैसे वस्त्र पहनने से कोई जंगल वासी नहीं हो जाता | सत्य यह है कि बाहरी समाज के लोगों के मस्तिष्क में लालच का राक्षस रहता है | ये लोग प्रकृति के शत्रु होते हैं | उन्होंने अपने लाभ के लिए जंगलों को काट डाला है | ये लोग अपने लालच के लिए कुछ भी कर सकते हैं | मुझे इन बाहर वालों से कोई शिकायत नहीं है | मुझे इनके मस्तिष्क में बैठे लालच के राक्षस से परहेज है |”
[सेतु की टिपण्णी : मातंगों को दैनन्दिनी में वर्णित ये तीन बाहर वाले दरअसल सेतु के संत हैं | हम उस समय मातांगो से मेल जोल करने की कोशिश कर रहे थे ताकि हम उनके इतिहास और संस्कृति को समझ सकें | बाबा मातंग बाहरी समाज के लोगों के लिए बहुत सख्त है लेकिन अपने समाज के लिए वे पिता की भांति हैं | बाद में आप देखेंगे कैसे उन्होंने सेतु के संतों को आत्मसात कर लिया | ]
जब उर्वा ने देखा कि बाबा बाहर वालों के सम्बन्ध में कोई बात नहीं करना चाहते हैं तो उसने बातचीत बंद कर दी और शहद खोजने में अपना ध्यान केन्द्रित कर लिया |
जब मधु मक्खियाँ विभिन्न स्थानों से अपने छाते की तरफ जाती हैं तो वे एक विशेष खुशबू बिखेरती हुई चलती हैं | हम मातंगों में ही वह खुशबू महसूस करने की क्षमता है | बाबा मातंग , उर्वा और अन्य 2 मातंग उसी खुशबू का पीछा करते हुए किसी नजदीकी मधु के छाते की तरफ बढ़ रहे थे | एकाध मील की दूरी तय करने के पश्चात् वह खुशबू आनी बंद हो गई | उस खुशबू का स्थान एक अजीब सी दुर्गन्ध ने ले लिया | जब उन्होंने आस पास देखा तो एक बीमार कुतिया एक पेड़ के नीचे पड़ी हुई थी |
वह कुतिया इसलिए दुर्गन्ध से भरी थी क्योंकि उसके शरीर में कीड़े पड़े हुए थे | पेट के ऊपर वाले स्थान और सिर में कीड़े बिलबिला रहे थे | वह लगभग अचेत थी और मृत्यु के निकट थी | मातंगों के लिए वह बहुत ही दर्दनाक दृश्य था |
“ओह !” बाबा मातंग के मुख से पीड़ा की आह निकल पड़ी | वे कुतिया के नजदीक आकर बैठे और बोले –“मैंने हाल ही में किसी जीव को इतना तड़पते हुए नहीं देखा है|”
उर्वा भी नजदीक बैठ गया और बोला – “बाबा हमें शीघ्र ही इसको बचाने के लिए कुछ करना होगा |”
बाबा मातंग ने अन्य दो मातंगों को जंगल से जहरीली जड़ी बूटियाँ और जल लाने के लिए भेजा ताकि जहरीली बूटियों से कीड़ों को बाहर निकाला जाए | वे दोनों मातंग बाबा के निर्देशानुसार बूटियाँ व जल लाने निकल गए |
बाबा मातंग ने चिकित्सा के देवताओं का आह्वान किया – “हे जुड़वाँ देवताओं, कृपा मेरे मस्तिष्क को अपना घर बनाओ ताकि मै इस प्राणी की चिकित्सा कर सकूँ|” फिर उन्होंने उर्वा की और मुड़कर कहा – “उर्वा, हम अपने गाँव से मधु की खोज में निकले थे | हमें नहीं भूलना चाहिए कि यही हमारा प्राथमिक कार्य है | तुम इस प्राणी की चिंता मत करो | इसकी चिकित्सा मेरी जिम्मेदारी है | तुम मधु की खोज जारी रखो | जब तुम्हे मधु मिल जाये तो ध्वनि सन्देश भेजकर हमें भी सूचित करो |”
उर्वा मधु की तलाश में निकल पड़ा और बाबा मातंग अपनी आँखे बंद करके उस कुतिया की आत्मा से संपर्क साधने लगे ताकि आत्मा कुतिया का शरीर छोड़कर तब तक न जाये जब तक औषधियां और जल न आ जाएँ | उन्होंने प्रार्थना की – “हे आत्मा, अपनी इस कुत्तिया की देह को बनाए रखो | जब मेरे साथी औषधियां ले आयेंगे तो मै इन घावों को ठीक कर दूंगा | आपकी यह देह पुनः स्वस्थ हो जायेगी |”
लेकिन दो मातंग जो औषधियां लाने गए थे वे बहुत समय पश्चात् भी वापिस नहीं लौटे | बाबा ने खड़े होकर उन्हें जोर से पुकारा –“ हे मातंगो, तुम लोग कहाँ हो? क्या तुम्हे औषधियां मिल गई हैं? इतना विलम्ब क्यों है?”
कोई जवाब नहीं आया | बाबा मातंग ने जंगल के पक्षियों से आग्रह किया कि वे उनका सन्देश उनके बिछुड़े हुए दो मातंग साथियों तक पहुंचाएं| पक्षियों ने चहचहाना शुरू किया | एक पक्षी से दुसरे पक्षी तक , दुसरे से तीसरे पक्षी तक सन्देश पहुंचा और अंत में दोनों मातंगों का पता लग गया | पक्षियों ने सूचित किया कि उन दो मातंगों के साथ कुछ असाधारण घटित हो रहा है | वे दोनों करीब डेढ़ मील दूर या तो मरे हुए पड़े हैं या अचेत हैं|”
बाबा मातंग यह सुचना पाकर चकित रह गए | वे उस स्थान की तरफ तुरंत दौड़ना चाहते थे लेकिन कुतिया को भी उस हालत में छोड़कर जाना उन्हें उचित नहीं लगा | उन्होंने उर्वा को जोर से पुकारा – “अरे उर्वा ... उर्वा ... “ लेकिन अब भी कोई जवाब नहीं आया | फिर से पक्षियों की सहायता ली गई लेकिन वे भी उर्वा का पता नहीं लगा सके|
यह बाबा मातंग के लिए तीन तरफ़ा त्रासदी थी | पहला , उनका शिष्य उर्वा कही गुम गया था | दुसरे, दो मातंग जंगल में कहीं अचेत पड़े हुए थे और तीसरा एक कुतिया मौत की कगार पर थी और बाबा मातंग बेबस थे | चाहे वो एक आवारा कुत्ता हो या उनका अपना पुत्र , एक मातंग जंगल के सब प्राणियों से समान रूप से प्रेम करता है | बाबा मातंग के लिए उस कुतिया को उन हालातों में छोड़कर जाना आसान नहीं था | उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे वे अपने पुत्र को मृत्यु शैया पर छोड़कर जा रहे हों | लेकिन अन्य कोई रास्ता भी नहीं था |
बाबा मातंग ने कुतिया की आत्मा से क्षमा मांगी और उस स्थान की तरफ दौड़े जहाँ दो मातंग बेहोश पड़े हुए थे | पक्षियों ने चहचहाते हुए बाबा मातंग को रास्ता दिखाया | जब वे उस स्थान पर पहुंचे तो सबसे पहले उनकी नजर वहां पड़ी हुई उन औषधियों पर पड़ी जो उन्होंने मातंगों से मंगवाई थी | उन औषधियों के पास पानी का पात्र भी पड़ा हुआ था | वही पर दो मातंग बेहोश पड़े हुए थे |
बाबा मातंग ने उनका निरिक्षण किया तो पता चला कि उन्हें किसी विषैले सरीसृप ने काटा है | उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी से मातंगों के शरीर के उन स्थानों पर चीरा लगाया जहाँ पर सरीसृप ने उन्हें काटा था और वहां से जहर चूसकर बाहर निकालने की प्रक्रिया आरम्भ की | लेकिन खून अन्दर नसों में पहुँच चुका था | बाबा मातंग को ज्ञात हुआ कि अगर शीघ्र ही उन मातांगो की नसों में प्रति-विष औषधियां नहीं दी गई तो उनकी मृत्यु निश्चित है |
क्या भीषण विपदा थी | वहां पर विषैली औषधियां पड़ी हुई थी जिनसे कुतिया का इलाज किया जाना था लेकिन कुतिया वहां से डेढ़ मील दूर थी | अतः वे औषधियां किसी काम की नहीं थी | उन मातांगो के लिए ऐसी प्रति-विष औषधियां चाहिए थी जो उनके शरीर में फ़ैल चुके विष के प्रभाव को कम कर पाती | जिस मरीज के लिए औषधियां उपलब्ध थी वो मरीज वहां से दूर था और जो मरीज पास थे उनके लिए औषधियां नहीं थी ! बाबा मातंग के हाथ कांपने लगे | उन्होंने जहर चूसकर बाहर निकालना जारी रखा लेकिन उतना काफी नहीं था | बीच बीच में उन्होंने उर्वा मातंग को भी आवाज लगाने की कोशिश की लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला |
बाबा मातंग जानते थे कि झील के दुसरे किनारे पर प्रति-विष औषधियां मिल सकती थी | लेकिन उन दो मातंगों को उस हालात में छोड़कर जाना खतरनाक था | उनका जहर चूसकर बाहर निकालते रहना और उन्हें कृत्रिम साँसे उपलब्ध कराते रहना जरुरी था |
इसी समय एक वानर ने उनकी सहायता करने का प्रस्ताव किया | बाबा मातंग ने वानर को उन ओषधियों की पहचान बताई | वानर तुरंत ओषधियाँ लाने के लिए झील के दूसरी तरफ चला गया |
निर्णायक समय बीतता जा रहा था लेकिन वानर ओषधियाँ लेकर वापिस नहीं लौटा | बाबा मातंग उन दो मातंगों को जीवित रखने के सभी तरीके आजमा रहे थे | उन्होंने सतह से पूरी तरह जहर सोख डाला था लेकिन जो विष उनके रक्त में घुस चुका था वह उनके शरीर को नीला करता जा रहा था | बाबा मातंग एक एक करके उन दोनों को कृत्रिम साँसे उपलब्ध करा रहे थे | लेकिन ओषधियों के बिना वे ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह सकते थे | चिंताओं के राक्षस पहले ही बाबा मातंग के दिमाग में घुस चुके थे | भय और चिंता के मारे उनके पसीने छूट रहे थे | उनका शरीर कांप रहा था | अंत में उन्होंने खुद ही झील के दूसरी तरफ जाकर जड़ी बूटियाँ लाने की ठानी | वे झील के किनारे जितनी तेजी से दौड़ सकते थे , दौड़े |
झील के दूसरी तरफ उन्होंने उसी वानर को एक वृक्ष से दुसरे वृक्ष के बीच मस्ती में उछलते हुए देखा | वह वानर एक हाथ में वे ओषधियाँ लिए हुए था और दुसरे हाथ से मजे से केले खा रहा था | जब बाबा ने वानर को बेपरवाह केले खाते देखा तो वे अपना आपा खो बैठे | वे चिल्लाये – “अरे वानर , तुम राक्षस हो | दो लोग अपनी जिंदगी के लिए लड़ रहे हैं और तुम बेचिंत यहाँ केले खा रहे हो ? मैंने तुम्हे ओषधियाँ लाने के लिए कहा और तुम अपनी इन्द्रियों को संतुष्ट कर रहे हो? तुम अपने समाज के लिए शर्म का कारण हो | तुम हमारे भगवान् श्री हनुमान की उन गौरव पूर्ण कार्यों पर भी कलंक हो जब उन्होंने हिमालय के जंगलों से भगवान् राम के भ्राता श्री लक्षमण के लिए ओषधियाँ लाकर उनकी जान बचाई थी |”
वानर पर बाबा मातंग के शब्दों का कोई असर नहीं हुआ | वह मजे से केले खाता रहा | जो ओषधियाँ उसके पास थी उनको भी उसने बाबा मातंग की तरफ फेंक दिया | वानर के इस व्यवहार से बाबा मातंग अत्यंत क्रोधित हो गए | उन्होंने एक छड़ी उठाई और वानर की तरफ मारने के लिए दौड़े | वानर भाग उठा | बाबा उसके पीछे दौड़े | वे वानर के प्रति कटु शब्द प्रयोग करते जा रहे थे और जो भी चीज उनके रास्ते में आ रही थी वे उसको वानर की तरफ फेंक रहे थे | एक के बाद एक तीन त्रासदियों ने बाबा मातंग को अन्दर से हिलाकर रख दिया था | उनमे संत के सारे गुण मानो ख़त्म हो गए थे | अन्यथा क्या कारण था कि बाबा मातंग जैसे महात्मा एक वानर को पीटने के लिए उसके पीछे दौड़ रहे थे?”
अंत में बाबा मातंग थक गए | वे वानर को नहीं पकड़ सके | वानर रुक गया और एक पेड़ पर जा बैठा |
फिर वहां से एक जानी पहचानी आवाज़ आई – “बाबा आपको ये क्या हो गया है? आप बेचारे वानर के पीछे क्यों पड़े हैं ?” यह उर्वा की आवाज थी जो उस पेड़ के नीचे शांति से बैठा हुआ था |
बाबा मातंग चिल्लाये – “तुम यहाँ क्या कर रहे हो उर्वा? मै तुम्हे पुकार रहा था .... तुमने उत्तर क्यों नहीं दिया ? तुम्हारे 2 मातंग भाई मृत्यु से लड़ रहे हैं और तुम यहाँ शांति से बैठे हो?”
“मै श्री हनुमान जी के पवित्र चरणों में बैठा हूँ बाबा, क्या आप उन्हें नहीं देख सकते ? मृत्यु से कौन लड़ रहा है? आप यह क्या बोल रहे हैं बाबा?” उर्वा ने पूछा |
बाबा मातंग का मस्तिष्क क्रोध , प्रतिशोध , चिंता आदि राक्षसों के नियंत्रण में था | यही कारण था कि वे श्री हनुमान को अपनी आँखों के सामने होते हुए भी नहीं देख पा रहे थे | लेकिन श्री हनुमान जी की कृपा से उन्होंने शीघ्र ही अपने मस्तिष्क में बैठे विभिन्न राक्षसों को पहचान लिया |
बाबा मातंग कटे वृक्ष की भांति गिर पड़े | उनके पैर मृत से हो गए | अपने दोनों हाथों को सामने की तरफ फैलाकर वे जमीन पर गिर पड़े और साष्टांग मुद्रा में गिरे हुए रोने लगे | जैसे ही उन्होंने श्री हनुमान जी के चरणों में स्वयं को समर्पित किया , सारे राक्षस उनके मस्तिष्क को छोड़कर भाग खड़े हुए | अंततः उन्हें श्री हनुमान जी की आवाज़ सुनाई दी – “उठो बाबा मातंग , उठो !”
बाबा मातंग ने अपना सिर उठाया | श्री हनुमान वहां खड़े खड़े मुस्कुरा रहे थे | उनका एक हाथ वृक्ष के तने पर था | उर्वा उनके चरणों में नीचे धरती पर बैठा हुआ था | बाबा मातंग ने पुनः साष्टांग प्रणाम किया और बोले –“हे श्री हनुमान ! मेरे दो मातंग भाइयों को किसी विषैले सरीसृप ने काटा है | कृपा उनकी जान बचाइए | उस कुतिया की भी जान बचाइए जो भयानक घावों से कराह रही मृत्यु की प्रतीक्षा कर रही है | कृपा करो प्रभु कृपा करो |”
हनुमान जी की मुस्कराहट और घनी हो गई | उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया |
उधर उर्वा श्री हनुमान जी के दैवीय रूप से प्रस्फुटित हो रही असीम उर्जा की धारा में खोया हुआ था | वह आस पास जो कुछ हो रहा था उससे अनभिज्ञ था | बाबा मातंग के शब्द सुनकर उसे आश्चर्य हुआ | बोला – “बाबा कुतिया को क्या हुआ? क्या आपने उसकी चिकित्सा नहीं की? लेकिन उन्होंने तो मुझे बताया कि कुतिया अब ठीक है?”
“ऐसा तुम्हे किसने बताया?” बाबा मातंग ने पूछा |
उर्वा ने कुछ दूरी पर स्थित दुसरे वृक्ष की और इशारा किया | दोनों मातंग जो कुछ देर पहले सरीसृप के काटे जाने से बेहोश पड़े थे वे अब उस वृक्ष पर लगे मधुमक्खी के छाते से मधु निकाल रहे थे | बाबा मातंग को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ |
अब हनुमान जी बोले –“हे बाबा मातंग , आज आप मधु खोजने के लिए अपने गाँव से निकले थे | लेकिन रास्ते में कुछ और काम आपको मिल गए जिनके कारण आप विचलित हो गए | उन विचलनो को निभाने के पश्चात् आप पुनः अपने मधु खोज के रास्ते पर वापिस आ सकते थे लेकिन आप अचानक आये कामों को पूरा करने की बजाये उनमे उलझते चले गए | अरे भाई ! जब वानर ने आपकी तरफ ओषधियाँ फेंक दी तो उस पर क्रोधित होकर उसके पीछे भागने की बजाये आपको ओषधियाँ उठाकर वापिस जाना चाहिए था | आप आसानी से अपने दो साथियों को ठीक कर सकते थे | फिर उन मातंगों के पास पड़ी विषैली ओषधियों और पानी को लेकर आप कुतिया के पास जा सकते थे और उसे भी ठीक कर सकते थे | और उसके बाद आप फिर से अपने मधु खोजने के कार्य में लग सकते थे |”
“मुझे माफ़ कर दीजिये प्रभु , मै आपकी परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर सका |” बाबा मातंग अपने बारे में दोष और हीनता की भावना से घिर गए |
“आपने कुछ नहीं किया बाबा मातंग , आपके कार्य राक्षसों द्वारा नियंत्रित किये जा रहे थे | क्रोध के राक्षस ने आपको वानर का पीछा करने के लिए प्रेरित किया और आप भटक गए|” भगवान हनुमान ने उत्तर दिया |
“लेकिन राक्षसों ने मेरे शरीर के माध्यम से जो कार्य किये मै ही उसके लिए जिम्मेदार हूँ प्रभु|” बाबा मातंग बोले –“ हम मनुष्य कुछ नहीं करते | हमारे कार्य या तो देवताओं द्वारा निर्देशित होते हैं या असुरों द्वारा | देवताओं द्वारा निर्देशित एक कार्य हमें मोक्ष की तरफ एक कदम नजदीक ले जाता है लेकिन राक्षसों द्वारा नियंत्रित कार्य हमें मोक्ष से 10 कदम और पीछे की और ले जाता है |”
स्वाभाविक रूप से श्री हनुमान मुस्कुरा रहे थे | कुछ क्षण पहले जो बाबा मातंग एक साधारण मनुष्य की भांति रो रहे थे अब वे विद्वतापूर्ण बाते कर रहे थे | हनुमान जी शरारत के लहजे में बोले –“लेकिन बाबा मातंग आपके मस्तिष्क में असुरों ने डेरा कैसे डाला | भला आप तो मातंग हैं और मातंगों में भी श्रेष्ट बाबा मातंग हैं | कैसे आये क्रोध और प्रतिशोध के असुर आपके मस्तिष्क में ?”
बाबा मातंग बोले – “परिस्थितियों पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है प्रभू! मै तो परिस्थितियों की भूल भूलैया में भटक गया था | एक परिस्थिति दूसरी में बदलती चली गई | कोई भी चिंतित हो सकता था | और जब चिंता नाम का असुर मस्तिष्क में आ बैठता है तो अन्य असुर अपने आप आ जाते हैं | क्रोध , प्रतिशोध और भय के असुर परिस्थितियों के कारण आ घुसे थे ...”
भगवान् हनुमान ने पूछा – “तो आपके मन में उन लोगों के प्रति कटु भावनाएं क्यों हैं जो जंगल से बाहर रहते हैं? उनके मस्तिष्क में लालच और स्वार्थ का असुर भी तो परिस्थितियों के कारण कुंडली मारे हुए हो सकता है ? क्या आपने ऐसा सोचा है ?”
उर्वा जो यह वार्तालाप बड़ी तन्मयता और जिज्ञासा से सुन रहा था वह बीच में ही बोल पड़ा | मासूम उच्चारण में बोला – “हे प्रभु हनुमान जी , मै भी ऐसे ही सोच रहा था | जन्म के समय तो हर मनुष्य एक समान ही होता है | स्वयं बाबा मातंग ने मुझे सिखाया है कि आत्मा मोक्ष प्राप्त करने के लिए देह धारण करती है | अगर मनुष्य का हर कार्य देवताओं द्वारा निर्देशित हो तो मोक्ष प्राप्त होता है | हम मातंग यहाँ एकांत में शांति से रहते हैं | लेकिन जंगल से बाहर के लोग उथल पुथल भरे माहौल में रहते हैं | यही कारण है कि हमारे ज्यादातर कार्य देवताओं द्वारा निर्देशित होते हैं किन्तु उनके कार्य स्वार्थ और लालच के असुरों द्वारा निर्देशित होते हैं | लेकिन वे लोग भी आपके भक्त हैं | मैंने उन 3 मनुष्यों के हाथ में आपकी और भगवान राम की मूर्ति देखी है | मैंने उनके चेहरे पर दिव्यता के दर्शन किये हैं | मै भी बाबा मातंग को कह रहा था कि हमें उनसे इतनी कठोरता से व्यवहार नहीं करना चाहिए |”
“हे प्रभु , अगर आप चाहते हैं कि हम मातंग उन लोगों के साथ मेल जोल करें तो हम करेंगे | मै आपके भक्तों के प्रति इतना कठोर व्यवहार करने के लिए आपसे क्षमा मांगता हूँ | मै उन्हें हमारे दैनिक कार्यों में सम्मिलित होने का आमंत्रण दूंगा | मै उनके द्वारा चरण पूजा के लिए दी जा रही भेंट भी स्वीकार करूँगा |” बाबा मातंग ने दोनों हाथ जोड़कर कहा |
भगवान हनुमान ने यह वार्तालाप इन शब्दों के साथ समाप्त किया – “हे बाबा मातंग , मै आपको अपना एकांत त्यागने के लिए नहीं कह रहा हूँ | अपने समाज के लिए पिता स्वरुप होने के नाते आपका कठोर व्यवहार उचित भी है | सभी मातंग अपने जीवन में मोक्ष प्राप्त करते हैं क्योंकि उन्हें इस शांत, एकांत और अनुकूल वातावरण में अपनी जीवन साधना का अवसर मिलता है | यह आपका कर्त्तव्य है कि आप इस अनुकूल वातावरण की रक्षा करें | लेकिन बदलते समय में आपको हर वस्तु को पूर्णता के परिपेक्ष्य में देखना चाहिए| दैवीय योजनाये और आपका मस्तिष्क एकरस होने चाहियें | आपका हर निर्णय आपके अनुभवों के आधार पर होना चाहिए जिसमे आज के अनुभव भी सम्मिलित हैं |”
बाबा मातंग और उर्वा बाद में मधु इकठ्ठा करने के अपने कार्य में लग गए | इस घटना के बाद 4 मातंगों (बाबा, उर्वा और अन्य दो जो मधु की खोज में आये थे) और 3 वानरों (सुचेता , विचेता और उनका बालक) को श्री हनुमान जी के आगमन का बोध हो गया था |
हनुमान जी की लीलाओं का यह अध्याय यही समाप्त होता है |
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आत्मा पर भ्रम की परतें
अध्याय पढने के बाद यह पर्यवेक्षण करना आवश्यक है कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं | अगर आप कुछ ऐसा महसूस कर रहे हैं -"वाह! मैंने कुछ नया पाया |" अथवा "वाह, मैंने कुछ नया सीखा |" अथवा "मेरी अपने प्रभु के प्रति भक्ति ओर भी बढ़ गई|" इत्यादि तो आप अपने प्रभु की ओर एक कदम भी नहीं बढ़ें हैं | आप उतनी ही दूरी पर अटके हुए हैं |
अगर अध्याय पढने के बाद आप कुछ ऐसे महसूस कर रहे हैं जैसे आपके अन्दर से कुछ बाहर निकलकर गिर पड़ा हो और आप आत्मा से हल्का महसूस कर रहे हों तो आप अपने प्रभु की तरफ कम से कम एक कदम बढ़ चुके हैं |"
आपकी आत्मा एक आईने की तरह है जिसके ऊपर इस बाहरी संसार के कारण धुल चढ़ गई है | अगर अध्याय पढने के बाद आप ऐसा महसूस कर रहे हैं कि आपने कुछ नया पा लिया है तो उसका अर्थ है कि आपने अपनी आत्मा पर एक और परत चढ़ा ली है | आप प्रभु के साक्षात् दर्शन तभी कर सकते हैं जब आप ये परतें हटायें |
अतः अगर आप इस समय आत्मा से हल्का महसूस नहीं कर रहे हैं तो आप कुछ समय बाद फिर आकर यह अध्याय पढ़िए |