बुधवार, 30 दिसंबर 2015

अध्याय 7 (वह फल है अथवा सूर्य..?? चिरंजीवी हनुमान जी ने खोला राज..)

यजमान बसंत का परिचय देते हुए बाबा मातंग ने चरण
पूजा आरम्भ की, “हे प्रभु हनुमान ! जब 41 साल पहले
आप आये थे बसंत एक बच्चा था | उस समय हमारा
डेरा सप्त कन्या पर्वत श्रंखला के एक पर्वत पर था |
वही पर पिछली बार की चरण पूजा हुई थी | यहाँ
उपस्थित सभी ब्राह्मणों , जिनमे से मै भी एक हूँ , ने
आपसे परम ज्ञान की प्राप्ति वही पर की थी |
हमने वह पर्वत श्रंखला क्यों छोड़ी , यह एक बहुत ही
पीड़ादायक घटना है | उस घटना को फिर से याद
करना मात्र भी मेरे लिए पीड़ादायक है किन्तु उस
घटना का वर्णन किये बिना बसंत का परिचय पूर्ण
नहीं होगा |”

बाबा मातंग ने एक गहरी सांस ली और बताने लगे - “हे
हनुमान जी , 41 साल पहले जब आपने हमसे विदा ली
थी उसके बाद कुछ ही महीने बीते थे कि बाबा
मातंग भी विष्णु लोक प्रस्थान कर गए | उसके बाद मैं
बाबा मातंग बना | बाबा पद के साथ जुडी हुई
जिम्मेदारियों को निभाना कठिन नहीं था
क्योंकि उस समय सभी वयस्क मातंग आपसे सीधे परम
ज्ञान प्राप्त किये हुए थे | उन सबको पता था कि
तन -मन - विवेक की सम्पूर्ण पवित्रता के साथ कैसे
जीवन जीया जाता है | बाबा बनने के बाद मेरी
पहली परीक्षा लेकिन ज्यादा दूर नहीं थी | एक
शाम रात्रि के भोजन के पश्चात् मैंने घाटी में एक
अजीब सा सन्नाटा अनुभव किया | भोजन के बाद मै
अपनी कुटिया में गया और हस्तिकर्ण ले आया |

सेतु टिपण्णी : हस्तीकरण मातांगो का एक शंख के
आकार का ऐसा यन्त्र होता है जो अति धीमी
आवाज भी पकड़ लेता है | इतनी धीमी आवाज जिसे
कि मानव के कान नहीं सुन पाते |

“मैंने असुरों की फुसफुसाहट को सुना | दर्जनों असुरों
का एक झुण्ड पर्वत के शिखर की ओर इकठ्ठा था |
हस्तिकर्ण की मदद से उनकी फुसफुसाहट को नीचे
घाटी में आराम से सुना जा सकता था | मैंने उनको
कहते सुना - “कितना सुनहरा अवसर है | ... कितने
समय बाद ... कितना सुनहरा अवसर ...”

“बुराई को अनुभव करने का अवसर ही तो असुर हमेशा
ढूंढते रहते है | यह तो निश्चित था कि पर्वत पर कोई
बुरी घटना होने वाली थी | कुछ ही मिनट बाद यह
भी पता चल गया कि वे किस अवसर के बारे में बातें
कर रहे थे | हमने एक विमान को पर्वत में टकराते देखा
| विमान में सफ़र कर रही दर्जनों आत्माए अपनी देहो
से बाहर हो गई और विमान आग के गोले में बदल गया
|

[सेतु टिपण्णी : यहाँ पर जिस विमान दुर्घटना का
जिक्र हुआ है यह संभवतः मर्तिनेयर फ्लाईट संख्या
138 का जिक्र है जो 4 दिसम्बर 1974 को सप्त
कन्या पर्वत पर दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी | यह
इंडोनेशिया से कोलोम्बो होते हुए मक्का जा रही
एक चार्टर्ड फ्लाईट थी | सेतु द्वारा श्री लंका के
अधिकारीयों के साथ पुष्टि किये गए दस्तावेजों के
अनुसार इस दुर्घटना में 182 हज यात्री और 9 चालक
दल के सदस्य मारे गए थे |]

“घाटी का सन्नाटा अब जंगल के पक्षियों और पशुओं
की चीखों में बदल गया था | मैंने बाबा मातंग के रूप
में अपना पहला महत्वपूर्ण निर्णय लिया | मैंने सभी
मातांगो को वह पर्वत छोड़कर सप्तकन्या श्रंखला के
सबसे दूर स्थित पर्वत पर स्थानातरित होने का
निर्देश दिया क्योंकि मुझे पता था कि पौह फटते
ही वहां “बाहर वाले लोग” और “राजा के सैनिक”
दुर्घटना का विश्लेषण करने के लिए आ जायेंगे |
(राजा के सैनिक का अर्थ है श्री लंका के सुरक्षा
बल )

“उस समय बसंत के पिता के अलावा सभी मातंग
उपस्थित थे | वह अपने पूर्वजों से बात करने के लिए
पर्वत शिखर की ओर गया हुआ था | जब घबराए हुए
पक्षी कुछ समय बाद अपने अपने घोंसलों में बैठ गए तब
मैंने पक्षियों के द्वारा बसंत को सन्देश भेजा |
विमान दुर्घटना उसके बहुत समीप हुई थी किन्तु वह
सुरक्षित था | मैंने उसको तुरंत नीचे घाटी में उतर आने
को कहा |

“हे हनुमान जी , आपको तो पता है कि हम मातंग
लोग केवल एक ही भौतिक खजाना अपने पास रखते
हैं --- उन रत्नों का खजाना जो मातंगों के हर
परिवार को पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत में मिला है| ये
रत्न हमें अपने पूर्वजों से संपर्क साधने में सहायक होते
हैं | जब भी कोई धर्मसंकट आता है तो हम अपने
पूर्वजों से संपर्क साधते हैं जो हम मानते हैं कि वे अब
भी समय के नकारात्मक निर्देशांकों (भूतकाल) में
जीवित हैं |

“पर्वत से जल्दी जल्दी उतरने के प्रयास में बसंत के
पिता अपने रत्न खो बैठे | अँधेरा घना था और बसंत के
पिता के पास जो मशाल थी उसका प्रकाश इतना
नहीं था कि रत्न ढूंढे जा सकते | लम्बे प्रयास के
पश्चात् भी जब उसे रत्न नहीं मिले तो मैंने उसे वहां
चट्टानों पर निशान लगाकर नीचे उतर आने को कहा
ताकि हम रत्न बाद में ढूंढ सकें |

“हमने रातो रात वह स्थान खाली कर दिया और
सप्त कन्या श्रंखला के सबसे दूर स्थित पर्वत पर चले
आये | कुछ महीने बाद जब हम दोबारा उस स्थान पर
लौटे तो हमने देखा कि “बाहरी लोगो” और सैनिकों
ने हमारे डेरे को तहस नहस कर दिया था | हम उस
स्थान पर गए जहाँ पर बसंत के परिवार के रत्न खो गए
थे | कई दिनों तक हमने उन रत्नों को ढूँढने की
कोशिश की लेकिन असफल रहे | मुझे आभास हुआ कि
किसी बाहरी मनुष्य ने वे रत्न वहां से चोरी कर लिए
थे | उस बाहरी मनुष्य के लिए वे रत्न केवल मूल्यवान
पत्थर भर थे लेकिन बसंत के परिवार के लिए तो वे रत्न
उनके पूर्वजों से संपर्क साधने का एकमात्र मार्ग थे |

“कुछ ही समय में मुझे आभास हो गया कि रत्नों के
गुम होने के साथ साथ कुछ ओर भी गुम होता चला
जा रहा था | मातंग उन रत्नों के खो जाने की वजह
से अपने मोक्ष का मार्ग भी भटकते जा रहे थे | जब
भी वे अपने दैनिक कार्य के लिए इधर उधर जाते वे उन
रत्नों की खोज करते थे |दिन भर दिन उनका स्वभाव
उन बाहरी मानवों जैसा होता जा रहा था जो
हमेशा भौतिक वस्तुओं के पीछे लगे रहते हैं | फिर मैंने
निर्णय लिया कि सभी मातंग परिवार अपने अपने
रत्न नदी में फेंक देंगे ताकि वे बसंत मातंग के परिवार के
समकक्ष हो सकें | इस निर्णय को लागू करने के लिए
आपकी आज्ञा लेने के लिए मैंने एक पूजा का
आयोजन किया | लेकिन आपने आज्ञा नहीं दी |
आपने परामर्श दिया कि मैं बसंत के परिवार को गोद
ले लूँ ताकि मेरे रत्न वे भी प्रयोग कर सकें | मैंने वैसा
ही किया | उन खोये हुए रत्नों की बुरी यादों को
पीछे छोड़ने के लिए सभी मातंगों ने सप्त कन्या पर्वत
श्रंखला का त्याग कर दिया और यहाँ आ गए |

“हे हनुमान जी , यह चरण पूजा के पहले यजमान बसंत
का परिचय मैंने दिया | उसके पिता अपने पूर्वजों की
उस धरोहर को खोने के सदमे को कभी भुला न सके |
उसकी देह बूढी होकर प्राणहीन हो गई लेकिन
उसकी आत्मा विष्णुलोक में नहीं गई | उसकी आत्मा
अब भी यहाँ है , देह हीन , केवल एक इच्छा लिए हुए --
अपने परिवार को वे रत्न वापिस लेते देखना | एक
आत्मा की केवल एक इच्छा हो और उसके कर्मों का
खाता बिलकुल खाली हो तो ऐसी आत्मा इस
कलियुग में नई देह नहीं धारण कर सकती | जैसे ही इस
आत्मा की एकमात्र इच्छा पूर्ण हो जायेगी , यह
विष्णुलोक चली जायेगी | लेकिन मेरी चिंता बसंत
को लेकर है | बचपन में इसके परिवार के ऊपर गुजरी इस
विपदा के कारण बहुत सारे असुरों और सुरों ने इसकी
आत्मा को प्रभावित किया है जिसके चलते इसके
कर्म खाते में बहुत सारे कर्म जमा हो गए हैं | इसीलिए
मैंने इसे चरण पूजा के पहले घंटे का यजमान बनाया है |
अगर जरुरत पड़े तो इसे हर रोज चरण पूजा का अवसर
प्रदान किया जाए ताकि इसके कर्मों का
परिष्करण हो सके |”

जैसे ही बाबा मातंग ने बसंत का परिचय समाप्त
किया , होतार उर्वा खड़ा हो गया | उसने पूछा - “हे
हनुमान जी , मैं यह जानने को उत्सुक हूँ को वे रत्न इस
समय कहाँ हैं ? क्या वे उसी मनुष्य के पास हैं जिसने
उनको सप्त कन्या पर्वत से चोरी किया था ? क्या
बसंत के परिवार को वे रत्न वापिस मिल पायेंगे ? अगर
नहीं तो बसंत के पिता की आत्मा को मुक्ति कैसे
मिलेगी ?”
हनुमान जी मुस्कुराये | यह मुस्कराहट इस बात का
इशारा थी कि प्रश्न का उतर सीधा नहीं होने
वाला है | हनुमान जी ने उत्तर दिया - “अगर उन
रत्नों को पाने की इच्छा यहाँ है तो रत्न भी यहाँ हैं
|”
“लेकिन यह कलियुग है , प्रभु ! कलियुग में प्रकट की हुई
इच्छाएं संख्या में अपरिमित है | और उसके ऊपर उन
इच्छाएं के मध्य विरोधाभास है सो अलग | उदाहरण
के तौर पर जिस मनुष्य ने वे रत्न चुराए थे उसकी इच्छा
और बसंत के परिवार की इच्छा अवश्य
विरोधाभासी होंगी | दोनों तरफ ही रत्न लेने की
इच्छा होगी ! और मुझे संदेह है कि असुर भी उसी
मनुष्य का साथ दे रहे हैं जिसने वे रत्न चुराए थे | तभी
तो हमें वे रत्न प्राप्त नहीं हुए !” उर्वा इस उम्मीद में
यह सब बोला कि हनुमान जी से उसे कोई सरल उत्तर
प्राप्त होगा |
हनुमान जी ने उत्तर दिया - “जिस मनुष्य ने वे रत्न
चुराए थे उसके जीवन में शांति भंग हो गई | किसी
ज्ञानी पुरुष के कहने पर उसने उन रत्नों को एक डिब्बे
में डालकर नदी में फेंक दिया | वह डब्बा तैरते हुए समुद्र
में पहुंचा , फिर सालों समुद्र में रहकर डब्बा क्षीण
हुआ और समुद्रतल में डूब गया |”
“तो वे रत्न समुद्रतल में हैं !” उर्वा की आँखे एकबारगी
तो चमक उठी लेकिन अगले ही क्षण आये विचार ने
वो चमक सोख ली - “लेकिन वहां से रत्न वापिस कैसे
आयेंगे ?”
हनुमान जी पुनः मुस्कुराये और अपने शब्द दोहराए -
“अगर उन रत्नों को प्राप्त करने की इच्छा यहाँ है तो
वे रत्न भी यही हैं |”
“लेकिन ... यह ... कलियुग है ... “ उर्वा बुदबुदाया |
बाबा मातंग ने उलझन में फंसे उर्वा को समझाया -
“हम इस समय हनुमंडल के अन्दर खड़े हैं और यहाँ पर
सतयुग जैसा है | अगर यहाँ कोई इच्छा प्रकट की
जाती है तो वह बिना किसी विरोधाभासजनित
अवरोध के पूर्ण हो जायेगी | वे रत्न जहाँ भी हों वे
यही हनुमंडल में आ जायेंगे |”
जब बाबा मातंग ने अपना वक्तव्य पूर्ण किया ,
हनुमंडल के बाहर खड़े असुरों और ऊपर उड़ रहे सुरों में
हलचल दिखाई दी | बाबा को अहसास हुआ कि उस
हलचल का स्त्रोत वे नहीं अपितु बसंत था जो अपनी
जगह पर आँखे बंद किये बैठा था और होंठों से कुछ
बुदबुदा रहा था | स्पष्टत: वह रत्न प्राप्त करने की
इच्छा प्रकट कर रहा था | बाबा तुरंत बोले - “रुको ,
रुको , ऐसा मत करो |”
सबने बसंत की तरफ जिज्ञासा भरी दृष्टि से देखा ,
विशेषतः उर्वा ने | बाबा मातंग बोले - “बसंत , तुम्हे
पता है तुमने अभी अभी कितनी इच्छाएं प्रकट की ?
हज़ार से भी ज्यादा ! हाँ ! इच्छाएं जागृत मन से ही
नहीं अपितु अर्द्ध-जागृत और सुप्त मन से भी प्रकट
होती हैं | जब तुम अभी अभी अपने जागृत मन से रत्न
वापिस पाने की इच्छा व्यक्त कर रहे थे , उन्ही कुछ
पलों में तुम्हारा अर्द्धजागृत तथा सुप्त मन उस
त्रासदीपूर्ण घटना से लेकर आज तक की रत्नों से
जुडी तुम्हारी सभी स्मृतियों को खंगाल रहा था |
कुछ ही पल में तुमने हज़ारों इच्छाएं प्रकट कर दी |
अगर तुम्हे अपनी रत्न वापिस पाने के इच्छा पूर्ण
करनी है तो तुम्हे केवल वही इच्छा प्रकट करनी
होगी -- उसके साथ कोई भावना अथवा कोई अन्य
इच्छा जोड़े बिना | इस समय तुम ऐसा नहीं कर
पाओगे | तुम्हे सबसे पहले अपने कर्मों को परिष्कृत
करना पड़ेगा | अतः जब तक मै अर्पण की प्रक्रिया
पूर्ण न कर लूँ , कृपा शांत बैठे रहो |”
“मै क्षमा चाहता हूँ |” बसंत खड़ा होकर बोला -
“अब मैं आपके विद्वतापूर्ण शब्दों से प्रबुद्ध हो गया हूँ
| मैं शांति से बैठूँगा | कृपा प्रक्रिया शुरू करें |”
जब बसंत अपनी जगह पर वापिस शांति से बैठ गया ,
बाबा मातंग ने अर्पण की प्रक्रिया शुरू की | हनुमान
जी को संबोधित करते हुए बोले - “हे हनुमान जी !
अगर बसंत की आत्मा यहाँ एक मातंग के रूप में
उपस्थित है तो यह इसके पिछले कर्मों के कारण है |
आज इसकी आत्मा जो भी है वह वस्तुतः इसके पिछले
कर्मों का कुल जोड़ है | बसंत फलों की एक टोकरी
अर्पण के लिए लाया है | यह फल भी इसके पिछले
कर्मों का कुल जोड़ हैं | आज इसकी आत्मा अपनी
सभी इच्छाओं को त्यागने की इच्छा रखती है और
अपने सभी पिछले कर्मों को आपके पवित्र चरणों में
समर्पित करना चाहती है | यजमान बसंत की तरफ से
मै यह फल एक एक करके आपके चरणों में अर्पित करने के
लिए खड़ा हुआ हूँ |”
हनुमान जी ने अपना मुख हिलाकर अर्पण की
आज्ञा दी और आँखे बंद करके ध्यान में चले गए |



तीन ब्राह्मण बाबा मातंग की सहायता के लिए
खड़े हुए | तीनों के पास एक एक खाली टोकरी थी |
उनमे से एक सीधे हनुमान जी के पास गया और उनके
चरणों में एक खाली टोकरी रख दी |
हनुमान जी के सामने एक आयताकार जलाशय
बनाया गया था | दूसरा ब्राह्मण उस जलाशय के उन
दो कोनों में से एक के पास गया जो हनुमान जी के
नजदीक थे और वहाँ एक खाली टोकरी रख दी | इस
टोकरी के चारों ओर लाल रंग का कपडा और लाल
धागे लिपटे हुए थे | तीसरा ब्राह्मण उन दो किनारों
में से दुसरे किनारे पर गया और वहां एक खाली
टोकरी रख दी | यह टोकरी श्वेत रंग के कपडे और श्वेत
धागों से लिपटी होने के कारण श्वेत थी |
जब तीनों ब्राह्मण अपने अपने स्थान पर वापिस लौट
गए तब हनुमान जी ने बसंत द्वारा लाई हुई टोकरी में
से एक फल उठाया | उन्होंने फल को अपने माथे पर
लगाया और कुछ मिनट तक उसी अवस्था में रहे | इस
दौरान उनकी आँखे बंद थी और हनुमंडल में भी
सन्नाटा था |
बाबा मातंग धीरे से जलाशय के पास आये और उसकी
परिक्रमा करने लगे | उर्वा बाबा मातंग की
गतिविधियों को बहुत ही पैनी दृष्टि से देख रहा
था | जलाशय का एक चक्कर पूरा करने के बाद बाबा
मातंग थोड़े से हनुमान जी के चरणों की ओर चले | तुरंत
एक असुर हनुमंडल के अन्दर घुस आया | उर्वा ने देखा
कि कुछ अन्य असुरों ने भी हनुमंडल में घुसने का प्रयास
किया और सुरों में भी हलचल हुई |

बाबा मातंग तुरंत पीछे हट गए और फिर
से जलाशय की परिक्रमा करने लगे | वह
असुर जो अन्दर घुस आया था , पुनः
बाहर चला गया |
जब बाबा मातंग ने दूसरी परिक्रमा पूर्ण
की, फिर से वैसा ही हुआ | एक - दो
असुर हनुमंडल के अन्दर घुस आये और सुरों में
भी गतिशीलता आई |
बाबा मातंग ने इस तरह 7 परिक्रमाए की
और अंततः फल को जलाशय के एक कोने
पर रखी लाल टोकरी में डाल दिया |
बाबा वेदी के पास आ गए जहाँ ब्राह्मण
अग्निदेव को पवित्र द्रव की आहुति दे
रहे थे | उर्वा भी वही आ गया | बाबा
और उर्वा श्लोक उच्चारण करने लगे | ये
श्लोक वस्तुतः बाबा और उर्वा के बीच
हुआ वार्तालाप का हिस्सा थे जो कुछ
यूँ थी :
होतर उर्वा ने कहा - “बाबा , पहला
फल लाल टोकरी में गया है न कि
हनुमान जी के चरणों में रखी टोकरी में |
क्या इसका अर्थ यह है कि चरण पूजा में
अर्पण का सबसे पहला प्रयास असफल
रहा ?”
बाबा मातंग बोले - “नहीं होतर |
प्रयास सफल था | अगर मै उस फल को
हनुमान जी के चरणों में अर्पित करने का
प्रयास करता तो एक असुर हनुमान जी
का असम्मान करने में सफल हो जाता |
वह वास्तविक असफलता होती | मैंने
सफलतापूर्वक ऐसा होने से बचा लिया
और फल को लाल टोकरी में दाल दिया
|”
“लेकिन वह फल हनुमान जी को अर्पित
नहीं हुआ ना बाबा|”
“हाँ तुम कह सकते हो कि वह फल छंटनी
प्रक्रिया में होकर बाहर निकल गया |
वह फल हनुमान जी को अर्पित करने
योग्य नहीं था |”
“हे बाबा , यहाँ पर उपस्थित मातंगों के
ज्ञान लाभ के लिए कृपया विस्तार में
बताइये कि वह फल हनुमान जी को
अर्पित करने योग्य क्यों नहीं था |
कृपया बताएं कि जब आपने फल को अपने
माथे से लगाया तो आपने क्या देखा ?
और जब आपने जलाशय की परिक्रमा
की तो आपने क्या अनुभव किया?”
बाबा ने उत्तर दिया - “हे होतर , जब मैंने
उस फल को अपने माथे से लगाया तो
बसंत के उन कर्मों को देखा जिनको वह
फल प्रतिबिंबित कर रहा है | मैंने बसंत के
हज़ारों कर्मों को देखा | उनमे से कुछ
कर्म किसी और के प्रभाव में नहीं बल्कि
स्वयं बसंत की आत्मा की इच्छाओं के
प्रभाव में किये गए थे | लेकिन कुछ कर्म
सुरों और असुरो के प्रभाव में किये गए थे |
अतः फल का वास्तविक स्वामित्व बसंत
की आत्मा, कुछ सुरों तथा कुछ असुरों के
बीच बंटा हुआ था | फल के उन सभी
स्वामियों में से केवल उस स्वामी को
वह फल प्रभु को अर्पित करने या न करने
का अधिकार है जिसका हिस्सा उसमे
सबसे अधिक है | इस फल में सबसे ज्यादा
हिस्सा उस असुर का है जो हनुमंडल के
अन्दर घुस आया था | अगर मैं उस फल को
प्रभु के चरणों में अर्पित करने का प्रयास
करता तो वह असुर यहाँ उपस्थित देहों में
किसी भी देह में घुस जाता और फिर
या तो वह प्रभु को असम्मानित करने
की कोशिश करता अथवा पूजा में कोई
और अवरोध पैदा करता | मैंने
सफलतापूर्वक ऐसा होने से बचा लिया |
अतः चरण पूजा में अर्पण का प्रथम
प्रयास सफल कहा जाएगा |”
उर्वा ने पुछा - “बाबा , कृपा हमें बताएं
कि वह असुर बसंत के कर्मों में भागीदार
कैसे बन बैठा ?”
बाबा मातंग ने उत्तर दिया -“जब मैंने उस
फल को अपने माथे पर लगाया , तब मैंने
बसंत के बहुत सारे कर्मों को देखा | उन
कर्मों में से मैं 3 का वर्णन करता हूँ
जिससे यह समझ में आएगा कि वह बसंत के
कर्मों में भागीदार कैसे है |
“मैंने देखा कि एक दिन बसंत एक वृक्ष
की शाखा पर चढ़ रहा था | उसे आभास
था कि एक पक्षी का घोंसला उस
शाखा पर है | दुर्घटना से उसका पैर
घोंसले पर पड़ गया | घोंसले के अन्दर
पक्षी के अंडे थे जो फूट गए | बसंत को
बहुत पछतावा हुआ | उसे विश्वास नहीं
हो रहा था कि उसका पैर घोंसले पर
चला कैसे गया जबकि उसे आभास था
कि घोंसला शाखा पर है | पक्षी के अंडे
तोड़ने के अपराधबोध में उसने स्वयं को
बहुत बुरा भला कहा |
“वास्तव में अंडे उसने नहीं तोड़े थे | एक
असुर ने उसकी देह का उपयोग करके वह
बुरा कार्य किया था | उर्वा , यहाँ पर
ध्यान देने वाली बात यह है कि उस असुर
ने बसंत की केवल देह को अपने अधीन
किया था | बसंत का विवेक स्वयं उसके
नियंत्रण में था | विवेक से हम क्या बुरा
है और क्या भला इसका निर्णय लेते हैं |
बसंत को उस बुरे कार्य का पछतावा था
| जब उसका पैर घोंसले पर पड़ा तब उसे
अहसास था कि उससे बुरा कार्य हो
गया है | अर्थात उसका विवेक उसके स्वयं
के अधीन था | असुर ने केवल उसकी देह
को अधीन किया था |
“जब कोई असुर किसी देह का उपयोग
करके बुरा कार्य करने में सफल हो जाता
है तो वह उसी देह के आस पास मंडराता
रहता है , इस ताक में कि उसे फिर से
कोई बुरा कार्य करने का अवसर प्राप्त
हो और वह उस देह का उपयोग वह बुरा
कार्य करने के लिए करे | इतना ही नहीं ,
वह बुरे कार्य का अवसर पैदा करने के
लिए भी उस देह तथा मन को चालाकी
से प्रयोग करने की कोशिश करता है |
यही असुरों का स्वभाव है |
“वह असुर भी फिर से बुरा कार्य करने के
अवसर की ताक में बसंत की देह के आस
पास मंडराता रहा | और फिर अवसर भी
आया | कुछ दिन बाद बसंत एक मधुमक्खी
के छाते से शहद तोड़ रहा था | पास में
एक पक्षी का घोंसला कुछ इस प्रकार
स्थित था कि बसंत को वह एक बेवजह
का अवरोध लगा | उसने लात मारकर वह
घोंसला नीचे गिरा दिया ताकि वह
आसानी से शहद इकठ्ठा कर सके | जब
उसने सारा शहद तोड़ लिया तब उसने
नीचे पड़े घोंसले को देखा | उसमे जो अंडे
थे वे फूट गए थे | उसे अहसास हुआ कि
घोंसले को गिराने का उसका निर्णय
सही नहीं था | “मै इतना बुरा कार्य
कैसा कर सकता हूँ ? मै उस घोंसले को
बिना गिराए भी अपना शहद तोड़
सकता था |” उसे बहुत पछतावा हुआ |
वास्तव में वह बुरा कार्य उसने नहीं
बल्कि असुर ने उसकी देह का उपयोग
करके किया था | यहाँ पर ध्यान देने
वाली बात यह है कि इस बार असुर ने न
केवल उसकी देह को अपने अधीन किया
था , बल्कि उसके विवेक को भी अपने
अधीन कर लिया था | तभी तो उसने
अपने विवेक से घोंसला गिराने का बुरा
निर्णय लिया | वह बाद में पछताया
क्योंकि उसका “संस्कार” असुर ने अपने
अधीन नहीं किया था | उसे अपने
संस्कार के अनुसार वह कार्य बुरा लगा

इसीलिए वह पछताया |


“कुछ महीने बाद मैंने बसंत को अपने कार्य
हेतु एक विशेष पक्षी का पंख लाने के
लिए कहा | जब उसे कई घंटों तक कोई
पंख नहीं मिला तो उसने पंख के लिए उस
विशेष पक्षी को मारने का निश्चय
किया | उस शाम जब वह पंख लेकर मेरे
पास आया तो मैं तुरंत समझ गया कि
उसने एक पक्षी की हत्या की है | जब
मैंने उसके लिए सजा घोषित की , वह
मुझसे बहस करने लगा | उसने तर्क दिया,
उस पक्षी को किसी न किसी दिन
मरना ही था , रोज इस संसार में पता
नहीं कितने पक्षी मासाहारी
प्राणियों का आहार बनते हैं | उसे अपने
बुरे कर्म का ज़रा सा भी पछतावा नहीं
था | अर्थात असुर ने न केवल उसकी देह,
मन तथा विवेक को अपने अधीन कर
लिया था , उसका संस्कार भी असुर के
अधीन हो गया था |
“क्या तुम्हे अब समझ आ रहा है होतर कि
वह असुर बसंत के कर्मों में भागीदार कैसे
बना ? क्या तुम्हे अब समझ आ रहा है कि
क्या होता अगर मै वह फल प्रभु के चरणों
में अर्पित करने की कोशिश करता?”
बाबा का श्लोक था |
उत्तर में उर्वा का श्लोक था - “हाँ हे
मातंगों में श्रेष्ठ! अब मै समझ गया हूँ कि
वह असुर हनुमंडल में कैसे प्रविष्ट कर गया
था ! अगर आप हनुमान जी के चरणों में
वह फल अर्पित करने का प्रयास करते तो
वह असुर आज फिर एक, और बड़ा , बुरा
कर्म करने में सफल हो जाता | और फिर
वह और भी ज्यादा शक्ति से बसंत की
देह के पास मंडराता रहता |”
बाबा ने उर्वा को संबोधित करते हुए एक
और श्लोक का उच्चारण किया - “हे
मातांगो के भविष्य के रक्षक , हे उर्वा ,
बताओ कि अब जबकि मैंने उस असुर के
द्वारा एक और बड़ा बुरा कार्य करने
का प्रयास असफल कर दिया है तो
इसका क्या असर होगा ?”
उर्वा ने उत्तर दिया - “अब वह असुर बसंत
के आस पास मंडराना बंद कर देगा
क्योंकि यह असुरों को स्वाभाव है --
जब कोई आत्मा उन्हें बुरा कार्य नहीं
करने देती है तो वे किसी अन्य स्थान पर
अपना अवसर तलाशने निकल जाते हैं |”
उर्वा और बाबा अब वेदी से उठ गए
जबकि अन्य ब्राह्मणों ने अग्निदेव को
आहुति देने का क्रम जारी रखा | उर्वा
होतर के लिए निर्धारित स्थान पर बैठ
गए और बाबा ने बसंत द्वारा अर्पण के
लिए लाइ गई फलों की टोकरी में से एक
फल और उठा लिया | हनुमान जी अब
भी ध्यान में थे और उनकी आँखें बंद थी |
बाबा ने दुसरे फल के लिए प्रक्रिया को
दोहराया | अंततः उन्होंने दूसरा फल भी
लाल टोकरी में डाल दिया | एक के बाद
एक 3 दर्जन से अधिक फलों को लाल
टोकरी में ही स्थान मिला | उसके बाद
एक फल श्वेत टोकरी में डाला गया (एक
फल श्वेत टोकरी में तब डाला जाता है
जब उस फल का सबसे ज्यादा स्वामित्व
किसी सुर के पास हो |)
लगभग 3 घंटे बीत गए | बसंत की टोकरी
में अब केवल 1 फल बचा था | लाल
टोकरी में ज्यादातर फल गए थे जबकि
एक दो फल श्वेत टोकरी में दिखाई दे रहे
थे | जब कोई फल श्वेत या लाल टोकरी
में गिरता था तब बसंत की आत्मा हल्का
महसूस कर रही थी क्योंकि उसको सुरों
और असुरों के प्रभावों से छुटकारा मिल
रहा था |
बाबा मातंग चिंतित दिखाई दे रहे थे |
उसका कारण यह था कि हनुमान जी के
पवित्र चरणों में रखी टोकरी अब भी
पूरी तरह खाली थी | अभी तक एक भी
फल इस योग्य नहीं मिला था जिसे
हनुमान जी को अर्पित किया जा सके
| यह शुभ संकेत नहीं था , विशेषकर
इसलिए कि यह चरण पूजा का सबसे
पहला अर्पण था |
यह बाबा मातंग के “मातंग पवित्रता” के
दंभ को भी चोट थी | वह हमेशा
उदाहरण देते थे कि “बाहर वाले
मनुष्य” (अर्थात जो मातंग नहीं हैं) किस
प्रकार सुरों तथा असुरों के अत्यधिक
प्रभाव में रहते हैं | लेकिन वहां , उन्ही के
कुल का , एक मातंग , एक भी ऐसा फल
लाया प्रतीत नहीं हो रहा था जो
हनुमान जी को अर्पित करने योग्य हो |
जब बाबा मातंग ने बसंत की टोकरी से
अंतिम फल उठाकर अपने माथे से लगाया
तो उनकी सारी आशाओं पर पानी फिर
गया | जिन कर्मों का प्रतिबिम्ब वह
फल था , उनमे से ज्यादातर कर्म सुरों
और असुरों के प्रभाव में प्रतीत हो रहे थे |
उन्होंने जलाशय की परिक्रमा आरम्भ
की | 7 बार परिक्रमा करने के बाद
निष्कर्ष निकला कि वह फल भी लाल
टोकरी में डालने योग्य ही था |
बाबा मातंग उस फल को लाल टोकरी में
डालने को झुके ही थे कि उन्हें अच्छा
विचार आया | वे जलाशय की 8 वी
बार परिक्रमा करने लगे |
फल केले का था | 8 बार जलाशय की
परिक्रमा करने के पश्चात् उन्होंने फल
को अपने हाथ में इधर उधर घुमाया | ऐसा
प्रतीत हो रहा था कि वे कुछ आंकलन
कर रहे थे | उन्होंने केले के छिलके को एक
तरफ से छीला और छीले हुए छिलके को
लाल टोकरी में डाल दिया क्योंकि वह
किसी असुर के मुख्य स्वामित्व में था |
उन्होंने कई बार जलाशय की परिक्रमा
की | हर बार केले के एक भाग को अलग
किया , आंकलन किया कि वह भाग
किसके स्वामित्व में है और उसी अनुसार
उस भाग को टोकरियों में रखते चले गए |
अंततः उन्हें केले का एक ऐसा छोटा
भाग ढूंढ लिया जिस पर बसंत की
आत्मा का पूर्ण स्वामित्व था | उन्होंने
केले के उस भाग को हनुमान जी के चरणों
में रखी टोकरी में रख दिया |
चरण पूजा का पहला अर्पण जो यजमान
बसंत की तरफ से था , पूर्ण हुआ | हनुमान
जी ने अपनी आँखे खोली | उन्होंने
अर्पित किये गए केले के छोटे से टुकड़े की
ओर देखा और मुस्कुरा दिए | बाबा
मातंग विनम्रता से बोले - “हे प्रभु , मुझे
क्षमा करें | मैंने अपने कुल में अधिकतम
पवित्रता के मानक बनाए रखने की
कोशिश की है | लेकिन बसंत कुछ विशेष
परिस्तिथियों में पला बढ़ा है जो सप्त
कन्या पर्वत में रत्न खो जाने के बाद शुरू
हुए | इसके कर्म सुरों और असुरों ने
अत्यधिक मात्रा में प्रभावित किए हैं |
यह फल का एक टुकड़ा ही यह आपको
अर्पण कर पाया है | मैं प्रार्थना करता
हूँ कि आप उसे अर्पण के लिए ओर अवसर
प्रदान करें | जब तक चरण पूजा चलती है
तब तक हर रोज एक घडी बसंत को
यजमान बनाया जाए ताकि वह अपने
कर्मों का परिष्करण कर सके |”
हनुमान जी मुस्कुरा भर दिए | उन्होंने
एक शब्द भी नहीं बोला |
बाबा मातंग ने धीमी आवाज में बड़ी
विनम्रता से कहा - “हे प्रभु , मै अब होतर
उर्वा को अनुरोध करता हूँ कि वे
कपिद्रष्ट को हनुमंडल के अन्दर सादर ले
आयें |
कपिद्रष्ट , “होतर” की तरह ही एक पद
होता है जो किसी वानर को मिलता
है | कपिद्रष्ट के बिना अर्पण पूर्ण नहीं
होता | बाबा मातंग के निर्देशानुसार
उर्वा कपिद्रष्ट वानर को हनुमंडल के
अन्दर ले आया |
कपिद्रष्ट ने हनुमान जी के आसन के
चारों और परिक्रमा लगाईं | यह हनुमान
जी को प्रणाम कहने का उसका तरीका
था | उसके पश्चात् वह हनुमान जी के
सामने बैठ गया और अपनी मासूम दृष्टि
से हनुमान जी को एकटक निहारने लगा
| हनुमान जी मुस्कुराये और बोले - “हे
कपिद्रष्ट , बसंत मातंग ने मुझे यह फल का
एक टुकड़ा श्रद्धा से अर्पित किया है |
मैं इसको आपके मुख के माध्यम से आहूत
करना चाहता हूँ |”
कपिद्रष्ट ने हनुमान जी के चारों ओर
एक और परिक्रमा लगाईं और फिर
हनुमान जी के चरणों में रखी टोकरी में
से फल के टुकड़े को उठा लिया | फल
खाने के पश्चात् उसने हनुमान जी का
आभार व्यक्त करने के लिए उनके आसन
की एक और परिक्रमा की | हनुमान जी
ने अपने पेट पर हाथ रखा और बोले -
“क्या स्वादिष्ट अर्पण है |” (जैसे कि
कपिद्रष्ट वानर ने नहीं बल्कि उन्होंने
ही फल खाया हो |)
कपिद्रष्ट के मुख से चीख निकली | वह
कह रहा था - “हे प्रभु , आप वो हैं जो इस
संसार में चिरंजीवी फल खाने के लिए
प्रसिद्ध हैं -- वह फल जो आकाश में
लटकता है और इतना दैदीप्यमान है कि
इस संसार के सभी फल उसी से प्रकाशित
होते हैं | वह फल जो इतनी दूरी पर लटका
हुआ है कि नश्वर प्राणी उस तक नहीं
पहुँच सकते | अगर कोई उस तक पहुँचने का
प्रयास करता है तो वह फल अपनी आभा
से उसे जला देता है | जिन प्रभु ने
प्रसिद्ध रूप से उस फल का सेवन किया है
, उन प्रभु को यह केले का छोटा सा
टुकड़ा कैसे स्वादिष्ट लग सकता है ? मै
मानता हूँ कि आप अपने भक्तों को
प्रसन्न करने के लिए ऐसा कह रहे हैं |”
वानर की उस चीख से उर्वा की आँखें
चमक उठी | उसे एक ऐसा प्रश्न ध्यान में
आ गया था जो वह हमेशा पूछना
चाहता था | उसने एक भी पल व्यर्थ
नहीं किया | तुरंत पूछा - “हे प्रभु हनुमान
, हम मातांगो को यह विशेष वरदान है
कि हम वानरों से वार्तालाप कर सकते हैं
| बहुत सारी चीजें जो उन्हें दिखाई देती
हैं वे लगभग वैसी ही हैं जैसी हमें दिखाई
देती हैं | लेकिन कई बार जो उन्हें दिखाई
देता हैं वह हमें समझ में नहीं आता |
उदाहरण के तौर पर वे सूर्य को एक
सितारे के रूप में नहीं देखते | उन्हें आकाश
में सूर्य की जगह एक बड़ा फल लटकता
नजर आता है जिसे वे चिरंजीवी फल
कहते हैं | रात्री में जब हम मनुष्य
सितारों से भरा आसमान देखते हैं ,
वानरों को उसकी जगह फलों का बाग़
नजर आता है | मैंने बाबा से कहानियाँ
सुनी हैं कि आपने भी एक बार सूर्य को
फल समझ लिया था और उसे खाने का
प्रयास ... किया ... था ...”
इससे पहले कि उर्बा अपना प्रश्न पूरा
करता, कपिद्रष्ट फिर से चीखा | वह कह
रहा था - “प्रयास नहीं किया था
बल्कि खा ही लिया था | अगर आप
चिरंजीवी फल की ओर किसी तरह
जाने का प्रयास करोगे तो वह आपको
भस्म कर देगा | आप उसे नहीं खा पायेंगे ,
वह आपको खा जाएगा | लेकिन हनुमान
जी ने सफलता पूर्वक उसका सेवन किया
था और चिरंजीवी हो गए |”
उर्वा शांतिपूर्वक बोला - “हाँ
कपिद्रष्ट महाशय , आप ठीक कह रहे हैं |
हनुमान जी अपनी देह को विखंडित
करने का योग कर रहे थे | उन्होंने सूर्य की
ओर उड़ान भरकर सफलतापूर्वक उस योग
में सिद्धि प्राप्त की ... अर्र ... मेरा
मतलब है चिरंजीवी फल की ओर उड़ान
भरकर |”
कपिद्रष्ट फिर से चीखा , इस बार बड़े
ही नम्रतापूर्वक , प्रभु हनुमान जी की
ओर मुख करके | वह कह रहा था - “हे प्रभु
, ये मनुष्य अजीब बाते करते हैं .... zzz…
zzz ...”
कपिद्रष्ट को शायद चक्कर आ रहे थे ---
और उसका कारण या तो फल का वो
टुकड़ा था जो उसने खाया था और या
पवित्र द्रव की आहुति से निकलने वाला
धुआ था | वह हनुमान जी के पास गया ,
उनके आसन से अपना सिर टिकाया और
हनुमान जी के चरणों के समीप निद्रा में
चला गया |

हनुमान जी ने सोते हुए वानर की ओर
वात्सल्य से देखा | फिर उन्होंने आसमान
की ओर देखा | सुर जो वहां पर छत जैसा
आभास दे रहे थे, ने स्वयं को इस तरह इधर
उधर किया कि मातांगो को सूर्य
दिखाई देने लगा | हनुमंडल में उपस्थित
सभी (कपिद्रष्ट को छोड़कर ) ने सूर्य
को प्रणाम किया | बाबा मातंग
बुदुबुदाये - “आह ! चरण पूजा का पहला
सूर्योदय |”
हनुमान जी ने उर्वा से पूछा - “हे
होतार, तुम्हे वहां क्या दिखाई दे रहा
है ?”
“सूर्य, प्रभु! “ उर्वा ने तुरंत उत्तर दिया ,
“वह दैत्याकार आग का गोला जिसके
चारों ओर हमारी पृथ्वी घुमती है |”
हनुमान जी ने पुछा - “तुम इसको कैसे देख
रहे हो ? इसको देखने के लिए किस यन्त्र
का प्रयोग कर रहे हो ? स्मरण है न कि
तुम एक आत्मा हो | और आत्मा को कुछ
भी अनुभव करने के लिए एक यन्त्र की
आवश्यकता होती है ?”
उर्वा ने उत्तर दिया - “मैं इसे अपनी
आँखों से देख रहा हूँ प्रभु ! अपनी त्वचा
से महसूस कर रहा हूँ | अपने मन से इसे समझ
रहा हूँ | मेरा तन-मन ही वह यंत्र है
जिसका उपयोग करके मेरी आत्मा
इसका (सूर्य का) अनुभव कर रही है |”
“तुम अपना यंत्र बदलने का प्रयास क्यों
नहीं करते ? सिर्फ यह देखने के लिए कि
क्या सूर्य सभी यंत्रों से एक जैसा ही
दिखाई देता है?”

“यन्त्र बदलू ? प्रभु ... क्या आपका अर्थ
है कि मैं अपना मानव शरीर त्यागकर
कोई और शरीर धारण कर लुं? मै देह बदलने
की विद्या में निपुण नहीं हूँ प्रभु |
लेकिन मै सीखना अवश्य चाहूँगा कि देह
कैसे बदली जाती है ... ठीक उस तरह जैसे
मै अपने वस्त्र बदलता हूँ |” उर्वा ने हाथ
जोड़कर कहा |

हनुमान जी ने उर्मी की ओर देखा | वह
पूजा में उपस्थित गण की पहली पंक्ति में
बैठी थी | उर्मी हनुमान जी से निर्देश
पाने की प्रतीक्षा में हाथ जोड़कर
खड़ी हो गई | उसे निर्देश नहीं , एक
प्रश्न मिला , “उर्मी , तुम्हे वहां क्या
दिखाई दे रहा है?”

“सूर्य, प्रभु ! ... आग का दैत्याकार
गोला जिसके चारों ओर हमारी पृथ्वी
घूमती है |”

“क्या तुम देखना चाहोगी कि वहां
वानरों को क्या दिखाई देता है?”
“हाँ प्रभु ,मेरी इच्छा ... है ...”
जैसे ही उर्मी ने “इच्छा” शब्द बोला ,
उसकी आँखें फ़ैल गई और उसकी जीभ
हकलाने लगी | वह अचेत हो रही थी |
उसके आस पास बैठी अन्य मातंग औरतों
ने खड़े होकर उसकी देह को सहारा
दिया | कुछ पल बाद उर्मी की देह धरा
पर अचेत लेटी हुई थी जबकि वानर
कपिद्रष्ट जो हनुमान जी के पास
सोया था वह जाग गया | वास्तव में
उर्मी की आत्मा वानर की देह में प्रवेश
कर गई थी जबकि वानर की आत्मा
अभी तक स्वपनलोक में ही थी |
हनुमान जी ने उर्मी , जो कि वानर की
देह में थी , से पूछा - “तुम्हे क्या दिखाई
दे रहा है वहां आकाश में?”
“फल ... प्रभु ... चिरंजीवी फल !” उत्तर
आया |

हनुमान जी ने उर्वा का रुख किया जो
कि उसके सामने खोले जा रहे रहस्य को
समझने की पूरी कोशिश कर रहा था |
हनुमान जी बोले - “जैसे ही तुम अपना
यन्त्र अर्थात देह बदलते हो तुम्हारे अनुभव
भी बदल जाते हैं |”
“लेकिन वास्तविकता क्या है प्रभु ?”
उर्वा विश्वासहीन आवाज में बोला -
“वह सूर्य है , जैसा हम मनुष्यों को
दिखता है अथवा वह एक फल है जैसा
वानरों को दिखता है?”
“वानर देह के लिए वह एक फल है और
मानव देह के लिए सूर्य | अन्य देहों के
लिए कुछ ओर !”
उर्वा आगे भी कुछ पूछना छह रहा था
लेकिन प्रश्न के लिए उसे सही शब्द नहीं
मिल रहे थे | इसलिए वह अपेक्षा कर रहा
था कि हनुमान जी “वास्तविकता” के
बारे में थोडा वर्णन और करें | हनुमान
जी ने उसे निराश नहीं किया | वे बोले
-“मुझे त्रिदेवों ने इस धरा पर वानर देह में
क्यों भेजा , मानव देह में क्यों नहीं ?
क्योंकि आत्माएं , जब किसी देह में
ज्यादा समय तक रहती हैं तो वे यह भूल
जाती हैं कि वे आत्मा हैं | वे स्वयं को
देह समझने लगती हैं |”

सभी मातंग एकाग्रता से हनुमान जी के
शब्दों को सुन रहे थे | हनुमान जी आगे
बोले - “आप लोग इस समय मानवों में
सबसे अधिक ज्ञानी हैं और आप भी इस
रहस्य को समझने में कठिनाई महसूस कर
रहे हैं जो मैं आपके सामने खोल रहा हूँ |
संसार के अन्य मानवो के बारे में विचार
कीजिये | वे वानरों के साथ वार्तालाप
नहीं कर सकते | वे वानरों का पक्ष नहीं
जानते | वे सब लोग सूर्य को केवल सूर्य के
रूप में देखते हैं और उन्होंने यह मत बना
लिया है कि जो वे देखते हैं केवल वही
एक वास्तविकता है | वे अन्य
वास्तविकताओं, जैसे कि वानरों को
दिखाई देने वाली वास्तविकता , से
अनभिज्ञ हैं | उन्होंने सुदूर अंतरिक्ष में
खोज करने के बड़े बड़े यंत्र बना लिए हैं
किन्तु वे भूल गए हैं कि मुख्य यन्त्र तो
उनका अपना तन-मन है | जिन चीजों
को वे यंत्र कहते हैं वे तो केवल मुख्य यन्त्र
अर्थान्त तन मन का विस्तार भर हैं |
भगवान राम जानते थे कि जैसे जैसे संसार
कलियुग की ओर बढेगा मनुष्य अन्य
वास्तविकताओं से पूर्णत: अंधे हो जायेंगे
| इसीलिए उन्होंने इच्छा जताई कि
सभी मनुष्य मुझे वानर रूप में पूजें | अगर
आप यह नहीं समझते कि मनुष्यों को
अनुभव होने वाली वास्तविकता अलग है
और वानरों को होने वाली अलग , तो
मेरी पूजा अधूरी है |”

जिस तन्मयता से मातंग हनुमान जी को
सुन रहे थे वह तब टूटी जब मातंग महिलायें
जहाँ बैठी थी वहां हलचल शुरू हुई | उर्मी
कराह रही थी | उसकी आत्मा उसकी
देह में वापिस आ रही थी | कपिद्रष्ट
वानर भी उठ गया था | बाबा मातंग ने
पूजा की प्रक्रिया चालू करना ठीक
समझा | वह बोले - “हे प्रभु , अब जबकि
फल अर्पण हो चुके हैं , यजमान बसंत आपके
चरणों में लाल चूरा अर्पित करने की
इच्छा रखते हैं |”

लाल चूरा हनुमान जी की हर पूजा में
आवश्यक है | मातंग इस चूरे को विभिन्न
पत्तियों से बनाते हैं | बाबा मातंग ने
बसंत की अर्पण की टोकरी के पास रखी
लाल चूरे की प्याली उठाई | कपिद्रष्ट
वानर बाबा के पास आकर बैठ गया |
बाबा ने पूरा लाल चूरा कपिद्रष्ट वानर
पर उड़ेल दिया | कपिद्रष्ट पवित्र लाल
चूरे में स्नान करके आनंदित लग रहा था |
हनुमान जी मुस्कुराये और बोले - “मुझे वह
दिन आज भी याद है जब भगवान् राम ने
मुझे लाल चुरा स्वयं अपने तन पर उड़ेलने
का निर्देश दिया था | भगवान् राम ने
मुझे बताया था कि यह लाल चूरा
मनुष्यों को यह स्मरण दिलाएगा कि
उनकी वास्तविकता ही मात्र
वास्तविकता नहीं है | वानरों की
अपनी अलग वास्तविकता है और अन्य
प्राणियों की अलग | लेकिन कलियुग के
इस पड़ाव पर इस संसार में केवल मुट्ठी भर
लोग ही ऐसे हैं जो इस रहस्य को समझ
सकते हैं | बाकी लोगों को केवल भगवान्

कल्कि ही यह रहस्य समझा सकते हैं |”


मातांगो के हाव भाव से ऐसा लग रहा
था कि उन्हें हनुमान जी द्वारा बताया
रहस्य समझ में आ गया था | बाबा बोले -
“यजमान बसंत का अर्पण अब पूर्ण हुआ |
अब मै 6 ब्राह्मणों से आग्रह करता हूँ कि
वे इन तीन टोकरियों को उठाकर
हनुमंडल से बाहर ले जाएँ और फलों को
बाहर प्रतीक्षा कर रहे वानरों में बाँट दें
| (एक लाल टोकरी , एक श्वेत और एक
वह जो हनुमान जी के चरणों में रखी थी
|”

दो ब्राह्मण लाल टोकरी के साथ
दक्षिण दिशा की ओर से हनुमंडल से
निकले , दो ब्राह्मण श्वेत टोकरी के
साथ उत्तर दिशा से और दो ब्राह्मण
प्रभु की टोकरी के साथ पूर्व दिशा से
हनुमंडल से बाहर निकले | उनका इन्तजार
बाहर सैकड़ों की संख्या में उपस्थित
वानर कर रहे थे जो चरण पूजा के फल
खाने को तत्पर थे |

हनुमान जी की लीलाओं का यह
अध्याय यही समाप्त होता है |

सोमवार, 28 दिसंबर 2015

अध्याय 6 ( 33 करोड़ "सुरों" का रहस्य व ईतिहास खोला चिरंजीवी हनुमान ने)

हनुमान जी सभी मातंगों को अलग अलग
प्रकरणों में दर्शन दे दिए थे | अब सभी को पता चल
गया था कि हनुमान जी उनकी
धरती पर आ चुके हैं | हनुमान जी के
आने का पता जिस मातंग को सबके बाद पड़ा वो थे 50 से कुछ
अधिक आयु के पुरुष बसंत| देर शाम को बसंत दौड़े दौड़े मातंगों के
डेरे की तरफ आये | भारी सांस से वे
चिल्ला रहे थे - “हनुमान जी हमारी
धरती पर आ गए हैं ... हनुमान जी आ
गए हैं |”
अन्य मातांगो को यह पहले से ही पता था लेकिन वे
इसके बारे में बोल नहीं पा रहे थे | जब उन्होंने मातंग
बसंत को इस बारे में ऊँची और सपष्ट आवाज में बोलते
सुना तो वे भी बोल उठे - “हो ! हो ! हनुमान
जी आ गए हैं | वे सभी बाबा मातंग और
माता मातंग के पास एकत्रित हुए |”
बाबा मातंग ने घोषणा की - “हाँ . हनुमान जी
41 साल बाद हमारी धरती पर आए हैं
और चरण पूजा कल सुबह शुरू होगी|”
चरण पूजा की तैयारियां पूरी की
जा चुकी थी क्योंकि उन्हें आभास था कि
हनुमान जी का उनकी धरती
पर पुनः आगमन का समय हो गया था | सभी मातंग
अर्पण के लिए फलादि इकठ्ठा कर रहे थे | बाबा मातंग ने
सभी को शांत रहने और दिन की
सभी गतिविधियाँ पूरी करके निद्रा के लिए
जाने का निर्देश दिया |
बाबा और उर्वा को छोड़कर सभी मातंग निद्रा में चले गए
| आधी रात के बाद दोनों उस स्थान पर गए जो पूजा के
लिए निर्धारित था | यह एक वृताकार क्षेत्र था जिसके मध्य में
वेदी बनी हुई थी , उसके
कुछ कदम दूर आसन बना हुआ था | उस वृताकार क्षेत्र
की परिधि पर मिटटी के दीए
रखे गए थे | उन दीपकों को आधीरात के
बाद विचित्र तेल से भरने का नियम है | यह तेल बाबा मातंग ने
जंगल की विशेष जड़ी बूटियों से एकत्र
किया है | इस तेल का रहस्य सिर्फ बाबा मातंग और माता मातंग को
मालुम है जिसे उन्हें सही समय पर
अगली पीढ़ी यानी
उर्वा और उर्मी को हस्तांतरित करना है |
जब बाबा और उर्वा उन दीपकों में विचित्र तेल भर रहे
थे तब बाबा ने किसी को चरण पूजा स्थान
की ओर आते हुए देखा | वे उर्वा से बोले -“उर्वा ,
इधर कौन आ रहा है ? जाओ और उसे रोको वह चाहे जो
भी हो | इस समय हमारे सिवाए किसी
भी मातंग का यहाँ आना प्रतिबंधित है |
शीघ्र जाओ |”
उर्वा उस व्यक्ति की ओर दौड़ा | वह व्यक्ति कोई
ओर नहीं बल्कि बसंत था | उर्वा बोला -
“चाचाश्री , आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? आप चरण
पूजा क्षेत्र की ओर क्यों आ रहे हैं ? आप चरण
पूजा के पहले घंटे के यजमान हैं | आपका यहाँ आना नियमों के
अनुसार वर्जित है |”
बसंत ऐसे लग रहा था जैसे कि निद्रा में हो | वह बुदबुदाया - “उर्वा
, मुझे बेचैनी सी हो रही
थी इसीलिए टहलने के लिए निकल आया
... मुझे खेद है ... मै अब वापिस चला जाऊँगा |”
बसंत ने मुड़कर वापिस अपने डेरे की ओर चलना शुरू
कर दिया | उर्वा चरण पूजा स्थान पर आकर दीपकों में
तेल भरने में बाबा मातंग कि मदद करने लगा |
बाबा ने पूछा - “वह कौन था , उर्वा ? वह इधर क्यों आ रहा था ?”
“वह बसंत चाचाश्री थे बाबा |” उर्वा ने उत्तर दिया -
“वह अपनी सुध में नहीं थे | वे
नींद में चल रहे थे |”
बाबा मातंग ने कोई उत्तर नहीं दिया क्योंकि वे चाहते थे
कि उर्वा को अपने कथन का विराधाभास स्वयं हो | कुछ पल सन्नाटा
रहा |

फिर उर्वा बोला - “नहीं बाबा , उनकी
पांचो इन्द्रियां तो सही से काम कर रही
थी | उन्हें सुध तो थी | उन्होंने मेरे साथ
अच्छे से वार्तालाप भी किया | वे बोले कि उन्हें
बेचैनी हो रही थी
इसीलिए वे टहलने के लिए निकल पड़े थे लेकिन न जाने
मुझे कुछ अजीब सा लगा |”
अब बाबा मातंग बोले - “क्या तुम्हे पूर्ण विश्वास है कि वह बसंत
ही था ?”

“हाँ बाबा | वह बसंत चाचाश्री ही थे |
यहाँ इतना भी अँधेरा नहीं है बाबा |
चांदनी में उनका चेहरा मुझे स्पष्ट दिखाई दिया |”
एक बार फिर बाबा मातंग ने जवाब देना उचित नहीं समझा
|

कुछ पल सन्नाटा रहा | सन्नाटे ने अपना काम किया और उर्वा को
कुछ कुछ समझ में आया | वह चिल्लाया - “हे भगवान् | क्या वह
बसंत की देह में कोई और था?”

“मेरा अनुमान है कि वह बसंत के शरीर में कोई असुर
था |” बाबा मातंग ने उत्तर दिया |

“एक असुर ने बसंत की देह का अपहरण कैसे किया
बाबा ?”

“अपहरण?” बाबा मातंग लगभग हंस ही दिए थे | फिर
गंभीर भाव से बोले - “यह अपहरण नहीं
है उर्वा | अगर तुम जानना चाहते हो कि असुर किस तरह कर्म
करते हैं तो मुझे भय है कि उत्तर इतना आसान नहीं
है | इस सब के पीछे हजारों साल का रहस्य और
इतिहास है | केवल विद्वानों में विद्वान व्यक्ति ही इस
रहस्य को समझ सकते हैं | इस समय इस संसार में केवल
हनुमान जी हैं जो इस रहस्य का वर्णन कर सकते
हैं | अगर मै तुम्हे यह रहस्य बताने लगूं तो तुम इसे समझ
नहीं पाओगे | मै और पिछली
पीढ़ी के मातंगों ने 41 साल पहले इस
रहस्य को स्वयं हनुमान जी से जाना था | अब समय
आ गया है कि तुम और नई पीढ़ी के मातंग
भी श्री हनुमान जी से इस
रहस्य को जानो क्योंकि वे 41 साल बाद फिर से हमारी
धरती पर पधारे हैं |”
“मै यह रहस्य जानने के लिए बहुत उत्सुक हूँ बाबा |
बड़ी चौंकाने वाली बात है कि हम मनुष्य
इन रहस्यमयी प्राणियों के बारे में अनजान रहते हैं जो
हमारे जीवन को इतना प्रभावित करते हैं | एक मातंग
होते हुए भी इन प्राणियों के बारे में मै केवल इतना
जानता हूँ कि सुर अच्छे होते हैं और असुर बुरे | अगर कोई
ऐसी चीज है जो मेरे सोने के बाद मेरे
शरीर का इस्तेमाल कर सकती है तो मुझे
उस चीज के बारे में जानना जरूरी है |”
उर्वा की टिपण्णी के जवाब में बाबा मातंग
के मन में जो स्वाभाविक विचार आया वो था , “उर्वा , केवल
नींद में ही नहीं , सुर तथा
असुर मानव जीवन के हर पल को प्रभावित करते हैं
|” लेकिन बाबा मातंग इस विचार को अपने होंठो तक नहीं
लाएं | वे आधी रात के समय सुरों और असुरों के बारे में
कोई वार्तालाप नहीं करना चाहते थे | वे
रीति रिवाजों को तुरंत पूरा करना चाहते थे | उन्होंने
निर्देश दिया - “उर्वा , अब 4 दीपक उठाओ --
सभी चारों दिशाओं से एक एक | और फिर उन
दीपकों को घेरे के सात कदम बाहर रख दो |”
“4 दीपकों को घेरे से बाहर रखने का क्या प्रयोजन है
बाबा ?” उर्वा की उत्सुकता को इस बात से कोई फर्क
नहीं पड़ता था कि आधी रात है |
बाबा मातंग को उर्वा का सवाल जवाब देने योग्य लगा | उन्होंने
उत्तर दिया - “जो ठीक घेरे के ऊपर दीए
रखे हैं वे तब जलाए जायेंगे जब चरण पूजा शुरू होगी |
अभी हम 4 दीए घेरे के बाहर असुरों को
पूजा स्थल से दूर रखने के लिए जलाएंगे |”
बाबा घेरे के मध्य में जाकर कुछ रीति रिवाज पूरे करने
लगे जहाँ पर वेदी और आसन बना हुआ था | उर्वा
वह करने लगा जिसका उसे निर्देश मिला था | जब उर्वा पहला
दीया घेरे के बाहर रख रहा था तब उसे बसंत फिर से
पूजा स्थल की ओर आता दिखाई दिया |
उसकी तरफ दौड़ने से पहले उर्वा ने बाबा मातंग
की इजाजत लेनी आवश्यक
समझी | बाबा बोले - “अब उसे रोकने के लिए उसके पास
जाने की आवश्यकता नहीं है उर्वा | जो
दीपक तुमने घेरे के बाहर रखा है उसे जला दो |”
उर्वा ने दीपक जलाया | उसने नोटिस किया कि
दीपक की रोशनी विचित्र लाल
रंग की थी | उसने उस विचित्र तेल और
उसकी रहस्यमयी रोशनी के
बारे में बहुत किस्से सुने थे | वह उम्मीद कर रहा था
कि उस रोशनी से कोई चमत्कार होगा लेकिन उसे कोई
चमत्कार होता दिखाई नहीं दिया | ओर कुछ
नहीं तो वह रोशनी बसंत को उधर आने से
रोक भी नहीं पा रही
थी | बसंत उसी गति से चरण पूजा स्थल
की तरफ बढ़ रहा था | उर्वा खड़ा हुआ और चिंतित
स्वर में चिल्लाया - “बाबा इस दीए से कुछ हो
नहीं रहा है ... |”
वह अपना वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया
था कि उसे अपने पीछे किसी के होने का
अहसास हुआ | जब वह मुड़ा तो एक लाल रंग की
पक्षी जैसी कोई चीज उसके
कानों के पास से होकर उडी | उसमे जंगल
की किसी भी भयावह स्थिति
से निपटने की हिम्मत थी लेकिन उस लाल
चीज ने उसके मन को आतंकित कर दिया | वह और
कुछ नहीं बल्कि असुर था | असुर हर जगह हैं
लेकिन उस दीपक की लाल
रोशनी ने मानव आँख को असुर के दर्शन करा दिए थे |
उर्वा तुरंत घेरे के अन्दर आ गया | बाबा मातंग घेरे के मध्य में
कुछ रीति रिवाजों में व्यस्त थे | उस सन्नाटे को
चीरने के लिए जो उसके मन के भयों को बाधा रहा था ,
उर्वा चिल्लाया - “बाबा मैंने दीया जला दिया है लेकिन
इसका कोई असर नहीं हो रहा है | बसंत
चाचाश्री तेजी से इस तरफ आ रहे है |”
बाबा मातंग ने उर्वा को सुना लेकिन उन्हें एक 20 के
करीब के लड़के के अधैर्य पर प्रतिक्रिया
देनी उचित नहीं समझी |
जब दीए को काम करना था काम किया | जैसे
ही बसंत उस दीए की विकिरणों
की रेंज में आया , उर्वा ने देखा कि बसंत पहले तो
जमीन पर बैठा और फिर वहीँ पर लेट गया
| उर्वा ने देखा कि एक लाल चीज बसंत के लेटे हुए
शरीर से निकली और उड़ गई |

उर्वा बसंत के पास दौड़कर गया तो उसने पाया कि बसंत
गहरी नींद में जमीन पर सोया
हुआ था | उसने उसके शरीर को हिलाकर जगाया |
“मैं यहाँ कैसे आया?” बसंत जागते ही बुदबुदाया |
“चिंता मत कीजिये चाचाश्री ... सब कुछ
ठीक है | आप नींद में चल रहे थे | अब
आप वापिस झोपडी में जा सकते हैं |”
बसंत को चिंता हो रही थी | जब उसे पता
चला कि वह प्रतिबंधित स्थान पर है तो वह अपराधबोध से ग्रस्त
होकर वापिस हो लिया | नींद में चलना उसके लिए कोई
नई बात नहीं थी | बहुत लोगों ने उसे बताया
था कि वह नींद में अजीब हरकतें करता
है | प्राय: वह बाहर निकल जाता था , नींद में चलता
था और वापिस आ जाता था | लेकिन इस बार जो असुर
उसकी देह को चला रहा था वह उसे बीच
में ही छोड़ गया था , वो भी एक प्रतिबंधित
स्थान के पास |
उर्वा वापिस चरण पूजा स्थल पर आ गया | उसने अपना 4
दीए रखने का कार्य पूरा किया | तब तक बाबा मातंग ने
भी वेदी के पास किये जाने वाले
रीति रिवाज पूर्ण कर लिए | डेरे की ओर
वापिस आते हुए उर्वा सुरों और असुरो के विचारों में खोया हुआ था |
वह अपने विचारों को होठों तक आने को नहीं रोक पाया ,
“यह कितना खतरनाक है बाबा ! एक बाहरी
प्राणी हमारी देह को नियंत्रित कर सकता
है और जो चाहे वो कर सकता है !”
“क्या उस असुर ने बसंत को कोई चोट पहुंचाई ? जब
दीपक की विकिरण असुर तक
पहुंची तब असुर चाहता तो बसन्त की देह
को खड़ी अवस्था में छोड़कर ही निकल
सकता था | अगर उसने ऐसा किया होता तो बसंत की देह
कटे पेड़ की तरह नीचे गिरती
| इसके बजाए असुर ने देह को आराम से धरती पर
लेटाया और फिर निकला | क्या तुमने नहीं देखा ?” बाबा
मातंग ने उत्तर दिया और फिर विस्तार से समझाया -

“असुर
भी देह के प्रति सुरक्षा और स्वत्व का भाव
ठीक उसी तरह रखते हैं जैसे हम रखते
हैं | असुर अपने आप में उतनी बड़ी
समस्या नहीं है जितना तुम सोच रहे हो |
असली समस्या यह है कि हम ये सोचते हैं कि हम
इस देह के स्वामी हैं | हम इस देह के
स्वामी नहीं है | हम इस देह में सिर्फ
किरायेदार हैं | इस रहस्य को अच्छे से समझने के लिए तुम्हे यह
जानना आवश्यक है कि इस सबकी शुरुआत कैसे हुई
| केवल श्री हनुमान जी ही
इस रहस्य का वर्णन कर सकते हैं | अभी अपने
विचारों को विश्राम दो और जाकर सो जाओ |”
उर्वा ने दो चार घंटे की नींद लेने
की कोशिश की लेकिन सुरों और असुरो के
विचारों ने उसके मन को सुबह तक जगाये रखा |
अंततः इन्तजार समाप्त हुआ | ब्रह्ममुहूर्त में चरण पूजा
की प्रक्रिया शुरू हुई | वृद्ध मातंग जिन्होंने हनुमान
जी से 41 साल पहले ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया था
उन्हें ब्राह्मण कहा जाता है | सबसे पहले बाबा मातंग , माता मातंग
तथा अन्य ब्राह्मण पूजा स्थल में प्रविष्ट हुए | इस वृताकार
स्थल को हनुमंडल कहा जाता है | हनुमंडल के अन्दर से
उन्होंने एक श्लोक पढ़ा जो उर्वा और उर्मी को कुछ
इस तरह संबोधित था - “हे उर्वा , तुम्हे बाबा मातंग की
परंपरा को आगे बढ़ाना है | हे उर्मी , तुम्हे माता मातंग
की परंपरा को आगे बढ़ाना है | हम सभी
ब्राह्मण तुम दोनों को पवित्र हनुमंडल में बुलाते हैं | आओ , विधि
के अनुसार दीपक जलाओ ताकि चरण पूजा प्रारंभ हो
सके |”

ब्राह्मणों को बताया गया कि उर्मी वहां उपस्थित
नहीं है | बाबा मातंग ने सबको सूचित किया -
“उर्मी की आत्मा कल शाम को एक
दैवीय कार्य हेतु गई थी जो कार्य उसको
श्री हनुमान जी के माध्यम से स्वयं
भगवान् विष्णु ने दिया था | इसीलिए वो देरी
से उठी | वह शीघ्र ही यहाँ
पहुँच जायेगी तब तक हम राम मंत्र जपेंगे |
जब मातंग एक सुर में किसी मंत्र का जाप करते हैं तो
वह आवाज नश्वर संसारों में ही नहीं
अपितु ब्रह्मलोक एवं विष्णुलोक तक पहुँचती है |
लेकिन उस समय उनके एकल स्वर में एक आवाज
की कमी खल रही
थी -- उर्मी की आवाज | वह
आवाज भी उस एकल सुर में शीघ्र
ही सम्मिलित हो गई जब उर्मी वहां
पहुँच गई | ब्राह्मणों ने फिर से उस श्लोक का उच्चारण करके
उर्वा और उर्मी को हनुमंडल के अन्दर बुलाया |
जब उर्वा और उर्मी हनुमंडल में आए तब ब्राह्मणों
ने उनको आगाह किया कि उन्हें वो सब दिखाई देने वाला है जो
उन्होंने कभी नहीं देखा था | जो मातंग घेरे
के बाहर खड़े थे उनको निर्देश दिया गया कि वे अपनी
आँखें बंद रखें | उसके बाद उर्वा और उर्मी ने
दीपक जलाना प्रारंभ किया | उन्होंने दीपक
जलाते वक़्त अपनी आँखे नीचे
रखी | जब सभी दीपक
जलाकर उर्वा और उर्मी खड़े हुए तो उन्होंने एक
विचित्र दृश्य देखा | दीपकों की विचित्र लाल
रोशनी में हनुमंडल के बाहर बहुत बड़ी
संख्या में लाल रंग के देह-हीन प्राणी खड़े
थे -- वे थे असुर | जो मातंग बाहर खड़े थे उनकी
तुलना में असुरों की संख्या बहुत ज्यादा थी
|

ब्राह्मण उसके बाद हनुमंडल के केंद्र की ओर बढे |
उन्होंने वेदी में पवित्र लकड़ियाँ डाली और
अग्निदेव की प्रशंसा में श्लोक पढने शुरू कर दिए |
जब अग्निदेव प्रकट हुए तो उन्हें पवित्र द्रव की
आहुति दी गई | एक श्वेत धुआं हनुमंडल में पैदा हो
गया | उस धुएं में एक अजीब सी हलचल
थी | “सुर!” उर्मी उत्साह में
बोली |
जो पवित्र द्रव अग्नि को अर्पित किया जा रहा था उस द्रव से सुर
मातांगो को दिखाई देने लगे | अब हनुमंडल एक ऐसी
गुफा जैसा लग रहा था जिसकी दीवारे लाल
थी और छत श्वेत --- लाल असुरों के कारण और श्वेत
सुरों के कारण |


सभी ब्राह्मण , उर्वा तथा उर्मी अब हाथ
जोड़कर आसन के सामने खड़े हो गए | उन्होंने उन शलोको का
उच्चारण किया जिनमे मातांगो के हनुमान जी के साथ
सदियों पुराने रिश्ते का जिक्र था | उन्होंने अति विनम्रता के साथ यह
भाव प्रकट किया कि उन्होंने तमाम कठिनाइयों के बावजूद
अपनी उच्च पवित्रता तथा सिद्धांतों को सुरक्षित रखा है
| मातांगो की भक्ति से प्रसन्न होकर हनुमान
जी प्रकट हुए | सभी ब्राह्मणों तथा उर्वा
, उर्मी ने साष्टांग प्रणाम किया | वेदी के
पास जहाँ हनुमान जी प्रकट हुए थे वहां से आसन
तक मातंगों ने आयताकार जल कुंड बना रखा था | जैसी
की परंपरा थी हनुमान जी उस
पानी के ऊपर चलकर आसन तक पहुंचे | जब
हनुमान जी चलते हैं तो उनका शरीर छोटे
छोटे कणों में विघटित हो जाता है और अगले ही पल
पुन: संघटित हो जाता है | यह विघटन और पुनःसंघटन एक पल के
भी इतने छोटे से हिस्से में होता है कि
किसी देखने वाले को पता ही
नहीं चल पाता | यही हनुमान
जी के चिरंजीवी
शरीर का राज है | पानी के ऊपर चलने
की इस परंपरा से यह बोध होता है कि हनुमान
जी की देह मानवों की तरह
धरती पर नहीं चलती | इस
रीति को “हनु चरण धोना” कहा जाता है क्योंकि जब
हनुमान जी की देह छोटे छोटे कणों में
विघटित होती है तब अशुद्ध कण कुंड के
पानी में मिल जाते हैं और पानी के शुद्ध
कण उनका स्थान ले लेते हैं |


जब हनुमान जी आसन पर विराजमान हो गए तब बाबा
मातंग ने उर्वा को चरण पूजा कार्यक्रम का “होतर” नियुक्त किया |
“होतर” का मातंगो की हर पूजा में अहम् स्थान होता
है | होतर वह व्यक्ति होता है जो प्रश्न पूछकर ब्राह्मणों और
देवताओं के मध्य ज्ञान वार्तालाप संचालित करता है | यह वार्तालाप
पूजा में उपस्थित मनुष्यों को मन के भ्रमजाल से निकालकर
सर्वोच्च वास्तविकता का अनुभव करवाता है | एक यजमान तब
तक पूजा में अर्पण नहीं कर सकता जब तक
की वह भ्रमजाल की कम से कम एक
परत से बाहर नहीं आ जाता |
बाबा मातंग बोले - “हे प्रभु हनुमान , बसंत पहले घंटे
की चरणपूजा का यजमान है | आपके माध्यम से मै
होतर को आग्रह करता हूँ कि वे यजमान को हनुमंडल के अन्दर
ले आयें |”
उर्वा हनुमंडल के घेरे की परिधि पर गया और बसंत का
नाम पुकारा | बसंत घेरे के बाहर आँखे बंद किये हुए अर्पण
की टोकरी लिए खड़ा था | उर्वा ने उसको
आँखे बंद किये किये ही हनुमंडल के अन्दर आने
और फिर अन्दर आकर आँखे खोलने का आग्रह किया | उसके बाद
उर्वा उसे वेदी के पास ले गया |
बसंत ने निर्धारित स्थान पर अर्पण की
टोकरी रख दी | उसने अग्निदेव को
झुककर प्रणाम किया और फिर हनुमान जी को साष्टांग
प्रणाम किया | अब बाबा मातंग बोले -“हे प्रभु हनुमान , अब जबकि
यजमान आ चुका है , होतर अन्य मातांगो को भी पवित्र
हनुमंडल के अन्दर ला सकता है |”
उर्वा सभी मातंगो को हनुमंडल के अन्दर ले आया |
सभी ने हनुमान जी को साष्टांग प्रणाम
किया और फिर निर्धारित स्थान पर बैठ गए | ब्राह्मण लगातार
अग्निदेव को पवित्र द्रव की आहुति दिए जा रहे थे |
यजमान को भी निर्धारित स्थान पर बैठने के लिए कहा
गया |

बाबा मातंग खड़े रहे और कुछ श्लोक उच्चारित किये जिनका
अर्थ है -“हे हनुमान जी यह पूजा स्थल एक लाल
गुफा जैसा लग रहा है क्योंकि इसके बाहर बहुत अधिक संख्या में
असुर खड़े हैं | सुरों की उपस्थिति के कारण एक श्वेत
छत बन गई है जिससे स्वर्ग का सा आभास हो रहा है | प्राय:
सुर तथा असुर अदृश्य रहते हैं लेकिन आपकी कृपा
से हमारे पास रहस्मयी तेल है जिससे असुर दृश्य हो
गए हैं और पवित्र द्रव है जिससे सुर दृश्य हो गए हैं | कलियुग
में पिछले कुछ सालों में यह पृथ्वी पर सबसे
बड़ी पूजा है | इस पूजा में आपकी
उपस्थिति ही वह कारण है कि सुरों में श्रेष्ट तथा
असुरों में श्रेष्ट यहाँ पधारे हैं | सुर आपके पवित्र चरणों में
अर्पण करके आनंद प्राप्त करने का यह अवसर
नहीं चूकने देना चाहते | दूसरी तरफ
असुर भी इसे अपने बुरे कार्य करने का बहुत बड़ा
अवसर देख रहे हैं | अतः असुर इस पूजा समारोह में अडचने पैदा
करने का पूर्ण प्रयास करेंगे --- और ऐसा समझ में भी
आता है | आखिर सुरों और असुरों को भी यह अधिकार
है कि वे अपनी इच्छानुसार प्रयास करें | मैं आपके
माध्यम से यहाँ उपस्थित सभी मातांगो को सावधान करना
चाहता हूँ कि वे सतर्क रहें ताकि सुर तथा असुर अपने प्रयासों में
सफल न हो सकें |”

उर्वा खड़ा हुआ और बोला -“हे प्रभु हनुमान , पूर्ण विनम्रता से
मैं यह शंका जाहिर करना चाहता हूँ कि सतर्कता ही
सुरों और असुरों से रक्षा करने के लिए काफी
नहीं है | कैसे सुनिश्चित हुआ जा सकता है कि अब
भी कोई सुर अथवा असुर यहाँ बैठे किसी
मातंग की देह में नहीं छुपा है ? वैसे
भी असुरों को छल कला में महारत हासिल है | सुरक्षा
के लिए ज्ञान सबसे पहली आवश्यकता है | अगर
किसी को उसके शत्रु के बारे में कुछ भी
मालुम नहीं हो तो वह अपनी रक्षा कैसे
कर सकता है ?अतः मै आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप इन
प्राणियों का रहस्य खोलें | क्या ये कोई शापित आत्माएं हैं ? इनके
अस्तित्व का क्या प्रयोजन है और ये इस संसार में किस तरह
काम करते हैं ? कृपा हमें यह सर्वोच्च ज्ञान देकर कृतार्थ करें
|”

बाबा मातंग इस बात से प्रसन्न थे कि उर्वा होतर की
जिम्मेदारी बखूबी निभा रहा था | उसने
सही समय पर सही सवाल पूछा था | बाबा
और उर्वा हनुमान जी को प्रणाम करके निर्धारित स्थानों
पर बैठ गए और हनुमान जी सुरों और असुरो का
रहस्य समझाने लगे -
“यह मानव संसार 4 युगों के कालचक्र में घूमता रहता है | इस 4
युगों के कालचक्र को कल्प कहते हैं | इस समय हम चौथे युग
में हैं | मै आपको पीछे उस समय काल में ले जाना
चाहता हूँ जब पिछला कल्प समाप्त होने को आ रहा था |

भगवान्
शिव ने विष्णु जी को सन्देश भेजा -“हे मानव संसार के
रक्षक , हे भगवान् विष्णु , यह संसार उस चरण पर पहुँच गया
है कि अब इसका विनाश आवश्यक हो गया है |”
भगवान् विष्णु ने उत्तर भेजा - “हे महादेव , वहां
करीब 1000 करोड़ आत्माएं मानव देहों में कैद हैं
और इच्छाओं की भूलभुलैया में संघर्ष कर
रही हैं | उनको वहां से निकलने का अवसर उपलब्ध
करवाना आवश्यक है | मै वहां उन आत्माओं को बंधन मुक्त
करने आता हूँ जो यहाँ उनके स्थायी स्थान अर्थात
विष्णुलोक में आने की इच्छा रखती हैं |”
“तब भगवान् विष्णु पृथ्वी पर कल्कि के रूप में
अवतरित हुए | संचार के घोड़े पर सवार , हाथ में ज्ञान
रुपी तलवार लहराते हुए वे सभी एक
हज़ार करोड़ आत्माओं के पास गए | उनका संचार का श्वेत घोडा
प्रकाश की गति से दौड़ा , उनकी
चमकती हुई ज्ञान रुपी तलवार मजबूत
से मजबूत कर्म बंधन काटने में सक्षम थी |
“यहाँ पर यह उल्लेख करना आवश्यक है कि जब कल्कि आए
तब अज्ञानता का अन्धकार कितना था | अगर कोई अन्धकार में हो
और प्रकाश चाहता हो तो उसका अन्धकार दूर करना बहुत आसान
है | लेकिन किसी को यह भ्रम हो कि वह प्रकाश में
है किन्तु वास्तव में वह अँधेरे में हो , उसका अन्धकार तब तक
दूर नहीं किया जा सकता जब तक वह भ्रम से बाहर
न आ जाए |ऐसी स्थिति थी |लोगो को यह
भ्रम था कि वे प्रकाश में हैं किन्तु वास्तव में वे अन्धकार में थे |

लोगों को भ्रम से बाहर आने की कोई इच्छा
नहीं थी | उन्हें परम सत्य
की खोज नहीं थी | उन्हें
खोज रहती थी तो सिर्फ इस झूठे
आश्वासन की कि वे भ्रम में नहीं हैं |
और भ्रम भी कोई साधारण भ्रम नहीं था
| वह भ्रम के अन्दर भ्रम था | उन्होंने प्राचीन
ज्ञान को भी अपनी सुविधा के अनुसार तोड़
मरोड़कर उसे अपने भ्रम के छोटे से घोंसले की एक
और परत मात्र बना दिया था |

“इन हालातों में कल्कि धरती पर आए | उन्होंने
अपनी ज्ञान रुपी तलवार से
सभी के कर्म के बंधन काटने का प्रस्ताव रखा |इस
प्रस्ताव के साथ वे हर आत्मा के पास एक बार नहीं ,
दो बार नहीं बल्कि सात बार गए | और फिर आया न्याय
का दिन | भगवान् शिव ने विनाश का तांडव किया | पूरी
पृथ्वी का पदार्थ पिंघल गया | मानव देहो
की बात छोडिये , कोई भी वस्तु
नहीं बची | वे आत्माएं जो इस भ्रम में
थी कि मानव शरीर ही उनका
घर है , बेघर हो गई | भगवान् कल्कि के 7 प्रयासों के पश्चात्
भी केवल 99 लाख ऐसी आत्माएं
थी जिन्होंने भगवान् कल्कि की ज्ञान
रुपी तलवार के सामने समर्पण किया था | वे 99 लाख
आत्माएं विष्णु लोक चली गई और उनको मोक्ष प्राप्त
हो गया | बाकी बची आत्माएं मोक्ष के लिए
योग्य नहीं थी | जब उनके कर्म के
बही खतों की जांच हुई तब केवल 33
करोड़ आत्माओं के खातों में अच्छे कर्मों का शेष था | उन 33
करोड़ आत्माओं को सुर कहा गया | बाकी के हिसाब में
बुरे कर्मों का शेष था उन्हें असुर कहा गया |
“भगवान् कल्कि ने निर्णय सुनाया - “सुरों को अगले पूरे कल्प में
सुख भोगने को मिलें और असुरो को अगले पूरे कल्प में दुःख भोगने
को मिलें |”

“मैंने भगवान् कल्कि से पूछा - “हे प्रभु , सुर और असुर बहुत
बड़ी संख्या में हैं | आपके निर्णय को लागू करना
बहुत बड़ा कार्य है | अगर मै इसके लिए कोई काम आ सकूँ तो
आज्ञा दीजिये |”भगवान् कल्कि मुस्कुराये और बोले -
“यह मेरा निर्णय नहीं है हनुमान | यह
मेरी इच्छा है और यह इच्छा “त्रिदेव के वैश्विक
नियम” के अनुसार अपने आप पूर्ण हो जायेगी |”
“यह विश्व “त्रिदेव के वैश्विक नियम” के अनुसार चलता है जिसके
अनुसार “संसार में जहाँ भी कोई इच्छा प्रकट
की जाती है , विश्व की
सभी शक्तियां उस इच्छा को पूर्ण करने के लिए काम
करती हैं |”

“उस समय पूरी पृथ्वी एक विचित्र द्रव
का गोला लग रही थी क्योंकि सब कुछ
पिंघल गया था | भगवान् कल्कि उस संसार का एक भाग थे | जब
उन्होंने अपनी इच्छा जताई तो संसार की
सभी शक्तियां उस इच्छा को पूर्ण करने में लग गई |
पृथ्वी की सतह से कुछ
किलोमीटर ऊपर एक बहुत मोटी परत
बननी शुरू हो गई | भगवान् कल्कि ने बताया - “हनुमान
, वो देखो असुरलोक का निर्माण हो रहा है | सभी असुर
वहां निवास करेंगे |”

“असुरलोक पृथ्वी की सतह से कुछ
किलोमीटर ऊपर बनी एक मोटी
अदृश्य परत थी | सभी असुर उस परत
में कैद हो गए | यह परत बहुत अधिक गर्म हुआ
करती थी क्योंकि सूर्य की
किरणें सीधे इस pपर पड़ती
थी | यह परत केवल सूर्य की किरणों को
ही नहीं सोखती
थी अपितु उन सभी तत्वों को
सोखती थी जो पीड़ा का कारण
बनते हैं | इस परत के द्वारा प्रदान की गई सुरक्षा के
कारण पृथ्वी का वातावरण अत्यधिक हर्षदायक हो गया
| यह परत सूर्य की किरणों को कुछ इस तरह
छानती थी कि पृथ्वी पर हर
समय एक जैसा वातावरण रहता था | दिन और रात ,
गर्मी , सर्दी आदि सभी
भिन्नताएं समाप्त हो गई | सारी प्रदूषित हवा इस परत
द्वारा सोख ली जाती थी जिससे
कि पृथ्वी का वातावरण अत्यधिक पवित्र और सुगन्धित
रहता था | उस महाविनाश के बाद पहले इस परत का निर्माण हुआ
जिसमे असुर कैद हो गए फिर पिघली हुई
धरती का विचित्र द्रव एक अत्यधिक सुन्दर
पृथ्वी की सतह बन गया | मै अपने
सामने यह रूपांतरण होता देख आश्चर्यचकित था |

भगवान् कल्कि
ने बताया - “प्रिये हनुमान , पृथ्वी की
सतह सुरलोक में परिवर्तित हो रही है | यहाँ
सभी 33 करोड़ सुर रहेंगे |”
“असुरलोक अर्थात पृथ्वी की सतह से
कुछ मील ऊपर बनी परत
पीड़ा से भरी थी और
पृथ्वी की सतह यानी सुरलोक
आनंद से भरा हुआ था | फिर 5 तत्वों ने मिलकर पृथ्वी
पर बहुत सारी मानव देहों का निर्माण किया | वे
शरीर धड़क रहे थे लेकिन उनमे आत्मा
नहीं थी | हर तरह के शरीर
थे - पुरुष , महिला , बच्चे , जवान | भगवान् कल्कि ने बताया - “ये
33 करोड़ शरीर हैं जिनके जरिए सुर इस सुरलोक का
आनंद लेंगे |”

“सुरों ने उन देहों में प्रवेश करकें सुरलोक का आनंद लेना शुरू कर
दिया | केवल एक नियम था जिसके अनुसार सब कुछ चल रहा था -
“त्रिदेव का वैश्विक नियम”| अगर कही
भी कोई इच्छा प्रकट हुई तो संसार की
सभी शक्तियां उस इच्छा को पूरा करने में लग
जाती थी | सुर कभी एक
शरीर में स्थायी तौर पर नहीं
रहते थे , वे आपस में देह बदलते रहते थे| उदाहरण के तौर पर
अगर किसी सुर को “बचपन” के सुख लेने
की इच्छा होती थी तो वह
बच्चे की देह धारण कर लेता था | अगर
किसी को पिता बनने की इच्छा
होती थी तो वह “व्यस्क” की
देह धारण करके किसी बच्चे की देह वाले
सुर को बच्चे का प्यार देने लगता था | समय का उन देहो पर कोई
असर नहीं होता था क्योंकि समय के बुरे प्रभाव
भी असुरलोक की परत द्वारा शोषित कर
लिए जाते थे | न वृद्धावस्था थी और न ही
कोई रोग |

“कई सदियाँ बीत गई | सभी नश्वर संसारों
में सुरलोक प्रसिद्ध हो गया | सुरलोक की तुलना
विष्णुलोक के साथ होने लगी | देखने से ऐसा लगता था
कि सुरलोक का कभी अंत नहीं होगा | एक
बार ब्रह्मलोक में ब्रह्मा और देवी
सरस्वती सुरलोक के बारे में बाते कर रहे थे |
विष्णुलोक यानी “श्वेत समंदर” में एक आत्मा ने यह
बातचीत सुन ली | उसने सुरलोक
की सुन्दरता का अनुभव करने की इच्छा
प्रकट की | भगवान् विष्णु ने उस आत्मा को सुरलोक
अर्थात सतयुग की पृथ्वी पर भेज दिया |
यह कल्प के प्रथम मनुष्य मनु की आत्मा
थी |

“ठीक जिस समय मनु की आत्मा ने
विष्णुलोक में अपनी इच्छा प्रकट की ,
एक सुर ने सुरलोक में उसकी पूरक इच्छा प्रकट
की | इच्छा थी - “रथ का चलाने का आनंद
अलग होता है और रथ की पिछली
सीट पर बैठने का आनंद अलग होता है | अब रथ
की तुलना देह से की जाए तो मैंने बहुत
सारे मानव शरीरों को चलाया है और इस संसार के बहुत
सारे सुख भोगे हैं | अब मै वह सुख भोगना चाहता हूँ जो तब मिलता
है जब शरीर को कोई और चलाये और मै
पिछली सीट पर बैठकर आनंद लूं |”
“उस सुर और मनु दोनों की इच्छा तुरंत पूर्ण हो गई |
मनु की आत्मा विष्णुलोक से आकर सुरलोक
की एक मानव देह में प्रवेश कर गई और
उसी देह में उस सुर ने पिछली
सीट ले ली | अब सुरलोक में कुल 33
करोड़ मानव देह , 33 करोड़ सुर और एक आत्मा थी
|

[सेतु टिपण्णी : जब आप किसी को देख
रहे होते हैं तब आपकी आत्मा आपकी
देह को चला रही होती है | जब आप
अपने आपको देख रहे हैं (ध्यान करते समय आदि ) तब
आपकी आत्मा आपकी देह
की पिछली सीट पर
होती है | हनुमान जी ने “चित्त” शब्द का
प्रयोग किया है लेकिन इस अध्याय के सन्दर्भ में
“बैकसीट” शब्द सही जंचता है |]
“सुरलोक में भ्रमण करते समय मनु की आत्मा ने
एक बहुत ही सुन्दर फूल देखा | मनु की
आत्मा ने इच्छा जाहिर की - “मैं यह पुष्प तोडना
चाहता हूँ |” एक सुर ने उसको आगाह किया - “हे मनु , आप यहाँ
सुरलोक को देखने और यहाँ के सुखों का आनंद लेने आये थे | अब
आपने यह फूल तोड़ने की नई इच्छा उत्पन्न कर
ली है | सुरलोक के फूल हमेशा खिले रहते हैं | उन्हें
तोडा नहीं जाता |”

मनु को अपनी गलती का अहसास हुआ
और उसने एक और इच्छा जाहिर की जो
थी - “मैं यह फूल नहीं तोडना चाहता |”
“अब मनु की दो इच्छाएं प्रकट हो चुकी
थी -
(1) “मैं फूल तोडना चाहता हूँ”
(2) मैं फूल
नहीं तोडना चाहता ---
और “त्रिदेव के वैश्विक नियम”
के अनुसार संसार की सभी शक्तियों ने दोनों
इच्छाओं को पूरा करने का कार्य शुरू कर दिया | दूसरी
इच्छा पहली इच्छा से कमजोर थी इसलिए
इस विरोध में पहली इच्छा की
जीत हुई |

“अब त्रिदेव के वैश्विक नियम के अनुसार एक फूल तोडना
आवश्यक हो गया था लेकिन सुरलोक में ऐसी कोई
ताकत नहीं थी जो फूल तोड़ने का यह बुरा
कार्य कर पाती | इसलिए एक असुर असुरलोक से
आजाद हो गया और नीचे सुरलोक में उतर आया | उस
असुर ने उस देह में प्रवेश किया जिसमे मनु की आत्मा
थी | उस देह की बैकसीट पर
जो सुर बैठा था वह निकल गया क्योंकि वह उस बुरे कर्म में
भागी नहीं बनना चाहता था | असुर ने उस
देह के माध्यम से उस फूल को तोड़ दिया जबकि मनु
की आत्मा ने बैकसीट से इस कृत्य को
देखा |
“जैसे ही यह कृत्य पूरा हुआ , सुर ने उस देह को
पुनः नियंत्रण में ले लिया और वह असुर उस देह से बाहर आ गया
| लेकिन वह असुर वापिस असुरलोक नहीं गया | वह
देहहीन सुरलोक में भटकने लगा - किसी
अन्य देह की तलाश में जिसके माध्यम से वह अपने
बुरे कृत्य कर सके |


“मनु चिल्लाने लगा - “मैंने पाप किया है , मैंने एक फूल को तोडा है
|” एक सुर ने उसे बताया - “हे मनु , तुमने फूल नहीं
तोडा | एक असुर ने फूल तोडा इस देह के द्वारा | तुम तो इस देह
की बैकसीट पर थे |
“सुरलोक में पहली बार पीड़ा अनुभव
की गई थी -- मनु को हुई अफ़सोस
की पीड़ा | अब वह असुरलोक
नहीं रहा था | वह एक सामान्य संसार हो गया था |
“हे मेरे प्रिय मातांगो , 4 युगों की कहानी
बहुत लम्बी है | मैं यह कहानी थोडा थोडा
करके बताऊंगा जैसे जैसे चरणपूजा आगे बढ़ेगी | इस
समय तो मै इस कहानी को संक्षिप्त में बता देता हूँ
ताकि आपको सुरों और असुरों के बारे में मोटा मोटी ज्ञान
हो जाए |

“मनु के आगमन के पश्चात् , विष्णुलोक से उठी बहुत
सी आत्माएं इस संसार में अपनी इच्छाएं
पूर्ण करने आने लगी | एक एक करके असुर
भी असुरलोक से आजाद होकर इस संसार में आने लगे
| असुरलोक की जो परत सभी
पीडाओं को सोखा करती थी
उसका धीरे धीरे पतन होने लगा | जल्द
ही यह संसार वैसा बन गया जिस रूप में यह आज है
- दिन , रात , मृत्यु ,जीवन आदि सब होने लगा |
“अब इस संसार में इच्छाएं प्रकट करने वाली 3
शक्तिया थी - सुर , असुर , और आत्माएं | इच्छाओं
के विरोधाभास में सबसे शक्तिशाली इच्छा की
जीत होती| इच्छाओं का विरोधाभास बढ़ने
लगा | सुरलोक में जब कोई इच्छा प्रकट होती
थी वह तुरंत पूरी हो जाती
थी लेकिन सामान्य संसार में इच्छा पूर्ण होने में बहुत
समय लगने लगा | एक , क्योंकि इच्छाएं संख्या और बारम्बारता दोनों
में अधिक हो गई थी | दूसरा ,विभिन्न इच्छाओं के
बीच विरोधाभास बढ़ गया था | इच्छाओं के पूर्ण होने में
आने वाली दिक्कतों को कम करने के लिए त्रेतायुग में
मुझे विशेष शक्ति के रूप में इस संसार में भेजा गया |
“त्रेतायुग में अच्छी इच्छाओं की शक्ति
बुरी इच्छाओं की शक्ति से ज्यादा
थी इसलिए अधिकतर अच्छी इच्छाओं
की जीत होती थी
| लेकिन कुछ स्थान ऐसे थे जहाँ बुरी इच्छाओं
की शक्तियां ज्यादा थी | वे स्थान
असुरलोक की प्रतिकृति बन गए थे | हाँ, प्रिये मातांगो ,
मैं लंका की इसी धरा की बात
कर रहा हूँ जहाँ रावण बुराइयों से भरा राज्य चला रहा था | इन
बुरी इच्छाओं की शक्तियों पर विजय पाने
के लिए स्वयं भगवान् विष्णु को राम अवतार में आना पड़ा |

“द्वापरयुग में अच्छे और बुरे का फासला और भी कम
हो गया | अब एक ही परिवार में अच्छा और बुरा दोनों
थे | कुरु परिवार में एक तरफ पांडव थे जिनकी इच्छाएं
अच्छी थी और दूसरी और थे
कौरव जिनकी इच्छाएं बुरी थी
| बुराई की शक्तियों को ख़त्म करने के लिए भगवान्
विष्णु ने कृष्ण अवतार लिया |
“और अब अच्छे और बुरे का फासला और भी कम हो
गया है | अब अच्छा और बुरा एक ही देह में रहता
है | द्वापर की तरह इस बार युद्ध एक
ही परिवार में नहीं होगा | इस बार युद्ध
एक ही शरीर में होगा |महाभारत में कुरु
परिवार का एक भाग ख़त्म किया गया था इस बार विनाश के नृत्य में
सभी देह ख़त्म हो जायेंगी | भगवान्
कल्कि आत्माओं को बचायेंगे , देहो को नहीं | इस
कल्प में जिन सुरों और असुरों को अपने भाग के क्रमशः सुख व
दुःख मिल चुके हैं वे इस नश्वर संसार से स्वतंत्र होकर विष्णुलोक
में चले जायेंगे | आत्माओं में से 99 लाख मोक्ष को प्राप्त
होंगी , 33 करोड़ अगले कल्प के सुर बन
जायेंगी और बाकी अगले कल्प के असुर
बन जायेंगी |
हनुमान जी ने संक्षिप्त में सुरों और असुरो का रहस्य
बताया | उर्वा इस कहानी में इतना तल्लीन
था कि वह इसे समाप्त नहीं होने देना चाहता था | इस
कहानी को और सुनने के लिए उर्वा प्रश्न करने के
लिए खड़ा हुआ लेकिन बाबा मातंग ने उसे रोक दिया और बोले - “हे
हनुमान जी , आपकी आज्ञा से मै
यजमान बसंत के लिए पूजा शुरू करना चाहूँगा |”

सेतु टिपण्णी : "सुर" , "असुर", "आत्मा", "कल्प"
आदि के बहुत से अर्थ विभिन्न संस्कृतियों में प्रचलित हैं | भक्तों
को इन शब्दों के यहाँ वहां से सुने हुए अर्थों के सन्दर्भ में इन
अध्यायों को नहीं पढना चाहिए | इन शब्दों को
उसी परिपेक्ष्य में पढ़ें जो हनुमान जी ने
अपनी इन लीलाओं में वर्णित किया है |

हनुमान जी की लीलाओं का
यह अध्याय यही समाप्त होता है |

सोमवार, 21 दिसंबर 2015

अध्याय 5 ( चिरंजीवी हनुमान ने सिखाया देह से बाहर निकलकर उड़ना )

जब उर्मी नींद से जागी तो
उसने अपने सामने श्री हनुमान जी को
देखा | कुछ पल पहले उसने उनको अपने सपने में भी
देखा था | उसे लगा कि वो अब भी सपने में है | हनुमान
जी ने उन्हें बताया कि वह सपने में नहीं
है और वे उसके गाँव के नजदीक खड़े हैं जहाँ वह
चूल्हे के लिए लकडिया चुनने आई हुई है |
हनुमान जी के पवित्र चरणों में बैठी
उर्मी के होंठो से प्रथम शब्द निकले -“हे प्रभु ,
आप कितने तीव्र है | एक पल पहले आप
स्वपनलोक में थे और अब आप भूलोक पर है | एक
ही पल में आपने स्वपनलोक से भूलोक
की यात्रा कर ली|”
“वह तो तुम भी हो उर्मी |” हनुमान
जी मुस्कुराये और बोले -“कुछ पल पहले तुम
भी स्वपनलोक में थी और देखो अब तुम
यहाँ हो |”
जवाब में उर्मी कुछ बुदबुदाई लेकिन हनुमान
जी ने उर्मी के शब्दों को नहीं
सुना क्योंकि उन्हें पास में मृत्यु के देवता यम के उपस्थित होने का
अहसास हुआ | अश्विन हनुमान जी के
पीछे खड़े थे | वे यम के पास गए और उनसे बात
करने लगे |
हनुमान जी शांत खड़े थे और उर्मी उनके
चरणों में बैठी हुई थी इस बात से बेखबर
कि उसके आस पास क्या हो रहा था |
अश्विनों ने यम से पूछा - “हे यम , आपके यहाँ उपस्थित होने का
क्या प्रयोजन है? हमें तो यहाँ ऐसा कोई नहीं दिखाई दे
रहा जो मृत्युशैया पर हो ? फिर आप यहाँ क्या कर रहे हैं ?”
यम ने उत्तर दिया - “हे देवो के चिकित्सकों , मै यहाँ हूँ क्योंकि
उर्मी की मृत्यु होने वाली है
|”
“क्या?” अश्विन यह सुनकर हैरान रह गए | वे बोले -
“उर्मी तो पूर्णतः स्वस्थ है और उसकी
रक्षा में स्वयं हनुमान खड़े हैं | फिर आपका यहाँ आने का साहस
कैसे हुआ ? वह नहीं मर सकती |”
यम ने उत्तर दिया -“नीयति के अनुसार
उर्मी की आत्मा को इस समय मृत्यु का
अनुभव होने वाला है | मै उसकी आत्मा के इस
अनुभव का साक्षी बनने ही यहाँ आया हूँ
| आप चित्रगुप्त की कर्म बही देख
सकते हैं अथवा भगवान् विष्णु से पूछ सकते हैं |
उसकी नीयति है कि हनुमान से मिलने के
बाद उसकी मृत्यु हो जायेगी | अब वह
हनुमान जी से मिल चुकी है | अब
उसकी मृत्यु का समय हो गया है | मै हनुमान
जी के उससे दूर चले जाने का इन्तजार कर रहा हूँ |
मुझे नहीं लगता कि हनुमान उसकी नियति
में बाधा डालने का प्रयास भी करेंगे |”
अश्विनो ने हनुमान जी की ओर देखा |
हनुमान जी ने यम की ओर देखा
भी नहीं था लेकिन उन्हें यम
की उपस्थिति और यम की अश्विनो के साथ
हो रहे वार्तालाप का आभास था |
अश्विनों ने यम को कहा -“हे यम , सवाल नीयति में
बाधा डालने का नहीं है | उर्मी
की रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है | अगर उसे कोई
रोग होता है तो हम उसे तुरंत ठीक कर देंगे | अगर
उसे कुछ और होता है तो स्वयं हनुमान जी
उसकी रक्षा हेतु उपस्थित हैं | वैसे भी ,
इस संसार में “कारण” “कार्य” से पहले आता है | जब तक हम
यहाँ है , हम हर उस चीज से उर्मी
की रक्षा करेंगे जो उर्मी की
मृत्यु का “कारण” बन सकती है |
“नीयति को अपना रास्ता चलने दो अश्विनो , मुझे इस बारे
में कोई तर्क नहीं करना है |” यम वार्तालाप समाप्त
करते हुए बोले | अब यम की आँखे उर्मी
पर टिकी थी |
हनुमान जी ने यम का सारा वार्तालाप सुना और फिर
उर्मी की ओर देखा | उर्मी को
इस बात का कतई अहसास नहीं था कि उसके साथ क्या
होने वाला था | वह हनुमान जी के चरणों में भाव विभोर
बैठी थी | उसे पूर्ण चेतना में लाने के लिए
हनुमान जी को जोर से उसका नाम बोलना पड़ा -
“उर्मी ! खड़ी हो जाओ |”
उर्मी खड़ी हो गई | उसके हाथ समर्पण
में जुड़े हुए और सिर झुका हुआ था | हनुमान जी बोले
- “उर्मी , मै चाहता हूँ कि तुम एक चीज
सीखो | तुम्हारे पास समय बहुत कम है लेकिन मै
जानता हूँ कि तुम यह कर सकती हो |”
“कम ... समय ...?” उर्मी बुदबुदाई |
हनुमान जी ने यह समझा जरूर कि उर्मी
ने क्या बुदबुदाया किन्तु उन्होंने उसका कोई उतर न देना बेहतर
समझा | उन्होंने एक औरत की ओर इशारा किया जो
कुछ मीटर की दूरी पर एक
वृक्ष के नीचे कुछ चुन रही
थी | वह मातंग स्त्री नहीं
बल्कि नजदीकी किसी अन्य
गाँव की स्त्री थी | वे बोले -
“उस औरत की और देखो , वह मुझे नहीं
देख सकती | उसका भी वैसा
ही नश्वर शरीर है जैसा तुम्हारा है | वह
भी मानव है , तुम भी मानव हो | तो ऐसा
क्यों है कि तुम्हारी आँखे मुझे देख सकती
हैं , लेकिन उसकी आँखे नहीं ?”
उर्मी के पास उस प्रश्न का कोई उत्तर
नहीं था | हनुमान जी आगे बोले - “तुम
उस औरत से अधिक शक्तिशाली हो | तुम इस ग्रह
के उन लाखों लोगो से अधिक शक्तिशाली हो जो मुझे
नहीं देख सकते |”
एक पल के लिए हनुमान जी चुप रहे | वे शायद यह
चाहते थे कि उर्मी उनके बोले गए शब्दों पर कुछ पल
सोचे | कुछ पल की चुप्पी के बाद वे फिर
बोले - “अब आसमान में उड़ रहे उस पक्षी को देखो |
वह पक्षी उड़ रहा है लेकिन तुम नहीं
उड़ सकती, क्यों? तुम्हारे शरीर
की कुछ सीमाए हैं | तुम्हारा यह
शरीर नहीं उड़ सकता | लेकिन तुम उड़
सकती हो | याद रखो , तुम एक आत्मा हो | तुम यह
देह नहीं हो | अगर तुम चाहो तो इस
शरीर को छोड़कर एक पक्षी का
शरीर धारण कर सकती हो | तुम एक
पक्षी की तरह उड़ सकती
है और फिर वापिस इसी शरीर में आ
सकती हो | तुम ऐसा कर सकती हो और
तुम्हे ऐसा करना है |”
उर्मी ने अपना सिर उठाकर आसमान में उड़ रहे
पक्षियों को देखा | उसके मस्तिष्क में विचार आया - “अगर मै अपना
शरीर बदल सकू तो मै पक्षी
नहीं बल्कि इस धरा के राजा के शरीर में
प्रवेश करना चाहूंगी | राजा के रूप में मेरा पहला आदेश
होगा कि कोई भी जंगल नहीं काटेगा | हाँ,
मै एक दिन के लिए इस धरा की राजा बनकर यह
आदेश पारित करना चाहूंगी |”
इससे पहले कि वह और अधिक कल्पना में खोती,
हनुमान जी ने उसे टोका , “नहीं
नहीं ... अपनी भौतिक इच्छाओं के जाल में
मत फंसो | वरना तुममे जो शक्तियां अभी हैं वे
भी लुप्त हो जायेंगी | तुम मुझे देख
भी नहीं सकोगी अगर तुमने
अपनी इच्छाओं को अपने ऊपर शासन करने दिया |
इच्छाएं देह को आत्मा पर हावी कर देती
हैं | इस संसार में करोडो ऐसे भक्त हैं जो मेरे साक्षात् दर्शन
की इच्छा रखते हैं लेकिन वे अपनी भौतिक
इच्छाओं से ऊपर नहीं उठ पाते | अपने
जीवन में वे अधिक से अधिक अपने मन तथा
शरीर के सामर्थ्य को ही आजमा पाते हैं |
वे आत्मा के सामर्थ्य को छूते भी नहीं हैं
| तुम्हे अपनी आत्मा के सामर्थ्य को पहचानना है ,
और अभी पहचानना है |”
उर्मी के पास हनुमान जी की
बातो पर कहने के लिए कोई उतर नहीं था | वह
समर्पण में अपना सिर झुकाए चुप खड़ी
थी | उसकी मानसिक अवस्था कह
रही थी - “हे प्रभु , आप मुझे जहाँ ले
चले, मै जाने के लिए तैयार हूँ |”
हनुमान जी बोले - “कुछ मिनट पहले तुम स्वपनलोक
में थी और तुम्हारा यह शरीर
यही भूलोक में इस वृक्ष के नीचे लेटा
हुआ था | याद है ?”
“हाँ , बाबा मातंग ने मुझे स्वपनलोक के बारे में बताया था |”
उर्मी बोली - “... कुछ मिनट पहले यह
शरीर इस वृक्ष के नीचे लेटा था जबकि
मेरी आत्मा स्वपनलोक में एक हुबहू
शरीर धारण किये हुए थी |”
“अच्छा! क्या तुमने कभी सोचा कि तुमने हज़ारो
मील की दूरी एक
ही पल में , बल्कि बिना किसी समय में
कैसे तय कर ली ? स्वपनलोक तो इस सौरमंडल तक
में नहीं है | स्वपनलोक तो यहाँ से इतना दूर है कि
नश्वर शरीर वहां कभी नहीं
पहुँच सकता लेकिन आत्मा झट से वहां पहुँच सकती
है |” हनुमान जी ने पूछा |
“हाँ अन्जनेया , मुझे बाबा मातंग से यह ज्ञान मिला है | एक
शरीर -- चाहे वह मृत हो अथवा जीवित ,
चाहे वह मनुष्य हो या मशीन -- इस सौरमंडल से
बाहर नहीं जा सकता | लेकिन एक आत्मा इस
ब्रह्माण्ड में कही भी पहुँच
सकती है |” उर्मी ने उतर दिया |
“आत्मा इस ब्रह्माण्ड में कही भी
पहुँच सकती है ... बशर्ते वह कर्म के बोझ तले न
दबी हो |” हनुमान जी ने
उर्मी के वाक्य को ठीक किया | वे आगे
बोले -“आत्मा के लिए दूरी का कोई अर्थ
नहीं है | इसके लिए यह वृक्ष भी उतना
ही दूर है जितना कि विष्णुलोक (ब्रह्माण्ड
की सबसे बाहरी परत) |
तुम्हारी आत्मा बिना समय व्यतीत किए
विष्णुलोक में पहुँच सकती है बशर्ते कि यह कर्म के
बोझ से न दबी हो | तुम्हारी आत्मा बिना
समय लगाये सूर्य पर पहुँच सकती है बशर्ते यह
कर्म के बोझ से न दबी हो | शरीर काल
और दूरी की सीमाओं में बंधा
है जबकि आत्मा कर्म की सीमाओं में
बंधी है | उदाहरण के तौर पर इस समय
तुम्हारी आत्मा चाहे तो भी विष्णुलोक
नहीं जा सकती क्योंकि इसे इस नश्वर
संसार में कर्म के बही खाते चुकता करने हैं | लेकिन
तुम्हारी आत्मा इस ब्रह्माण्ड में कई अन्य जगह जा
सकती है | यह इस देह को छोड़कर
कही दूसरी जगह कोई अन्य देह धारण
कर सकती है | मै चाहता हूँ कि तुम ऐसा करो | मै
चाहता हूँ कि तुम अपनी आत्मा की
मुक्तइच्छा का पूर्णतः उपयोग करो |”
यह सुनकर उर्मी भय और बेचैनी
सी महसूस करने लगी| वह
बोली -“हे प्रभु , जब मै इस शरीर का
त्याग करुँगी तो मै कैसा महसूस करूंगी ?
क्या यह अनुभव स्वपनलोक में जाने जैसा होगा जहाँ उल जूलूल
घटित होता रहता है ?”
हनुमान जी उसके भय और बेचैनी को
समझ रहे थे | वे समझ रहे थे कि वे उर्मी को वह
तकनीक सिखाने जा रहे थे जिसे सीखने में
योगी भी बहुत समय लगाते हैं | फिर वह
तो एक सामान्य मातंग कन्या थी | उसके भय और
बेचैनी को दूर करने के लिए वे बोले - “मान लो कि
तुम्हारे सामने बहुत सारे रंग बिरंगे कपडे हैं और तुम्हे उनमे से
एक कपडा पसंद करके पहनना है | क्या यह कोई
ऐसी चीज है जिसे करने में भय और
बेचैनी हो ? जब तुम इस शरीर का त्याग
करोगी तो तुम्हे वे सब शरीर दिखेंगे जो उस
समय तुम्हारी आत्मा द्वारा धारण करने के लिए
उपलब्ध होंगे | तुम्हे केवल उन सभी
शरीरों में से एक को चुनना है | बस एक बात का ख्याल
रखना | किसी भी शरीर में
अधिक समय तक मत रहना वरना तुम उस शरीर के
मरने तक वही कैद रहोगी|”
“हे प्रभु , मै अपनी आत्मा की
मुक्तइच्छा को अनुभव करने के लिए तैयार हूँ | मुझे बताइये कि मै
यह शरीर कैसे छोडूं |” उर्मी ने
अपनी बेचैनी छिपाते हुए कहा |
अब सूर्य बादलों के पीछे ढक गया था | जोर
की आंधी कभी
भी शुरू होने वाली थी | शायद
मृत्यु के देव यम भी उसी
आंधी का इन्तजार कर रहे थे | अन्य मातंग महिलाएं
जो उर्मी के साथ आई थी ,
अपनी लकड़ियाँ बाँध रही थी
ताकि वे आंधी आने से पहले घर की तरफ
अग्रसर हो सकें | उर्मी आंधी से बेखबर
थी क्योंकि वह पूर्णतः हनुमान जी
की उर्जा में लीन थी |
“इसे देखो|” हनुमान जी अपनी
हथेली दिखाते हुए बोले जिस पर गेहूं का एक दाना था |
उसके बाद उन्होंने उस पेड़ की सबसे
ऊँची डाली की तरफ इशारा किया
जिसके नीचे वे खड़े थे | उस डाली पर एक
मोर बैठा था | उन्होंने पूछा , “अगर मै इस दाने को उस मोर
की ओर उछालूं तो क्या होगा?”
जहाँ पर उर्मी खड़ी थी वहां
से उस मोर की पूँछ का छोटा सा हिस्सा ही
नजर आ रहा था | उर्मी ने उत्तर दिया - “यह दाना मोर
तक पहुंचेगा ही नहीं | बीच
में वृक्ष की पत्तियां और डालियाँ है | यह दाना उन
पत्तियों से टकराएगा और नीचे गिर जाएगा |”
“ठीक कहा |” हनुमान जी बोले - “मान लो
कि यह पत्तियां और डालियाँ इस दाने को न रोकें और इसको मोर तक
पहुँचने दें तो क्या होगा ?”


“यह दाना मोर को लगेगा और शायद मोर उड़ जाएगा |”
उर्मी ने उत्तर दिया |
“ठीक| कुछ ऐसा ही तुम्हारी
आत्मा के साथ होता है | देखो तुम इस संसार को अपनी
5 इन्द्रियों से अनुभव कर रही हो - दृष्टि , श्रवण ,
गंध , स्पर्श और स्वाद | मान लो कि तुम्हारी वो मित्र
स्त्रियाँ तुम्हे वहां से पुकार लगाएं - “उर्मी , आओ
घर चलें|” तुम्हारा मस्तिष्क उस आवाज को कानों के जरिये सुनेगा,
समझेगा और फिर उसके ऊपर प्रतिक्रिया देगा | अर्थात जो
भी तुम सुनती हो वह तुम्हारे मस्तिष्क
तक पहुँचता है और वही से प्रतिक्रिया के रूप में लौट
आता है | वह आत्मा तक कभी नहीं
पहुँचता | ठीक उस तरह जैसे यह गेंहू का दाना
पत्तियों से टकराकर नीचे गिर जाता है , मोर तक
नहीं पहुँचता | अगर यह दाना मोर तक पहुँच जाए तो
मोर उड़ जाएगा |”
उर्मी ने अपनी सभी इन्द्रियों
का ध्यान किया - “हम्म ... मै इस समय क्या क्या अनुभव कर
रही हूँ? मै प्रभु की आवाज सुन
रही हूँ ... मै हवा का स्पर्श महसूस कर
रही हूँ ... मै कोई गंध नहीं महसूस कर
रही ... मै ...”
“देखो , इस हवा में गंध तो है लेकिन तुम उसे नहीं
अनुभव कर रही हो | इसका अर्थ है कि हवा में इस
समय जो गंध है उसे तुम्हारा मस्तिष्क नहीं पहचानता
और न ही उस पर कोई प्रतिक्रिया देता है | तुम्हे
ठीक ऐसा ही अपनी हर
इन्द्रिये के साथ करना है | तुम्हे सिर्फ इतना करना है कि तुम्हारा
मस्तिष्क जो कुछ भी इन्द्रियों द्वारा अनुभव करे उसे
न तो समझे , न ही उस पर कोई प्रतिक्रिया दे | जिस
क्षण तुम ऐसा करने में सफल हो जाओगी ,
तुम्हारी आत्मा इस शरीर का त्याग कर
देगी |” हनुमान जी ने तकनीक
उजागर की |
उर्मी ने अपनी इन्द्रियों का फिर से ख्याल
किया और बोली - “हे प्रभु , मै तो अब हवा का स्पर्श
भी महसूस नहीं कर रही |
अब मेरी केवल दो इन्द्रियां क्रियाशील हैं -
एक, मै अपनी आँखों से आपको देख रही
हूँ | दूसरा, मै अपने कानो से आपको सुन रही हूँ |
अगर मै अपनी आँखे बंद कर लूं और आपके शब्दों
पर गौर करना बंद कर दूं तो ...”
“हाँ , तब तुम्हारी आत्मा इस देह से फुर्र हो
जायेगी |” हनुमान जी ने बताया -
“अपनी आँखे बंद करो और मेरे शब्दों को समझना बंद
करो | तुम्हारा कार्य आसान करने के लिए मै सिर्फ श्री
राम के नाम का जाप करूँगा | मै कुछ और नहीं बोलूँगा |
“राम” ऐसा शब्द है जो तुम्हारे मस्तिष्क को बींधते
हुए तुम्हारी आत्मा तक पहुँच जाएगा |”
उर्मी ने अपनी आँखे बंद कर
ली | हनुमान जी जपने लगे - “राम ... राम
... राम ... राम ... राम ... राम ...”
जब हनुमान जी ने राम नाम सातवी बार जपा
तब उर्मी की आत्मा उस देह से निकल
गई और इसे एक आत्मिक अनुभव हुआ | वृक्ष , जंगल ,
हनुमान ... सब कुछ गायब हो गया | उसे केवल बहुत सारे
शरीर दिखाई दे रहे थे | उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे
वह कोई उडती हुई मक्खी है और उनमे
से किसी एक शरीर पर उतरने
वाली है |”
हनुमान जी ने 8 वी बार राम का नाम
उच्चारित नहीं किया | उसकी जगह
उन्होंने उर्मी का नाम लिया -“उर्मी ...”
उर्मी की देह जो उनके सामने
खड़ी थी उसने ऐसे प्रतिक्रिया
दी जैसे वह अचानक गहरी
नींद से जगा दी गई हो -“हम्म ... हाँ ...
हाँ ... प्रभु ... हाँ”
हनुमान जी मुस्कुरा दिए | उर्मी चकित
सी थी | वह बुदबुदाई - “क्या मैंने
अभी अभी इस शरीर का त्याग
किया ? अभी अभी ... क्या
मेरी आत्मा ने इस देह का त्याग किया और वापिस आ
गई ?”
हनुमान जी ने उसे मुस्कुराते हुए शाबाशी
दी -“तुम एक उत्तम शिष्य हो | तुमने इस
तकनीक को पहले ही प्रयास में
सीख लिया |”
उर्मी उस प्रशंसा से खुश नहीं हुई |
उसके होंठ सूख गए थे | उसका मस्तिष्क उस आत्मिक अनुभव
से घबरा गया था | उसके मुंह से अनायास निकल पड़ा -“क्या होता
... क्या होता अगर मै इस देह में वापिस न लौट पाती
तो ? क्या मै मर जाती? क्या यह देह हमेशा के लिए
मर जाती?”
“इस देह की चिंता मत करो उर्मी |”
हनुमान जी बोले -“जहाँ तक मै देख पा रहा हूँ, यह
देह आने वाले कुछ समय तक तो नहीं मृत होने
वाली | जब तुम इस शरीर को छोड़
दोगी तो यह ब्रह्माण्ड अपने आप इसकी
देखभाल करेगा जब तक कि तुम इसमें फिर से नहीं
लौट आती |”
“लेकिन ... लेकिन ... आप मेरी इस देह को देख रहे
थे , प्रभु | कृपा मुझे बताइए इस देह ने कैसी
प्रतिक्रिया दी जब मेरी आत्मा कुछ पल
पहले इससे बाहर निकली थी |”
उर्मी ने अपने भय को छिपाने की कोशिश
करते हुए प्रश्न किया |
“कुछ नहीं हुआ इसे | तुम इस शरीर से
सिर्फ एक पल के लिए बाहर निकली थी |
मैंने तो तुम्हारे चेहरे पर कुछ भी असाधारण
नहीं देखा | और कोई नहीं देख पाता |
अगर तुम एक लम्बे समय के लिए भी इस
शरीर से बाहर रहो तो भी इसके बारे में चिंता
मत करो | यह ब्रह्माण्ड अपने आप इसकी देखभाल
करेगा |” हनुमान जी ने उर्मी को बताया |
उर्मी अब भी अपने भय को विजय
नहीं कर पाई थी | उसने पुछा -“तब क्या
होगा अगर मै कभी भी इस देह में वापिस
न लौटूं?”
“मैंने बताया ना, उर्मी | तुम्हारी आत्मा
पूर्णतः मुक्त नहीं हो जायेगी |
तुम्हारी आत्मा एक खूंटे से बंधी गाय
की तरह है | यह उतनी ही
घूम सकती है जितनी लम्बी
रस्सी है | तुम्हारी आत्मा कर्म
की रस्सी से बंधी है | तुम्हे
मातांगो के साथ कई सालों तक रहना है उन कर्मों को चुकता करने के
लिए | चाहे तुम्हारी आत्मा कही
भी जाए, यह वापिस आएगी जरूर | यह
तकनीक सीखने के बाद तुम भगवान्
नहीं बन जाओगी | तुममे
दैवीय शक्तियां नहीं आएँगी |
यह एक सामान्य मानवी शक्ति है | बाबा मातंग के पास
भी यह शक्ति है |क्या तुमने बाबा मातंग को इस शक्ति
के कारण कभी असामान्य होते देखा है ?
नहीं न ! इसलिए चिंता मत करो , सब कुछ सामान्य
ही रहेगा |”
उर्मी संतुष्ट और शांत लग रही
थी | इससे पहले की वह हनुमान
जी को कुछ कह पाती उसकी
सहेलियों ने उसे आवाज दी -“उर्मी , चलो
घर की और चले | शीघ्रता करो |
आंधी कभी भी शुरू हो
सकती है |”
उर्मी ने उनकी ओर देखा और सिर हिलाया
| फिर उसने आज्ञा लेने हेतु श्री हनुमान
जी की ओर देखा | हनुमान
जी बोले -“जाओ उर्मी | लेकिन जब
भी तुम्हे राम नाम का जाप सुनाई दे , वही
करना जो मैंने अभी अभी तुम्हे सिखाया है
| राम की ध्वनि को अपनी देह और मन
को बींधते हुए निकलने देना ताकि वह ध्वनि
तुम्हारी आत्मा तक पहुँच सके |”
उर्मी ने उसे हनुमान जी का आदेश समझा
| घुटनों के बल बैठते हुए उसने अपना सिर हनुमान जी
के चरणों में झुका दिया | उसकी सहेलियों ने
भी उसे ऐसा करते हुए देखा लेकिन उन्हें इसमें कुछ
भी असामान्य नहीं लगा क्योंकि मातंग
अक्सर अदृश्य शक्तियों से बतियाते हैं |
जैसे ही उर्मी अपनी सहेलियों
की ओर चलने लगी , हनुमान
जी ने पीछे यम की ओर रुख
किया | दोनों ने एक दुसरे का अभिवादन किया | यम बोले -“हे
शक्तिमान हनुमान , उर्मी से अपनी
सुरक्षा का घेरा हटाने के लिए धन्यवाद | धन्यवाद
नीयति में बाधा न बनने के लिए |”
हनुमान जी मुस्कुराये और बोले -“क्यों? क्या कुछ होने
वाला है ? क्या आप यहाँ उर्मी की मृत्यु
के साक्षी बनने आये हैं ?”
यम बोले -“हे हनुमान , आप सब कुछ जानते हैं | ऐसे मत बनो
जैसे आपको कुछ पता ही नहीं है |”
“हैं? उर्मी की मृत्यु होगी?”
हनुमान जी ने बच्चे सा मासूम चेहरा बनाकर कहा
-“कैसे?”
जैसे ही हनुमान जी ने यह प्रश्न पूछा
भयंकर आंधी शुरू हो गई | यम के चेहरे पर
दानवी मुस्कान आ गई | उन्होंने एक वृक्ष
की तरफ इशारा करते हुए कहा -“जैसे ही
उर्मी उस वृक्ष के नीचे
पहुंचेगी , एक टहनी उस पेड़ से उस पर
गिरेगी | मेरे 11 गिनते ही ऐसा होगा |”
हनुमान जी ने उस वृक्ष की ओर देखा |
उर्मी उस वृक्ष से कुछ ही कदम दूर
थी | यम की ओर बिना देखे हनुमान
जी ने शरारती लहजे में कहा - “अच्छा ,
आप अपने 11 गिनिये | मै तो अपने प्रभु का नाम जपूंगा |”
हवा अचानक बहुत तेज हो गई थी | हनुमान
जी ने जपना शुरू किया - “राम ... राम ...”
उर्मी उस वृक्ष के नीचे पहुंचकर रूक
गई | यह देखकर यम की दानवी मुस्कान
ओर भी चौड़ी हो गई | वे गिन रहे थे --
“8 ... 9 ...” --- उर्मी हवा की गति के
कारण नहीं रुकी थी |
उर्मी तब रुकी जब उसे “राम” का स्वर
सुनाई दिया | उसे ऐसा लगा जैसे हवाए राम नाम का जाप कर
रही हो | उसने अपनी आँखों को बंद किया
और शांत खड़ी हो गई | उसने राम नाम को
अपनी देह तथा मन बिंधने दिया उसे बिना समझे और
उस पर बिना कोई प्रतिक्रिया दिए | राम नाम ठीक उस
समय उसकी आत्मा तक पहुंचा जब यम ने “11” गिना
| राम नाम ने उसकी आत्मा को उस देह से अलग कर
दिया |
यम नीयति के साथ ऐसे धोखा होते देख चकित रह गए
| उनके 11 गिनते ही पेड़ की शाखा
उर्मी के ऊपर गिरने वाली थी
लेकिन वह नहीं गिरी | हनुमान
जी ने यम की ओर देखा , मुस्कुराये और
वहां से ओझल हो गए | यम बहुत क्रोधित थे | वे चिल्लाये -
“काल .. काल ...”
काल (समय के देव) यम के सामने प्रकट हुए और बोले - “हे
यम भ्राता, मै समझ सकता हूँ कि आप क्यों क्रोधित हैं | मैंने
आपको अदृश्य रूप में बताया था कि आपके 11 गिनते
ही शाखा गिरेगी | सच में ही
उस क्षण वह शाखा गिरने वाली थी | आप
पवनदेव से पूछिए कि उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया |”
काल ने पवनदेव को बुलाया और इस बारे में पुछा | पवनदेव ने उत्तर
दिया - “मुझे बताया गया था कि मुझे उर्मी
की मृत्यु का कारण बनना है | मुझे बताया गया था कि
मुझे उर्मी की आत्मा को मृत्यु का अनुभव
प्रदान करना है | लेकिन मै जैसे ही वह शाखा गिराने
वाला था , वह वहां से फुर्र हो गई |”
“क्या?” काल ने प्रतिक्रिया दी - “वह ठीक
उस वृक्ष के नीचे थी | वह
अभी अभी आगे निकली है |
देखो , वह वहां जा रही है |”
“वह उर्मी नहीं है |” पवनदेव ने उत्तर
दिया -“उर्मी उस देह में नहीं है | वह
(उसकी आत्मा) उस देह से निकलकर जा
चुकी है |”
यम को अब कुछ कुछ समझ आ रहा था | उन्होंने पूछा -
“ठीक है ... कि उर्मी की
आत्मा उस देह से निकलकर जा चुकी है और इस
समय कोई अन्य आत्मा इस देह में घुस गई है | लेकिन उस देह
में किसकी आत्मा घुसी है? और
उर्मी की आत्मा इस समय कहाँ है?”
उनमे से किसी को नहीं पता था कि
उर्मी की आत्मा कहाँ चली
गई है | किसी अन्य आत्मा ने उर्मी
की देह को अपना लिया था | उसके व्यवहार से कोई
नहीं बता सकता था कि उसकी देह को कोई
अन्य आत्मा चला रही है | उसकी
सहेलियां भी इस बात से अनभिज्ञ थी | वे
सब अपने सिर पर लकडियो के गट्ठर लिए हुए घर की
तरफ बढ़ रही थी | उनके कुछ दूर चलते
ही आंधी से उनमे से एक संतुलन खो
बैठी और लकड़ी का गठ्ठर गिर गया |
उसने उर्मी से कहा -“उर्मी , इस गठ्ठर
को उठाने में मेरी सहायता करो |”
उर्मी ने अपनी सहेली
की गठ्ठर उठाने में सहायता की | अर्थात
उर्मी का मन व तन नई आत्मा के साथ
भी अच्छे से चल रहा था | लेकिन जब वह घर
पहुंची तब बाबा मातंग तुरंत पहचान गए कि
उर्मी की देह किसी अन्य
आत्मा के वश में है | जब कोई आस पास नहीं था तब
उन्होंने उर्मी के पास जाकर पूछा -“तुम कौन हो|”
उर्मी की देह से एक आवाज आई - “मैं
उर्मी हूँ बाबा ! आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं ?”
बाबा मातंग इसी उत्तर कि अपेक्षा कर रहे थे |
उर्मी की देह , मन और स्मरण ज्यों के
त्यों थे | केवल उसकी आत्मा बदली हुई
थी | बाबा मातंग ने मन ही मन सोचा -“तुम
उर्मी नहीं हो | तुम्हारा मस्तिष्क कह
रहा है कि तुम उर्मी हो क्योंकि मस्तिष्क में वह
सूचना भरी है | लेकिन मै उर्मी को केवल
उसके मस्तिष्क से ही नहीं बल्कि
उसकी आत्मा से जानता हूँ |”
ठीक उसी समय हनुमान जी
वहां प्रकट हो गए | बाबा मातंग ने उनको विधिवत प्रणाम किया |
हनुमान उर्मी के उस शरीर को दिखाई
नहीं दे रहे थे क्योंकि उस शरीर में जो
आत्मा थी वो हनुमान जी के साक्षात्
दर्शन के योग्य नहीं थी | बाबा मातंग ने
हनुमान जी से वार्तालाप प्रारंभ करने से पहले
उर्मी को वहां से जाने के लिए कह दिया |
हनुमान जी बोले -“बाबा मातंग , आप ठीक
कह रहे हैं | उर्मी के शरीर में
उसकी आत्मा नहीं है | जो आत्मा उसके
शरीर में उपस्थित है आपको उस आत्मा का इतिहास
जानना जरूरी है | एक राम नारायण नाम का पुरुष है |
उसने अपना पूरा जीवन अपने बच्चों की
ख़ुशी में लगा दिया | जब वह बूढा हो गया तब उसके
बच्चे सुदूर देशों में जाकर बस गए | उन्होंने राम नारायण को
वृद्धाश्रम में भर्ती करा दिया | अपने बच्चों से दूर
रहने के दुःख में रामनारायण दिन रात भगवान् विष्णु की
अराधना करने लगा | उसने प्रार्थना की कि कम से कम
उसके अंतिम दिनों में उसका परिवार उसके साथ हो | भगवान् विष्णु
उसकी यह इच्छा पूरी करना चाहते थे
लेकिन उसके बच्चों का इतना अच्छा भाग्य नहीं था कि
उनके पाप भगवान् विष्णु धो दें | भगवान विष्णु ने मुझे कोई उपाय
ढूँढने को कहा | इसलिए राम नारायण की आत्मा
अपनी अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए
उर्मी की देह में आ गई है | जब यह
आंधी ख़त्म होगी , आप
उर्मी को असामान्य रूप से अपने परिवार के साथ भावुक
होता देखेंगे | आपको उस स्थिति को संभालना है यह जानते हुए कि
राम नारायण की आत्मा उर्मी
की देह के माध्यम से अपनी अंतिम इच्छा
पूरी कर रही है | यह आत्मा कल
ब्रह्ममुहूर्त से पहले इस शरीर को त्याग
देगी |”
“अगर यह भगवान् विष्णु का निर्देश है तो आप चिंता न करे
अन्जनेया! मै यह निश्चित करूँगा कि राम नारायण को
अपनी अंतिम इच्छा पूरी करने में कोई
अवरोध न आये |” बाबा मातंग बोले -“लेकिन इस समय
उर्मी की आत्मा कहाँ है?”
“उर्मी की आत्मा इस समय मृत्यु का
अनुभव ले रही है |” हनुमान जी ने बताया
-“यह उसकी नीयति थी कि
मुझे मिलने के तुरंत बाद उसका मृत्यु से साक्षातकार होगा | मै
उससे मिला और उसको देह से फुर्र से बाहर निकलना सिखाया |
वह इस देह से उड़कर राम नारायण की देह में
चली गई जो यहाँ से मीलों दूर एक
वृद्धाश्रम में है |”
उर्मी की आत्मा को देह से बाहर निकलने
की तकनीक का ज्ञान था लेकिन वह राम
नारायण की देह में कैद हो गई | वह देह लगभग मृत
थी | उस देह की केवल एक
ही इन्द्रिय काम कर रही थी
और वो थी स्पर्श | वह देह बाहर से
गर्मी और जलन महसूस कर रही
थी और प्रतिक्रिया स्वरुप पसीना छोड़
रही थी | उर्मी
की आत्मा उस देह से भी फुर्र से बाहर
निकल जाती अगर वह किसी तरह उस
जलन और गर्मी को कोई प्रतिक्रिया नहीं
देती (क्योंकि देह से बाहर निकलने की
तकनीक है - पांचो इन्द्रियों से कुछ भी
अनुभव करे , उसको न तो समझना न ही कोई
प्रतिक्रिया देना )| ऐसा होने वाला नहीं था |
उर्मी की आत्मा तब तक उस देह में
फंसी रही जब तक कि अगली
सुबह ब्रह्ममुहूर्त के समय वह देह मृत नहीं हो
गई |
जिस क्षण राम नारायण की देह मृत हुई ,
उसकी आत्मा भी उर्मी
की देह से निकल गई और अगले जन्म
की ओर अग्रसर हो गई | दूसरी ओर
उर्मी की आत्मा भी राम
नारायण की देह से आजाद हो गई और
अपनी देह में वापिस आ गई |
इस तरह हनुमान जी ने यह संभव किया कि राम
नारायण ने भी अपनी अंतिम इच्छा पूर्ण
कर ली और उर्मी भी मृत्यु
से बच गई |
जब उर्मी अपनी देह में वापिस आई तब
हनुमान जी की यात्रा के तीसरे
दिन का ब्रह्ममुहूर्त था | जब वह उठी तब तक
अन्य मातंगो ने चरणपूजा शुरू कर दी थी |
हनुमान जी सभी मातंगों से मिल चुके थे
और चरण पूजा का वह प्रथम दिन था | पूजा में हनुमान
जी ने उर्मी के साथ हुई घटनाओं का
वर्णन किया और अध्याय क्रमांक 3, 4 व 5 को लॉगबुक में
शब्दबद्ध किया गया | (अध्याय क्रमांक 1 तथा 2 की
घटनाओं को बाबा मातंग ने खुद देखा और शब्दबद्ध किया था)
चौथे अध्याय में दिल्ली नामक शहर के एक लड़के का
जिक्र है जो उर्मी का पिछले जन्म का पुत्र है | वह
लड़का दरअसल हनुमान जी का एक युवा भक्त है
जिसने इत्तेफाक से सेतु के माध्यम से चरण पूजा में
भी भाग लिया था | अन्य सभी भक्त
जिन्होंने सेतु के माध्यम से चरण पूजा के लिए अपनी
सेवा और अर्पण भेजा था उन सबका जिक्र लॉगबुक में आया है |
वे सब भक्त अपनी घटनाएं आने वाले अध्यायों में
पढेंगे|
वे भक्त जो हनुमान जी की
लीलाओं के अध्यायों को गंभीरता से पढ़ते
आ रहे हैं उन्होंने इस पांचवे अध्याय के पढ़ते ही
हनुमान जी से मिलने के लिए आवश्यक 36 पडावों में
से 2 पड़ाव पार कर लिए हैं |
गुप्त मंत्र की द्वितिय पंक्ति पीने के लिए लेखक से सम्पर्क करें.

हनुमान जी की लीलाओं का
यह अध्याय यही समाप्त होता है |