सोमवार, 21 दिसंबर 2015

अध्याय 5 ( चिरंजीवी हनुमान ने सिखाया देह से बाहर निकलकर उड़ना )

जब उर्मी नींद से जागी तो
उसने अपने सामने श्री हनुमान जी को
देखा | कुछ पल पहले उसने उनको अपने सपने में भी
देखा था | उसे लगा कि वो अब भी सपने में है | हनुमान
जी ने उन्हें बताया कि वह सपने में नहीं
है और वे उसके गाँव के नजदीक खड़े हैं जहाँ वह
चूल्हे के लिए लकडिया चुनने आई हुई है |
हनुमान जी के पवित्र चरणों में बैठी
उर्मी के होंठो से प्रथम शब्द निकले -“हे प्रभु ,
आप कितने तीव्र है | एक पल पहले आप
स्वपनलोक में थे और अब आप भूलोक पर है | एक
ही पल में आपने स्वपनलोक से भूलोक
की यात्रा कर ली|”
“वह तो तुम भी हो उर्मी |” हनुमान
जी मुस्कुराये और बोले -“कुछ पल पहले तुम
भी स्वपनलोक में थी और देखो अब तुम
यहाँ हो |”
जवाब में उर्मी कुछ बुदबुदाई लेकिन हनुमान
जी ने उर्मी के शब्दों को नहीं
सुना क्योंकि उन्हें पास में मृत्यु के देवता यम के उपस्थित होने का
अहसास हुआ | अश्विन हनुमान जी के
पीछे खड़े थे | वे यम के पास गए और उनसे बात
करने लगे |
हनुमान जी शांत खड़े थे और उर्मी उनके
चरणों में बैठी हुई थी इस बात से बेखबर
कि उसके आस पास क्या हो रहा था |
अश्विनों ने यम से पूछा - “हे यम , आपके यहाँ उपस्थित होने का
क्या प्रयोजन है? हमें तो यहाँ ऐसा कोई नहीं दिखाई दे
रहा जो मृत्युशैया पर हो ? फिर आप यहाँ क्या कर रहे हैं ?”
यम ने उत्तर दिया - “हे देवो के चिकित्सकों , मै यहाँ हूँ क्योंकि
उर्मी की मृत्यु होने वाली है
|”
“क्या?” अश्विन यह सुनकर हैरान रह गए | वे बोले -
“उर्मी तो पूर्णतः स्वस्थ है और उसकी
रक्षा में स्वयं हनुमान खड़े हैं | फिर आपका यहाँ आने का साहस
कैसे हुआ ? वह नहीं मर सकती |”
यम ने उत्तर दिया -“नीयति के अनुसार
उर्मी की आत्मा को इस समय मृत्यु का
अनुभव होने वाला है | मै उसकी आत्मा के इस
अनुभव का साक्षी बनने ही यहाँ आया हूँ
| आप चित्रगुप्त की कर्म बही देख
सकते हैं अथवा भगवान् विष्णु से पूछ सकते हैं |
उसकी नीयति है कि हनुमान से मिलने के
बाद उसकी मृत्यु हो जायेगी | अब वह
हनुमान जी से मिल चुकी है | अब
उसकी मृत्यु का समय हो गया है | मै हनुमान
जी के उससे दूर चले जाने का इन्तजार कर रहा हूँ |
मुझे नहीं लगता कि हनुमान उसकी नियति
में बाधा डालने का प्रयास भी करेंगे |”
अश्विनो ने हनुमान जी की ओर देखा |
हनुमान जी ने यम की ओर देखा
भी नहीं था लेकिन उन्हें यम
की उपस्थिति और यम की अश्विनो के साथ
हो रहे वार्तालाप का आभास था |
अश्विनों ने यम को कहा -“हे यम , सवाल नीयति में
बाधा डालने का नहीं है | उर्मी
की रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है | अगर उसे कोई
रोग होता है तो हम उसे तुरंत ठीक कर देंगे | अगर
उसे कुछ और होता है तो स्वयं हनुमान जी
उसकी रक्षा हेतु उपस्थित हैं | वैसे भी ,
इस संसार में “कारण” “कार्य” से पहले आता है | जब तक हम
यहाँ है , हम हर उस चीज से उर्मी
की रक्षा करेंगे जो उर्मी की
मृत्यु का “कारण” बन सकती है |
“नीयति को अपना रास्ता चलने दो अश्विनो , मुझे इस बारे
में कोई तर्क नहीं करना है |” यम वार्तालाप समाप्त
करते हुए बोले | अब यम की आँखे उर्मी
पर टिकी थी |
हनुमान जी ने यम का सारा वार्तालाप सुना और फिर
उर्मी की ओर देखा | उर्मी को
इस बात का कतई अहसास नहीं था कि उसके साथ क्या
होने वाला था | वह हनुमान जी के चरणों में भाव विभोर
बैठी थी | उसे पूर्ण चेतना में लाने के लिए
हनुमान जी को जोर से उसका नाम बोलना पड़ा -
“उर्मी ! खड़ी हो जाओ |”
उर्मी खड़ी हो गई | उसके हाथ समर्पण
में जुड़े हुए और सिर झुका हुआ था | हनुमान जी बोले
- “उर्मी , मै चाहता हूँ कि तुम एक चीज
सीखो | तुम्हारे पास समय बहुत कम है लेकिन मै
जानता हूँ कि तुम यह कर सकती हो |”
“कम ... समय ...?” उर्मी बुदबुदाई |
हनुमान जी ने यह समझा जरूर कि उर्मी
ने क्या बुदबुदाया किन्तु उन्होंने उसका कोई उतर न देना बेहतर
समझा | उन्होंने एक औरत की ओर इशारा किया जो
कुछ मीटर की दूरी पर एक
वृक्ष के नीचे कुछ चुन रही
थी | वह मातंग स्त्री नहीं
बल्कि नजदीकी किसी अन्य
गाँव की स्त्री थी | वे बोले -
“उस औरत की और देखो , वह मुझे नहीं
देख सकती | उसका भी वैसा
ही नश्वर शरीर है जैसा तुम्हारा है | वह
भी मानव है , तुम भी मानव हो | तो ऐसा
क्यों है कि तुम्हारी आँखे मुझे देख सकती
हैं , लेकिन उसकी आँखे नहीं ?”
उर्मी के पास उस प्रश्न का कोई उत्तर
नहीं था | हनुमान जी आगे बोले - “तुम
उस औरत से अधिक शक्तिशाली हो | तुम इस ग्रह
के उन लाखों लोगो से अधिक शक्तिशाली हो जो मुझे
नहीं देख सकते |”
एक पल के लिए हनुमान जी चुप रहे | वे शायद यह
चाहते थे कि उर्मी उनके बोले गए शब्दों पर कुछ पल
सोचे | कुछ पल की चुप्पी के बाद वे फिर
बोले - “अब आसमान में उड़ रहे उस पक्षी को देखो |
वह पक्षी उड़ रहा है लेकिन तुम नहीं
उड़ सकती, क्यों? तुम्हारे शरीर
की कुछ सीमाए हैं | तुम्हारा यह
शरीर नहीं उड़ सकता | लेकिन तुम उड़
सकती हो | याद रखो , तुम एक आत्मा हो | तुम यह
देह नहीं हो | अगर तुम चाहो तो इस
शरीर को छोड़कर एक पक्षी का
शरीर धारण कर सकती हो | तुम एक
पक्षी की तरह उड़ सकती
है और फिर वापिस इसी शरीर में आ
सकती हो | तुम ऐसा कर सकती हो और
तुम्हे ऐसा करना है |”
उर्मी ने अपना सिर उठाकर आसमान में उड़ रहे
पक्षियों को देखा | उसके मस्तिष्क में विचार आया - “अगर मै अपना
शरीर बदल सकू तो मै पक्षी
नहीं बल्कि इस धरा के राजा के शरीर में
प्रवेश करना चाहूंगी | राजा के रूप में मेरा पहला आदेश
होगा कि कोई भी जंगल नहीं काटेगा | हाँ,
मै एक दिन के लिए इस धरा की राजा बनकर यह
आदेश पारित करना चाहूंगी |”
इससे पहले कि वह और अधिक कल्पना में खोती,
हनुमान जी ने उसे टोका , “नहीं
नहीं ... अपनी भौतिक इच्छाओं के जाल में
मत फंसो | वरना तुममे जो शक्तियां अभी हैं वे
भी लुप्त हो जायेंगी | तुम मुझे देख
भी नहीं सकोगी अगर तुमने
अपनी इच्छाओं को अपने ऊपर शासन करने दिया |
इच्छाएं देह को आत्मा पर हावी कर देती
हैं | इस संसार में करोडो ऐसे भक्त हैं जो मेरे साक्षात् दर्शन
की इच्छा रखते हैं लेकिन वे अपनी भौतिक
इच्छाओं से ऊपर नहीं उठ पाते | अपने
जीवन में वे अधिक से अधिक अपने मन तथा
शरीर के सामर्थ्य को ही आजमा पाते हैं |
वे आत्मा के सामर्थ्य को छूते भी नहीं हैं
| तुम्हे अपनी आत्मा के सामर्थ्य को पहचानना है ,
और अभी पहचानना है |”
उर्मी के पास हनुमान जी की
बातो पर कहने के लिए कोई उतर नहीं था | वह
समर्पण में अपना सिर झुकाए चुप खड़ी
थी | उसकी मानसिक अवस्था कह
रही थी - “हे प्रभु , आप मुझे जहाँ ले
चले, मै जाने के लिए तैयार हूँ |”
हनुमान जी बोले - “कुछ मिनट पहले तुम स्वपनलोक
में थी और तुम्हारा यह शरीर
यही भूलोक में इस वृक्ष के नीचे लेटा
हुआ था | याद है ?”
“हाँ , बाबा मातंग ने मुझे स्वपनलोक के बारे में बताया था |”
उर्मी बोली - “... कुछ मिनट पहले यह
शरीर इस वृक्ष के नीचे लेटा था जबकि
मेरी आत्मा स्वपनलोक में एक हुबहू
शरीर धारण किये हुए थी |”
“अच्छा! क्या तुमने कभी सोचा कि तुमने हज़ारो
मील की दूरी एक
ही पल में , बल्कि बिना किसी समय में
कैसे तय कर ली ? स्वपनलोक तो इस सौरमंडल तक
में नहीं है | स्वपनलोक तो यहाँ से इतना दूर है कि
नश्वर शरीर वहां कभी नहीं
पहुँच सकता लेकिन आत्मा झट से वहां पहुँच सकती
है |” हनुमान जी ने पूछा |
“हाँ अन्जनेया , मुझे बाबा मातंग से यह ज्ञान मिला है | एक
शरीर -- चाहे वह मृत हो अथवा जीवित ,
चाहे वह मनुष्य हो या मशीन -- इस सौरमंडल से
बाहर नहीं जा सकता | लेकिन एक आत्मा इस
ब्रह्माण्ड में कही भी पहुँच
सकती है |” उर्मी ने उतर दिया |
“आत्मा इस ब्रह्माण्ड में कही भी
पहुँच सकती है ... बशर्ते वह कर्म के बोझ तले न
दबी हो |” हनुमान जी ने
उर्मी के वाक्य को ठीक किया | वे आगे
बोले -“आत्मा के लिए दूरी का कोई अर्थ
नहीं है | इसके लिए यह वृक्ष भी उतना
ही दूर है जितना कि विष्णुलोक (ब्रह्माण्ड
की सबसे बाहरी परत) |
तुम्हारी आत्मा बिना समय व्यतीत किए
विष्णुलोक में पहुँच सकती है बशर्ते कि यह कर्म के
बोझ से न दबी हो | तुम्हारी आत्मा बिना
समय लगाये सूर्य पर पहुँच सकती है बशर्ते यह
कर्म के बोझ से न दबी हो | शरीर काल
और दूरी की सीमाओं में बंधा
है जबकि आत्मा कर्म की सीमाओं में
बंधी है | उदाहरण के तौर पर इस समय
तुम्हारी आत्मा चाहे तो भी विष्णुलोक
नहीं जा सकती क्योंकि इसे इस नश्वर
संसार में कर्म के बही खाते चुकता करने हैं | लेकिन
तुम्हारी आत्मा इस ब्रह्माण्ड में कई अन्य जगह जा
सकती है | यह इस देह को छोड़कर
कही दूसरी जगह कोई अन्य देह धारण
कर सकती है | मै चाहता हूँ कि तुम ऐसा करो | मै
चाहता हूँ कि तुम अपनी आत्मा की
मुक्तइच्छा का पूर्णतः उपयोग करो |”
यह सुनकर उर्मी भय और बेचैनी
सी महसूस करने लगी| वह
बोली -“हे प्रभु , जब मै इस शरीर का
त्याग करुँगी तो मै कैसा महसूस करूंगी ?
क्या यह अनुभव स्वपनलोक में जाने जैसा होगा जहाँ उल जूलूल
घटित होता रहता है ?”
हनुमान जी उसके भय और बेचैनी को
समझ रहे थे | वे समझ रहे थे कि वे उर्मी को वह
तकनीक सिखाने जा रहे थे जिसे सीखने में
योगी भी बहुत समय लगाते हैं | फिर वह
तो एक सामान्य मातंग कन्या थी | उसके भय और
बेचैनी को दूर करने के लिए वे बोले - “मान लो कि
तुम्हारे सामने बहुत सारे रंग बिरंगे कपडे हैं और तुम्हे उनमे से
एक कपडा पसंद करके पहनना है | क्या यह कोई
ऐसी चीज है जिसे करने में भय और
बेचैनी हो ? जब तुम इस शरीर का त्याग
करोगी तो तुम्हे वे सब शरीर दिखेंगे जो उस
समय तुम्हारी आत्मा द्वारा धारण करने के लिए
उपलब्ध होंगे | तुम्हे केवल उन सभी
शरीरों में से एक को चुनना है | बस एक बात का ख्याल
रखना | किसी भी शरीर में
अधिक समय तक मत रहना वरना तुम उस शरीर के
मरने तक वही कैद रहोगी|”
“हे प्रभु , मै अपनी आत्मा की
मुक्तइच्छा को अनुभव करने के लिए तैयार हूँ | मुझे बताइये कि मै
यह शरीर कैसे छोडूं |” उर्मी ने
अपनी बेचैनी छिपाते हुए कहा |
अब सूर्य बादलों के पीछे ढक गया था | जोर
की आंधी कभी
भी शुरू होने वाली थी | शायद
मृत्यु के देव यम भी उसी
आंधी का इन्तजार कर रहे थे | अन्य मातंग महिलाएं
जो उर्मी के साथ आई थी ,
अपनी लकड़ियाँ बाँध रही थी
ताकि वे आंधी आने से पहले घर की तरफ
अग्रसर हो सकें | उर्मी आंधी से बेखबर
थी क्योंकि वह पूर्णतः हनुमान जी
की उर्जा में लीन थी |
“इसे देखो|” हनुमान जी अपनी
हथेली दिखाते हुए बोले जिस पर गेहूं का एक दाना था |
उसके बाद उन्होंने उस पेड़ की सबसे
ऊँची डाली की तरफ इशारा किया
जिसके नीचे वे खड़े थे | उस डाली पर एक
मोर बैठा था | उन्होंने पूछा , “अगर मै इस दाने को उस मोर
की ओर उछालूं तो क्या होगा?”
जहाँ पर उर्मी खड़ी थी वहां
से उस मोर की पूँछ का छोटा सा हिस्सा ही
नजर आ रहा था | उर्मी ने उत्तर दिया - “यह दाना मोर
तक पहुंचेगा ही नहीं | बीच
में वृक्ष की पत्तियां और डालियाँ है | यह दाना उन
पत्तियों से टकराएगा और नीचे गिर जाएगा |”
“ठीक कहा |” हनुमान जी बोले - “मान लो
कि यह पत्तियां और डालियाँ इस दाने को न रोकें और इसको मोर तक
पहुँचने दें तो क्या होगा ?”


“यह दाना मोर को लगेगा और शायद मोर उड़ जाएगा |”
उर्मी ने उत्तर दिया |
“ठीक| कुछ ऐसा ही तुम्हारी
आत्मा के साथ होता है | देखो तुम इस संसार को अपनी
5 इन्द्रियों से अनुभव कर रही हो - दृष्टि , श्रवण ,
गंध , स्पर्श और स्वाद | मान लो कि तुम्हारी वो मित्र
स्त्रियाँ तुम्हे वहां से पुकार लगाएं - “उर्मी , आओ
घर चलें|” तुम्हारा मस्तिष्क उस आवाज को कानों के जरिये सुनेगा,
समझेगा और फिर उसके ऊपर प्रतिक्रिया देगा | अर्थात जो
भी तुम सुनती हो वह तुम्हारे मस्तिष्क
तक पहुँचता है और वही से प्रतिक्रिया के रूप में लौट
आता है | वह आत्मा तक कभी नहीं
पहुँचता | ठीक उस तरह जैसे यह गेंहू का दाना
पत्तियों से टकराकर नीचे गिर जाता है , मोर तक
नहीं पहुँचता | अगर यह दाना मोर तक पहुँच जाए तो
मोर उड़ जाएगा |”
उर्मी ने अपनी सभी इन्द्रियों
का ध्यान किया - “हम्म ... मै इस समय क्या क्या अनुभव कर
रही हूँ? मै प्रभु की आवाज सुन
रही हूँ ... मै हवा का स्पर्श महसूस कर
रही हूँ ... मै कोई गंध नहीं महसूस कर
रही ... मै ...”
“देखो , इस हवा में गंध तो है लेकिन तुम उसे नहीं
अनुभव कर रही हो | इसका अर्थ है कि हवा में इस
समय जो गंध है उसे तुम्हारा मस्तिष्क नहीं पहचानता
और न ही उस पर कोई प्रतिक्रिया देता है | तुम्हे
ठीक ऐसा ही अपनी हर
इन्द्रिये के साथ करना है | तुम्हे सिर्फ इतना करना है कि तुम्हारा
मस्तिष्क जो कुछ भी इन्द्रियों द्वारा अनुभव करे उसे
न तो समझे , न ही उस पर कोई प्रतिक्रिया दे | जिस
क्षण तुम ऐसा करने में सफल हो जाओगी ,
तुम्हारी आत्मा इस शरीर का त्याग कर
देगी |” हनुमान जी ने तकनीक
उजागर की |
उर्मी ने अपनी इन्द्रियों का फिर से ख्याल
किया और बोली - “हे प्रभु , मै तो अब हवा का स्पर्श
भी महसूस नहीं कर रही |
अब मेरी केवल दो इन्द्रियां क्रियाशील हैं -
एक, मै अपनी आँखों से आपको देख रही
हूँ | दूसरा, मै अपने कानो से आपको सुन रही हूँ |
अगर मै अपनी आँखे बंद कर लूं और आपके शब्दों
पर गौर करना बंद कर दूं तो ...”
“हाँ , तब तुम्हारी आत्मा इस देह से फुर्र हो
जायेगी |” हनुमान जी ने बताया -
“अपनी आँखे बंद करो और मेरे शब्दों को समझना बंद
करो | तुम्हारा कार्य आसान करने के लिए मै सिर्फ श्री
राम के नाम का जाप करूँगा | मै कुछ और नहीं बोलूँगा |
“राम” ऐसा शब्द है जो तुम्हारे मस्तिष्क को बींधते
हुए तुम्हारी आत्मा तक पहुँच जाएगा |”
उर्मी ने अपनी आँखे बंद कर
ली | हनुमान जी जपने लगे - “राम ... राम
... राम ... राम ... राम ... राम ...”
जब हनुमान जी ने राम नाम सातवी बार जपा
तब उर्मी की आत्मा उस देह से निकल
गई और इसे एक आत्मिक अनुभव हुआ | वृक्ष , जंगल ,
हनुमान ... सब कुछ गायब हो गया | उसे केवल बहुत सारे
शरीर दिखाई दे रहे थे | उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे
वह कोई उडती हुई मक्खी है और उनमे
से किसी एक शरीर पर उतरने
वाली है |”
हनुमान जी ने 8 वी बार राम का नाम
उच्चारित नहीं किया | उसकी जगह
उन्होंने उर्मी का नाम लिया -“उर्मी ...”
उर्मी की देह जो उनके सामने
खड़ी थी उसने ऐसे प्रतिक्रिया
दी जैसे वह अचानक गहरी
नींद से जगा दी गई हो -“हम्म ... हाँ ...
हाँ ... प्रभु ... हाँ”
हनुमान जी मुस्कुरा दिए | उर्मी चकित
सी थी | वह बुदबुदाई - “क्या मैंने
अभी अभी इस शरीर का त्याग
किया ? अभी अभी ... क्या
मेरी आत्मा ने इस देह का त्याग किया और वापिस आ
गई ?”
हनुमान जी ने उसे मुस्कुराते हुए शाबाशी
दी -“तुम एक उत्तम शिष्य हो | तुमने इस
तकनीक को पहले ही प्रयास में
सीख लिया |”
उर्मी उस प्रशंसा से खुश नहीं हुई |
उसके होंठ सूख गए थे | उसका मस्तिष्क उस आत्मिक अनुभव
से घबरा गया था | उसके मुंह से अनायास निकल पड़ा -“क्या होता
... क्या होता अगर मै इस देह में वापिस न लौट पाती
तो ? क्या मै मर जाती? क्या यह देह हमेशा के लिए
मर जाती?”
“इस देह की चिंता मत करो उर्मी |”
हनुमान जी बोले -“जहाँ तक मै देख पा रहा हूँ, यह
देह आने वाले कुछ समय तक तो नहीं मृत होने
वाली | जब तुम इस शरीर को छोड़
दोगी तो यह ब्रह्माण्ड अपने आप इसकी
देखभाल करेगा जब तक कि तुम इसमें फिर से नहीं
लौट आती |”
“लेकिन ... लेकिन ... आप मेरी इस देह को देख रहे
थे , प्रभु | कृपा मुझे बताइए इस देह ने कैसी
प्रतिक्रिया दी जब मेरी आत्मा कुछ पल
पहले इससे बाहर निकली थी |”
उर्मी ने अपने भय को छिपाने की कोशिश
करते हुए प्रश्न किया |
“कुछ नहीं हुआ इसे | तुम इस शरीर से
सिर्फ एक पल के लिए बाहर निकली थी |
मैंने तो तुम्हारे चेहरे पर कुछ भी असाधारण
नहीं देखा | और कोई नहीं देख पाता |
अगर तुम एक लम्बे समय के लिए भी इस
शरीर से बाहर रहो तो भी इसके बारे में चिंता
मत करो | यह ब्रह्माण्ड अपने आप इसकी देखभाल
करेगा |” हनुमान जी ने उर्मी को बताया |
उर्मी अब भी अपने भय को विजय
नहीं कर पाई थी | उसने पुछा -“तब क्या
होगा अगर मै कभी भी इस देह में वापिस
न लौटूं?”
“मैंने बताया ना, उर्मी | तुम्हारी आत्मा
पूर्णतः मुक्त नहीं हो जायेगी |
तुम्हारी आत्मा एक खूंटे से बंधी गाय
की तरह है | यह उतनी ही
घूम सकती है जितनी लम्बी
रस्सी है | तुम्हारी आत्मा कर्म
की रस्सी से बंधी है | तुम्हे
मातांगो के साथ कई सालों तक रहना है उन कर्मों को चुकता करने के
लिए | चाहे तुम्हारी आत्मा कही
भी जाए, यह वापिस आएगी जरूर | यह
तकनीक सीखने के बाद तुम भगवान्
नहीं बन जाओगी | तुममे
दैवीय शक्तियां नहीं आएँगी |
यह एक सामान्य मानवी शक्ति है | बाबा मातंग के पास
भी यह शक्ति है |क्या तुमने बाबा मातंग को इस शक्ति
के कारण कभी असामान्य होते देखा है ?
नहीं न ! इसलिए चिंता मत करो , सब कुछ सामान्य
ही रहेगा |”
उर्मी संतुष्ट और शांत लग रही
थी | इससे पहले की वह हनुमान
जी को कुछ कह पाती उसकी
सहेलियों ने उसे आवाज दी -“उर्मी , चलो
घर की और चले | शीघ्रता करो |
आंधी कभी भी शुरू हो
सकती है |”
उर्मी ने उनकी ओर देखा और सिर हिलाया
| फिर उसने आज्ञा लेने हेतु श्री हनुमान
जी की ओर देखा | हनुमान
जी बोले -“जाओ उर्मी | लेकिन जब
भी तुम्हे राम नाम का जाप सुनाई दे , वही
करना जो मैंने अभी अभी तुम्हे सिखाया है
| राम की ध्वनि को अपनी देह और मन
को बींधते हुए निकलने देना ताकि वह ध्वनि
तुम्हारी आत्मा तक पहुँच सके |”
उर्मी ने उसे हनुमान जी का आदेश समझा
| घुटनों के बल बैठते हुए उसने अपना सिर हनुमान जी
के चरणों में झुका दिया | उसकी सहेलियों ने
भी उसे ऐसा करते हुए देखा लेकिन उन्हें इसमें कुछ
भी असामान्य नहीं लगा क्योंकि मातंग
अक्सर अदृश्य शक्तियों से बतियाते हैं |
जैसे ही उर्मी अपनी सहेलियों
की ओर चलने लगी , हनुमान
जी ने पीछे यम की ओर रुख
किया | दोनों ने एक दुसरे का अभिवादन किया | यम बोले -“हे
शक्तिमान हनुमान , उर्मी से अपनी
सुरक्षा का घेरा हटाने के लिए धन्यवाद | धन्यवाद
नीयति में बाधा न बनने के लिए |”
हनुमान जी मुस्कुराये और बोले -“क्यों? क्या कुछ होने
वाला है ? क्या आप यहाँ उर्मी की मृत्यु
के साक्षी बनने आये हैं ?”
यम बोले -“हे हनुमान , आप सब कुछ जानते हैं | ऐसे मत बनो
जैसे आपको कुछ पता ही नहीं है |”
“हैं? उर्मी की मृत्यु होगी?”
हनुमान जी ने बच्चे सा मासूम चेहरा बनाकर कहा
-“कैसे?”
जैसे ही हनुमान जी ने यह प्रश्न पूछा
भयंकर आंधी शुरू हो गई | यम के चेहरे पर
दानवी मुस्कान आ गई | उन्होंने एक वृक्ष
की तरफ इशारा करते हुए कहा -“जैसे ही
उर्मी उस वृक्ष के नीचे
पहुंचेगी , एक टहनी उस पेड़ से उस पर
गिरेगी | मेरे 11 गिनते ही ऐसा होगा |”
हनुमान जी ने उस वृक्ष की ओर देखा |
उर्मी उस वृक्ष से कुछ ही कदम दूर
थी | यम की ओर बिना देखे हनुमान
जी ने शरारती लहजे में कहा - “अच्छा ,
आप अपने 11 गिनिये | मै तो अपने प्रभु का नाम जपूंगा |”
हवा अचानक बहुत तेज हो गई थी | हनुमान
जी ने जपना शुरू किया - “राम ... राम ...”
उर्मी उस वृक्ष के नीचे पहुंचकर रूक
गई | यह देखकर यम की दानवी मुस्कान
ओर भी चौड़ी हो गई | वे गिन रहे थे --
“8 ... 9 ...” --- उर्मी हवा की गति के
कारण नहीं रुकी थी |
उर्मी तब रुकी जब उसे “राम” का स्वर
सुनाई दिया | उसे ऐसा लगा जैसे हवाए राम नाम का जाप कर
रही हो | उसने अपनी आँखों को बंद किया
और शांत खड़ी हो गई | उसने राम नाम को
अपनी देह तथा मन बिंधने दिया उसे बिना समझे और
उस पर बिना कोई प्रतिक्रिया दिए | राम नाम ठीक उस
समय उसकी आत्मा तक पहुंचा जब यम ने “11” गिना
| राम नाम ने उसकी आत्मा को उस देह से अलग कर
दिया |
यम नीयति के साथ ऐसे धोखा होते देख चकित रह गए
| उनके 11 गिनते ही पेड़ की शाखा
उर्मी के ऊपर गिरने वाली थी
लेकिन वह नहीं गिरी | हनुमान
जी ने यम की ओर देखा , मुस्कुराये और
वहां से ओझल हो गए | यम बहुत क्रोधित थे | वे चिल्लाये -
“काल .. काल ...”
काल (समय के देव) यम के सामने प्रकट हुए और बोले - “हे
यम भ्राता, मै समझ सकता हूँ कि आप क्यों क्रोधित हैं | मैंने
आपको अदृश्य रूप में बताया था कि आपके 11 गिनते
ही शाखा गिरेगी | सच में ही
उस क्षण वह शाखा गिरने वाली थी | आप
पवनदेव से पूछिए कि उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया |”
काल ने पवनदेव को बुलाया और इस बारे में पुछा | पवनदेव ने उत्तर
दिया - “मुझे बताया गया था कि मुझे उर्मी
की मृत्यु का कारण बनना है | मुझे बताया गया था कि
मुझे उर्मी की आत्मा को मृत्यु का अनुभव
प्रदान करना है | लेकिन मै जैसे ही वह शाखा गिराने
वाला था , वह वहां से फुर्र हो गई |”
“क्या?” काल ने प्रतिक्रिया दी - “वह ठीक
उस वृक्ष के नीचे थी | वह
अभी अभी आगे निकली है |
देखो , वह वहां जा रही है |”
“वह उर्मी नहीं है |” पवनदेव ने उत्तर
दिया -“उर्मी उस देह में नहीं है | वह
(उसकी आत्मा) उस देह से निकलकर जा
चुकी है |”
यम को अब कुछ कुछ समझ आ रहा था | उन्होंने पूछा -
“ठीक है ... कि उर्मी की
आत्मा उस देह से निकलकर जा चुकी है और इस
समय कोई अन्य आत्मा इस देह में घुस गई है | लेकिन उस देह
में किसकी आत्मा घुसी है? और
उर्मी की आत्मा इस समय कहाँ है?”
उनमे से किसी को नहीं पता था कि
उर्मी की आत्मा कहाँ चली
गई है | किसी अन्य आत्मा ने उर्मी
की देह को अपना लिया था | उसके व्यवहार से कोई
नहीं बता सकता था कि उसकी देह को कोई
अन्य आत्मा चला रही है | उसकी
सहेलियां भी इस बात से अनभिज्ञ थी | वे
सब अपने सिर पर लकडियो के गट्ठर लिए हुए घर की
तरफ बढ़ रही थी | उनके कुछ दूर चलते
ही आंधी से उनमे से एक संतुलन खो
बैठी और लकड़ी का गठ्ठर गिर गया |
उसने उर्मी से कहा -“उर्मी , इस गठ्ठर
को उठाने में मेरी सहायता करो |”
उर्मी ने अपनी सहेली
की गठ्ठर उठाने में सहायता की | अर्थात
उर्मी का मन व तन नई आत्मा के साथ
भी अच्छे से चल रहा था | लेकिन जब वह घर
पहुंची तब बाबा मातंग तुरंत पहचान गए कि
उर्मी की देह किसी अन्य
आत्मा के वश में है | जब कोई आस पास नहीं था तब
उन्होंने उर्मी के पास जाकर पूछा -“तुम कौन हो|”
उर्मी की देह से एक आवाज आई - “मैं
उर्मी हूँ बाबा ! आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं ?”
बाबा मातंग इसी उत्तर कि अपेक्षा कर रहे थे |
उर्मी की देह , मन और स्मरण ज्यों के
त्यों थे | केवल उसकी आत्मा बदली हुई
थी | बाबा मातंग ने मन ही मन सोचा -“तुम
उर्मी नहीं हो | तुम्हारा मस्तिष्क कह
रहा है कि तुम उर्मी हो क्योंकि मस्तिष्क में वह
सूचना भरी है | लेकिन मै उर्मी को केवल
उसके मस्तिष्क से ही नहीं बल्कि
उसकी आत्मा से जानता हूँ |”
ठीक उसी समय हनुमान जी
वहां प्रकट हो गए | बाबा मातंग ने उनको विधिवत प्रणाम किया |
हनुमान उर्मी के उस शरीर को दिखाई
नहीं दे रहे थे क्योंकि उस शरीर में जो
आत्मा थी वो हनुमान जी के साक्षात्
दर्शन के योग्य नहीं थी | बाबा मातंग ने
हनुमान जी से वार्तालाप प्रारंभ करने से पहले
उर्मी को वहां से जाने के लिए कह दिया |
हनुमान जी बोले -“बाबा मातंग , आप ठीक
कह रहे हैं | उर्मी के शरीर में
उसकी आत्मा नहीं है | जो आत्मा उसके
शरीर में उपस्थित है आपको उस आत्मा का इतिहास
जानना जरूरी है | एक राम नारायण नाम का पुरुष है |
उसने अपना पूरा जीवन अपने बच्चों की
ख़ुशी में लगा दिया | जब वह बूढा हो गया तब उसके
बच्चे सुदूर देशों में जाकर बस गए | उन्होंने राम नारायण को
वृद्धाश्रम में भर्ती करा दिया | अपने बच्चों से दूर
रहने के दुःख में रामनारायण दिन रात भगवान् विष्णु की
अराधना करने लगा | उसने प्रार्थना की कि कम से कम
उसके अंतिम दिनों में उसका परिवार उसके साथ हो | भगवान् विष्णु
उसकी यह इच्छा पूरी करना चाहते थे
लेकिन उसके बच्चों का इतना अच्छा भाग्य नहीं था कि
उनके पाप भगवान् विष्णु धो दें | भगवान विष्णु ने मुझे कोई उपाय
ढूँढने को कहा | इसलिए राम नारायण की आत्मा
अपनी अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए
उर्मी की देह में आ गई है | जब यह
आंधी ख़त्म होगी , आप
उर्मी को असामान्य रूप से अपने परिवार के साथ भावुक
होता देखेंगे | आपको उस स्थिति को संभालना है यह जानते हुए कि
राम नारायण की आत्मा उर्मी
की देह के माध्यम से अपनी अंतिम इच्छा
पूरी कर रही है | यह आत्मा कल
ब्रह्ममुहूर्त से पहले इस शरीर को त्याग
देगी |”
“अगर यह भगवान् विष्णु का निर्देश है तो आप चिंता न करे
अन्जनेया! मै यह निश्चित करूँगा कि राम नारायण को
अपनी अंतिम इच्छा पूरी करने में कोई
अवरोध न आये |” बाबा मातंग बोले -“लेकिन इस समय
उर्मी की आत्मा कहाँ है?”
“उर्मी की आत्मा इस समय मृत्यु का
अनुभव ले रही है |” हनुमान जी ने बताया
-“यह उसकी नीयति थी कि
मुझे मिलने के तुरंत बाद उसका मृत्यु से साक्षातकार होगा | मै
उससे मिला और उसको देह से फुर्र से बाहर निकलना सिखाया |
वह इस देह से उड़कर राम नारायण की देह में
चली गई जो यहाँ से मीलों दूर एक
वृद्धाश्रम में है |”
उर्मी की आत्मा को देह से बाहर निकलने
की तकनीक का ज्ञान था लेकिन वह राम
नारायण की देह में कैद हो गई | वह देह लगभग मृत
थी | उस देह की केवल एक
ही इन्द्रिय काम कर रही थी
और वो थी स्पर्श | वह देह बाहर से
गर्मी और जलन महसूस कर रही
थी और प्रतिक्रिया स्वरुप पसीना छोड़
रही थी | उर्मी
की आत्मा उस देह से भी फुर्र से बाहर
निकल जाती अगर वह किसी तरह उस
जलन और गर्मी को कोई प्रतिक्रिया नहीं
देती (क्योंकि देह से बाहर निकलने की
तकनीक है - पांचो इन्द्रियों से कुछ भी
अनुभव करे , उसको न तो समझना न ही कोई
प्रतिक्रिया देना )| ऐसा होने वाला नहीं था |
उर्मी की आत्मा तब तक उस देह में
फंसी रही जब तक कि अगली
सुबह ब्रह्ममुहूर्त के समय वह देह मृत नहीं हो
गई |
जिस क्षण राम नारायण की देह मृत हुई ,
उसकी आत्मा भी उर्मी
की देह से निकल गई और अगले जन्म
की ओर अग्रसर हो गई | दूसरी ओर
उर्मी की आत्मा भी राम
नारायण की देह से आजाद हो गई और
अपनी देह में वापिस आ गई |
इस तरह हनुमान जी ने यह संभव किया कि राम
नारायण ने भी अपनी अंतिम इच्छा पूर्ण
कर ली और उर्मी भी मृत्यु
से बच गई |
जब उर्मी अपनी देह में वापिस आई तब
हनुमान जी की यात्रा के तीसरे
दिन का ब्रह्ममुहूर्त था | जब वह उठी तब तक
अन्य मातंगो ने चरणपूजा शुरू कर दी थी |
हनुमान जी सभी मातंगों से मिल चुके थे
और चरण पूजा का वह प्रथम दिन था | पूजा में हनुमान
जी ने उर्मी के साथ हुई घटनाओं का
वर्णन किया और अध्याय क्रमांक 3, 4 व 5 को लॉगबुक में
शब्दबद्ध किया गया | (अध्याय क्रमांक 1 तथा 2 की
घटनाओं को बाबा मातंग ने खुद देखा और शब्दबद्ध किया था)
चौथे अध्याय में दिल्ली नामक शहर के एक लड़के का
जिक्र है जो उर्मी का पिछले जन्म का पुत्र है | वह
लड़का दरअसल हनुमान जी का एक युवा भक्त है
जिसने इत्तेफाक से सेतु के माध्यम से चरण पूजा में
भी भाग लिया था | अन्य सभी भक्त
जिन्होंने सेतु के माध्यम से चरण पूजा के लिए अपनी
सेवा और अर्पण भेजा था उन सबका जिक्र लॉगबुक में आया है |
वे सब भक्त अपनी घटनाएं आने वाले अध्यायों में
पढेंगे|
वे भक्त जो हनुमान जी की
लीलाओं के अध्यायों को गंभीरता से पढ़ते
आ रहे हैं उन्होंने इस पांचवे अध्याय के पढ़ते ही
हनुमान जी से मिलने के लिए आवश्यक 36 पडावों में
से 2 पड़ाव पार कर लिए हैं |
गुप्त मंत्र की द्वितिय पंक्ति पीने के लिए लेखक से सम्पर्क करें.

हनुमान जी की लीलाओं का
यह अध्याय यही समाप्त होता है |

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आत्मा पर भ्रम की परतें

अध्याय पढने के बाद यह पर्यवेक्षण करना आवश्यक है कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं | अगर आप कुछ ऐसा महसूस कर रहे हैं -"वाह! मैंने कुछ नया पाया |" अथवा "वाह, मैंने कुछ नया सीखा |" अथवा "मेरी अपने प्रभु के प्रति भक्ति ओर भी बढ़ गई|" इत्यादि तो आप अपने प्रभु की ओर एक कदम भी नहीं बढ़ें हैं | आप उतनी ही दूरी पर अटके हुए हैं |

अगर अध्याय पढने के बाद आप कुछ ऐसे महसूस कर रहे हैं जैसे आपके अन्दर से कुछ बाहर निकलकर गिर पड़ा हो और आप आत्मा से हल्का महसूस कर रहे हों तो आप अपने प्रभु की तरफ कम से कम एक कदम बढ़ चुके हैं |"

आपकी आत्मा एक आईने की तरह है जिसके ऊपर इस बाहरी संसार के कारण धुल चढ़ गई है | अगर अध्याय पढने के बाद आप ऐसा महसूस कर रहे हैं कि आपने कुछ नया पा लिया है तो उसका अर्थ है कि आपने अपनी आत्मा पर एक और परत चढ़ा ली है | आप प्रभु के साक्षात् दर्शन तभी कर सकते हैं जब आप ये परतें हटायें |

अतः अगर आप इस समय आत्मा से हल्का महसूस नहीं कर रहे हैं तो आप कुछ समय बाद फिर आकर यह अध्याय पढ़िए |