हनुमान जी सभी मातंगों को अलग अलग
प्रकरणों में दर्शन दे दिए थे | अब सभी को पता चल
गया था कि हनुमान जी उनकी
धरती पर आ चुके हैं | हनुमान जी के
आने का पता जिस मातंग को सबके बाद पड़ा वो थे 50 से कुछ
अधिक आयु के पुरुष बसंत| देर शाम को बसंत दौड़े दौड़े मातंगों के
डेरे की तरफ आये | भारी सांस से वे
चिल्ला रहे थे - “हनुमान जी हमारी
धरती पर आ गए हैं ... हनुमान जी आ
गए हैं |”
अन्य मातांगो को यह पहले से ही पता था लेकिन वे
इसके बारे में बोल नहीं पा रहे थे | जब उन्होंने मातंग
बसंत को इस बारे में ऊँची और सपष्ट आवाज में बोलते
सुना तो वे भी बोल उठे - “हो ! हो ! हनुमान
जी आ गए हैं | वे सभी बाबा मातंग और
माता मातंग के पास एकत्रित हुए |”
बाबा मातंग ने घोषणा की - “हाँ . हनुमान जी
41 साल बाद हमारी धरती पर आए हैं
और चरण पूजा कल सुबह शुरू होगी|”
चरण पूजा की तैयारियां पूरी की
जा चुकी थी क्योंकि उन्हें आभास था कि
हनुमान जी का उनकी धरती
पर पुनः आगमन का समय हो गया था | सभी मातंग
अर्पण के लिए फलादि इकठ्ठा कर रहे थे | बाबा मातंग ने
सभी को शांत रहने और दिन की
सभी गतिविधियाँ पूरी करके निद्रा के लिए
जाने का निर्देश दिया |
बाबा और उर्वा को छोड़कर सभी मातंग निद्रा में चले गए
| आधी रात के बाद दोनों उस स्थान पर गए जो पूजा के
लिए निर्धारित था | यह एक वृताकार क्षेत्र था जिसके मध्य में
वेदी बनी हुई थी , उसके
कुछ कदम दूर आसन बना हुआ था | उस वृताकार क्षेत्र
की परिधि पर मिटटी के दीए
रखे गए थे | उन दीपकों को आधीरात के
बाद विचित्र तेल से भरने का नियम है | यह तेल बाबा मातंग ने
जंगल की विशेष जड़ी बूटियों से एकत्र
किया है | इस तेल का रहस्य सिर्फ बाबा मातंग और माता मातंग को
मालुम है जिसे उन्हें सही समय पर
अगली पीढ़ी यानी
उर्वा और उर्मी को हस्तांतरित करना है |
जब बाबा और उर्वा उन दीपकों में विचित्र तेल भर रहे
थे तब बाबा ने किसी को चरण पूजा स्थान
की ओर आते हुए देखा | वे उर्वा से बोले -“उर्वा ,
इधर कौन आ रहा है ? जाओ और उसे रोको वह चाहे जो
भी हो | इस समय हमारे सिवाए किसी
भी मातंग का यहाँ आना प्रतिबंधित है |
शीघ्र जाओ |”
उर्वा उस व्यक्ति की ओर दौड़ा | वह व्यक्ति कोई
ओर नहीं बल्कि बसंत था | उर्वा बोला -
“चाचाश्री , आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? आप चरण
पूजा क्षेत्र की ओर क्यों आ रहे हैं ? आप चरण
पूजा के पहले घंटे के यजमान हैं | आपका यहाँ आना नियमों के
अनुसार वर्जित है |”
बसंत ऐसे लग रहा था जैसे कि निद्रा में हो | वह बुदबुदाया - “उर्वा
, मुझे बेचैनी सी हो रही
थी इसीलिए टहलने के लिए निकल आया
... मुझे खेद है ... मै अब वापिस चला जाऊँगा |”
बसंत ने मुड़कर वापिस अपने डेरे की ओर चलना शुरू
कर दिया | उर्वा चरण पूजा स्थान पर आकर दीपकों में
तेल भरने में बाबा मातंग कि मदद करने लगा |
बाबा ने पूछा - “वह कौन था , उर्वा ? वह इधर क्यों आ रहा था ?”
“वह बसंत चाचाश्री थे बाबा |” उर्वा ने उत्तर दिया -
“वह अपनी सुध में नहीं थे | वे
नींद में चल रहे थे |”
बाबा मातंग ने कोई उत्तर नहीं दिया क्योंकि वे चाहते थे
कि उर्वा को अपने कथन का विराधाभास स्वयं हो | कुछ पल सन्नाटा
रहा |
फिर उर्वा बोला - “नहीं बाबा , उनकी
पांचो इन्द्रियां तो सही से काम कर रही
थी | उन्हें सुध तो थी | उन्होंने मेरे साथ
अच्छे से वार्तालाप भी किया | वे बोले कि उन्हें
बेचैनी हो रही थी
इसीलिए वे टहलने के लिए निकल पड़े थे लेकिन न जाने
मुझे कुछ अजीब सा लगा |”
अब बाबा मातंग बोले - “क्या तुम्हे पूर्ण विश्वास है कि वह बसंत
ही था ?”
“हाँ बाबा | वह बसंत चाचाश्री ही थे |
यहाँ इतना भी अँधेरा नहीं है बाबा |
चांदनी में उनका चेहरा मुझे स्पष्ट दिखाई दिया |”
एक बार फिर बाबा मातंग ने जवाब देना उचित नहीं समझा
|
कुछ पल सन्नाटा रहा | सन्नाटे ने अपना काम किया और उर्वा को
कुछ कुछ समझ में आया | वह चिल्लाया - “हे भगवान् | क्या वह
बसंत की देह में कोई और था?”
“मेरा अनुमान है कि वह बसंत के शरीर में कोई असुर
था |” बाबा मातंग ने उत्तर दिया |
“एक असुर ने बसंत की देह का अपहरण कैसे किया
बाबा ?”
“अपहरण?” बाबा मातंग लगभग हंस ही दिए थे | फिर
गंभीर भाव से बोले - “यह अपहरण नहीं
है उर्वा | अगर तुम जानना चाहते हो कि असुर किस तरह कर्म
करते हैं तो मुझे भय है कि उत्तर इतना आसान नहीं
है | इस सब के पीछे हजारों साल का रहस्य और
इतिहास है | केवल विद्वानों में विद्वान व्यक्ति ही इस
रहस्य को समझ सकते हैं | इस समय इस संसार में केवल
हनुमान जी हैं जो इस रहस्य का वर्णन कर सकते
हैं | अगर मै तुम्हे यह रहस्य बताने लगूं तो तुम इसे समझ
नहीं पाओगे | मै और पिछली
पीढ़ी के मातंगों ने 41 साल पहले इस
रहस्य को स्वयं हनुमान जी से जाना था | अब समय
आ गया है कि तुम और नई पीढ़ी के मातंग
भी श्री हनुमान जी से इस
रहस्य को जानो क्योंकि वे 41 साल बाद फिर से हमारी
धरती पर पधारे हैं |”
“मै यह रहस्य जानने के लिए बहुत उत्सुक हूँ बाबा |
बड़ी चौंकाने वाली बात है कि हम मनुष्य
इन रहस्यमयी प्राणियों के बारे में अनजान रहते हैं जो
हमारे जीवन को इतना प्रभावित करते हैं | एक मातंग
होते हुए भी इन प्राणियों के बारे में मै केवल इतना
जानता हूँ कि सुर अच्छे होते हैं और असुर बुरे | अगर कोई
ऐसी चीज है जो मेरे सोने के बाद मेरे
शरीर का इस्तेमाल कर सकती है तो मुझे
उस चीज के बारे में जानना जरूरी है |”
उर्वा की टिपण्णी के जवाब में बाबा मातंग
के मन में जो स्वाभाविक विचार आया वो था , “उर्वा , केवल
नींद में ही नहीं , सुर तथा
असुर मानव जीवन के हर पल को प्रभावित करते हैं
|” लेकिन बाबा मातंग इस विचार को अपने होंठो तक नहीं
लाएं | वे आधी रात के समय सुरों और असुरों के बारे में
कोई वार्तालाप नहीं करना चाहते थे | वे
रीति रिवाजों को तुरंत पूरा करना चाहते थे | उन्होंने
निर्देश दिया - “उर्वा , अब 4 दीपक उठाओ --
सभी चारों दिशाओं से एक एक | और फिर उन
दीपकों को घेरे के सात कदम बाहर रख दो |”
“4 दीपकों को घेरे से बाहर रखने का क्या प्रयोजन है
बाबा ?” उर्वा की उत्सुकता को इस बात से कोई फर्क
नहीं पड़ता था कि आधी रात है |
बाबा मातंग को उर्वा का सवाल जवाब देने योग्य लगा | उन्होंने
उत्तर दिया - “जो ठीक घेरे के ऊपर दीए
रखे हैं वे तब जलाए जायेंगे जब चरण पूजा शुरू होगी |
अभी हम 4 दीए घेरे के बाहर असुरों को
पूजा स्थल से दूर रखने के लिए जलाएंगे |”
बाबा घेरे के मध्य में जाकर कुछ रीति रिवाज पूरे करने
लगे जहाँ पर वेदी और आसन बना हुआ था | उर्वा
वह करने लगा जिसका उसे निर्देश मिला था | जब उर्वा पहला
दीया घेरे के बाहर रख रहा था तब उसे बसंत फिर से
पूजा स्थल की ओर आता दिखाई दिया |
उसकी तरफ दौड़ने से पहले उर्वा ने बाबा मातंग
की इजाजत लेनी आवश्यक
समझी | बाबा बोले - “अब उसे रोकने के लिए उसके पास
जाने की आवश्यकता नहीं है उर्वा | जो
दीपक तुमने घेरे के बाहर रखा है उसे जला दो |”
उर्वा ने दीपक जलाया | उसने नोटिस किया कि
दीपक की रोशनी विचित्र लाल
रंग की थी | उसने उस विचित्र तेल और
उसकी रहस्यमयी रोशनी के
बारे में बहुत किस्से सुने थे | वह उम्मीद कर रहा था
कि उस रोशनी से कोई चमत्कार होगा लेकिन उसे कोई
चमत्कार होता दिखाई नहीं दिया | ओर कुछ
नहीं तो वह रोशनी बसंत को उधर आने से
रोक भी नहीं पा रही
थी | बसंत उसी गति से चरण पूजा स्थल
की तरफ बढ़ रहा था | उर्वा खड़ा हुआ और चिंतित
स्वर में चिल्लाया - “बाबा इस दीए से कुछ हो
नहीं रहा है ... |”
वह अपना वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया
था कि उसे अपने पीछे किसी के होने का
अहसास हुआ | जब वह मुड़ा तो एक लाल रंग की
पक्षी जैसी कोई चीज उसके
कानों के पास से होकर उडी | उसमे जंगल
की किसी भी भयावह स्थिति
से निपटने की हिम्मत थी लेकिन उस लाल
चीज ने उसके मन को आतंकित कर दिया | वह और
कुछ नहीं बल्कि असुर था | असुर हर जगह हैं
लेकिन उस दीपक की लाल
रोशनी ने मानव आँख को असुर के दर्शन करा दिए थे |
उर्वा तुरंत घेरे के अन्दर आ गया | बाबा मातंग घेरे के मध्य में
कुछ रीति रिवाजों में व्यस्त थे | उस सन्नाटे को
चीरने के लिए जो उसके मन के भयों को बाधा रहा था ,
उर्वा चिल्लाया - “बाबा मैंने दीया जला दिया है लेकिन
इसका कोई असर नहीं हो रहा है | बसंत
चाचाश्री तेजी से इस तरफ आ रहे है |”
बाबा मातंग ने उर्वा को सुना लेकिन उन्हें एक 20 के
करीब के लड़के के अधैर्य पर प्रतिक्रिया
देनी उचित नहीं समझी |
जब दीए को काम करना था काम किया | जैसे
ही बसंत उस दीए की विकिरणों
की रेंज में आया , उर्वा ने देखा कि बसंत पहले तो
जमीन पर बैठा और फिर वहीँ पर लेट गया
| उर्वा ने देखा कि एक लाल चीज बसंत के लेटे हुए
शरीर से निकली और उड़ गई |
उर्वा बसंत के पास दौड़कर गया तो उसने पाया कि बसंत
गहरी नींद में जमीन पर सोया
हुआ था | उसने उसके शरीर को हिलाकर जगाया |
“मैं यहाँ कैसे आया?” बसंत जागते ही बुदबुदाया |
“चिंता मत कीजिये चाचाश्री ... सब कुछ
ठीक है | आप नींद में चल रहे थे | अब
आप वापिस झोपडी में जा सकते हैं |”
बसंत को चिंता हो रही थी | जब उसे पता
चला कि वह प्रतिबंधित स्थान पर है तो वह अपराधबोध से ग्रस्त
होकर वापिस हो लिया | नींद में चलना उसके लिए कोई
नई बात नहीं थी | बहुत लोगों ने उसे बताया
था कि वह नींद में अजीब हरकतें करता
है | प्राय: वह बाहर निकल जाता था , नींद में चलता
था और वापिस आ जाता था | लेकिन इस बार जो असुर
उसकी देह को चला रहा था वह उसे बीच
में ही छोड़ गया था , वो भी एक प्रतिबंधित
स्थान के पास |
उर्वा वापिस चरण पूजा स्थल पर आ गया | उसने अपना 4
दीए रखने का कार्य पूरा किया | तब तक बाबा मातंग ने
भी वेदी के पास किये जाने वाले
रीति रिवाज पूर्ण कर लिए | डेरे की ओर
वापिस आते हुए उर्वा सुरों और असुरो के विचारों में खोया हुआ था |
वह अपने विचारों को होठों तक आने को नहीं रोक पाया ,
“यह कितना खतरनाक है बाबा ! एक बाहरी
प्राणी हमारी देह को नियंत्रित कर सकता
है और जो चाहे वो कर सकता है !”
“क्या उस असुर ने बसंत को कोई चोट पहुंचाई ? जब
दीपक की विकिरण असुर तक
पहुंची तब असुर चाहता तो बसन्त की देह
को खड़ी अवस्था में छोड़कर ही निकल
सकता था | अगर उसने ऐसा किया होता तो बसंत की देह
कटे पेड़ की तरह नीचे गिरती
| इसके बजाए असुर ने देह को आराम से धरती पर
लेटाया और फिर निकला | क्या तुमने नहीं देखा ?” बाबा
मातंग ने उत्तर दिया और फिर विस्तार से समझाया -
“असुर
भी देह के प्रति सुरक्षा और स्वत्व का भाव
ठीक उसी तरह रखते हैं जैसे हम रखते
हैं | असुर अपने आप में उतनी बड़ी
समस्या नहीं है जितना तुम सोच रहे हो |
असली समस्या यह है कि हम ये सोचते हैं कि हम
इस देह के स्वामी हैं | हम इस देह के
स्वामी नहीं है | हम इस देह में सिर्फ
किरायेदार हैं | इस रहस्य को अच्छे से समझने के लिए तुम्हे यह
जानना आवश्यक है कि इस सबकी शुरुआत कैसे हुई
| केवल श्री हनुमान जी ही
इस रहस्य का वर्णन कर सकते हैं | अभी अपने
विचारों को विश्राम दो और जाकर सो जाओ |”
उर्वा ने दो चार घंटे की नींद लेने
की कोशिश की लेकिन सुरों और असुरो के
विचारों ने उसके मन को सुबह तक जगाये रखा |
अंततः इन्तजार समाप्त हुआ | ब्रह्ममुहूर्त में चरण पूजा
की प्रक्रिया शुरू हुई | वृद्ध मातंग जिन्होंने हनुमान
जी से 41 साल पहले ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया था
उन्हें ब्राह्मण कहा जाता है | सबसे पहले बाबा मातंग , माता मातंग
तथा अन्य ब्राह्मण पूजा स्थल में प्रविष्ट हुए | इस वृताकार
स्थल को हनुमंडल कहा जाता है | हनुमंडल के अन्दर से
उन्होंने एक श्लोक पढ़ा जो उर्वा और उर्मी को कुछ
इस तरह संबोधित था - “हे उर्वा , तुम्हे बाबा मातंग की
परंपरा को आगे बढ़ाना है | हे उर्मी , तुम्हे माता मातंग
की परंपरा को आगे बढ़ाना है | हम सभी
ब्राह्मण तुम दोनों को पवित्र हनुमंडल में बुलाते हैं | आओ , विधि
के अनुसार दीपक जलाओ ताकि चरण पूजा प्रारंभ हो
सके |”
ब्राह्मणों को बताया गया कि उर्मी वहां उपस्थित
नहीं है | बाबा मातंग ने सबको सूचित किया -
“उर्मी की आत्मा कल शाम को एक
दैवीय कार्य हेतु गई थी जो कार्य उसको
श्री हनुमान जी के माध्यम से स्वयं
भगवान् विष्णु ने दिया था | इसीलिए वो देरी
से उठी | वह शीघ्र ही यहाँ
पहुँच जायेगी तब तक हम राम मंत्र जपेंगे |
जब मातंग एक सुर में किसी मंत्र का जाप करते हैं तो
वह आवाज नश्वर संसारों में ही नहीं
अपितु ब्रह्मलोक एवं विष्णुलोक तक पहुँचती है |
लेकिन उस समय उनके एकल स्वर में एक आवाज
की कमी खल रही
थी -- उर्मी की आवाज | वह
आवाज भी उस एकल सुर में शीघ्र
ही सम्मिलित हो गई जब उर्मी वहां
पहुँच गई | ब्राह्मणों ने फिर से उस श्लोक का उच्चारण करके
उर्वा और उर्मी को हनुमंडल के अन्दर बुलाया |
जब उर्वा और उर्मी हनुमंडल में आए तब ब्राह्मणों
ने उनको आगाह किया कि उन्हें वो सब दिखाई देने वाला है जो
उन्होंने कभी नहीं देखा था | जो मातंग घेरे
के बाहर खड़े थे उनको निर्देश दिया गया कि वे अपनी
आँखें बंद रखें | उसके बाद उर्वा और उर्मी ने
दीपक जलाना प्रारंभ किया | उन्होंने दीपक
जलाते वक़्त अपनी आँखे नीचे
रखी | जब सभी दीपक
जलाकर उर्वा और उर्मी खड़े हुए तो उन्होंने एक
विचित्र दृश्य देखा | दीपकों की विचित्र लाल
रोशनी में हनुमंडल के बाहर बहुत बड़ी
संख्या में लाल रंग के देह-हीन प्राणी खड़े
थे -- वे थे असुर | जो मातंग बाहर खड़े थे उनकी
तुलना में असुरों की संख्या बहुत ज्यादा थी
|
ब्राह्मण उसके बाद हनुमंडल के केंद्र की ओर बढे |
उन्होंने वेदी में पवित्र लकड़ियाँ डाली और
अग्निदेव की प्रशंसा में श्लोक पढने शुरू कर दिए |
जब अग्निदेव प्रकट हुए तो उन्हें पवित्र द्रव की
आहुति दी गई | एक श्वेत धुआं हनुमंडल में पैदा हो
गया | उस धुएं में एक अजीब सी हलचल
थी | “सुर!” उर्मी उत्साह में
बोली |
जो पवित्र द्रव अग्नि को अर्पित किया जा रहा था उस द्रव से सुर
मातांगो को दिखाई देने लगे | अब हनुमंडल एक ऐसी
गुफा जैसा लग रहा था जिसकी दीवारे लाल
थी और छत श्वेत --- लाल असुरों के कारण और श्वेत
सुरों के कारण |
सभी ब्राह्मण , उर्वा तथा उर्मी अब हाथ
जोड़कर आसन के सामने खड़े हो गए | उन्होंने उन शलोको का
उच्चारण किया जिनमे मातांगो के हनुमान जी के साथ
सदियों पुराने रिश्ते का जिक्र था | उन्होंने अति विनम्रता के साथ यह
भाव प्रकट किया कि उन्होंने तमाम कठिनाइयों के बावजूद
अपनी उच्च पवित्रता तथा सिद्धांतों को सुरक्षित रखा है
| मातांगो की भक्ति से प्रसन्न होकर हनुमान
जी प्रकट हुए | सभी ब्राह्मणों तथा उर्वा
, उर्मी ने साष्टांग प्रणाम किया | वेदी के
पास जहाँ हनुमान जी प्रकट हुए थे वहां से आसन
तक मातंगों ने आयताकार जल कुंड बना रखा था | जैसी
की परंपरा थी हनुमान जी उस
पानी के ऊपर चलकर आसन तक पहुंचे | जब
हनुमान जी चलते हैं तो उनका शरीर छोटे
छोटे कणों में विघटित हो जाता है और अगले ही पल
पुन: संघटित हो जाता है | यह विघटन और पुनःसंघटन एक पल के
भी इतने छोटे से हिस्से में होता है कि
किसी देखने वाले को पता ही
नहीं चल पाता | यही हनुमान
जी के चिरंजीवी
शरीर का राज है | पानी के ऊपर चलने
की इस परंपरा से यह बोध होता है कि हनुमान
जी की देह मानवों की तरह
धरती पर नहीं चलती | इस
रीति को “हनु चरण धोना” कहा जाता है क्योंकि जब
हनुमान जी की देह छोटे छोटे कणों में
विघटित होती है तब अशुद्ध कण कुंड के
पानी में मिल जाते हैं और पानी के शुद्ध
कण उनका स्थान ले लेते हैं |
जब हनुमान जी आसन पर विराजमान हो गए तब बाबा
मातंग ने उर्वा को चरण पूजा कार्यक्रम का “होतर” नियुक्त किया |
“होतर” का मातंगो की हर पूजा में अहम् स्थान होता
है | होतर वह व्यक्ति होता है जो प्रश्न पूछकर ब्राह्मणों और
देवताओं के मध्य ज्ञान वार्तालाप संचालित करता है | यह वार्तालाप
पूजा में उपस्थित मनुष्यों को मन के भ्रमजाल से निकालकर
सर्वोच्च वास्तविकता का अनुभव करवाता है | एक यजमान तब
तक पूजा में अर्पण नहीं कर सकता जब तक
की वह भ्रमजाल की कम से कम एक
परत से बाहर नहीं आ जाता |
बाबा मातंग बोले - “हे प्रभु हनुमान , बसंत पहले घंटे
की चरणपूजा का यजमान है | आपके माध्यम से मै
होतर को आग्रह करता हूँ कि वे यजमान को हनुमंडल के अन्दर
ले आयें |”
उर्वा हनुमंडल के घेरे की परिधि पर गया और बसंत का
नाम पुकारा | बसंत घेरे के बाहर आँखे बंद किये हुए अर्पण
की टोकरी लिए खड़ा था | उर्वा ने उसको
आँखे बंद किये किये ही हनुमंडल के अन्दर आने
और फिर अन्दर आकर आँखे खोलने का आग्रह किया | उसके बाद
उर्वा उसे वेदी के पास ले गया |
बसंत ने निर्धारित स्थान पर अर्पण की
टोकरी रख दी | उसने अग्निदेव को
झुककर प्रणाम किया और फिर हनुमान जी को साष्टांग
प्रणाम किया | अब बाबा मातंग बोले -“हे प्रभु हनुमान , अब जबकि
यजमान आ चुका है , होतर अन्य मातांगो को भी पवित्र
हनुमंडल के अन्दर ला सकता है |”
उर्वा सभी मातंगो को हनुमंडल के अन्दर ले आया |
सभी ने हनुमान जी को साष्टांग प्रणाम
किया और फिर निर्धारित स्थान पर बैठ गए | ब्राह्मण लगातार
अग्निदेव को पवित्र द्रव की आहुति दिए जा रहे थे |
यजमान को भी निर्धारित स्थान पर बैठने के लिए कहा
गया |
बाबा मातंग खड़े रहे और कुछ श्लोक उच्चारित किये जिनका
अर्थ है -“हे हनुमान जी यह पूजा स्थल एक लाल
गुफा जैसा लग रहा है क्योंकि इसके बाहर बहुत अधिक संख्या में
असुर खड़े हैं | सुरों की उपस्थिति के कारण एक श्वेत
छत बन गई है जिससे स्वर्ग का सा आभास हो रहा है | प्राय:
सुर तथा असुर अदृश्य रहते हैं लेकिन आपकी कृपा
से हमारे पास रहस्मयी तेल है जिससे असुर दृश्य हो
गए हैं और पवित्र द्रव है जिससे सुर दृश्य हो गए हैं | कलियुग
में पिछले कुछ सालों में यह पृथ्वी पर सबसे
बड़ी पूजा है | इस पूजा में आपकी
उपस्थिति ही वह कारण है कि सुरों में श्रेष्ट तथा
असुरों में श्रेष्ट यहाँ पधारे हैं | सुर आपके पवित्र चरणों में
अर्पण करके आनंद प्राप्त करने का यह अवसर
नहीं चूकने देना चाहते | दूसरी तरफ
असुर भी इसे अपने बुरे कार्य करने का बहुत बड़ा
अवसर देख रहे हैं | अतः असुर इस पूजा समारोह में अडचने पैदा
करने का पूर्ण प्रयास करेंगे --- और ऐसा समझ में भी
आता है | आखिर सुरों और असुरों को भी यह अधिकार
है कि वे अपनी इच्छानुसार प्रयास करें | मैं आपके
माध्यम से यहाँ उपस्थित सभी मातांगो को सावधान करना
चाहता हूँ कि वे सतर्क रहें ताकि सुर तथा असुर अपने प्रयासों में
सफल न हो सकें |”
उर्वा खड़ा हुआ और बोला -“हे प्रभु हनुमान , पूर्ण विनम्रता से
मैं यह शंका जाहिर करना चाहता हूँ कि सतर्कता ही
सुरों और असुरों से रक्षा करने के लिए काफी
नहीं है | कैसे सुनिश्चित हुआ जा सकता है कि अब
भी कोई सुर अथवा असुर यहाँ बैठे किसी
मातंग की देह में नहीं छुपा है ? वैसे
भी असुरों को छल कला में महारत हासिल है | सुरक्षा
के लिए ज्ञान सबसे पहली आवश्यकता है | अगर
किसी को उसके शत्रु के बारे में कुछ भी
मालुम नहीं हो तो वह अपनी रक्षा कैसे
कर सकता है ?अतः मै आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप इन
प्राणियों का रहस्य खोलें | क्या ये कोई शापित आत्माएं हैं ? इनके
अस्तित्व का क्या प्रयोजन है और ये इस संसार में किस तरह
काम करते हैं ? कृपा हमें यह सर्वोच्च ज्ञान देकर कृतार्थ करें
|”
बाबा मातंग इस बात से प्रसन्न थे कि उर्वा होतर की
जिम्मेदारी बखूबी निभा रहा था | उसने
सही समय पर सही सवाल पूछा था | बाबा
और उर्वा हनुमान जी को प्रणाम करके निर्धारित स्थानों
पर बैठ गए और हनुमान जी सुरों और असुरो का
रहस्य समझाने लगे -
“यह मानव संसार 4 युगों के कालचक्र में घूमता रहता है | इस 4
युगों के कालचक्र को कल्प कहते हैं | इस समय हम चौथे युग
में हैं | मै आपको पीछे उस समय काल में ले जाना
चाहता हूँ जब पिछला कल्प समाप्त होने को आ रहा था |
भगवान्
शिव ने विष्णु जी को सन्देश भेजा -“हे मानव संसार के
रक्षक , हे भगवान् विष्णु , यह संसार उस चरण पर पहुँच गया
है कि अब इसका विनाश आवश्यक हो गया है |”
भगवान् विष्णु ने उत्तर भेजा - “हे महादेव , वहां
करीब 1000 करोड़ आत्माएं मानव देहों में कैद हैं
और इच्छाओं की भूलभुलैया में संघर्ष कर
रही हैं | उनको वहां से निकलने का अवसर उपलब्ध
करवाना आवश्यक है | मै वहां उन आत्माओं को बंधन मुक्त
करने आता हूँ जो यहाँ उनके स्थायी स्थान अर्थात
विष्णुलोक में आने की इच्छा रखती हैं |”
“तब भगवान् विष्णु पृथ्वी पर कल्कि के रूप में
अवतरित हुए | संचार के घोड़े पर सवार , हाथ में ज्ञान
रुपी तलवार लहराते हुए वे सभी एक
हज़ार करोड़ आत्माओं के पास गए | उनका संचार का श्वेत घोडा
प्रकाश की गति से दौड़ा , उनकी
चमकती हुई ज्ञान रुपी तलवार मजबूत
से मजबूत कर्म बंधन काटने में सक्षम थी |
“यहाँ पर यह उल्लेख करना आवश्यक है कि जब कल्कि आए
तब अज्ञानता का अन्धकार कितना था | अगर कोई अन्धकार में हो
और प्रकाश चाहता हो तो उसका अन्धकार दूर करना बहुत आसान
है | लेकिन किसी को यह भ्रम हो कि वह प्रकाश में
है किन्तु वास्तव में वह अँधेरे में हो , उसका अन्धकार तब तक
दूर नहीं किया जा सकता जब तक वह भ्रम से बाहर
न आ जाए |ऐसी स्थिति थी |लोगो को यह
भ्रम था कि वे प्रकाश में हैं किन्तु वास्तव में वे अन्धकार में थे |
लोगों को भ्रम से बाहर आने की कोई इच्छा
नहीं थी | उन्हें परम सत्य
की खोज नहीं थी | उन्हें
खोज रहती थी तो सिर्फ इस झूठे
आश्वासन की कि वे भ्रम में नहीं हैं |
और भ्रम भी कोई साधारण भ्रम नहीं था
| वह भ्रम के अन्दर भ्रम था | उन्होंने प्राचीन
ज्ञान को भी अपनी सुविधा के अनुसार तोड़
मरोड़कर उसे अपने भ्रम के छोटे से घोंसले की एक
और परत मात्र बना दिया था |
“इन हालातों में कल्कि धरती पर आए | उन्होंने
अपनी ज्ञान रुपी तलवार से
सभी के कर्म के बंधन काटने का प्रस्ताव रखा |इस
प्रस्ताव के साथ वे हर आत्मा के पास एक बार नहीं ,
दो बार नहीं बल्कि सात बार गए | और फिर आया न्याय
का दिन | भगवान् शिव ने विनाश का तांडव किया | पूरी
पृथ्वी का पदार्थ पिंघल गया | मानव देहो
की बात छोडिये , कोई भी वस्तु
नहीं बची | वे आत्माएं जो इस भ्रम में
थी कि मानव शरीर ही उनका
घर है , बेघर हो गई | भगवान् कल्कि के 7 प्रयासों के पश्चात्
भी केवल 99 लाख ऐसी आत्माएं
थी जिन्होंने भगवान् कल्कि की ज्ञान
रुपी तलवार के सामने समर्पण किया था | वे 99 लाख
आत्माएं विष्णु लोक चली गई और उनको मोक्ष प्राप्त
हो गया | बाकी बची आत्माएं मोक्ष के लिए
योग्य नहीं थी | जब उनके कर्म के
बही खतों की जांच हुई तब केवल 33
करोड़ आत्माओं के खातों में अच्छे कर्मों का शेष था | उन 33
करोड़ आत्माओं को सुर कहा गया | बाकी के हिसाब में
बुरे कर्मों का शेष था उन्हें असुर कहा गया |
“भगवान् कल्कि ने निर्णय सुनाया - “सुरों को अगले पूरे कल्प में
सुख भोगने को मिलें और असुरो को अगले पूरे कल्प में दुःख भोगने
को मिलें |”
“मैंने भगवान् कल्कि से पूछा - “हे प्रभु , सुर और असुर बहुत
बड़ी संख्या में हैं | आपके निर्णय को लागू करना
बहुत बड़ा कार्य है | अगर मै इसके लिए कोई काम आ सकूँ तो
आज्ञा दीजिये |”भगवान् कल्कि मुस्कुराये और बोले -
“यह मेरा निर्णय नहीं है हनुमान | यह
मेरी इच्छा है और यह इच्छा “त्रिदेव के वैश्विक
नियम” के अनुसार अपने आप पूर्ण हो जायेगी |”
“यह विश्व “त्रिदेव के वैश्विक नियम” के अनुसार चलता है जिसके
अनुसार “संसार में जहाँ भी कोई इच्छा प्रकट
की जाती है , विश्व की
सभी शक्तियां उस इच्छा को पूर्ण करने के लिए काम
करती हैं |”
“उस समय पूरी पृथ्वी एक विचित्र द्रव
का गोला लग रही थी क्योंकि सब कुछ
पिंघल गया था | भगवान् कल्कि उस संसार का एक भाग थे | जब
उन्होंने अपनी इच्छा जताई तो संसार की
सभी शक्तियां उस इच्छा को पूर्ण करने में लग गई |
पृथ्वी की सतह से कुछ
किलोमीटर ऊपर एक बहुत मोटी परत
बननी शुरू हो गई | भगवान् कल्कि ने बताया - “हनुमान
, वो देखो असुरलोक का निर्माण हो रहा है | सभी असुर
वहां निवास करेंगे |”
“असुरलोक पृथ्वी की सतह से कुछ
किलोमीटर ऊपर बनी एक मोटी
अदृश्य परत थी | सभी असुर उस परत
में कैद हो गए | यह परत बहुत अधिक गर्म हुआ
करती थी क्योंकि सूर्य की
किरणें सीधे इस pपर पड़ती
थी | यह परत केवल सूर्य की किरणों को
ही नहीं सोखती
थी अपितु उन सभी तत्वों को
सोखती थी जो पीड़ा का कारण
बनते हैं | इस परत के द्वारा प्रदान की गई सुरक्षा के
कारण पृथ्वी का वातावरण अत्यधिक हर्षदायक हो गया
| यह परत सूर्य की किरणों को कुछ इस तरह
छानती थी कि पृथ्वी पर हर
समय एक जैसा वातावरण रहता था | दिन और रात ,
गर्मी , सर्दी आदि सभी
भिन्नताएं समाप्त हो गई | सारी प्रदूषित हवा इस परत
द्वारा सोख ली जाती थी जिससे
कि पृथ्वी का वातावरण अत्यधिक पवित्र और सुगन्धित
रहता था | उस महाविनाश के बाद पहले इस परत का निर्माण हुआ
जिसमे असुर कैद हो गए फिर पिघली हुई
धरती का विचित्र द्रव एक अत्यधिक सुन्दर
पृथ्वी की सतह बन गया | मै अपने
सामने यह रूपांतरण होता देख आश्चर्यचकित था |
भगवान् कल्कि
ने बताया - “प्रिये हनुमान , पृथ्वी की
सतह सुरलोक में परिवर्तित हो रही है | यहाँ
सभी 33 करोड़ सुर रहेंगे |”
“असुरलोक अर्थात पृथ्वी की सतह से
कुछ मील ऊपर बनी परत
पीड़ा से भरी थी और
पृथ्वी की सतह यानी सुरलोक
आनंद से भरा हुआ था | फिर 5 तत्वों ने मिलकर पृथ्वी
पर बहुत सारी मानव देहों का निर्माण किया | वे
शरीर धड़क रहे थे लेकिन उनमे आत्मा
नहीं थी | हर तरह के शरीर
थे - पुरुष , महिला , बच्चे , जवान | भगवान् कल्कि ने बताया - “ये
33 करोड़ शरीर हैं जिनके जरिए सुर इस सुरलोक का
आनंद लेंगे |”
“सुरों ने उन देहों में प्रवेश करकें सुरलोक का आनंद लेना शुरू कर
दिया | केवल एक नियम था जिसके अनुसार सब कुछ चल रहा था -
“त्रिदेव का वैश्विक नियम”| अगर कही
भी कोई इच्छा प्रकट हुई तो संसार की
सभी शक्तियां उस इच्छा को पूरा करने में लग
जाती थी | सुर कभी एक
शरीर में स्थायी तौर पर नहीं
रहते थे , वे आपस में देह बदलते रहते थे| उदाहरण के तौर पर
अगर किसी सुर को “बचपन” के सुख लेने
की इच्छा होती थी तो वह
बच्चे की देह धारण कर लेता था | अगर
किसी को पिता बनने की इच्छा
होती थी तो वह “व्यस्क” की
देह धारण करके किसी बच्चे की देह वाले
सुर को बच्चे का प्यार देने लगता था | समय का उन देहो पर कोई
असर नहीं होता था क्योंकि समय के बुरे प्रभाव
भी असुरलोक की परत द्वारा शोषित कर
लिए जाते थे | न वृद्धावस्था थी और न ही
कोई रोग |
“कई सदियाँ बीत गई | सभी नश्वर संसारों
में सुरलोक प्रसिद्ध हो गया | सुरलोक की तुलना
विष्णुलोक के साथ होने लगी | देखने से ऐसा लगता था
कि सुरलोक का कभी अंत नहीं होगा | एक
बार ब्रह्मलोक में ब्रह्मा और देवी
सरस्वती सुरलोक के बारे में बाते कर रहे थे |
विष्णुलोक यानी “श्वेत समंदर” में एक आत्मा ने यह
बातचीत सुन ली | उसने सुरलोक
की सुन्दरता का अनुभव करने की इच्छा
प्रकट की | भगवान् विष्णु ने उस आत्मा को सुरलोक
अर्थात सतयुग की पृथ्वी पर भेज दिया |
यह कल्प के प्रथम मनुष्य मनु की आत्मा
थी |
“ठीक जिस समय मनु की आत्मा ने
विष्णुलोक में अपनी इच्छा प्रकट की ,
एक सुर ने सुरलोक में उसकी पूरक इच्छा प्रकट
की | इच्छा थी - “रथ का चलाने का आनंद
अलग होता है और रथ की पिछली
सीट पर बैठने का आनंद अलग होता है | अब रथ
की तुलना देह से की जाए तो मैंने बहुत
सारे मानव शरीरों को चलाया है और इस संसार के बहुत
सारे सुख भोगे हैं | अब मै वह सुख भोगना चाहता हूँ जो तब मिलता
है जब शरीर को कोई और चलाये और मै
पिछली सीट पर बैठकर आनंद लूं |”
“उस सुर और मनु दोनों की इच्छा तुरंत पूर्ण हो गई |
मनु की आत्मा विष्णुलोक से आकर सुरलोक
की एक मानव देह में प्रवेश कर गई और
उसी देह में उस सुर ने पिछली
सीट ले ली | अब सुरलोक में कुल 33
करोड़ मानव देह , 33 करोड़ सुर और एक आत्मा थी
|
[सेतु टिपण्णी : जब आप किसी को देख
रहे होते हैं तब आपकी आत्मा आपकी
देह को चला रही होती है | जब आप
अपने आपको देख रहे हैं (ध्यान करते समय आदि ) तब
आपकी आत्मा आपकी देह
की पिछली सीट पर
होती है | हनुमान जी ने “चित्त” शब्द का
प्रयोग किया है लेकिन इस अध्याय के सन्दर्भ में
“बैकसीट” शब्द सही जंचता है |]
“सुरलोक में भ्रमण करते समय मनु की आत्मा ने
एक बहुत ही सुन्दर फूल देखा | मनु की
आत्मा ने इच्छा जाहिर की - “मैं यह पुष्प तोडना
चाहता हूँ |” एक सुर ने उसको आगाह किया - “हे मनु , आप यहाँ
सुरलोक को देखने और यहाँ के सुखों का आनंद लेने आये थे | अब
आपने यह फूल तोड़ने की नई इच्छा उत्पन्न कर
ली है | सुरलोक के फूल हमेशा खिले रहते हैं | उन्हें
तोडा नहीं जाता |”
मनु को अपनी गलती का अहसास हुआ
और उसने एक और इच्छा जाहिर की जो
थी - “मैं यह फूल नहीं तोडना चाहता |”
“अब मनु की दो इच्छाएं प्रकट हो चुकी
थी -
(1) “मैं फूल तोडना चाहता हूँ”
(2) मैं फूल
नहीं तोडना चाहता ---
और “त्रिदेव के वैश्विक नियम”
के अनुसार संसार की सभी शक्तियों ने दोनों
इच्छाओं को पूरा करने का कार्य शुरू कर दिया | दूसरी
इच्छा पहली इच्छा से कमजोर थी इसलिए
इस विरोध में पहली इच्छा की
जीत हुई |
“अब त्रिदेव के वैश्विक नियम के अनुसार एक फूल तोडना
आवश्यक हो गया था लेकिन सुरलोक में ऐसी कोई
ताकत नहीं थी जो फूल तोड़ने का यह बुरा
कार्य कर पाती | इसलिए एक असुर असुरलोक से
आजाद हो गया और नीचे सुरलोक में उतर आया | उस
असुर ने उस देह में प्रवेश किया जिसमे मनु की आत्मा
थी | उस देह की बैकसीट पर
जो सुर बैठा था वह निकल गया क्योंकि वह उस बुरे कर्म में
भागी नहीं बनना चाहता था | असुर ने उस
देह के माध्यम से उस फूल को तोड़ दिया जबकि मनु
की आत्मा ने बैकसीट से इस कृत्य को
देखा |
“जैसे ही यह कृत्य पूरा हुआ , सुर ने उस देह को
पुनः नियंत्रण में ले लिया और वह असुर उस देह से बाहर आ गया
| लेकिन वह असुर वापिस असुरलोक नहीं गया | वह
देहहीन सुरलोक में भटकने लगा - किसी
अन्य देह की तलाश में जिसके माध्यम से वह अपने
बुरे कृत्य कर सके |
“मनु चिल्लाने लगा - “मैंने पाप किया है , मैंने एक फूल को तोडा है
|” एक सुर ने उसे बताया - “हे मनु , तुमने फूल नहीं
तोडा | एक असुर ने फूल तोडा इस देह के द्वारा | तुम तो इस देह
की बैकसीट पर थे |
“सुरलोक में पहली बार पीड़ा अनुभव
की गई थी -- मनु को हुई अफ़सोस
की पीड़ा | अब वह असुरलोक
नहीं रहा था | वह एक सामान्य संसार हो गया था |
“हे मेरे प्रिय मातांगो , 4 युगों की कहानी
बहुत लम्बी है | मैं यह कहानी थोडा थोडा
करके बताऊंगा जैसे जैसे चरणपूजा आगे बढ़ेगी | इस
समय तो मै इस कहानी को संक्षिप्त में बता देता हूँ
ताकि आपको सुरों और असुरों के बारे में मोटा मोटी ज्ञान
हो जाए |
“मनु के आगमन के पश्चात् , विष्णुलोक से उठी बहुत
सी आत्माएं इस संसार में अपनी इच्छाएं
पूर्ण करने आने लगी | एक एक करके असुर
भी असुरलोक से आजाद होकर इस संसार में आने लगे
| असुरलोक की जो परत सभी
पीडाओं को सोखा करती थी
उसका धीरे धीरे पतन होने लगा | जल्द
ही यह संसार वैसा बन गया जिस रूप में यह आज है
- दिन , रात , मृत्यु ,जीवन आदि सब होने लगा |
“अब इस संसार में इच्छाएं प्रकट करने वाली 3
शक्तिया थी - सुर , असुर , और आत्माएं | इच्छाओं
के विरोधाभास में सबसे शक्तिशाली इच्छा की
जीत होती| इच्छाओं का विरोधाभास बढ़ने
लगा | सुरलोक में जब कोई इच्छा प्रकट होती
थी वह तुरंत पूरी हो जाती
थी लेकिन सामान्य संसार में इच्छा पूर्ण होने में बहुत
समय लगने लगा | एक , क्योंकि इच्छाएं संख्या और बारम्बारता दोनों
में अधिक हो गई थी | दूसरा ,विभिन्न इच्छाओं के
बीच विरोधाभास बढ़ गया था | इच्छाओं के पूर्ण होने में
आने वाली दिक्कतों को कम करने के लिए त्रेतायुग में
मुझे विशेष शक्ति के रूप में इस संसार में भेजा गया |
“त्रेतायुग में अच्छी इच्छाओं की शक्ति
बुरी इच्छाओं की शक्ति से ज्यादा
थी इसलिए अधिकतर अच्छी इच्छाओं
की जीत होती थी
| लेकिन कुछ स्थान ऐसे थे जहाँ बुरी इच्छाओं
की शक्तियां ज्यादा थी | वे स्थान
असुरलोक की प्रतिकृति बन गए थे | हाँ, प्रिये मातांगो ,
मैं लंका की इसी धरा की बात
कर रहा हूँ जहाँ रावण बुराइयों से भरा राज्य चला रहा था | इन
बुरी इच्छाओं की शक्तियों पर विजय पाने
के लिए स्वयं भगवान् विष्णु को राम अवतार में आना पड़ा |
“द्वापरयुग में अच्छे और बुरे का फासला और भी कम
हो गया | अब एक ही परिवार में अच्छा और बुरा दोनों
थे | कुरु परिवार में एक तरफ पांडव थे जिनकी इच्छाएं
अच्छी थी और दूसरी और थे
कौरव जिनकी इच्छाएं बुरी थी
| बुराई की शक्तियों को ख़त्म करने के लिए भगवान्
विष्णु ने कृष्ण अवतार लिया |
“और अब अच्छे और बुरे का फासला और भी कम हो
गया है | अब अच्छा और बुरा एक ही देह में रहता
है | द्वापर की तरह इस बार युद्ध एक
ही परिवार में नहीं होगा | इस बार युद्ध
एक ही शरीर में होगा |महाभारत में कुरु
परिवार का एक भाग ख़त्म किया गया था इस बार विनाश के नृत्य में
सभी देह ख़त्म हो जायेंगी | भगवान्
कल्कि आत्माओं को बचायेंगे , देहो को नहीं | इस
कल्प में जिन सुरों और असुरों को अपने भाग के क्रमशः सुख व
दुःख मिल चुके हैं वे इस नश्वर संसार से स्वतंत्र होकर विष्णुलोक
में चले जायेंगे | आत्माओं में से 99 लाख मोक्ष को प्राप्त
होंगी , 33 करोड़ अगले कल्प के सुर बन
जायेंगी और बाकी अगले कल्प के असुर
बन जायेंगी |
हनुमान जी ने संक्षिप्त में सुरों और असुरो का रहस्य
बताया | उर्वा इस कहानी में इतना तल्लीन
था कि वह इसे समाप्त नहीं होने देना चाहता था | इस
कहानी को और सुनने के लिए उर्वा प्रश्न करने के
लिए खड़ा हुआ लेकिन बाबा मातंग ने उसे रोक दिया और बोले - “हे
हनुमान जी , आपकी आज्ञा से मै
यजमान बसंत के लिए पूजा शुरू करना चाहूँगा |”
सेतु टिपण्णी : "सुर" , "असुर", "आत्मा", "कल्प"
आदि के बहुत से अर्थ विभिन्न संस्कृतियों में प्रचलित हैं | भक्तों
को इन शब्दों के यहाँ वहां से सुने हुए अर्थों के सन्दर्भ में इन
अध्यायों को नहीं पढना चाहिए | इन शब्दों को
उसी परिपेक्ष्य में पढ़ें जो हनुमान जी ने
अपनी इन लीलाओं में वर्णित किया है |
हनुमान जी की लीलाओं का
यह अध्याय यही समाप्त होता है |
प्रकरणों में दर्शन दे दिए थे | अब सभी को पता चल
गया था कि हनुमान जी उनकी
धरती पर आ चुके हैं | हनुमान जी के
आने का पता जिस मातंग को सबके बाद पड़ा वो थे 50 से कुछ
अधिक आयु के पुरुष बसंत| देर शाम को बसंत दौड़े दौड़े मातंगों के
डेरे की तरफ आये | भारी सांस से वे
चिल्ला रहे थे - “हनुमान जी हमारी
धरती पर आ गए हैं ... हनुमान जी आ
गए हैं |”
अन्य मातांगो को यह पहले से ही पता था लेकिन वे
इसके बारे में बोल नहीं पा रहे थे | जब उन्होंने मातंग
बसंत को इस बारे में ऊँची और सपष्ट आवाज में बोलते
सुना तो वे भी बोल उठे - “हो ! हो ! हनुमान
जी आ गए हैं | वे सभी बाबा मातंग और
माता मातंग के पास एकत्रित हुए |”
बाबा मातंग ने घोषणा की - “हाँ . हनुमान जी
41 साल बाद हमारी धरती पर आए हैं
और चरण पूजा कल सुबह शुरू होगी|”
चरण पूजा की तैयारियां पूरी की
जा चुकी थी क्योंकि उन्हें आभास था कि
हनुमान जी का उनकी धरती
पर पुनः आगमन का समय हो गया था | सभी मातंग
अर्पण के लिए फलादि इकठ्ठा कर रहे थे | बाबा मातंग ने
सभी को शांत रहने और दिन की
सभी गतिविधियाँ पूरी करके निद्रा के लिए
जाने का निर्देश दिया |
बाबा और उर्वा को छोड़कर सभी मातंग निद्रा में चले गए
| आधी रात के बाद दोनों उस स्थान पर गए जो पूजा के
लिए निर्धारित था | यह एक वृताकार क्षेत्र था जिसके मध्य में
वेदी बनी हुई थी , उसके
कुछ कदम दूर आसन बना हुआ था | उस वृताकार क्षेत्र
की परिधि पर मिटटी के दीए
रखे गए थे | उन दीपकों को आधीरात के
बाद विचित्र तेल से भरने का नियम है | यह तेल बाबा मातंग ने
जंगल की विशेष जड़ी बूटियों से एकत्र
किया है | इस तेल का रहस्य सिर्फ बाबा मातंग और माता मातंग को
मालुम है जिसे उन्हें सही समय पर
अगली पीढ़ी यानी
उर्वा और उर्मी को हस्तांतरित करना है |
जब बाबा और उर्वा उन दीपकों में विचित्र तेल भर रहे
थे तब बाबा ने किसी को चरण पूजा स्थान
की ओर आते हुए देखा | वे उर्वा से बोले -“उर्वा ,
इधर कौन आ रहा है ? जाओ और उसे रोको वह चाहे जो
भी हो | इस समय हमारे सिवाए किसी
भी मातंग का यहाँ आना प्रतिबंधित है |
शीघ्र जाओ |”
उर्वा उस व्यक्ति की ओर दौड़ा | वह व्यक्ति कोई
ओर नहीं बल्कि बसंत था | उर्वा बोला -
“चाचाश्री , आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? आप चरण
पूजा क्षेत्र की ओर क्यों आ रहे हैं ? आप चरण
पूजा के पहले घंटे के यजमान हैं | आपका यहाँ आना नियमों के
अनुसार वर्जित है |”
बसंत ऐसे लग रहा था जैसे कि निद्रा में हो | वह बुदबुदाया - “उर्वा
, मुझे बेचैनी सी हो रही
थी इसीलिए टहलने के लिए निकल आया
... मुझे खेद है ... मै अब वापिस चला जाऊँगा |”
बसंत ने मुड़कर वापिस अपने डेरे की ओर चलना शुरू
कर दिया | उर्वा चरण पूजा स्थान पर आकर दीपकों में
तेल भरने में बाबा मातंग कि मदद करने लगा |
बाबा ने पूछा - “वह कौन था , उर्वा ? वह इधर क्यों आ रहा था ?”
“वह बसंत चाचाश्री थे बाबा |” उर्वा ने उत्तर दिया -
“वह अपनी सुध में नहीं थे | वे
नींद में चल रहे थे |”
बाबा मातंग ने कोई उत्तर नहीं दिया क्योंकि वे चाहते थे
कि उर्वा को अपने कथन का विराधाभास स्वयं हो | कुछ पल सन्नाटा
रहा |
फिर उर्वा बोला - “नहीं बाबा , उनकी
पांचो इन्द्रियां तो सही से काम कर रही
थी | उन्हें सुध तो थी | उन्होंने मेरे साथ
अच्छे से वार्तालाप भी किया | वे बोले कि उन्हें
बेचैनी हो रही थी
इसीलिए वे टहलने के लिए निकल पड़े थे लेकिन न जाने
मुझे कुछ अजीब सा लगा |”
अब बाबा मातंग बोले - “क्या तुम्हे पूर्ण विश्वास है कि वह बसंत
ही था ?”
“हाँ बाबा | वह बसंत चाचाश्री ही थे |
यहाँ इतना भी अँधेरा नहीं है बाबा |
चांदनी में उनका चेहरा मुझे स्पष्ट दिखाई दिया |”
एक बार फिर बाबा मातंग ने जवाब देना उचित नहीं समझा
|
कुछ पल सन्नाटा रहा | सन्नाटे ने अपना काम किया और उर्वा को
कुछ कुछ समझ में आया | वह चिल्लाया - “हे भगवान् | क्या वह
बसंत की देह में कोई और था?”
“मेरा अनुमान है कि वह बसंत के शरीर में कोई असुर
था |” बाबा मातंग ने उत्तर दिया |
“एक असुर ने बसंत की देह का अपहरण कैसे किया
बाबा ?”
“अपहरण?” बाबा मातंग लगभग हंस ही दिए थे | फिर
गंभीर भाव से बोले - “यह अपहरण नहीं
है उर्वा | अगर तुम जानना चाहते हो कि असुर किस तरह कर्म
करते हैं तो मुझे भय है कि उत्तर इतना आसान नहीं
है | इस सब के पीछे हजारों साल का रहस्य और
इतिहास है | केवल विद्वानों में विद्वान व्यक्ति ही इस
रहस्य को समझ सकते हैं | इस समय इस संसार में केवल
हनुमान जी हैं जो इस रहस्य का वर्णन कर सकते
हैं | अगर मै तुम्हे यह रहस्य बताने लगूं तो तुम इसे समझ
नहीं पाओगे | मै और पिछली
पीढ़ी के मातंगों ने 41 साल पहले इस
रहस्य को स्वयं हनुमान जी से जाना था | अब समय
आ गया है कि तुम और नई पीढ़ी के मातंग
भी श्री हनुमान जी से इस
रहस्य को जानो क्योंकि वे 41 साल बाद फिर से हमारी
धरती पर पधारे हैं |”
“मै यह रहस्य जानने के लिए बहुत उत्सुक हूँ बाबा |
बड़ी चौंकाने वाली बात है कि हम मनुष्य
इन रहस्यमयी प्राणियों के बारे में अनजान रहते हैं जो
हमारे जीवन को इतना प्रभावित करते हैं | एक मातंग
होते हुए भी इन प्राणियों के बारे में मै केवल इतना
जानता हूँ कि सुर अच्छे होते हैं और असुर बुरे | अगर कोई
ऐसी चीज है जो मेरे सोने के बाद मेरे
शरीर का इस्तेमाल कर सकती है तो मुझे
उस चीज के बारे में जानना जरूरी है |”
उर्वा की टिपण्णी के जवाब में बाबा मातंग
के मन में जो स्वाभाविक विचार आया वो था , “उर्वा , केवल
नींद में ही नहीं , सुर तथा
असुर मानव जीवन के हर पल को प्रभावित करते हैं
|” लेकिन बाबा मातंग इस विचार को अपने होंठो तक नहीं
लाएं | वे आधी रात के समय सुरों और असुरों के बारे में
कोई वार्तालाप नहीं करना चाहते थे | वे
रीति रिवाजों को तुरंत पूरा करना चाहते थे | उन्होंने
निर्देश दिया - “उर्वा , अब 4 दीपक उठाओ --
सभी चारों दिशाओं से एक एक | और फिर उन
दीपकों को घेरे के सात कदम बाहर रख दो |”
“4 दीपकों को घेरे से बाहर रखने का क्या प्रयोजन है
बाबा ?” उर्वा की उत्सुकता को इस बात से कोई फर्क
नहीं पड़ता था कि आधी रात है |
बाबा मातंग को उर्वा का सवाल जवाब देने योग्य लगा | उन्होंने
उत्तर दिया - “जो ठीक घेरे के ऊपर दीए
रखे हैं वे तब जलाए जायेंगे जब चरण पूजा शुरू होगी |
अभी हम 4 दीए घेरे के बाहर असुरों को
पूजा स्थल से दूर रखने के लिए जलाएंगे |”
बाबा घेरे के मध्य में जाकर कुछ रीति रिवाज पूरे करने
लगे जहाँ पर वेदी और आसन बना हुआ था | उर्वा
वह करने लगा जिसका उसे निर्देश मिला था | जब उर्वा पहला
दीया घेरे के बाहर रख रहा था तब उसे बसंत फिर से
पूजा स्थल की ओर आता दिखाई दिया |
उसकी तरफ दौड़ने से पहले उर्वा ने बाबा मातंग
की इजाजत लेनी आवश्यक
समझी | बाबा बोले - “अब उसे रोकने के लिए उसके पास
जाने की आवश्यकता नहीं है उर्वा | जो
दीपक तुमने घेरे के बाहर रखा है उसे जला दो |”
उर्वा ने दीपक जलाया | उसने नोटिस किया कि
दीपक की रोशनी विचित्र लाल
रंग की थी | उसने उस विचित्र तेल और
उसकी रहस्यमयी रोशनी के
बारे में बहुत किस्से सुने थे | वह उम्मीद कर रहा था
कि उस रोशनी से कोई चमत्कार होगा लेकिन उसे कोई
चमत्कार होता दिखाई नहीं दिया | ओर कुछ
नहीं तो वह रोशनी बसंत को उधर आने से
रोक भी नहीं पा रही
थी | बसंत उसी गति से चरण पूजा स्थल
की तरफ बढ़ रहा था | उर्वा खड़ा हुआ और चिंतित
स्वर में चिल्लाया - “बाबा इस दीए से कुछ हो
नहीं रहा है ... |”
वह अपना वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया
था कि उसे अपने पीछे किसी के होने का
अहसास हुआ | जब वह मुड़ा तो एक लाल रंग की
पक्षी जैसी कोई चीज उसके
कानों के पास से होकर उडी | उसमे जंगल
की किसी भी भयावह स्थिति
से निपटने की हिम्मत थी लेकिन उस लाल
चीज ने उसके मन को आतंकित कर दिया | वह और
कुछ नहीं बल्कि असुर था | असुर हर जगह हैं
लेकिन उस दीपक की लाल
रोशनी ने मानव आँख को असुर के दर्शन करा दिए थे |
उर्वा तुरंत घेरे के अन्दर आ गया | बाबा मातंग घेरे के मध्य में
कुछ रीति रिवाजों में व्यस्त थे | उस सन्नाटे को
चीरने के लिए जो उसके मन के भयों को बाधा रहा था ,
उर्वा चिल्लाया - “बाबा मैंने दीया जला दिया है लेकिन
इसका कोई असर नहीं हो रहा है | बसंत
चाचाश्री तेजी से इस तरफ आ रहे है |”
बाबा मातंग ने उर्वा को सुना लेकिन उन्हें एक 20 के
करीब के लड़के के अधैर्य पर प्रतिक्रिया
देनी उचित नहीं समझी |
जब दीए को काम करना था काम किया | जैसे
ही बसंत उस दीए की विकिरणों
की रेंज में आया , उर्वा ने देखा कि बसंत पहले तो
जमीन पर बैठा और फिर वहीँ पर लेट गया
| उर्वा ने देखा कि एक लाल चीज बसंत के लेटे हुए
शरीर से निकली और उड़ गई |
उर्वा बसंत के पास दौड़कर गया तो उसने पाया कि बसंत
गहरी नींद में जमीन पर सोया
हुआ था | उसने उसके शरीर को हिलाकर जगाया |
“मैं यहाँ कैसे आया?” बसंत जागते ही बुदबुदाया |
“चिंता मत कीजिये चाचाश्री ... सब कुछ
ठीक है | आप नींद में चल रहे थे | अब
आप वापिस झोपडी में जा सकते हैं |”
बसंत को चिंता हो रही थी | जब उसे पता
चला कि वह प्रतिबंधित स्थान पर है तो वह अपराधबोध से ग्रस्त
होकर वापिस हो लिया | नींद में चलना उसके लिए कोई
नई बात नहीं थी | बहुत लोगों ने उसे बताया
था कि वह नींद में अजीब हरकतें करता
है | प्राय: वह बाहर निकल जाता था , नींद में चलता
था और वापिस आ जाता था | लेकिन इस बार जो असुर
उसकी देह को चला रहा था वह उसे बीच
में ही छोड़ गया था , वो भी एक प्रतिबंधित
स्थान के पास |
उर्वा वापिस चरण पूजा स्थल पर आ गया | उसने अपना 4
दीए रखने का कार्य पूरा किया | तब तक बाबा मातंग ने
भी वेदी के पास किये जाने वाले
रीति रिवाज पूर्ण कर लिए | डेरे की ओर
वापिस आते हुए उर्वा सुरों और असुरो के विचारों में खोया हुआ था |
वह अपने विचारों को होठों तक आने को नहीं रोक पाया ,
“यह कितना खतरनाक है बाबा ! एक बाहरी
प्राणी हमारी देह को नियंत्रित कर सकता
है और जो चाहे वो कर सकता है !”
“क्या उस असुर ने बसंत को कोई चोट पहुंचाई ? जब
दीपक की विकिरण असुर तक
पहुंची तब असुर चाहता तो बसन्त की देह
को खड़ी अवस्था में छोड़कर ही निकल
सकता था | अगर उसने ऐसा किया होता तो बसंत की देह
कटे पेड़ की तरह नीचे गिरती
| इसके बजाए असुर ने देह को आराम से धरती पर
लेटाया और फिर निकला | क्या तुमने नहीं देखा ?” बाबा
मातंग ने उत्तर दिया और फिर विस्तार से समझाया -
“असुर
भी देह के प्रति सुरक्षा और स्वत्व का भाव
ठीक उसी तरह रखते हैं जैसे हम रखते
हैं | असुर अपने आप में उतनी बड़ी
समस्या नहीं है जितना तुम सोच रहे हो |
असली समस्या यह है कि हम ये सोचते हैं कि हम
इस देह के स्वामी हैं | हम इस देह के
स्वामी नहीं है | हम इस देह में सिर्फ
किरायेदार हैं | इस रहस्य को अच्छे से समझने के लिए तुम्हे यह
जानना आवश्यक है कि इस सबकी शुरुआत कैसे हुई
| केवल श्री हनुमान जी ही
इस रहस्य का वर्णन कर सकते हैं | अभी अपने
विचारों को विश्राम दो और जाकर सो जाओ |”
उर्वा ने दो चार घंटे की नींद लेने
की कोशिश की लेकिन सुरों और असुरो के
विचारों ने उसके मन को सुबह तक जगाये रखा |
अंततः इन्तजार समाप्त हुआ | ब्रह्ममुहूर्त में चरण पूजा
की प्रक्रिया शुरू हुई | वृद्ध मातंग जिन्होंने हनुमान
जी से 41 साल पहले ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया था
उन्हें ब्राह्मण कहा जाता है | सबसे पहले बाबा मातंग , माता मातंग
तथा अन्य ब्राह्मण पूजा स्थल में प्रविष्ट हुए | इस वृताकार
स्थल को हनुमंडल कहा जाता है | हनुमंडल के अन्दर से
उन्होंने एक श्लोक पढ़ा जो उर्वा और उर्मी को कुछ
इस तरह संबोधित था - “हे उर्वा , तुम्हे बाबा मातंग की
परंपरा को आगे बढ़ाना है | हे उर्मी , तुम्हे माता मातंग
की परंपरा को आगे बढ़ाना है | हम सभी
ब्राह्मण तुम दोनों को पवित्र हनुमंडल में बुलाते हैं | आओ , विधि
के अनुसार दीपक जलाओ ताकि चरण पूजा प्रारंभ हो
सके |”
ब्राह्मणों को बताया गया कि उर्मी वहां उपस्थित
नहीं है | बाबा मातंग ने सबको सूचित किया -
“उर्मी की आत्मा कल शाम को एक
दैवीय कार्य हेतु गई थी जो कार्य उसको
श्री हनुमान जी के माध्यम से स्वयं
भगवान् विष्णु ने दिया था | इसीलिए वो देरी
से उठी | वह शीघ्र ही यहाँ
पहुँच जायेगी तब तक हम राम मंत्र जपेंगे |
जब मातंग एक सुर में किसी मंत्र का जाप करते हैं तो
वह आवाज नश्वर संसारों में ही नहीं
अपितु ब्रह्मलोक एवं विष्णुलोक तक पहुँचती है |
लेकिन उस समय उनके एकल स्वर में एक आवाज
की कमी खल रही
थी -- उर्मी की आवाज | वह
आवाज भी उस एकल सुर में शीघ्र
ही सम्मिलित हो गई जब उर्मी वहां
पहुँच गई | ब्राह्मणों ने फिर से उस श्लोक का उच्चारण करके
उर्वा और उर्मी को हनुमंडल के अन्दर बुलाया |
जब उर्वा और उर्मी हनुमंडल में आए तब ब्राह्मणों
ने उनको आगाह किया कि उन्हें वो सब दिखाई देने वाला है जो
उन्होंने कभी नहीं देखा था | जो मातंग घेरे
के बाहर खड़े थे उनको निर्देश दिया गया कि वे अपनी
आँखें बंद रखें | उसके बाद उर्वा और उर्मी ने
दीपक जलाना प्रारंभ किया | उन्होंने दीपक
जलाते वक़्त अपनी आँखे नीचे
रखी | जब सभी दीपक
जलाकर उर्वा और उर्मी खड़े हुए तो उन्होंने एक
विचित्र दृश्य देखा | दीपकों की विचित्र लाल
रोशनी में हनुमंडल के बाहर बहुत बड़ी
संख्या में लाल रंग के देह-हीन प्राणी खड़े
थे -- वे थे असुर | जो मातंग बाहर खड़े थे उनकी
तुलना में असुरों की संख्या बहुत ज्यादा थी
|
ब्राह्मण उसके बाद हनुमंडल के केंद्र की ओर बढे |
उन्होंने वेदी में पवित्र लकड़ियाँ डाली और
अग्निदेव की प्रशंसा में श्लोक पढने शुरू कर दिए |
जब अग्निदेव प्रकट हुए तो उन्हें पवित्र द्रव की
आहुति दी गई | एक श्वेत धुआं हनुमंडल में पैदा हो
गया | उस धुएं में एक अजीब सी हलचल
थी | “सुर!” उर्मी उत्साह में
बोली |
जो पवित्र द्रव अग्नि को अर्पित किया जा रहा था उस द्रव से सुर
मातांगो को दिखाई देने लगे | अब हनुमंडल एक ऐसी
गुफा जैसा लग रहा था जिसकी दीवारे लाल
थी और छत श्वेत --- लाल असुरों के कारण और श्वेत
सुरों के कारण |
सभी ब्राह्मण , उर्वा तथा उर्मी अब हाथ
जोड़कर आसन के सामने खड़े हो गए | उन्होंने उन शलोको का
उच्चारण किया जिनमे मातांगो के हनुमान जी के साथ
सदियों पुराने रिश्ते का जिक्र था | उन्होंने अति विनम्रता के साथ यह
भाव प्रकट किया कि उन्होंने तमाम कठिनाइयों के बावजूद
अपनी उच्च पवित्रता तथा सिद्धांतों को सुरक्षित रखा है
| मातांगो की भक्ति से प्रसन्न होकर हनुमान
जी प्रकट हुए | सभी ब्राह्मणों तथा उर्वा
, उर्मी ने साष्टांग प्रणाम किया | वेदी के
पास जहाँ हनुमान जी प्रकट हुए थे वहां से आसन
तक मातंगों ने आयताकार जल कुंड बना रखा था | जैसी
की परंपरा थी हनुमान जी उस
पानी के ऊपर चलकर आसन तक पहुंचे | जब
हनुमान जी चलते हैं तो उनका शरीर छोटे
छोटे कणों में विघटित हो जाता है और अगले ही पल
पुन: संघटित हो जाता है | यह विघटन और पुनःसंघटन एक पल के
भी इतने छोटे से हिस्से में होता है कि
किसी देखने वाले को पता ही
नहीं चल पाता | यही हनुमान
जी के चिरंजीवी
शरीर का राज है | पानी के ऊपर चलने
की इस परंपरा से यह बोध होता है कि हनुमान
जी की देह मानवों की तरह
धरती पर नहीं चलती | इस
रीति को “हनु चरण धोना” कहा जाता है क्योंकि जब
हनुमान जी की देह छोटे छोटे कणों में
विघटित होती है तब अशुद्ध कण कुंड के
पानी में मिल जाते हैं और पानी के शुद्ध
कण उनका स्थान ले लेते हैं |
जब हनुमान जी आसन पर विराजमान हो गए तब बाबा
मातंग ने उर्वा को चरण पूजा कार्यक्रम का “होतर” नियुक्त किया |
“होतर” का मातंगो की हर पूजा में अहम् स्थान होता
है | होतर वह व्यक्ति होता है जो प्रश्न पूछकर ब्राह्मणों और
देवताओं के मध्य ज्ञान वार्तालाप संचालित करता है | यह वार्तालाप
पूजा में उपस्थित मनुष्यों को मन के भ्रमजाल से निकालकर
सर्वोच्च वास्तविकता का अनुभव करवाता है | एक यजमान तब
तक पूजा में अर्पण नहीं कर सकता जब तक
की वह भ्रमजाल की कम से कम एक
परत से बाहर नहीं आ जाता |
बाबा मातंग बोले - “हे प्रभु हनुमान , बसंत पहले घंटे
की चरणपूजा का यजमान है | आपके माध्यम से मै
होतर को आग्रह करता हूँ कि वे यजमान को हनुमंडल के अन्दर
ले आयें |”
उर्वा हनुमंडल के घेरे की परिधि पर गया और बसंत का
नाम पुकारा | बसंत घेरे के बाहर आँखे बंद किये हुए अर्पण
की टोकरी लिए खड़ा था | उर्वा ने उसको
आँखे बंद किये किये ही हनुमंडल के अन्दर आने
और फिर अन्दर आकर आँखे खोलने का आग्रह किया | उसके बाद
उर्वा उसे वेदी के पास ले गया |
बसंत ने निर्धारित स्थान पर अर्पण की
टोकरी रख दी | उसने अग्निदेव को
झुककर प्रणाम किया और फिर हनुमान जी को साष्टांग
प्रणाम किया | अब बाबा मातंग बोले -“हे प्रभु हनुमान , अब जबकि
यजमान आ चुका है , होतर अन्य मातांगो को भी पवित्र
हनुमंडल के अन्दर ला सकता है |”
उर्वा सभी मातंगो को हनुमंडल के अन्दर ले आया |
सभी ने हनुमान जी को साष्टांग प्रणाम
किया और फिर निर्धारित स्थान पर बैठ गए | ब्राह्मण लगातार
अग्निदेव को पवित्र द्रव की आहुति दिए जा रहे थे |
यजमान को भी निर्धारित स्थान पर बैठने के लिए कहा
गया |
बाबा मातंग खड़े रहे और कुछ श्लोक उच्चारित किये जिनका
अर्थ है -“हे हनुमान जी यह पूजा स्थल एक लाल
गुफा जैसा लग रहा है क्योंकि इसके बाहर बहुत अधिक संख्या में
असुर खड़े हैं | सुरों की उपस्थिति के कारण एक श्वेत
छत बन गई है जिससे स्वर्ग का सा आभास हो रहा है | प्राय:
सुर तथा असुर अदृश्य रहते हैं लेकिन आपकी कृपा
से हमारे पास रहस्मयी तेल है जिससे असुर दृश्य हो
गए हैं और पवित्र द्रव है जिससे सुर दृश्य हो गए हैं | कलियुग
में पिछले कुछ सालों में यह पृथ्वी पर सबसे
बड़ी पूजा है | इस पूजा में आपकी
उपस्थिति ही वह कारण है कि सुरों में श्रेष्ट तथा
असुरों में श्रेष्ट यहाँ पधारे हैं | सुर आपके पवित्र चरणों में
अर्पण करके आनंद प्राप्त करने का यह अवसर
नहीं चूकने देना चाहते | दूसरी तरफ
असुर भी इसे अपने बुरे कार्य करने का बहुत बड़ा
अवसर देख रहे हैं | अतः असुर इस पूजा समारोह में अडचने पैदा
करने का पूर्ण प्रयास करेंगे --- और ऐसा समझ में भी
आता है | आखिर सुरों और असुरों को भी यह अधिकार
है कि वे अपनी इच्छानुसार प्रयास करें | मैं आपके
माध्यम से यहाँ उपस्थित सभी मातांगो को सावधान करना
चाहता हूँ कि वे सतर्क रहें ताकि सुर तथा असुर अपने प्रयासों में
सफल न हो सकें |”
उर्वा खड़ा हुआ और बोला -“हे प्रभु हनुमान , पूर्ण विनम्रता से
मैं यह शंका जाहिर करना चाहता हूँ कि सतर्कता ही
सुरों और असुरों से रक्षा करने के लिए काफी
नहीं है | कैसे सुनिश्चित हुआ जा सकता है कि अब
भी कोई सुर अथवा असुर यहाँ बैठे किसी
मातंग की देह में नहीं छुपा है ? वैसे
भी असुरों को छल कला में महारत हासिल है | सुरक्षा
के लिए ज्ञान सबसे पहली आवश्यकता है | अगर
किसी को उसके शत्रु के बारे में कुछ भी
मालुम नहीं हो तो वह अपनी रक्षा कैसे
कर सकता है ?अतः मै आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप इन
प्राणियों का रहस्य खोलें | क्या ये कोई शापित आत्माएं हैं ? इनके
अस्तित्व का क्या प्रयोजन है और ये इस संसार में किस तरह
काम करते हैं ? कृपा हमें यह सर्वोच्च ज्ञान देकर कृतार्थ करें
|”
बाबा मातंग इस बात से प्रसन्न थे कि उर्वा होतर की
जिम्मेदारी बखूबी निभा रहा था | उसने
सही समय पर सही सवाल पूछा था | बाबा
और उर्वा हनुमान जी को प्रणाम करके निर्धारित स्थानों
पर बैठ गए और हनुमान जी सुरों और असुरो का
रहस्य समझाने लगे -
“यह मानव संसार 4 युगों के कालचक्र में घूमता रहता है | इस 4
युगों के कालचक्र को कल्प कहते हैं | इस समय हम चौथे युग
में हैं | मै आपको पीछे उस समय काल में ले जाना
चाहता हूँ जब पिछला कल्प समाप्त होने को आ रहा था |
भगवान्
शिव ने विष्णु जी को सन्देश भेजा -“हे मानव संसार के
रक्षक , हे भगवान् विष्णु , यह संसार उस चरण पर पहुँच गया
है कि अब इसका विनाश आवश्यक हो गया है |”
भगवान् विष्णु ने उत्तर भेजा - “हे महादेव , वहां
करीब 1000 करोड़ आत्माएं मानव देहों में कैद हैं
और इच्छाओं की भूलभुलैया में संघर्ष कर
रही हैं | उनको वहां से निकलने का अवसर उपलब्ध
करवाना आवश्यक है | मै वहां उन आत्माओं को बंधन मुक्त
करने आता हूँ जो यहाँ उनके स्थायी स्थान अर्थात
विष्णुलोक में आने की इच्छा रखती हैं |”
“तब भगवान् विष्णु पृथ्वी पर कल्कि के रूप में
अवतरित हुए | संचार के घोड़े पर सवार , हाथ में ज्ञान
रुपी तलवार लहराते हुए वे सभी एक
हज़ार करोड़ आत्माओं के पास गए | उनका संचार का श्वेत घोडा
प्रकाश की गति से दौड़ा , उनकी
चमकती हुई ज्ञान रुपी तलवार मजबूत
से मजबूत कर्म बंधन काटने में सक्षम थी |
“यहाँ पर यह उल्लेख करना आवश्यक है कि जब कल्कि आए
तब अज्ञानता का अन्धकार कितना था | अगर कोई अन्धकार में हो
और प्रकाश चाहता हो तो उसका अन्धकार दूर करना बहुत आसान
है | लेकिन किसी को यह भ्रम हो कि वह प्रकाश में
है किन्तु वास्तव में वह अँधेरे में हो , उसका अन्धकार तब तक
दूर नहीं किया जा सकता जब तक वह भ्रम से बाहर
न आ जाए |ऐसी स्थिति थी |लोगो को यह
भ्रम था कि वे प्रकाश में हैं किन्तु वास्तव में वे अन्धकार में थे |
लोगों को भ्रम से बाहर आने की कोई इच्छा
नहीं थी | उन्हें परम सत्य
की खोज नहीं थी | उन्हें
खोज रहती थी तो सिर्फ इस झूठे
आश्वासन की कि वे भ्रम में नहीं हैं |
और भ्रम भी कोई साधारण भ्रम नहीं था
| वह भ्रम के अन्दर भ्रम था | उन्होंने प्राचीन
ज्ञान को भी अपनी सुविधा के अनुसार तोड़
मरोड़कर उसे अपने भ्रम के छोटे से घोंसले की एक
और परत मात्र बना दिया था |
“इन हालातों में कल्कि धरती पर आए | उन्होंने
अपनी ज्ञान रुपी तलवार से
सभी के कर्म के बंधन काटने का प्रस्ताव रखा |इस
प्रस्ताव के साथ वे हर आत्मा के पास एक बार नहीं ,
दो बार नहीं बल्कि सात बार गए | और फिर आया न्याय
का दिन | भगवान् शिव ने विनाश का तांडव किया | पूरी
पृथ्वी का पदार्थ पिंघल गया | मानव देहो
की बात छोडिये , कोई भी वस्तु
नहीं बची | वे आत्माएं जो इस भ्रम में
थी कि मानव शरीर ही उनका
घर है , बेघर हो गई | भगवान् कल्कि के 7 प्रयासों के पश्चात्
भी केवल 99 लाख ऐसी आत्माएं
थी जिन्होंने भगवान् कल्कि की ज्ञान
रुपी तलवार के सामने समर्पण किया था | वे 99 लाख
आत्माएं विष्णु लोक चली गई और उनको मोक्ष प्राप्त
हो गया | बाकी बची आत्माएं मोक्ष के लिए
योग्य नहीं थी | जब उनके कर्म के
बही खतों की जांच हुई तब केवल 33
करोड़ आत्माओं के खातों में अच्छे कर्मों का शेष था | उन 33
करोड़ आत्माओं को सुर कहा गया | बाकी के हिसाब में
बुरे कर्मों का शेष था उन्हें असुर कहा गया |
“भगवान् कल्कि ने निर्णय सुनाया - “सुरों को अगले पूरे कल्प में
सुख भोगने को मिलें और असुरो को अगले पूरे कल्प में दुःख भोगने
को मिलें |”
“मैंने भगवान् कल्कि से पूछा - “हे प्रभु , सुर और असुर बहुत
बड़ी संख्या में हैं | आपके निर्णय को लागू करना
बहुत बड़ा कार्य है | अगर मै इसके लिए कोई काम आ सकूँ तो
आज्ञा दीजिये |”भगवान् कल्कि मुस्कुराये और बोले -
“यह मेरा निर्णय नहीं है हनुमान | यह
मेरी इच्छा है और यह इच्छा “त्रिदेव के वैश्विक
नियम” के अनुसार अपने आप पूर्ण हो जायेगी |”
“यह विश्व “त्रिदेव के वैश्विक नियम” के अनुसार चलता है जिसके
अनुसार “संसार में जहाँ भी कोई इच्छा प्रकट
की जाती है , विश्व की
सभी शक्तियां उस इच्छा को पूर्ण करने के लिए काम
करती हैं |”
“उस समय पूरी पृथ्वी एक विचित्र द्रव
का गोला लग रही थी क्योंकि सब कुछ
पिंघल गया था | भगवान् कल्कि उस संसार का एक भाग थे | जब
उन्होंने अपनी इच्छा जताई तो संसार की
सभी शक्तियां उस इच्छा को पूर्ण करने में लग गई |
पृथ्वी की सतह से कुछ
किलोमीटर ऊपर एक बहुत मोटी परत
बननी शुरू हो गई | भगवान् कल्कि ने बताया - “हनुमान
, वो देखो असुरलोक का निर्माण हो रहा है | सभी असुर
वहां निवास करेंगे |”
“असुरलोक पृथ्वी की सतह से कुछ
किलोमीटर ऊपर बनी एक मोटी
अदृश्य परत थी | सभी असुर उस परत
में कैद हो गए | यह परत बहुत अधिक गर्म हुआ
करती थी क्योंकि सूर्य की
किरणें सीधे इस pपर पड़ती
थी | यह परत केवल सूर्य की किरणों को
ही नहीं सोखती
थी अपितु उन सभी तत्वों को
सोखती थी जो पीड़ा का कारण
बनते हैं | इस परत के द्वारा प्रदान की गई सुरक्षा के
कारण पृथ्वी का वातावरण अत्यधिक हर्षदायक हो गया
| यह परत सूर्य की किरणों को कुछ इस तरह
छानती थी कि पृथ्वी पर हर
समय एक जैसा वातावरण रहता था | दिन और रात ,
गर्मी , सर्दी आदि सभी
भिन्नताएं समाप्त हो गई | सारी प्रदूषित हवा इस परत
द्वारा सोख ली जाती थी जिससे
कि पृथ्वी का वातावरण अत्यधिक पवित्र और सुगन्धित
रहता था | उस महाविनाश के बाद पहले इस परत का निर्माण हुआ
जिसमे असुर कैद हो गए फिर पिघली हुई
धरती का विचित्र द्रव एक अत्यधिक सुन्दर
पृथ्वी की सतह बन गया | मै अपने
सामने यह रूपांतरण होता देख आश्चर्यचकित था |
भगवान् कल्कि
ने बताया - “प्रिये हनुमान , पृथ्वी की
सतह सुरलोक में परिवर्तित हो रही है | यहाँ
सभी 33 करोड़ सुर रहेंगे |”
“असुरलोक अर्थात पृथ्वी की सतह से
कुछ मील ऊपर बनी परत
पीड़ा से भरी थी और
पृथ्वी की सतह यानी सुरलोक
आनंद से भरा हुआ था | फिर 5 तत्वों ने मिलकर पृथ्वी
पर बहुत सारी मानव देहों का निर्माण किया | वे
शरीर धड़क रहे थे लेकिन उनमे आत्मा
नहीं थी | हर तरह के शरीर
थे - पुरुष , महिला , बच्चे , जवान | भगवान् कल्कि ने बताया - “ये
33 करोड़ शरीर हैं जिनके जरिए सुर इस सुरलोक का
आनंद लेंगे |”
“सुरों ने उन देहों में प्रवेश करकें सुरलोक का आनंद लेना शुरू कर
दिया | केवल एक नियम था जिसके अनुसार सब कुछ चल रहा था -
“त्रिदेव का वैश्विक नियम”| अगर कही
भी कोई इच्छा प्रकट हुई तो संसार की
सभी शक्तियां उस इच्छा को पूरा करने में लग
जाती थी | सुर कभी एक
शरीर में स्थायी तौर पर नहीं
रहते थे , वे आपस में देह बदलते रहते थे| उदाहरण के तौर पर
अगर किसी सुर को “बचपन” के सुख लेने
की इच्छा होती थी तो वह
बच्चे की देह धारण कर लेता था | अगर
किसी को पिता बनने की इच्छा
होती थी तो वह “व्यस्क” की
देह धारण करके किसी बच्चे की देह वाले
सुर को बच्चे का प्यार देने लगता था | समय का उन देहो पर कोई
असर नहीं होता था क्योंकि समय के बुरे प्रभाव
भी असुरलोक की परत द्वारा शोषित कर
लिए जाते थे | न वृद्धावस्था थी और न ही
कोई रोग |
“कई सदियाँ बीत गई | सभी नश्वर संसारों
में सुरलोक प्रसिद्ध हो गया | सुरलोक की तुलना
विष्णुलोक के साथ होने लगी | देखने से ऐसा लगता था
कि सुरलोक का कभी अंत नहीं होगा | एक
बार ब्रह्मलोक में ब्रह्मा और देवी
सरस्वती सुरलोक के बारे में बाते कर रहे थे |
विष्णुलोक यानी “श्वेत समंदर” में एक आत्मा ने यह
बातचीत सुन ली | उसने सुरलोक
की सुन्दरता का अनुभव करने की इच्छा
प्रकट की | भगवान् विष्णु ने उस आत्मा को सुरलोक
अर्थात सतयुग की पृथ्वी पर भेज दिया |
यह कल्प के प्रथम मनुष्य मनु की आत्मा
थी |
“ठीक जिस समय मनु की आत्मा ने
विष्णुलोक में अपनी इच्छा प्रकट की ,
एक सुर ने सुरलोक में उसकी पूरक इच्छा प्रकट
की | इच्छा थी - “रथ का चलाने का आनंद
अलग होता है और रथ की पिछली
सीट पर बैठने का आनंद अलग होता है | अब रथ
की तुलना देह से की जाए तो मैंने बहुत
सारे मानव शरीरों को चलाया है और इस संसार के बहुत
सारे सुख भोगे हैं | अब मै वह सुख भोगना चाहता हूँ जो तब मिलता
है जब शरीर को कोई और चलाये और मै
पिछली सीट पर बैठकर आनंद लूं |”
“उस सुर और मनु दोनों की इच्छा तुरंत पूर्ण हो गई |
मनु की आत्मा विष्णुलोक से आकर सुरलोक
की एक मानव देह में प्रवेश कर गई और
उसी देह में उस सुर ने पिछली
सीट ले ली | अब सुरलोक में कुल 33
करोड़ मानव देह , 33 करोड़ सुर और एक आत्मा थी
|
[सेतु टिपण्णी : जब आप किसी को देख
रहे होते हैं तब आपकी आत्मा आपकी
देह को चला रही होती है | जब आप
अपने आपको देख रहे हैं (ध्यान करते समय आदि ) तब
आपकी आत्मा आपकी देह
की पिछली सीट पर
होती है | हनुमान जी ने “चित्त” शब्द का
प्रयोग किया है लेकिन इस अध्याय के सन्दर्भ में
“बैकसीट” शब्द सही जंचता है |]
“सुरलोक में भ्रमण करते समय मनु की आत्मा ने
एक बहुत ही सुन्दर फूल देखा | मनु की
आत्मा ने इच्छा जाहिर की - “मैं यह पुष्प तोडना
चाहता हूँ |” एक सुर ने उसको आगाह किया - “हे मनु , आप यहाँ
सुरलोक को देखने और यहाँ के सुखों का आनंद लेने आये थे | अब
आपने यह फूल तोड़ने की नई इच्छा उत्पन्न कर
ली है | सुरलोक के फूल हमेशा खिले रहते हैं | उन्हें
तोडा नहीं जाता |”
मनु को अपनी गलती का अहसास हुआ
और उसने एक और इच्छा जाहिर की जो
थी - “मैं यह फूल नहीं तोडना चाहता |”
“अब मनु की दो इच्छाएं प्रकट हो चुकी
थी -
(1) “मैं फूल तोडना चाहता हूँ”
(2) मैं फूल
नहीं तोडना चाहता ---
और “त्रिदेव के वैश्विक नियम”
के अनुसार संसार की सभी शक्तियों ने दोनों
इच्छाओं को पूरा करने का कार्य शुरू कर दिया | दूसरी
इच्छा पहली इच्छा से कमजोर थी इसलिए
इस विरोध में पहली इच्छा की
जीत हुई |
“अब त्रिदेव के वैश्विक नियम के अनुसार एक फूल तोडना
आवश्यक हो गया था लेकिन सुरलोक में ऐसी कोई
ताकत नहीं थी जो फूल तोड़ने का यह बुरा
कार्य कर पाती | इसलिए एक असुर असुरलोक से
आजाद हो गया और नीचे सुरलोक में उतर आया | उस
असुर ने उस देह में प्रवेश किया जिसमे मनु की आत्मा
थी | उस देह की बैकसीट पर
जो सुर बैठा था वह निकल गया क्योंकि वह उस बुरे कर्म में
भागी नहीं बनना चाहता था | असुर ने उस
देह के माध्यम से उस फूल को तोड़ दिया जबकि मनु
की आत्मा ने बैकसीट से इस कृत्य को
देखा |
“जैसे ही यह कृत्य पूरा हुआ , सुर ने उस देह को
पुनः नियंत्रण में ले लिया और वह असुर उस देह से बाहर आ गया
| लेकिन वह असुर वापिस असुरलोक नहीं गया | वह
देहहीन सुरलोक में भटकने लगा - किसी
अन्य देह की तलाश में जिसके माध्यम से वह अपने
बुरे कृत्य कर सके |
“मनु चिल्लाने लगा - “मैंने पाप किया है , मैंने एक फूल को तोडा है
|” एक सुर ने उसे बताया - “हे मनु , तुमने फूल नहीं
तोडा | एक असुर ने फूल तोडा इस देह के द्वारा | तुम तो इस देह
की बैकसीट पर थे |
“सुरलोक में पहली बार पीड़ा अनुभव
की गई थी -- मनु को हुई अफ़सोस
की पीड़ा | अब वह असुरलोक
नहीं रहा था | वह एक सामान्य संसार हो गया था |
“हे मेरे प्रिय मातांगो , 4 युगों की कहानी
बहुत लम्बी है | मैं यह कहानी थोडा थोडा
करके बताऊंगा जैसे जैसे चरणपूजा आगे बढ़ेगी | इस
समय तो मै इस कहानी को संक्षिप्त में बता देता हूँ
ताकि आपको सुरों और असुरों के बारे में मोटा मोटी ज्ञान
हो जाए |
“मनु के आगमन के पश्चात् , विष्णुलोक से उठी बहुत
सी आत्माएं इस संसार में अपनी इच्छाएं
पूर्ण करने आने लगी | एक एक करके असुर
भी असुरलोक से आजाद होकर इस संसार में आने लगे
| असुरलोक की जो परत सभी
पीडाओं को सोखा करती थी
उसका धीरे धीरे पतन होने लगा | जल्द
ही यह संसार वैसा बन गया जिस रूप में यह आज है
- दिन , रात , मृत्यु ,जीवन आदि सब होने लगा |
“अब इस संसार में इच्छाएं प्रकट करने वाली 3
शक्तिया थी - सुर , असुर , और आत्माएं | इच्छाओं
के विरोधाभास में सबसे शक्तिशाली इच्छा की
जीत होती| इच्छाओं का विरोधाभास बढ़ने
लगा | सुरलोक में जब कोई इच्छा प्रकट होती
थी वह तुरंत पूरी हो जाती
थी लेकिन सामान्य संसार में इच्छा पूर्ण होने में बहुत
समय लगने लगा | एक , क्योंकि इच्छाएं संख्या और बारम्बारता दोनों
में अधिक हो गई थी | दूसरा ,विभिन्न इच्छाओं के
बीच विरोधाभास बढ़ गया था | इच्छाओं के पूर्ण होने में
आने वाली दिक्कतों को कम करने के लिए त्रेतायुग में
मुझे विशेष शक्ति के रूप में इस संसार में भेजा गया |
“त्रेतायुग में अच्छी इच्छाओं की शक्ति
बुरी इच्छाओं की शक्ति से ज्यादा
थी इसलिए अधिकतर अच्छी इच्छाओं
की जीत होती थी
| लेकिन कुछ स्थान ऐसे थे जहाँ बुरी इच्छाओं
की शक्तियां ज्यादा थी | वे स्थान
असुरलोक की प्रतिकृति बन गए थे | हाँ, प्रिये मातांगो ,
मैं लंका की इसी धरा की बात
कर रहा हूँ जहाँ रावण बुराइयों से भरा राज्य चला रहा था | इन
बुरी इच्छाओं की शक्तियों पर विजय पाने
के लिए स्वयं भगवान् विष्णु को राम अवतार में आना पड़ा |
“द्वापरयुग में अच्छे और बुरे का फासला और भी कम
हो गया | अब एक ही परिवार में अच्छा और बुरा दोनों
थे | कुरु परिवार में एक तरफ पांडव थे जिनकी इच्छाएं
अच्छी थी और दूसरी और थे
कौरव जिनकी इच्छाएं बुरी थी
| बुराई की शक्तियों को ख़त्म करने के लिए भगवान्
विष्णु ने कृष्ण अवतार लिया |
“और अब अच्छे और बुरे का फासला और भी कम हो
गया है | अब अच्छा और बुरा एक ही देह में रहता
है | द्वापर की तरह इस बार युद्ध एक
ही परिवार में नहीं होगा | इस बार युद्ध
एक ही शरीर में होगा |महाभारत में कुरु
परिवार का एक भाग ख़त्म किया गया था इस बार विनाश के नृत्य में
सभी देह ख़त्म हो जायेंगी | भगवान्
कल्कि आत्माओं को बचायेंगे , देहो को नहीं | इस
कल्प में जिन सुरों और असुरों को अपने भाग के क्रमशः सुख व
दुःख मिल चुके हैं वे इस नश्वर संसार से स्वतंत्र होकर विष्णुलोक
में चले जायेंगे | आत्माओं में से 99 लाख मोक्ष को प्राप्त
होंगी , 33 करोड़ अगले कल्प के सुर बन
जायेंगी और बाकी अगले कल्प के असुर
बन जायेंगी |
हनुमान जी ने संक्षिप्त में सुरों और असुरो का रहस्य
बताया | उर्वा इस कहानी में इतना तल्लीन
था कि वह इसे समाप्त नहीं होने देना चाहता था | इस
कहानी को और सुनने के लिए उर्वा प्रश्न करने के
लिए खड़ा हुआ लेकिन बाबा मातंग ने उसे रोक दिया और बोले - “हे
हनुमान जी , आपकी आज्ञा से मै
यजमान बसंत के लिए पूजा शुरू करना चाहूँगा |”
सेतु टिपण्णी : "सुर" , "असुर", "आत्मा", "कल्प"
आदि के बहुत से अर्थ विभिन्न संस्कृतियों में प्रचलित हैं | भक्तों
को इन शब्दों के यहाँ वहां से सुने हुए अर्थों के सन्दर्भ में इन
अध्यायों को नहीं पढना चाहिए | इन शब्दों को
उसी परिपेक्ष्य में पढ़ें जो हनुमान जी ने
अपनी इन लीलाओं में वर्णित किया है |
हनुमान जी की लीलाओं का
यह अध्याय यही समाप्त होता है |
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आत्मा पर भ्रम की परतें
अध्याय पढने के बाद यह पर्यवेक्षण करना आवश्यक है कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं | अगर आप कुछ ऐसा महसूस कर रहे हैं -"वाह! मैंने कुछ नया पाया |" अथवा "वाह, मैंने कुछ नया सीखा |" अथवा "मेरी अपने प्रभु के प्रति भक्ति ओर भी बढ़ गई|" इत्यादि तो आप अपने प्रभु की ओर एक कदम भी नहीं बढ़ें हैं | आप उतनी ही दूरी पर अटके हुए हैं |
अगर अध्याय पढने के बाद आप कुछ ऐसे महसूस कर रहे हैं जैसे आपके अन्दर से कुछ बाहर निकलकर गिर पड़ा हो और आप आत्मा से हल्का महसूस कर रहे हों तो आप अपने प्रभु की तरफ कम से कम एक कदम बढ़ चुके हैं |"
आपकी आत्मा एक आईने की तरह है जिसके ऊपर इस बाहरी संसार के कारण धुल चढ़ गई है | अगर अध्याय पढने के बाद आप ऐसा महसूस कर रहे हैं कि आपने कुछ नया पा लिया है तो उसका अर्थ है कि आपने अपनी आत्मा पर एक और परत चढ़ा ली है | आप प्रभु के साक्षात् दर्शन तभी कर सकते हैं जब आप ये परतें हटायें |
अतः अगर आप इस समय आत्मा से हल्का महसूस नहीं कर रहे हैं तो आप कुछ समय बाद फिर आकर यह अध्याय पढ़िए |