बुधवार, 27 जुलाई 2016

अध्याय 9 ( रामसेतु का भेद खोला चिंरजीवी हनुमान जी ने)

[सेतु टिप्पणी : इस अध्याय का दूसरा आधा भाग मनातीत ज्ञान से सरोबार है - ऐसा ज्ञान जो हमें मानव मन की सीमाओं से बाहर ले जाता है | अतः मुख्यधारा के भक्त जो अपने मानव मस्तिष्क से अत्यधिक रूप से जुड़े हैं , उन्हें यह ज्ञान ग्रहण करने में कठिनाई हो सकती है | फिर भी हम यह अध्याय प्रकाशित कर रहे हैं क्योंकि श्री हनुमान जी का यही निर्देश है | शायद सेतु की ऑनलाइन कम्युनिटी में कुछ गृहस्थ साधक ऐसे हैं जिन तक यह अध्याय पहुंचना आवश्यक है | ]



चरण पूजा का पहला चरण जिसके यजमान बसंत थे , पूरा हो चुका था | यजमान बसंत ने अर्पण में फलों की टोकरी भेंट की थी और प्रसाद के रूप में हनुमान जी से पाताल का ज्ञान पाया था | उसकी गुप्त इच्छा अपने परिवार के खोये रत्न पाने की थी, लेकिन उसकी यह इच्छा अभी तक अधूरी थी | हनुमान जी आसन से खड़े हो चुके थे | हनुमंडल में उपस्थित अन्य मातंग भी अपना सिर श्रद्धा से झुकाए और हाथ जोड़े हुए खड़े हो गए थे | प्रार्थना सभा भंग होने से पहले उर्वा ने हनुमान जी से अनिवार्य रूप से पूछा - “हे प्रभु , रत्न समुद्र के तल में हैं तो वहां से वापिस कैसे आयेंगे ? यह असंभव प्रतीत होता है - pपहले तो समुद्र की इतनी गहराई में पहुंचना और फिर उन छोटे छोटे रत्नों को ढूंढना !”



बाबा मातंग को उर्वा के इस व्यवहार से क्रोध आ गया | उन्होंने उर्वा की तरफ क्रोधित दृष्टि से देखा, फिर हनुमान जी की और हाथ जोड़कर बोले - “हे प्रभु इसे क्षमा कर दीजिये | यह नादान और अज्ञानी है | उसे नहीं पता कि यजमान द्वारा प्रसाद ग्रहण करने के पश्चात् प्रार्थना सभा अवश्य भंग होनी चाहिए | मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ |”



हनुमान जी मुस्कुराये | उन्होंने पहले उर्वा की ओर देखा और फिर बाबा मातंग की ओर देखा | उसके पश्चात् वे आसन के सामने बने जल कुंड के ऊपर चले और अदृश्य हो गए |



बाबा मातंग ने सभा भंग की रीतियाँ प्रारंभ की | यजमान बसंत ने बाबा मातंग की निगरानी में हनुमंडल की परिधि पर रखे दीयों को एक एक करके बुझा दिया | फिर हनुमंडल के मध्य में स्थापित वेदी से अग्नि देव को विदा किया गया | उर्वा ने इन रीतियों को पूरा करने में सहायता करने का प्रयत्न किया लेकिन बाबा मातंग ने उसे ऐसा नहीं करने दिया |



अंततः जब सभा भंग हुई और मातांगो ने अपने अपने घर की ओर प्रस्थान करना शुरू किया तब उर्वा ने बाबा के सामने अपना पक्ष रखने का प्रयत्न किया | बाबा ने उसको बोलने का अवसर नहीं दिया |



बाद में जब मातंग नाश्ता कर रहे थे तब उर्वा बाबा के पास बैठा और बोलने की कोशिश की | बाबा मातंग गरजे - “अगर बसंत ने स्वयं ही प्रसाद में रत्न नहीं मांगे तो तुम कौन होते हो उसके लिए रत्न मांगने वाले, वो भी तब जब हनुमान जी अपने आसन से उठ चुके थे | तुमने हद पार कर दी है उर्वा ! अब मैं तुम्हे होतर नियुक्त नहीं करूँगा | अब से उर्मी होतर का कार्यभार संभालेगी |”



उर्वा ने बोलने की कोशिश की - “बाबा , मैं तो केवल यह चाहता था कि ...”



“क्या चाहते थे तुम?” बाबा फिर गरजे - “तुम क्या सोचते हो , क्या चरण पूजा तुम्हारे चाहने न चाहने के अनुसार चलेगी? ‘मैं तो ये चाहता था’ का क्या अर्थ है ? क्या तुम्हारा चाहना हमारे पुरखों द्वारा सदियों से निर्धारित विधि विधान से भी ऊपर है?”

उर्वा रो पड़ा | उसने अपनी नाश्ते की थाली उठाई और वहां से तुरंत सुबकते हुए उठकर चला गया |



उर्मी भी बाबा मातंग के पास ही बैठी हुई थी | वह सब कुछ चुपचाप देख रही थी | बाबा ने उर्मी से कहा - “मेरा भी यही मानना है कि खोये हुए रत्न बसंत के परिवार को वापिस मिलने चाहिए ताकि उसके पिता को मुक्ति मिल सके | लेकिन हम मनुष्य हैं | जो हम सही समझते हैं वह सही हो यह आवश्यक नहीं है | क्या तुमने देखा नहीं उर्मी, बसंत द्वारा अर्पण के लिए लाये गए फलों के ढेर में से केवल एक छोटा सा केले का टुकड़ा प्रभु के चरणों में अर्पण के योग्य निकला | इससे पता चलता है कि बसंत पर सुरों और असुरों का कितना प्रभाव है | तो हम कैसे निश्चिन्त हो सकते हैं कि रत्न प्राप्त करने की हमारी इच्छा, हमारी स्वयं की इच्छा है ? हो सकता है कि यह इच्छा हमारे अन्दर सुरों तथा असुरों द्वारा प्रेरित की गई हो |



“और ऐसा केवल बसंत के साथ नहीं है | मुझे डर है कि पिछले 41 साल में हम सब लोग सुरों और असुरों के अत्यधिक प्रभाव में आ गए हैं | हम अपने आपको पवित्र समझते हैं लेकिन यह पवित्रता की भावना असुरों द्वारा pप्रेरित भी तो हो सकती है | मुझे लगता है कि हनुमान जी (महाभारत के ) भीष्म का जिक्र करके मेरी तरफ संकेत कर रहे थे | भीष्म सोचता था कि वह बहुत धर्ममार्गी है लेकिन असल में वह बुरी तरह असुरों की जकड में था|”







“चिंता मत करो बाबा मातंग | आप सुरों और असुरों के प्रभाव में नहीं हो |” यह हनुमान जी की आवाज थी | वे वहां पर बैठे थे जहाँ कुछ पल पहले उर्मी बैठी थी |



हनुमान जी को अपने साथ नाश्ता करते पाकर बाबा मातंग आनंद के अतिरेक में भौंचक्के हो गए | उन्हें यह नहीं सूझ रहा था कि वे क्या करें | आदर और समर्पण पूर्वक हाथ जोड़ते हुए बुदबुदाए - “प्रभु !”



हनुमान जी ने आगे कहा - “... और आप अपने आपको लगातार निरिक्षण में रखते हैं | यह इस बात का प्रतीक है कि आप पवित्र हैं | आपने “बाबा” के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को अभी तक सुचारू रूप से निभाया है | और उर्वा ने भी कुछ गलत नहीं किया | जो प्रश्न उसने पुछा वह इस समय सभी साधक मातांगो के मन में है | मुझे पता है कि कब एक साधक के मन में प्रश्न स्थापित किया जाए और कब उसका उत्तर दिया जाए | जहाँ तक रीतियों का प्रश्न है , मातंग परम्परा के रक्षक के रूप में आपका क्रोध उचित ही है | आपके क्रोध के कारण उर्वा अभी यह चिंतन कर रहा है कि वह रीति क्यों बनी है और उसे तोडना क्यों उचित नहीं है |”



बाबा को हनुमान जी के शब्द सुनकर अत्यंत संतोष अनुभव हुआ | उन्होंने हनुमान जी के दर्शन के लिए फिर से अपना सिर ऊपर उठाया लेकिन तब तक हनुमान जी वहां से अदृश्य हो चुके थे | अब उस स्थान पर पुनः उर्मी बैठी थी |



कुछ समय पश्चात् चरण पूजा का अगला चरण शुरू हुआ | इस बार यजमान थी चरिता नाम की एक मातंग औरत | उर्मी को होतर नियुक्त किया गया |अर्पण की रीति प्रारंभ करने से पहले यजमान की आत्मा का हनुमान जी के शब्दों द्वारा पवित्र होना आवश्यक था |

हनुमान जी बोले - “चरण पूजा के पिछले चरण में उर्वा ने एक प्रश्न पूछा था - कि अगर रत्न गहरे समुद्र में हैं तो उन्हें वापिस लाना कैसे संभव है?



“उर्वा के प्रश्न से मुझे नल की याद हो आई - नल यानी वह वानर जिसने समुद्र के ऊपर सेतु का निर्माण किया था |



“जब भगवान् राम ने रावण के विरुद्ध युद्ध करने की ठानी तब करोडो वानर सेना में सम्मिलित होने के लिए इकट्ठे हो गए | लंका समुद्र के उस पार स्थित थी | इतनी बड़ी वानर सेना को समुद्र पार करवाना एक बड़ी चुनौती थी | भगवान् राम ने सेनापतियों से सलाह करने के लिए बैठक बुलाई |



“सुग्रीव ने विचार रखा - “प्रभु , हम पूरी सेना को लंका में नहीं उतार सकते | लंका के बाहरी हिस्से में इतनी बड़ी संख्या में सेना को ठहराने की व्यवस्था नहीं हो पाएगी | शत्रु की धरती पर सेना के लिए भोजनादि की कमी पड़ जायेगी | अतः हमें केवल आधी सेना के साथ आगे बढ़ना चाहिए | आधी सेना इस तरफ रुकी रहेगी | अगर युद्ध लम्बा चला तो इस तरफ की सेना को बाद में बुला लेंगे | हमारे पास कर्मबल बहुत है | जितनी नौकाओं की आवश्यकता पड़ेगी , वे जल्दी ही बन जायेंगी |”





“लक्ष्मण ने पूछा - “अगर रास्ते में समुद्र के राक्षसों ने आक्रमण कर दिया तो क्या होगा ? हमारी सेना समुद्र के खतरों से निपटने में कुशल नहीं है |”





“मैंने लक्षमण को भरोसा दिलाया कि अगर भगवान् राम की आज्ञा होगी तो मैं अकेला ही समुद के राक्षसों से लड़ने के लिए पर्याप्त हूँ | अतः समुद्र के खतरों से डरने की आवश्यकता नहीं है |



“अंगद बोला - “मुझे शक है कि रावण के पास समुद्र युद्ध में कुशल सेना की एक टुकड़ी है | अगर उसने उस टुकड़ी को समुद्र में भेज दिया तो हमारी सेना तो समुद्र में ही समाप्त हो जायेगी |”



“भगवान् राम बोले - “अभी युद्ध घोषित नहीं किया गया है | कोई भी योद्धा युद्ध घोषित किये बिना आक्रमण नहीं कर सकता |”



“लक्षमण ने टिपण्णी की - “रावण असुरों के प्रभाव में है | मुझे नहीं लगता कि वह क्षत्रियों के नियमों का पालन करेगा |”



“भगवान् राम बोले - “लक्षमण मुझे पता है कि रावण असुरों के प्रभाव में है लेकिन उसे अपनी सैन्य शक्ति के ऊपर बहुत अहंकार है इसलिए वह कायरता से आक्रमण नहीं करेगा |”



“सुग्रीव को अपनी योजना में कमी नजर आई | वह बोला - “हम आधी सेना को तो नौकाओं द्वारा बिना कठिनाई के ले जायेंगे, लेकिन अगर हमें इस तरफ बची सेना की बाद में आवश्यकता पड़ी तो उसे हम नहीं बुला पायेंगे | क्योंकि युद्ध घोषित होने के पश्चात् रावण समुद्र में भी आक्रमण करने के लिए स्वतंत्र होगा | वह अपने समुद्री योद्धा भेजकर हमारी सेना को समुद्र में ही ख़त्म कर देगा |”

“जी हाँ|” अंगद ने अपना मत रखा - “किसी भी चीज से लड़ने के लिए हमारी सेना के पैरों के नीचे भूमि होनी आवश्यक है | उन्हें नौकाओं में युद्ध करने की कला नहीं आती |”



“भगवान् राम बोले - “अगर हम समुद्र में सेतु बना दे तो कैसा रहेगा? सेतु का पैरों तले होना भूमि होने जैसा ही है | सेतु के मार्ग से बाकी सेना को बुलाने में समस्या नहीं आएगी |”



“सभा में उपस्थित सभी ने आश्चर्य भरी दृष्टि से एक दुसरे को देखा | “समुद्र पर सेतु?” सुग्रीव बोले - “वह संभव नहीं है प्रभु |”



““नल इसे संभव कर सकता है |” प्रभु राम बोले |



““न ... नल ... हाँ ... नल नाम का एक कुशल वानर है तो सही जो सेतु बनाना जानता है | लेकिन उसे आप कैसे जानते हैं प्रभु?” सुग्रीव ने आश्चर्य से पूछा |



“यह एक अनुचित प्रश्न था : भगवान् राम, सर्वशक्तिमान प्रभु तो सबको जानते हैं | ऐसा कैसे हो सकता है कि वे किसी को न जानते हो? मैं बोल पड़ा - “क्यों न हम नल को बुलाकर पूछे कि वह सेतु निर्माण कर सकता है या नहीं?”



“सुग्रीव ने तुरंत उत्तर दिया - “वह वानर केवल एक वृक्ष से दुसरे वृक्ष के बीच सेतु बना सकता है | वह समुद्र में सेतु नहीं बना सकता | यह असंभव है |”



“मुझे ज्ञान था कि प्रभु श्री राम के लिए कुछ भी असंभव नहीं है | मैंने जोर डालकर कहा - “नल को बुलाकर उसी से पूछते हैं |”





“अंगद नल को बुलाने चला गया |



“जब अंगद पुनः सभा कक्ष में आया , नल उसके साथ था | नल आश्चर्यचकित था कि प्रभु राम उसे जानते थे और करोड़ों वानरों में से उसे बुलाया था | अंगद नल की तरफ से बोला - “प्रभु , मैंने नल से पूछा | वह कहता है कि वह पानी में सेतु नहीं बना सकता |”



“प्रभु राम नल की ओर मुस्कुराये और बोले - “नल , हर सृजनशील जीव भगवान् विश्वकर्मा का रूप है | अगर तुम दो वृक्षों के बीच सेतु बना सकते हो तो तुम यहाँ से लंका के बीच भी सेतु बना सकते हो | क्या तुम नहीं बना सकते?”





“नल सुन्न था | लेकिन उसने तुरंत उत्तर दिया जैसे कि उसके होंठों से शब्द अचानक गिर गए हों , “हाँ मैं बना सकता हूँ |”



“सभी ने नल की ओर देखा | नल का आत्मविश्वास उड़ गया और वह फिर से अनिश्चित सा लगा | प्रभु राम ने उसकी आँखों में देखा | फिर से जादू हुआ और वह सेनापतियों की उस सभा में जोर से बोला - “हां , मैं समुद्र में सेतु बना सकता हूँ | मैं समुद्र का अभी सर्वेक्षण करूँगा और फिर मैं सेतु की रूपरेखा तैयार करूँगा |”



“भगवान् राम ने मुझे नल के साथ समुद्र सर्वेक्षण के लिए जाने का निर्देश दिया |



“मैं नल के साथ सभा कक्ष से निकल गया | मैंने गौर किया कि नल कांप रहा था और बुदबुदा रहा था - “हाँ ... सेतु का निर्माण संभव है ... हाँ मैं सेतु बनाऊंगा ... “ उसका आत्मविश्वास पुनः डोल रहा था | वह अपने आपको भरोसा दिलाने का प्रयत्न कर रहा था |



“हमने एक नौका ली , कुछ रस्सियाँ और छड़ियाँ ली और समुद्र में निकल पड़े | नल विभिन्न स्थानों पर समुद्र की गहराई नापने लगा | समुद्र हर जगह बहुत गहरा था | नल निराश था | अंततः उसने आशा छोड़ दी और बोला - “इस समुद्र में सेतु बनाना असंभव है |”



““तो तुमने प्रभु राम को हाँ क्यों कहा?” मैंने पूछा|

“नल ने उत्तर दिया - “जब प्रभु राम ने मेरी तरफ देखा तो पता नहीं मुझे क्या हुआ | मुझे आभास हुआ कि मैं विश्वकर्मा हूँ और मैं किसी भी चीज का सृजन कर सकता हूँ | लेकिन जैसे ही मैं सभा कक्ष से बाहर आया , मुझे आभास हुआ कि मैं तो केवल एक साधारण वानर हूँ |”



“मैं बोला - “ओ नल , अगर भगवान् राम को तुझमे विश्वास है तो अवश्य ही तुम्हारे अन्दर कोई विशेष शक्ति है | चाहे पानी कितना भी गहरा हो , तुम सेतु बना सकते हो |”



“लेकिन ... कैसे?” नल असहाय होकर बोला - “मैं कैसे कहूँ ... यह बिलकुल असंभव है | मैं इस गहरे पानी में एक स्तम्भ भी खड़ा नहीं कर सकता|”



“हम समुद्र के बीचो बीच नौका चला रहे थे | नल अपने ऊपर इतनी बड़ी जिम्मेदारी पाकर भयभीत हो रहा था | उसने मुझसे प्रार्थना की कि मैं कोई सुझाव दूँ | मैंने उसको आँखे बंद करके प्रभु राम का जाप करने का सुझाव दिया |



“उसने अपनी आँखें बंद की और प्रभु राम के नाम का जाप करने लगा | मैं उसके चेहरे पर तेज देख सकता था | मैं बोला - “हे आत्मा जो प्रभु राम के नाम का जाप कर रही है , तुम कौन हो? अपना परिचय दो|”



“अपनी आँखें बंद किये हुए ही नल ने उत्तर दिया - “मैं नल हूँ , विश्वकर्मा का एक रूप | मैं अपने आपको समुद्र के बीचों बीच नींव खोदते हुए देख रहा हूँ | मैं स्वयं को समुद्र का सीना चीरते हुए देख सकता हूँ | हां मैं यह कर सकता हूँ | हाँ , मैं यह अवश्य करूँगा |”





“मुझे नल के चेहरे पर भगवान् विश्वकर्मा की झलक दिखाई दी | मैंने उसे आँखे खोलने को कहा |



“जब उसने आँखें खोली तो उसने कुछ विचित्र देखा | वह चिल्लाया - “अग्नि के गोले !”



“मैंने पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि नल हमारी नौका से कुछ मीटर दूर स्थित एक बड़े मगरमच्छ की ओर संकेत कर रहा था | अपनी गदा पर पकड़ मजबूत करते हुए मैंने पूछा - “अग्नि के गोले? नहीं ! यह तो केवल एक मगरमच्छ है|”



““लेकिन मुझे इस मगरमच्छ में कुछ विचित्र नजर आया | इसकी आँखें दो आग के गोलों की तरह लग रही थी | और यह बिलकुल मेरी ओर देख रहा था |” नल ने जोर देकर कहा |



““अवश्य प्रकाश का कोई भ्रम रहा होगा , और कुछ नहीं|” मैंने नल को आश्वासन दिया लेकिन वह मगरमच्छ मुझे भी संदेहास्पद लग रहा था | एक साधारण समुद्री मगरमच्छ हम पर आक्रमण करने आना चाहिए था लेकिन जब हमने उसकी ओर देखा वह दूर चला गया |



“नल बोला - “मुझे पता नहीं ऐसा क्यों लगा कि वह मगरमच्छ रावण का जासूस है | क्या हमें उसका पीछा करके सत्य पता नहीं करना चाहिए?”



“नहीं.” मैं बोला - “समुद्र में ऐसे बहुत सारे जीव हैं | हमें केवल अपने कार्य पर ध्यान देना चाहिए | मैं इन जीवों पर तभी आक्रमण करूँगा जब वे हमें कोई हानि पहुँचाने का प्रयास करें |”



“कार्य ! ओह ...” नल बोला - “हमारे पास जो कार्य है वह असंभव है | मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है कि कहाँ से शुरू करें |”



““लेकिन कुछ पल पहले तुम्हारा मुख दैवीय शक्तियों से दैदीप्यमान था | जब तुम भगवान् राम के नाम का जप कर रहे थे तब मुझे तुम्हारे मुख में भगवान् विश्वकर्मा के दर्शन हुए थे |” मैंने उसे बताया |



“नल मजाक करते हुए बोला - “यह सेतु तभी बन सकता है अगर चट्टानें समुद्र में तैरने लगें |”



“मैंने गंभीरता से कहा - “अगर भगवान् राम की इच्छा हो तो कुछ भी असंभव नहीं है | अगर भगवान् राम सोचते हैं कि तुम सेतु बना लोगे तो जाओ और आराम करो | कल सुबह भगवान् राम के नाम का जाप करते हुए समुद्र में पत्थर फेंकना शुरू कर देना | वे तैरने लगेंगे अगर भगवान् राम की इच्छा हुई तो |”



“नल को पूर्ण विश्वास तो नहीं हुआ लेकिन उसके पास और कोई विकल्प भी नहीं था | मैंने उसको सर्वेक्षण बंद करने को कहा | मैं उसको सुदूर समुद्र में ले गया और उसे भिन्न भिन्न प्रकार के समुद्री जंतु दिखाए | उसने समुद्र दर्शन बाल उत्सुकता के साथ किया और सेतु की बात उसके मन से उतर गई |


“जब हम देर शाम अपनी सैन्य छावनी में लौटे, अंगद और सुग्रीव ने पूछा कि सर्वेक्षण पूर्ण हुआ कि नहीं | नल के पास कोई उत्तर नहीं था | मैंने उसकी तरफ से उत्तर दिया - “हाँ सर्वेक्षण पूरा हो चुका है | नल कल सेतु निर्माण आरम्भ करेगा |”



“मैंने भगवान् राम को मेरी तरफ मुस्कुराते हुए देखा | वे यह सत्य जानते थे कि हम लोग सर्वेक्षण नहीं बल्कि पूरा दिन समुद्र दर्शन कर रहे थे और नौका सैर का आनंद ले रहे थे | वे यह भी जानते थे कि हमें तनिक भी विचार नहीं था कि सेतु कैसे बनेगा |



“अगली सुबह सबकी दृष्टि नल पर थी | सभी सेनापति समुद्र किनारे एकत्र थे | नल समुद्र किनारे इस तरह टहल रहा था जैसे वह कुछ माप रहा हो | उसे छेड़ने के विचार से मैंने पूछा - “हे महान नल ! निर्माण कहाँ से शुरू किया जाए? कृपा हमारा मार्गदर्शन करें ताकि हम आवश्यक सामान उस स्थान पर एकत्र कर सकें |”



“स्वाभाविक था कि नल बेचैन था और उसके होंठ गतिमान थे | वह धीरे धीरे भगवान् राम के नाम का जाप कर रहा था | जब मैंने उसको चिढाया, उसने मेरी तरफ देखा और जाप की ध्वनि तेज कर दी - “राम ... राम ... राम ...”



“अंगद और सुग्रीव ने मेरी ओर उत्सुकता से देखा | मैं तुरंत बोला - “अर्र ... हाँ .. राम .. राम ... राम ... नल के कहने का अर्थ है कि भगवान् राम बताएँगे सेतु कहाँ से शुरू करना है |”



“भाग्य से भगवान् राम लक्ष्मण के साथ वहां पहुँच गए और बोले - “हाँ , मेरे साथ आओ | हम पहले पूजा करेंगे , उसके बाद नल निर्माण आरम्भ कर सकता है |”



“ऐसा प्रतीत हुआ कि भगवान् राम को पहले से ही पता था कि सेतु निर्माण कहाँ से शुरू करना है | वे हमें वहां ले गए और पूजा आरम्भ की | नल अब भी बेचैन था लेकिन मुझे पूर्ण विश्वास था कि सब कुछ सही होने वाला था |





“जब पूजा समाप्त हो गई तब पुनः नल की तरफ सबका ध्यान हो गया | जब भगवान् राम ने उसकी ओर देखा , उसकी बेचैनी उड़ गई और दिव्य शक्तियों का उसमे संचार हुआ | नल ने अपने हाथ से समुद्र की ओर संकेत किया और सिंहगर्जना की - “चलो समुद्र की छाती पर पहला पत्थर रखें | जय श्री राम |”

“मैंने भी उसके स्वर में अपना स्वर मिलाया और कहा - “जय श्री राम” और मैंने एक पत्थर समुद्र में उस तरफ फेंका जिस तरफ नल ने हाथ फैला रखा था | जब मेरा फेंका हुआ पत्थर पानी में नहीं डूबा तो वहां उपस्थित सभी लोगों के आश्चर्य और उत्साह का ठिकाना नहीं रहा | नल शायद किसी और ही संसार में खोया हुआ था | जब उसका मस्तिष्क वास्तविकता में लौटा तो अत्यंत आश्चर्य में पड़ गया | उसने शब्द तो एक भी नहीं बोला लेकिन उसकी आँखे मुझसे पूछ रही थी - “यह चमत्कार कैसे हुआ? संसार के नियम कैसे बदल गए? समुद्र में पत्थर कैसे तैरा?”



“मुझे कम से कम इस बात का तो विश्वास था कि भगवान् राम का कोई भी काम संसार के किसी नियम का उल्लंघन नहीं कर सकता | अगर पानी में पत्थर बाकी संसार के लिए नहीं तैरते तो भगवान् राम अपने कार्य हेतु नियम तोड़कर पत्थर नहीं तैरायेंगे |



“जब अंगद ने यह घोषणा की कि नल की कुशलता और भगवान् राम की कृपा से पानी में फेंका गया पत्थर तैर रहा है तो पूरी सेना ने जोर से भगवान् राम के नाम का उद्घोष किया | नल पूरी वानर जाति का नायक बन गया |



“नल तैरते हुए पत्थर का रहस्य जानना चाहता था | वह प्रभु राम से बोला - “प्रभु , मैं समुद्र में जाकर कुछ माप लेने के लिए आपकी आज्ञा चाहता हूँ | क्या मैं हनुमान जी के साथ जा सकता हूँ?”



“भगवान् राम की आज्ञा लेने के बाद हमने एक नौका ली और उस स्थान पर गए जहाँ पत्थर तैर रहा था | वहां जाकर देखा तो हम यह देखकर आश्चर्यचकित हो गए कि पत्थर तैर नहीं रहा था , पत्थर तो एक टीले के ऊपर आराम से टिका हुआ था | नल आश्चर्य में बोला - “मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा है | यह टीला यहाँ कहाँ से आया? कल तो यहाँ गहरा पानी था | कैसा चमत्कार है यह ... रातों रात ... कैसे?”



“मेरे पास कोई उत्तर नहीं था | मैंने केवल इतना कहा - “भगवान् राम के नाम की शक्ति है यह!”



“नल ने आँखें बंद करके जोर से भगवान् राम का नाम जपा | मैं नौका चलाता रहा यह देखने के लिए कि टीला कहाँ तक है | हमने पाया कि वह चमत्कारी टीला पूरे समुद्र के आर पार उभर आया था | अब हमको करना सिर्फ यह था कि हम जहाँ तहां बची खाली जगहों को भरकर सतह को समतल कर दे | नल छोटे छोटे स्थानों को भरकर सेतु बनाने में कुशल था | अगले दो चार दिनों में हमने वानरों के भारी कर्मबल की सहायता से उस टीले को सपाट सेतु में बदल दिया |



“नल को वानर समाज में जो अचानक यश मिला था उससे वह सहज महसूस नहीं करता था | उसे लगता था कि वह इस यश का अधिकारी नहीं था क्योंकि टीला तो भगवान् राम की शक्तियों से उभरा था | जब सेतु पूरा बन गया , भगवान् राम ने उसे बताया -

“हे नल , उस टीले के उभरने का कारण तुम हो, कोई और नहीं | अभी मैं तुम्हे यह नही बता सकता कि यह कैसे हुआ लेकिन युद्ध समाप्ति के पश्चात् तुम्हे मैं यह रहस्य अवश्य बताऊंगा|”



“नल को सम्मानित करते हुए भगवान् राम ने सेतु का नाम ‘नल सेतु’ रख दिया |



“युद्ध समाप्ति के पश्चात् नल ने भगवान् राम से टीले का रहस्य पूछा | हे बुद्धिमान मातंगो , क्या तुम यह अनुमान लगा सकते हो कि वह रहस्य क्या है?” हनुमान जी ने मातंगों की सभा से पूछा |



“उर्वा शांत बैठा हुआ था | हनुमान जी ने उसकी ओर देखा और कहा - “उर्वा के प्रश्न ने मुझे नल की याद दिला दी | नल कह रहा था कि समुद्र पर सेतु बनाना असंभव है और उर्वा कह रहा था कि समुद्र में से वे रत्न वापिस लाना असंभव है | मैं यह नहीं कह रहा कि चमत्कारी रूप से कोई टीला समुद्र में से निकल आयेंगा और वे रत्न ऊपर आ जायेंगे | मैं तो केवल इतना कह रहा हूँ कि कुछ भी असंभव नहीं है |”



उर्वा कुछ नहीं बोला | उर्मी पूजा की होतर थी | उसने खड़े होकर पूछा - “हे प्रभु , हम रहस्य जानने के लिए उत्सुक हैं | रातों रात समुद्र में टीला कैसे बना? कृपा हमें ब्रह्मज्ञान दें और रहस्य समझने में हमारी सहायता करें | हम अनुमान नहीं लगा सकते |”



हनुमान जी बोले - “मैं अब यह रहस्य बताने जा रहा हूँ | मेरे हर शब्द पर ध्यान देना अन्यथा तुन्हें यह समझ में नहीं आएगा |



 “जब हम खुली हवा में होते हैं तो हम सहजता से जीवन जीते हैं लेकिन जब हम पानी के अन्दर जाते हैं तो हमें कठिनाई होती है | मछलियों के साथ इसका बिलकुल विपरीत होता है | मछली जब पानी में होती है तब वह सहज होती हैं लेकिन हवा में आते ही उसे कठिनाई होती है | कल्पना करो कि एक मछली गहरे पानी में है | क्या तुम मछली के संसार की मछली के दृष्टिकोण से कल्पना कर सकते हो?” हनुमान जी ने पूछा |



“होतर उर्मी जिसे देह बदलने का अनुभव है, ने तुरंत उत्तर दिया - “जिस तरह वायु हमारे लिए अदृश्य है , पानी मछलियों के लिए अदृश्य है | मेरे विचार से एक मछली पानी में वैसा ही अनुभव करती है जैसा एक पंछी हवा में करता है | वह अपने आस पास खुली जगह महसूस करती है जिसमे वह विचरण करती है |”



“बिलकुल ठीक|” हनुमान जी बोले - “क्या तुम सबको समझ में आ रहा है उर्मी ने जो कहा? क्या तुम सब मछली के संसार की कल्पना कर सकते हो? मछली के लिए पानी “गैस” है और हवा “द्रव” है | जब वह पानी में होती है तो उसे आस पास खुली जगह महसूस होती है, और जब वह हवा में होती है तब उसे अपने आस पास “द्रव” का आभास होता है जो उसका दम घोंट देता है |”



[सेतु की टिपण्णी : हम मानवों का स्वभाव होता है कि हम हर चीज को अपने दृष्टिकोण से देखते और समझते हैं | लेकिन यहाँ पर आपको अपना दृष्टिकोण छोड़ना है | साधक रोज इसका अभ्यास करते हैं | पता नहीं मुख्यधारा के भक्त यह कर पायेंगे या नहीं | अगर अभी तक आपने यह अध्याय समझ लिया है तो आप गृहस्थ साधक है.]





सभी मातांगो ने हामी भरी | हनुमान जी आगे बोले - “अब पाताल लोक की कल्पना करो| जब मैं पाताल में गया था तब मुझे वहां कुछ भी असाधारण नहीं लगा | वह बिलकुल हमारे संसार की तरह ही एक साधारण संसार दिखाई पड़ रहा था | हे मातंगो , ज़रा सोचो और बताओ | अगर पाताल धरती की गहराई में है तो वहां पर अंधकारमय और घुटनभरा सब होना चाहिए | मुझे वहां ऐसा क्यों नहीं अनुभव हुआ?”


होतर उर्मी ने उत्तर दिया - “अगर मैं अपनी मानव देह के साथ पानी में जाऊं तो मुझे वहां घुटन लगेगी , लेकिन अगर मैं मछली की देह धारण करके वहां जाऊं तो मुझे पानी के अन्दर कुछ भी असाधारण नहीं लगेगा | उसी प्रकार , हे प्रभु , आपकी देह पाताल में नहीं गई | आपकी आत्मा ने पाताल के किसी जीव की देह धारण करके पाताल का अनुभव किया था |”



हनुमान जी ने धरती की ओर इशारा करते हुए कहा - “देखो, हम एक ठोस धरा पर उपस्थित हैं | तो अगर पातालवासियों के लिए अन्दर से सब कुछ सामान्य है तो कम से कम उन्हें उनके संसार के ऊपर यह ठोस छत तो दिखाई देनी चाहिए? मैंने ऐसी कोई छत नहीं देखि | मुझे उनका आसमान भी अपने आसमान की तरह खुला दिखा | ऐसा क्यों?”



उर्मी को तुरंत कोई उत्तर नहीं सूझा | हनुमान जी ने उर्वा की ओर देखा | उसने बाबा मातंग की ओर देखकर अपना सिर नीचे कर लिया | हनुमान जी बोले - “उर्वा , अगर पूजा के घंटे के दौरान आप बोलोगे तो बाबा आपको नहीं डांटेंगे | बोलो !”



“प्रभु , मैं सोचता हूँ कि पाताल के जीवों के लिए हम और हमारा संसार अदृश्य हैं |” उर्वा ने खड़ा होकर धीमी आवाज में कहा - “मछली को पानी एक अदृश्य गैस जैसा लगता है उसी प्रकार पाताल के जीवो को हमारी ठोस चीजें अदृश्य गैस की भांति लगती हैं | इसलिए उन्हें अपने संसार के ऊपर कोई छत दिखाई नहीं देती |”



हनुमान जी सहमत दिखाई दिए | वे बोले - “हाँ , लेकिन वे किसी तरह हमारे संसार के बारे में जानते जरूर हैं | वे सोचते हैं कि उनके संसार के ऊपर एक मोटी अदृश्य परत है जिसमे जीव रहते हैं | अतः मानवलोक उनके लिए एक मोटी अदृश्य परत मात्र है | क्या तुम्हे पता है कि अहि और महि ने भगवान् राम और लक्ष्मण का हरण क्यों किया था?”



“क्योंकि रावण महि की देह में प्रवेश किया करता था , उसने अहि को भगवान् राम का हरण करने के लिए उकसाया |” उर्वा ने तुरंत उत्तर दिया |



“वो तो ठीक है लेकिन क्या तुम्हे मालुम है कि रावण ने पाताल के जीवों को भगवान् राम का हरण करने के लिए कैसे उकसाया?” हनुमान जी ने बताया , “महि की देह के माध्यम से उसने पाताल वालो को झूठी कहानी बताकर उन्हें विश्वास दिलाया कि मानवलोक के pप्राणी पाताललोक पर आक्रमण करने वाले हैं | उसने उनको विश्वास दिलाया कि राम और लक्ष्मण उस सेना का नेतृत्व कर रहे हैं जो पाताल पर आक्रमण करने की योजना बना रही है |”



“भगवान् राम और लक्षमण की (परम) आत्माओं का हरण करके उन्होंने उनको पाताल लोक की दो देहों में बंद कर दिया | उन्होंने एक दृष्टा को बुलाया जो आत्माओं से बात करने में कुशल था | अहि ने दृष्टा को कहा - “हे दृष्टा, हमने इन दो आत्माओं का हरण मानवलोक से किया है | गुप्त सूचना के अनुसार ये दो आत्माएं एक सेना का नेतृत्व कर रही हैं जो पाताल लोक पर आक्रमण करने वाली है | इन आत्माओं से पूछताछ करके इनकी योजना का पता लगाइए |”



“द्रष्टा ने प्रभु राम और लक्ष्मण की आत्माओं में झांककर पूछा - “हे आत्मा, तुम कौन हो |”



““मैं नल हूँ |” प्रभु राम ने उत्तर दिया |



“रावण जो वहां महि की देह में उपस्थित था , तुरंत बोला - “नहीं , वह नल नहीं है | वह राम है | वह झूठ बोल रहा है |”



““द्रष्टा ने कहा - “हे महि , मुझे इतना तो अनुभव है कि आत्मा झूठ बोल रही है या सच इसका पता कर सकूँ | यह आत्मा सत्य बोल रही है | उसका नाम नल है , राम नहीं |”

“महि (रावण) ने क्रोध में कहा , “हे द्रष्टा , आपसे भूल हुई है | वह राम है |”



[सेतू टिप्पणी : उपरोक्त पंक्ति में “महि(रावण)” का अर्थ है महि की देह + रावण की आत्मा | इसको “महिरावण” न पढ़ें | उस पाताल जीव का नाम “महि” था “महिरावण” नहीं |]



“द्रष्टा ने महि(रावण) की आँखों में देखा और बोले - “यह आत्मा तो नल है लेकिन अब मुझे संदेह हो रहा है कि तुम सच में महि की आत्मा हो या .... | मैं यह विश्वास क्यों न करूँ कि महि की देह में कोई बुरी आत्मा घुस गई है और मेरे ज्ञान पर संदेह कर रही है |”



“रावण जो वहाँ महि की देह में था, भयभीत हो गया | वह तुरंत क्रोध दिखाकर कक्ष से निकल गया | अहि के बीच में बोलने से महि द्रष्टा की नजरो से थोडा सा बच गया | अहि बोला - “हे द्रष्टा , इनका क्या नाम है उससे हमें कुछ लेना देना नहीं है | इनकी योजना का भेद लगाइए | पता लगाइए कि इस समय इनकी सेना कहाँ है |”



“इस समय?” द्रष्टा ने पूछा - “हमारा “इस समय” या इनका “इस समय”| ... क्योंकि इनका समय और हमारा समय सामूहिक नहीं है |



“अहि द्रष्टा के शब्दों में उलझ सा गया | बोला - “हे द्रष्टा , पाताललोक में आप ही तो मानवलोक मामलों के मंत्री हैं | मुझे बताया गया है कि आपके विभाग ने मानवलोक के बारे में काफी ज्ञान हासिल किया है | मैंने यह भी सुना है कि आपने ऐसे हथियार बनाए हैं जिनसे मानवलोक को काफी हद तक प्रभावित किया जा सकता है |”



““द्रष्टा ने उत्तर दिया - “मानवलोक हमारे लिए पूर्णतः अदृश्य है | लेकिन आत्मा वाचन के जरिये हमने उस लोक के बारे में काफी अध्ययन किया है | हमने पाया है कि हमारे संसार से इनके संसार का भूतकाल दिखाई देता है , वर्तमान नहीं | हम इनका भूतकाल प्रभावित कर सकते हैं , वर्तमान नहीं | उदाहरण के तौर पर , ये दो आत्माएं जो इस कक्ष में उपस्थित हैं , हम इनके भूतकाल से वार्तालाप कर सकते हैं , वर्तमान से नहीं |”



“अहि बोला - “हे द्रष्टा , मेरे पास आपकी विद्या को समझने का धैर्य नहीं है | कृपा अपनी विद्या के अनुसार इनसे वार्तालाप कीजिये और इनकी सेना को रोकने का कोई उपाय निकालिए |”



“द्रष्टा ने भगवान् राम की (परम) आत्मा में झाँका और पूछा - “हे आत्मा , तुम कौन हो |”



““मैं नल हूँ , विश्वकर्मा का एक रूप | मैं अपने आपको समुद्र के बीचों बीच नींव खोदते हुए देख रहा हूँ | मैं स्वयं को समुद्र का सीना चीरते हुए देख सकता हूँ | हां मैं यह कर सकता हूँ | हाँ , मैं यह अवश्य करूँगा |”  उत्तर मिला |





“कुछ पल बाद भगवान् राम ने द्रष्टा की आँखों में देखा और जोर से बोले - “अग्नि के गोले !” द्रष्टा घबरा गया | वह भगवान् राम से तुरंत दूर हो गया | अहि ने पूछा - “क्या हुआ द्रष्टा? क्या आपको कुछ अप्रिय दिखा?”





“अररर .. न ... नहीं ... कुछ अप्रिये नहीं ... उसे पता चल गया कि मैं उसकी आत्मा में झाँक रहा हूँ |” द्रष्टा ने भयपूर्ण आवाज में उत्तर दिया |



[सेतु का वर्णन : पाताल लोक का द्रष्टा, मानवलोक के नल को उस मगरमच्छ की आँखों से देख रहा था | यहाँ पर काल के भ्रम पर गौर फरमाइए : जब भगवान् राम और लक्षमण का हरण करके पाताल ले जाया गया था तब लंका युद्ध चल रहा था . लेकिन पाताल के लोगों का संपर्क हमारे वर्तमान से नहीं बल्कि भूतकाल से है | इसलिए उस द्रष्टा को दिखाई दे रहा था कि वानरों की सेना ने अभी समुद्र भी पार नहीं किया था और नल समुद्र में सर्वेक्षण कर रहा था |]

 “द्रष्टा को जो कुछ भी दिखा उसके अनुसार उसने मत रखा - “हे अहि ! यह नल उस सेना का प्रमुख मालुम हो रहा है जो हम पर आक्रमण करने वाली है | मैंने सुना कि वह कुछ चीरने की बात कर रहा था | जैसा कि आप जानते हैं , मानवलोक एक अदृश्य मोटी परत है | शायद वे उस परत को चीरकर हम पर आक्रमण करने की बात कर रहे थे | मैंने उस आत्मा की गतिशीलता का पता लगाया है | मैं मानवलोक के मानचित्र पर वह रेखा बना सकता हूँ जहाँ से ये लोग चीरकर हम पर आक्रमण करने वाले हैं | हम उस रेखा के एक छोर से दुसरे छोर तक संबलन लगाकर वहां से मानवलोक की परत को मजबूत कर सकते हैं ताकि वे उसे चीर न सकें |”



“उत्तम!” अहि ने द्रष्टा को बधाई दी और आदेश दिया - “हे द्रष्टा , मानचित्र अभी बनाओ | हम मानवलोक की उस रेखा के पास संबलन भेजने की तैयारी करते हैं |”



“हे मातांगो , पातालवासियों ने जो संबलन मानवलोक की ओर भेजा उसके फलस्वरूप समुद्र में एक छोर से दुसरे छोर तक एक टीला बन गया | तो यह है उस टीले का रहस्य |”



यजमान चरिता की आत्मा अब “हल्की” महसूस कर रही थी | अब वह अर्पणं के योग्य थी | बाबा मातंग अर्पण की प्रक्रिया शुरू करने के लिए खड़े हुए थे कि हनुमान जी ने उर्वा की ओर देखा | वह कुछ पूछना चाहता था | हनुमान जी बोले - “उर्वा , अपना प्रश्न पूछने में भय अथवा संकोच न करो | खड़े हो जाओ और पूछो |”



उर्वा ने खड़े होकर पूछा - “हे प्रभु , मैं सोच रहा था ... भगवान् राम का हरण करके उनको पाताल ले जाया गया था | तो फिर उन्होंने पाताल के द्रष्टा के सामने अपना परिचय “नल” कहकर क्यों दिया? क्या वह असत्य नहीं था ? मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम असत्य कैसे कह सकते हैं? अगर मैंने कुछ अनुचित पूछा हो तो क्षमा करें |”



हनुमान जी ने मुस्कराकर उत्तर दिया - “वहां पर भगवान् राम नहीं बल्कि उनकी (परम) आत्मा थी | उनकी आत्मा परम है | बाकी सभी आत्माएं उनकी आत्मा का उपसमुच्चय हैं | परम आत्मा अपने आपको किसी भी रूप में प्रकट कर सकते हैं | पाताल में उन्होंने अपने आपको नल के रूप में प्रकट किया | अब जबकि मैंने टीले का रहस्य बता दिया है , तुम्हे पता चल गया होगा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया?”





उर्वा का मन अब संतुष्ट था | इससे होतर उर्मी में भी प्रश्न पूछने का साहस आ गया | उसने कहा - “हे प्रभु , पाताल के उस द्रष्टा का हमारे लोक के बारे में ज्ञान बहुत ही निम्न था | वह यह भी पता नहीं लगा सका कि मानवलोक से पाताल की ओर कोई हमला नहीं होने वाला था |”



हनुमान जी ने अपना हाथ आसमान की ओर उठाते हुए कहा - “हमारे लोक के ऊपर भी एक अदृश्य लोक है | तुम उस लोक के बारे में कितना जानती हो?”



सभा से अब कोई और प्रश्न नहीं आया | बाबा मातंग वेदी की ओर बढे जहाँ यजमान चरिता द्वारा लाई गई फलों की टोकरी रखी थी , और उन्होंने अर्पण की प्रक्रिया शुरू कर दी|



सेतु के संतो की विशेष टिपण्णी : अगर हम हनुमान जी की लीलाओं के इन अध्यायों की प्राचीन हिन्दू ग्रंथो से तुलना करें तो एक बात साफ़ हो जाती है : प्राचीन ग्रन्थ -- चाहे वो रामायण हो , महाभारत हो , वेद हों या उपनिषद् - जिस रूप में वे हमें आज उपलब्ध हैं वे वास्तविक रूप में नहीं हैं | उन्हें बहुत बार गलत अर्थ में तोडा मरोड़ा गया है | उदाहरण के तौर पर, मनातीत ज्ञान जिसे समझना बहुत मुश्किल है उसे आसान परिकल्पनाओ जैसे ‘वरदान’, ‘श्राप’ आदि से बदल दिया गया है | सदियों की अज्ञानता के बाद अब मानवता को हनुमान जी की कृपा से यह मनातीत ज्ञान वास्तविक रूप में प्राप्त हो रहा है | हमारी पीढ़ी वास्तव में बहुत भाग्यशाली है |

वर्णन एडिट 1 :  जैसी कि अपेक्षा थी , कुछ भक्त समय का भ्रम समझ नहीं पा रहे हैं | वे सब एक ही गलती कर रहे हैं : वे पाताल और भूलोक को साथ साथ रखकर उनकी सेब और संतरे की तरह तुलना कर रहे हैं | देखिये, सबसे पहले तो आपको यह तय करना पड़ेगा कि आप किसी संसार को देखने या समझने के लिए कहाँ खड़े होना चाहते हैं | आप स्वतंत्र नहीं हैं | आप या तो पाताल में हैं या भूलोक में | हम पाताल का उपरी संसार यानी व्याहृति हैं , इसलिए जब भूलोक में खड़े होकर आप पाताल को देखेंगे तो आपको पाताल का भविष्य दिखाई देगा | अगर पाताल से खड़े होकर भूलोक को देखेंगे तो आपको भूलोक का भूतकाल दिखाई देगा |


मान लीजिय कि आपके पास एक मशीन है जिससे आप पाताल को देख सकते हैं | कल्पना कीजिये कि आप समुद्र के किनारे पर हैं जब नल समुद्र का पर्यवेक्षण करने गया हुआ है | आप अपनी मशीन के जरिये पाताल में झांकेंगे तो आपको क्या दिखाई देगा ? आपको दिखाई देगा कि राम और लक्षमण की आत्माएं वहां पर हैं और द्रष्टा उनसे पुछताछ कर रहा है |

अब मान लीजिये कि आप पाताल में हैं और अपनी मशीन के जरिये भूलोक को देख रहे हैं | कल्पना कीजिये कि आप उसी कक्ष में हैं जहाँ द्रष्टा भगवान् राम और लक्ष्मण की आत्माओं से पूछताछ कर रहा है | अगर आप वहां से अपनी मशीन के जरिये भूलोक को देखेंगे तो आपको क्या दिखेगा ? आपको दिखेगा कि नल समुद्र का पर्यवेक्षण कर रहा है |

पहले आपको निर्णय लेने पड़ेगा कि आपका निरिक्षण बिंदु क्या है? अगर आप अपने लिए ऐसा निरिक्षण बिंदु चुनते हैं जो न पाताल में हैं न भूलोक में , तो वह कोई तीसरा संसार है | आपको उस तीसरे संसार का भूलोक तथा पाताल के साथ काल-सम्बन्ध जानना पड़ेगा और फिर इस सम्बन्ध के अनुसार पाताल और भूलोक को देखना पड़ेगा |

हनुमान जी की लीलाओं का यह अध्याय यही समाप्त होता है |

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

अध्याय 8 मकरध्वज नहीं थे उनके पुत्र। चिरंजिवी हनुमान जी ने खोला रहस्य

प्रतिषेधात्मक टिपण्णी: यह अध्याय मातंगो की ‘लॉग बुक’ के निषेधित भाग से लिया गया है | इस अध्याय को पढना मना है अगर आपने पहले 7 अध्याय अच्छे से नहीं समझे हैं |

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जब 6 ब्राह्मण अर्पण के फलों का वितरण करके हनुमंडल में वापिस आ गए , हनुमान जी ने यजमान बसंत से कहा - “हे यजमान , जिस श्रद्धा भाव से आपने इस अर्पण के रूप में अपने कर्मों को समर्पित किया है उससे मैं प्रसन्न हूँ | बोलो प्रसाद के रूप में क्या पाने की इच्छा रखते हो ?”

यजमान बसंत खड़े हुए | एकबारगी तो वे हनुमान जी से अपने खोये हुए रत्न मांगने को हुए किन्तु तुरंत ही मन बदला | हाथ जोड़कर बोले - “हे प्रभु, परम ज्ञान ही वह प्रसाद है जिसकी हम मातंग इच्छा रखते हैं | मुझे भी उसी ज्ञान की इच्छा है जो मोक्ष की ओर ले जाता है |

हनुमान जी मुस्कुराए | यह स्पष्ट नहीं था कि वे यजमान बसंत की रत्नों की अव्यक्त इच्छा पर मुस्कुराये या ज्ञान की व्यक्त इच्छा पर | वे बोले - “अपने स्थान पर बैठ जाओ यजमान |” जब बसंत बैठ गया हनुमान जी हनुमंडल में उपस्थित सभी मातंगो को संबोधित करते हुए बोले - “मै आपको रामायण की वह कड़ी बतलाता हूँ जो केवल भाग्यवान मानव समझ सकते हैं | मैं आपको रामायण की पाताल कड़ी बतलाता हूँ |”

हनुमंडल में सभी प्रभु की ओर उत्सुकता से देख रहे थे | होतर उर्वा की उत्सुकता का कोई ठिकाना नहीं था | वह खड़ा हुआ और बोला - “हे प्रभु , मै पाताल कड़ी को हमेशा से समझना चाहता था लेकिन बाबा मातंग यह कहकर बताने से इनकार कर देते थे कि यह निषेध है | हे प्रभु , इस कड़ी में ऐसा क्या है कि यह निषेधित है ?”

इससे पहले कि हनुमान जी उर्वा को कोई उत्तर देते , बाबा मातंग खड़े हुए , हनुमान जी के सामने सिर झुकाया (आज्ञा लेने हेतु) , फिर उर्वा की ओर मुड़कर बोले - “हे होतर, जो इस कड़ी को अच्छे से जानते हैं वे बहुत कम हैं , और जो इस कड़ी को सही से बता सकते हैं वे केवल चिरंजीवी हनुमान हैं | हम वरिष्ट मातंग जिन्होंने 41 साल पहले यह कड़ी प्रभु से सुनी थे , इस कड़ी को बताने के योग्य नहीं हैं | इसलिए इस कड़ी को हमेशा ‘चरणपूजा बही’ के निषेधित हिस्से में रखा जाता है |”

हनुमान जी ने बाबा मातंग के कथन को संशोधित किया - “बाबा मातंग , मैं उस कड़ी का भाग था इसलिए मै इस कड़ी का सही विवरण करने में समर्थ हूँ , लेकिन यह सत्य नहीं है कि ऐसा केवल मै कर सकता हूँ | ऐसी कई महान आत्माएं हैं जिन्होंने काल पर विजय पाई है -- उदाहरण के तौर पर महर्षि व्यास | उनकी आत्मा अब भी इस मानव लोक में है और वे जब चाहे देह धारण कर सकते हैं | वे भूतकाल में जाकर रामायण , महाभारत ; तथा अन्य कालों की घटनाओं को ऐसे देख सकते हैं मानो वे अब भी घटित हो रही हों | वे इतिहास के किसी भी काल का सही विवरण दे सकते हैं |

बाबा मातंग अपना कथन हनुमान जी के शब्दों के प्रकाश में संशोधित करते हुए बोले - “मैं क्षमा चाहता हूँ , प्रभु | मैं कहना चाहता था कि केवल वे महान आत्माएं जिन्होंने काल पर विजय पाई है , पाताल कड़ी का सही विवरण कर सकते हैं | अन्य आत्माओं के लिए इसका विवरण करना निषेध है |”

 हनुमान जी अब बाबा मातंग से सहमत दिखाई दिए | बाबा और उर्वा अपने अपने स्थान पर बैठ गए और हनुमान जी पाताल कड़ी सुनाने लगे | उन्होंने बताया - “असुर , जो इस संसार में बुराई के लिए जिम्मेदार हैं , वे स्वभाव से एक बिखरी हुई सेना की तरह हैं : इस बिखरी अवस्था में वे एक दुसरे को ख़त्म कर सकते हैं जिससे कि संसार पर उनका कुल बुरा असर शून्य हो सकता है | लेकिन कोई है जो इनको संगठित करके संसार में बुराई फ़ैलाने में इनका नेतृत्व करता है | उसका नाम है शुक्राचार्य | वह इन असुरो का कप्तान है | वह संसार में व्यवस्थित रूप से बुराई फ़ैलाने के लिए असुरो का प्रयोग करता है | इसलिए वह भगवान् विष्णु का शत्रु है | शुक्र के द्वारा असुरो के हाथों करवाई गई इस व्यवस्थित बुराई को ख़त्म करने के लिए भगवान् विष्णु अवतार लेते हैं |

“जब भगवान् विष्णु ने श्री राम के रूप में अवतार लिया तब शुक्र ने रावण को श्री राम के विरुद्ध प्रयुक्त किया | रावण बहुत बुद्धिमान और तेजबुद्धि था | शुक्र ने असुरो केप्रयुक्त किये जा रहे थे | द्रोण जैसे योद्धाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ | शुक्र ने असुरो की सारी शक्ति इन योद्धाओं के साथ लगा दी थी |

“रावण , भीष्म आदि का जो हश्र हुआ उसके लिए वे स्वयं जिम्मेदार थे क्योंकि उन्होंने अपने तन-मन-विवेक पर असुरों का कब्ज़ा होने दिया |

“शुक्र की अब तक की सबसे गूढ़ योजना अभी भगवान् विष्णु के आने वाले अवतार कल्कि को अपने जाल में फंसाने के लिए बुनी गई है | भगवान् विष्णु के लिए सबसे बड़ी चुनौती है एक ऐसी औरत को खोजना जो असुरो के प्रभाव से पूर्णतः मुक्त हो; एक औरत जो भगवान् कल्कि को 9 महीने अपने पेट में रख सके बिना असुरों से प्रभावित हुए | कलियुग के इस चरम पर एक भी ऐसा मनुष्य नहीं है जो असुरों के प्रभाव से मुक्त हो | इसलिए भगवान् कल्कि का जन्म लेना ही महाभारत युद्ध से भी बड़ी कवायद होने वाली है |

“रावण शुक्र की दृष्टि में तब आया जब उसने अपनी अद्भुत समझने की शक्ति और बोधिक क्षमता का परिचय दिया | जब रावण लंका का राजा बना तो उसने आस पास के राज्यों को जीतकर अपना राज्य शक्तिशाली बनाने की सोची | जिस दिन रावण अपनी सेना के साथ एक राज्य जीतने के लिए कूच करने वाला था , उससे पिछली शाम को शुक्र उससे मिला और पुछा , “दशानन , तुम्हारे आकलन से तुम कितने दिन में इस राज्य को जीत लोगे? - राजा अर्क के राज्य को ?”
रावण ने विनम्रता से उत्तर दिया - “आचार्य , राजा अर्क ने बहुत शक्तिशाली किला बना रखा है वो भी बहुत घने जंगल में | जंगल के सभी पशु पक्षी राजा अर्क के वफादार हैं | अतः मुझे अर्क की सेना से ही नहीं अपितु जंगल के खतरनाक पशुओं और जंगल के अन्य खतरों से भी लड़ना पड़ेगा | मुझे चुनौती का भान है | मै यह डींग तो नहीं हांकना चाहूँगा कि मै कितने दिन में वह राज्य जीत लूँगा , लेकिन इतना जरूर कहना चाहूँगा कि मै वह राज्य संसार के किसी अन्य योद्धा से तेज ही जीतूँगा |”

““मेरा उद्देश्य तुम्हारे हौसले को तोडना नहीं है दशानन | लेकिन एकबारगी सोचो : इस संसार में हज़ारों राज्य हैं | सीधे युद्ध से तुम अपने जीवन में ऐसे कितने राज्यों को जीत सकते हो ? हर युद्ध के बाद सेना को जान - माल का नुक्सान होता है जिससे उबरने में महीनों बीत जाते हैं |” ये शब्द बोलते हुए शुक्र की आँखें रावण के चेहरे पर आ रही pप्रतिक्रिया को पढ़ रही थी | थोडा रूककर शुक्र बोले - “हे दशानन , कौशल्य में तुम्हारा तन 100 मानवों के तन के बराबर है | ज्ञान में तुम्हारा मस्तिष्क 10 मनुष्यों के मस्तिष्कों के बराबर है | तुम्हारे तन -मन की इन असाधारण योग्यताओं के बावजूद तुम अंततः एक मनुष्य हो | इस पूरे संसार की तुलना में तुम मात्र एक छोटा सा कण हो | अगर पूरे संसार को जीतना है तो तुम्हे अपने मानव तन - मन की सीमाओं से आगे जाना होगा |”

“रावण ने अपने विचारों को सुनियोजित करने में एक पल लिया और बोला - “आचार्य , शक्ति में मैं केवल एक मानव नहीं हूँ | मेरी सेना के हज़ारों सैनिक मेरे लिए मरने के लिए तैयार हैं | उनके तन-मन भी मेरे तन-मन ही हैं|”

“शुक्र बोले - “कल्पना करो कि तुम्हारी मनुष्य की नहीं बल्कि सर्प की देह होती | तुम राजा अर्क के पास बिना किसी रुकावट के पहुँच जाते ; सेना की सहायता के बिना|”

““लेकिन ऐसी कल्पना करने का क्या प्रयोजन जो संभव ही नहीं है | मैं सर्प की देह कैसे प्राप्त कर सकता हूँ ? मैं मनुष्य हूँ |” रावण शुक्र के शब्दों पर गहराई से विचार करते हुए बोला |द्वारा रावण की देह - मन- विवेक - संस्कार सबको अपने वश में कर लिया | उसके बाद उसने असुरो की सारी ताकत को रावण के साथ लगाकर रावण को भगवान् श्री राम जी के विरुद्ध खड़ा कर दिया |



“जब भगवान् विष्णु कृष्ण के रूप में आये तब शुक्र ने महाबली भीष्म तथा अन्य योद्धाओ को श्री कृष्ण के विरुद्ध लाकर खड़ा कर दिया | भीष्म बहुत ही शक्तिशाली थे और उनके अनुसार वे धर्म के अनुसार जीते थे | उनको तनिक भी भान नहीं था कि उनके विवेक पर असुरों ने कुछ इस तरह कब्ज़ा कर लिया था कि उनके अपने सत्यता के सिद्धांत शुक्र के षड़यंत्र के लिए
प्रयुक्त किये जा रहे थे | द्रोण जैसे योद्धाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ | शुक्र ने असुरो की सारी शक्ति इन योद्धाओं के साथ लगा दी थी |





“रावण , भीष्म आदि का जो हश्र हुआ उसके लिए वे स्वयं जिम्मेदार थे क्योंकि उन्होंने अपने तन-मन-विवेक पर असुरों का कब्ज़ा होने दिया |





“शुक्र की अब तक की सबसे गूढ़ योजना अभी भगवान् विष्णु के आने वाले अवतार कल्कि को अपने जाल में फंसाने के लिए बुनी गई है | भगवान् विष्णु के लिए सबसे बड़ी चुनौती है एक ऐसी औरत को खोजना जो असुरो के प्रभाव से पूर्णतः मुक्त हो; एक औरत जो भगवान् कल्कि को 9 महीने अपने पेट में रख सके बिना असुरों से प्रभावित हुए | कलियुग के इस चरम पर एक भी ऐसा मनुष्य नहीं है जो असुरों के प्रभाव से मुक्त हो | इसलिए भगवान् कल्कि का जन्म लेना ही महाभारत युद्ध से भी बड़ी कवायद होने वाली है |





“रावण शुक्र की दृष्टि में तब आया जब उसने अपनी अद्भुत समझने की शक्ति और बोधिक क्षमता का परिचय दिया | जब रावण लंका का राजा बना तो उसने आस पास के राज्यों को जीतकर अपना राज्य शक्तिशाली बनाने की सोची | जिस दिन रावण अपनी सेना के साथ एक राज्य जीतने के लिए कूच करने वाला था , उससे पिछली शाम को शुक्र उससे मिला और पुछा , “दशानन , तुम्हारे आकलन से तुम कितने दिन में इस राज्य को जीत लोगे? - राजा अर्क के राज्य को ?”



रावण ने विनम्रता से उत्तर दिया - “आचार्य , राजा अर्क ने बहुत शक्तिशाली किला बना रखा है वो भी बहुत घने जंगल में | जंगल के सभी पशु पक्षी राजा अर्क के वफादार हैं | अतः मुझे अर्क की सेना से ही नहीं अपितु जंगल के खतरनाक पशुओं और जंगल के अन्य खतरों से भी लड़ना पड़ेगा | मुझे चुनौती का भान है | मै यह डींग तो नहीं हांकना चाहूँगा कि मै कितने दिन में वह राज्य जीत लूँगा , लेकिन इतना जरूर कहना चाहूँगा कि मै वह राज्य संसार के किसी अन्य योद्धा से तेज ही जीतूँगा |”





““मेरा उद्देश्य तुम्हारे हौसले को तोडना नहीं है दशानन | लेकिन एकबारगी सोचो : इस संसार में हज़ारों राज्य हैं | सीधे युद्ध से तुम अपने जीवन में ऐसे कितने राज्यों को जीत सकते हो ? हर युद्ध के बाद सेना को जान - माल का नुक्सान होता है जिससे उबरने में महीनों बीत जाते हैं |” ये शब्द बोलते हुए शुक्र की आँखें रावण के चेहरे पर आ रही प्रतिक्रिया को पढ़ रही थी | थोडा रूककर शुक्र बोले - “हे दशानन , कौशल्य में तुम्हारा तन 100 मानवों के तन के बराबर है | ज्ञान में तुम्हारा मस्तिष्क 10 मनुष्यों के मस्तिष्कों के बराबर है | तुम्हारे तन -मन की इन असाधारण योग्यताओं के बावजूद तुम अंततः एक मनुष्य हो | इस पूरे संसार की तुलना में तुम मात्र एक छोटा सा कण हो | अगर पूरे संसार को जीतना है तो तुम्हे अपने मानव तन - मन की सीमाओं से आगे जाना होगा |”

रावण ने अपने विचारों को सुनियोजित करने में एक पल लिया और बोला - “आचार्य , शक्ति में मैं केवल एक मानव नहीं हूँ | मेरी सेना के हज़ारों सैनिक मेरे लिए मरने के लिए तैयार हैं | उनके तन-मन भी मेरे तन-मन ही हैं|”



“शुक्र बोले - “कल्पना करो कि तुम्हारी मनुष्य की नहीं बल्कि सर्प की देह होती | तुम राजा अर्क के पास बिना किसी रुकावट के पहुँच जाते ; सेना की सहायता के बिना|”





““लेकिन ऐसी कल्पना करने का क्या प्रयोजन जो संभव ही नहीं है | मैं सर्प की देह कैसे प्राप्त कर सकता हूँ ? मैं मनुष्य हूँ |” रावण शुक्र के शब्दों पर गहराई से विचार करते हुए बोला |





“शुक्र बोला - “तुम मनुष्य नहीं हो दशानन | तुम एक आत्मा हो जिसने मनुष्य की देह धारण कर रखी है | अगर तुम चाहो तो इस देह को छोड़कर दूसरी देह पहन सकते हो | तुम राजा अर्क को मारने के लिए कुछ समय के लिए सर्प बन सकते हो | फिर तुम वापिस मनुष्य की देह में आ सकते हो |”





रावण बोला - “आचार्य मुझे पता है कि मै एक आत्मा हूँ | जिस तरह देह काल-स्थान के निर्देशांकों में विचरण करती है , आत्मा कर्म-इच्छा के निर्देशांकों में विचरण करती है | मेरी इच्छा और कर्म के निर्देशांक कुछ इस तरह हैं कि इस समय मैंने मनुष्य की देह धारण कर रखी है | मेरी सर्प की देह कैसे हो सकती है?”



““तुम्हारे कहने का अर्थ है कि ... इस जीवन में तुम्हारी सदा मानव देह ही रही है ... तुम्हारे जन्म से लेकर अब तक ... तुमने कोई दूसरी देह धारण नहीं की है ... इस जीवन में ?” शुक्र ने पुछा |



“”अररर ... नहीं .... हाँ .... मेरा मतलब है हैं , मेरी आत्मा ने इस जीवन में हमेशा मानव देह ही धारण रखी है |” रावण ने हिचकिचाते हुए जवाब दिया |





“शुक्र ने पैनी दृष्टि से रावण को देखा और बोले - “तुम्हारा ऐसा कहना ये कहने के सामान है कि तुम्हारी देह हमेशा जमीन पर रही है | मत भूलो कि जब हम जमीन पर चलते हैं तब भी हमारा एक पैर हवा में रहता है |उसी तरह यह भी संभव है कि तुम्हारी आत्मा इस जीवन में मानव देह के अलावा अन्य देह भी धारण करती हो |”





 “रावण ने उत्तर दिया - “आचार्य , जहाँ तक मेरी स्मृति है , मैंने हमेशा मानव देह ही धारण किये रखी है |”





““क्या तुम अपनी स्मृति पर अपनी आत्मा से अधिक विश्वास करते हो ?”



“रावण के पास इसका कोई उत्तर नहीं था | कुछ क्षण के विराम के पश्चात् शुक्र ने वर्णन किया - “हे दशानन , स्मृति केवल तुम्हारे तन-मन का एक गुण है | इस समय तुम्हारी देह कौन सी है यह तुम्हारे कर्म और इच्छा के निर्देशांको पर निर्भर है | इसलिए तुम्हारी इस समय जो स्मृति है वह भी तुम्हारे इस समय के कर्म और इच्छा के निर्देशांको पर निर्भर है | जब तुम नींद में जाते हो तब तुम्हारी आत्मा स्वपन लोक में जाकर विभिन्न प्रकार की देह धारण करती है | तुम्हारी आत्मा स्वपन लोक की सभी स्मृतियाँ इस देह में नहीं ला सकती | तुम्हारी आत्मा केवल वो स्मृतियाँ यहाँ लाती है जिसकी अनुमति तुम्हारे कर्म और इच्छा के निर्देशांक देते हैं |”





रावण आत्मा के ज्ञान का मर्म तुरंत समझ गया | शुक्र के चरणों में घुटनों के बल बैठकर बोला - “आचार्य , मै अपनी स्मृति से अधिक अपनी आत्मा पर भरोसा करता हूँ और अपनी आत्मा से भी ज्यादा भरोसा मैं आपकी दी हुई शिक्षा पर करता हूँ | कृपा मुझे शिक्षा दीजिये कि देह कैसे बदली जा सकती है |”





“शुक्र ने पूछा - “तुम्हारी अर्क के राज्य में कैसे जाने की योजना है? क्या तुम्हे रास्ता मालुम है?”



“रावण ने उत्तर दिया - “हाँ आचार्य , मेरे सेनापतियों ने सर्वेक्षण किया है और अर्क के राज्य में पहुँचने का सबसे उत्तम रास्ता पता किया है |”

““जिस तरह अर्क तक पहुँचने के लिए तुम अपने सेनापतियों पर निर्भर हो , वैसे ही तुम्हे अपनी देह बदलने के लिए असुरों पर निर्भर होना पड़ेगा | असुरों को पता है कि किस देह को धारण करने के लिए कौन से कर्म-इच्छा निर्देशांक आवश्यक हैं | चिंता मत करो | मैं असुरों का गुरु हूँ | वे वही करेंगे जो मैं उनसे करवाना चाहता हूँ |” शुक्र ने वर्णन किया |





““आचार्य, मैं स्वयं को आपको समर्पित करता हूँ | कृपा आदेश दें कि मुझे राजा अर्क का राज्य जीतने के लिए क्या करना चाहिए | अर्क का एक मंत्री अर्क के विरूद्ध है | वह अन्दर से हमारी सेना की सहायता करेगा | अर्क को मारने के बाद मैं उस मंत्री को वहां का शासक बना दूंगा | वह मेरे अधीन रहकर वहां का शासन करेगा|”



““तुम्हारी सेना अर्क के राज्य में नहीं जायेगी , दशानन| तुम अकेले वहां जाओगे वह भी सर्प के रूप में और रात में ही अर्क की हत्या कर दोगे| अर्क के उस विद्रोही मंत्री को सन्देश भेज दो कि अर्क जैसे चूहे को मारने के लिए तुम्हे सेना की जरूरत नहीं है | वह चूहा आज रात ही मारा जायेगा | उसे कहो कि वह राज्य का नियंत्रण अपने हाथ में लेने के लिए तैयार रहे |”





“रावण ने अर्क के राज्य पर सेना के हमले का विचार त्याग दिया | उसने अर्क के विद्रोही मंत्री को बाज के माध्यम से तुरंत सन्देश भेजा जैसा कि शुक्र ने कहा था |





“उस रात रावण आत्मा, देह तथा असुरों आदि के बारे में गहराई से विचार करते हुए नींद में चला गया | उसे उस रात विचित्र स्वपन दिखाई दिए | उसे दिखाई दिया कि राजा अर्क देवताओं से विशेष शक्तियां प्राप्त करने के लिए यज्ञ कर रहा था | अर्क ने सफलतापूर्वक यज्ञ पूर्ण किया और क्षेत्र का सबसे शक्तिशाली राजा बन गया | रावण ने अर्क का शासन स्वीकार कर लिया और उसके अधीन शासन करने लगा | इस भयानक स्वपन से उसकी नींद खुल गई | भय से उसके पसीने छूट रहे थे | उसने पानी पीया और वापिस नींद में चला गया | स्वपन फिर से शुरू हो गया और उसने अपने आपको अर्क के राज्य में रेंगते हुए देखा | उसने देखा कि उसने अर्क के महल में किसी की गर्दन पर आक्रमण करके उसकी हत्या कर दी है|”





“यह विचित्र स्वप्न पूरे रात चलता रहा| सुबह जब वह उठा तो उसने अपनी खिड़की पर अपने बाज को पाया जो अर्क के मंत्री का संदेश लाया था | सन्देश था - “... हे राजाओं के राजा ! हे मेरे प्रभु ! आप मृत्यु के देवता से भी शक्तिशाली हैं | आपने अर्क को सच में चूहे की मृत्यु दी | कोबरा नाग ने कल रात उसे मार दिया | मैं अपनी आँखों से आपकी जादुई शक्तियां देखकर स्वयं को भाग्यशाली समझता हूँ | आप राजाओं के राजा हैं | मैं आपका शासन स्वीकार करता हूँ | मैंने अर्क के राज्य को अपने नियंत्रण में ले लिया है | मैं आपके शासन के नीचे अर्क राज्य पर शासन करूँगा ... अगर आप आज्ञा दें तो ...”





“रावण को बाद में पता चला कि उस रात अर्क के राज्य में क्या घटनाएँ घटित हुई | एक कोबरा नाग का जोड़ा अर्क के राज्य में रहता था | वे नागो के राजा थे और राजा अर्क के प्रति उनकी निष्ठा थी | देर रात मादा कोबरा को जाग आई और उसने नर कोबरा से कहा - “मैंने सुना है कि राजा अर्क देवताओं से विशेष शक्तियां प्राप्त करने के लिए यज्ञ करने की तैयारी कर रहे हैं | उस यज्ञ में वह हमारे राज्य के सभी नागों की बलि देने वाला है |”





“नर कोबरा को इस सूचना पर विश्वास नहीं हुआ | उसने राजा के महल में पूछताछ की तो पता चला कि अर्क सच में ही एक यज्ञ की तैयारी कर रहा था जो अगली सुबह शुरू होने वाला था | इस धोखे पर नर कोबरा बहुत क्रोधित हो गया | वह राजा के महल में चुपके से घुस गया और अर्क की हत्या कर दी |





“उस सुबह रावण सबसे पहले शुक्राचार्य से मिलने पहुंचा यह जानने के लिए कि यह चमत्कार कैसे हुआ | शुक्राचार्य ने बताया - “हे दशानन, कल रात तुम्हारी आत्मा उस समय मादा कोबरा की देह में घुस गयी जब वह सोई हुई थी और उसकी आत्मा उसकी देह में नहीं थी | तुमने उसकी देह का प्रयोग करके नर कोबरा को गलत सुचना दे दी | दरअसल अर्क की यज्ञ में नागों का बलिदान देने की कोई योजना नहीं थी|”

““... लेकिन आचार्य , मैं मादा कोबरा की देह में कब गया ? मुझे तो कुछ याद नहीं हैं ... मुझे तो सिर्फ इतना याद है कि मुझे कल रात कुछ विचित्र स्वपन दिखाई दिए |” रावण ख़ुशी में चिल्लाते हुए से बोला | अगले ही पल उसे अपने शब्दों में तर्क का अभाव होने का अहसास हुआ | उसने अपने शब्दों में संशोधन किया - “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुझे क्या याद है | क्योंकि मेरी स्मृति इस पर निर्भर करती है कि इस समय मेरी आत्मा के कर्म और इच्छा के निर्देशांक क्या हैं | हाँ ... मैं अपनी स्मृति पर विश्वास  नहीं कर सकता| मैं केवल आपके शब्दों पर विश्वास कर सकता हूँ | मैंने अपने जीवन में सबसे चमत्कारी अनुभव यह प्राप्त किया है| आचार्य ... आपने बिना सेना के एक राजा की हत्या कर दी|”



““मेरे पास असुरों की सेना है, दशानन|” शुक्र ने रावण को बताया - “यहाँ पर यह बताना जरूरी है कि मेरे असुर अकेले अर्क की हत्या नहीं कर सकते थे | तुम्हारी इच्छा और कर्म ही मुख्य हथियार हैं जिनका उपयोग करके मेरे असुरो ने यह कार्य किया | तुम्हारी आत्मा की शक्ति मेरे असुरों की शक्ति के साथ मिलकर इससे भी बड़े कारनामे कर सकते हैं |”





“हे मातांगो मैंने यह घटना इसलिए सुनाई क्योंकि यह पाताल कड़ी को समझने के लिए बहुत आवश्यक है | रावण की असुरों के मार्ग पर यात्रा इसी घटना से शुरू हुई थी | धीरे धीरे असुरों ने रावण को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया |” हनुमान जी ने अति उत्सुक मातंगो की सभा को बताया | इससे पहले कि मातंगों में से कोई भी कोई प्रश्न पूछता , हनुमान जी ने आगे बोलना शुरू किया - “रावण ने बहुत जल्दी आस पास के राज्य इसी तरह जीते और अपना शासन दूर दूर तक फैला लिया |”





“एक दिन शुक्र ने रावण को एक ज्वालामुखी के पास वार्तालाप हेतु बुलाया| रावण ने हाथ जोड़कर वार्तालाप शुरू किया -“आचार्य , मुझे आपका यहाँ वार्तालाप करने का प्रयोजन समझ में नहीं आया | यहाँ बहुत गर्मी है | हालांकि ज्वालामुखी यहाँ से बहुत दूर है , ज्वालामुखी का दृश्य ही किसी भी इंसान को जिन्दा जलाने वाला प्रतीत होता है|”





““तुम अपने महल में अपनी विजयों पर कुछ ज्यादा ही आनंद मना रहे थे | तो मैंने सोचा कि तुम्हे वास्तविकता का आभास कराना चाहिए|” शुक्र ने क्रोध में कहा |



“रावण शुक्र के चरणों में घुटने टिकाते हुए हाथ जोड़कर बोला - “आचार्य, कृपा मुझपर इस तरह क्रोधित न हों | आपके शब्द ज्वालामुखी से अधिक भयानक प्रतीत होते हैं |”





“शुक्र ने थोडा नम्र होकर कहा - “हे दशानन, अगर तुम्हे गर्मी का एक झोंका मृत्यु के घाट उतार सकता है तो फिर राज्य जीतने का क्या लाभ? सारी विजय निरर्थक है जब तक कि तुम मृत्यु पर विजय न प्राप्त कर लो |”





““आचार्य, मैं एक आत्मा हूँ जो कभी नहीं मर सकती | मैं देह नहीं हूँ |” रावण ने शुक्र को प्रभावित करने के लिए ज्ञान भरे शब्द कहने की कोशिश की |





“लेकिन शुक्र प्रभावित नहीं हुए| वे बोले - “लोग तुम्हे इस देह से ही तो जानते हैं , दशानन| अगर यह देह मृत हो गई तो तुम बिलकुल ऐसी ही देह कहाँ से लाओगे?”





रावण बोला -“मानव शरीर की कुछ सीमायें हैं आचार्य| कृपा मुझे बताएं कि इन सीमाओं को कैसे पार किया जा सकता है?”





“शुक्र ने तुरंत उत्तर दिया -“जाओ और जाकर उस ज्वालामुखी में कूद जाओ|”



“रावण ने एकबारगी तो ऐसा सोचा कि शुक्र उस पर अब भी क्रोधित हैं लेकिन फिर उसने शुक्र के कहे शब्दों में से ज्ञान निचोड़ने के काम पर अपने मस्तिष्क को लगा दिया | कुछ देर सोचने के बाद वह बोला -“आचार्य , मैं कम से कम इस मानव शरीर के साथ तो ज्वालामुखी के करीब भी नहीं जा सकता | क्या इस संसार में ऐसा कोई जीव है जो ज्वालामुखी की गर्मी को सह सके ? मैं उस जीव की देह का उपयोग करके निश्चय ही ज्वालामुखी में कूद सकता हूँ |लेकिन जहाँ तक मेरा ज्ञान है , इस संसार में ऐसा कोई जीव नहीं है |”





““कौन सा ज्ञान तुम्हे यह बताता है कि ऐसा कोई जीव इस संसार में नहीं है - वो ज्ञान जो तुम्हारे मानव मस्तिस्क में संग्रहीत है , या वो ज्ञान जो तुम्हे मानव मस्तिष्क की सीमाओं के पार ले जाता है?” शुक्र ने पुछा|

“मेरा मतलब था ... कि मैंने कभी ऐसे जीव को न ही देखा है न किसी से सुना है जो ज्वालामुखी की गर्मी सहन कर सकता हो |” रावण ने तुरंत उत्तर दिया जिससे कि उसे शुक्र के शब्दो पर गहरे से विचार करने का कुछ समय मिल गया| शुक्र ने रावण के शीघ्रता से कहे शब्दों का उत्तर नहीं दिया तो रावण ने विचारों की गहराई में जाकर उत्तर दिया - “मैं सहमत हूँ आचार्य| मैं ऐसे ज्ञान पर विश्वास नहीं कर सकता जो मेरे मानव मस्तिष्क में संग्रहीत है क्योंकि वह ज्ञान मेरे मानव शरीर की पांच इन्द्रियों पर आधारित है | ऐसे भी जीव हो सकते हैं जो मेरी मानव इन्द्रियां अनुभव न कर सकें और जिनके बारे में मेरा मानव मस्तिष्क सोच भी न सके|”



““बहुत अच्छा!” शुक्र ने टिपण्णी की और बोले - “ज्वालामुखी से जो गर्म द्रव निकल रहा है यह धरती के गर्भ से निकल रहा है जहाँ न तो प्रकाश है न हवा और तापमान भी अत्यधिक है| क्या तुम्हारा मस्तिष्क इतना बड़ा है कि यह समझ सके कि वहां उस अवस्था में भी कुछ जीव रह रहे हैं ? जिस तरह हम मानव हवा के परितंत्र में रहते हैं ; मछलियाँ जल के परितंत्र में रहती हैं , पाताल के जीव इस गर्म द्रव के परितंत्र में रहते हैं जो तुम ज्वालामुखी से निकलता देख रहे हो | वह पूर्णतः अलग संसार है | तुम उस संसार को अपने इस मानव तन-मन से अनुभव नहीं कर सकते | उस संसार को अनुभव करने के लिए तुम्हे उस संसार की देह ही धारण करनी पड़ेगी | जब तुम पाताल को पाताल की देह के माध्यम से अनुभव करोगे तो वह हमारे संसार की तरह ही सामान्य संसार दिखाई पड़ेगा |”





“रावण को शुक्र की बात तुरंत समझ आ गई | उसने इस पर एक बुद्धिमान प्रश्न पूछा| वो बोला - “आचार्य , अगर हम , इस मानव लोक के जीव पाताल के जीवों के साथ किसी भी तरह की पारस्परिक क्रिया नहीं कर सकते तो पाताल को जीतने का क्या लाभ ? उनकी वस्तुएं हमारे किसी भी काम की नहीं हैं क्योंकि हमारे लिए तो वे वस्तुए एक अत्यधिक गर्म द्रव मात्र हैं | तो उस संसार के बारे में सोचने से भी क्या लाभ?”



“शुक्र ने उत्तर दिया - “क्योंकि अगर तुम यह सीख लेते हो कि पाताल में कैसे जाया जाए और कैसे वापिस आया जाए तो तुम काल पर विजय प्राप्त कर लोगे | तो तुम भूतकाल और भविष्य काल में यात्रा कर सकोगे | तुम अपना भूत और भविष्य बदल भी सकोगे |”





“रावण तुरंत कुछ नहीं पूछ सका| वह गहरे विचारों में चला गया | उसके विचारों को सहारा देने के लिए शुक्र बोले , “यहाँ कुंजी यह है कि पाताल अस्तित्व के बिलकुल अलग फलक पर है | हमारा समय तंत्र पाताल के जीवों पर लागू नहीं होता | पाताल के जीव समय के बिलकुल अलग पट्टे पर “दौड़” रहे हैं |”



“शुक्र जो रहस्य समझाने का प्रयास कर रहे थे उसे समझने के लिए रावण को इतना संकेत प्रयाप्त था | वह बोला - “मैं समझ गया आचार्य | भगवान् शिव की कृपा से मैंने काल को अपनी आँखों से देखा है | मैंने समय के वे अदृश्य धागे देखे हैं जिन पर हम टिके हुए हैं | वे एक ऐसे पट्टे की भांति हैं जो केवल आगे की ओर चलता है | जिसके कारण हम समय में पीछे की ओर यात्रा नहीं कर सकते | हम चाहे जो भी कर रहे हों , हम भविष्य की ओर अग्रसर होते रहते हैं क्योंकि हम समय के उस पट्टे के साथ चिपके हुए हैं | पाताल का काल पट्टा हमारे काल पट्टे के समानांतर चलने वाला पट्टा है | हम हमारे पट्टे से पाताल के पट्टे पर कूद सकते हैं और फिर वापिस हमारे पट्टे पर आते समय हमारे पास विकल्प होता है कि हम भूतकाल में वापिस आयें या भविष्य काल में | यह अद्भुत है ... लेकिन आचार्य , पाताल में कैसे जाया जाए?”



“शुक्र ने उत्तर दिया - “दशानन, मेरी असुरों की सेना तुम्हारे इच्छा-कर्म के निर्देशांक इस तरह बदलने में सक्षम है जिससे कि तुम्हारी आत्मा की पहुँच पाताल के जीवों की देह तक हो जायेगी ... वह भी बहुत शीघ्र ... अगर तुम अपनी तुच्छ विजयों पर तुच्छ आनंद मनाना बंद कर दो तो !”



“प्रिये मातंगो , उस दिन से रावण की आत्मा के पाताल के साथ प्रयोग शुरू हो गए | उस समय पाताल में दो भाई रहते थे - अहि और महि | रावण की आत्मा की पहुँच महि की देह तक हो गई जिसके जरिये वह पाताल के अद्भुत संसार का आनंद लेने लगा | अहि और महि भाइयों के बीच अद्भुत प्रेम था | रावण मही की देह में घुसकर अहि को बुरे कार्य करने के लिए उकसाने लगा|



[सेतु टिपण्णी : अहि और महि रावण के भाई नहीं थे | अहि और महि परस्पर भाई थे और रावण महि की देह में प्रवेश किया करता था | अगर आपको यह समझ में नहीं आया है तो कृपा अध्याय शुरू से फिर से पढ़े |]

“अपने पाताल के प्रयोगों से रावण ने मानवलोक में भूत और भविष्य में विचरण करना सीख लिया | लेकिन उसने केवल वही सीखा जो शुक्र उसे सीखाना चाहते थे | रावण के कर्म अब उसकी इच्छा शक्ति का आधार खो चुके थे | उसकी आत्मा को शुक्र ने अपने असुरों के माध्यम से जकड रखा था और शुक्र उसका प्रयोग भगवान् विष्णु के विपरीत बुने जा रहे अपने षडयंत्र में कर रहे थे |



“रावण द्वारा हासिल की गई परलोक शक्तियां और भगवान् राम का उन शक्तियों को नष्ट करना , भगवान् राम की लीलाओं का शानदार भाग है | वे लीलाएं केवल ज्ञानियों द्वारा बखान की जा सकती हैं, वे भी केवल योग्य लोगों के सामने |



“शुक्र ने रावण को भरोसा दिला रखा था कि जब तक रावण अपनी देह को सुरक्षित रखेगा तब तक अन्य सभी को पुनर्जीवित किया जा सकता है | इसलिए युद्धभूमि में रावण ने खुद कदम न रखकर अपने भाइयों तथा बेटों को भेजा | लेकिन शुक्र का षड्यंत्र भगवान् राम को काल के एक असीमित फंदे , जिसे महामाया कहा जाता है , में जकड़ने का था | जब लंका के सभी प्रमुख योद्धा मृत्यु को प्राप्त हो गए , तब शुक्र ने अपने महाषडयंत्र को कार्यान्वित किया | इस महा षडयंत्र की पहली कड़ी थी भगवान् राम को पाताल में ले जाना |



“हे मातंगो , पाताल में जाने के कई रास्ते हैं | साधारणतया एक आत्मा जिस रास्ते से जाती है उस रास्ते को “याद” कर लेती है और उसी रास्ते से वापिस भी आ जाती है | शुक्र का षडयंत्र भगवान् राम को एक ऐसे एकतरफा रास्ते से पाताल ले जाने का था जिससे कि उनके पास वापिस आने का एक ही रास्ता बचे जो उनको भूतकाल में ले जाए | कल्पना कीजिये , भगवान् राम उस रात लंका के सभी प्रमुख योद्धाओं को मारकर सोते हैं और अगली सुबह भूतकाल में उठकर देखते हैं कि कोई नहीं मरा है | वे पुनः युद्ध करते हैं , पुनः लंका के प्रमुख योद्धाओं को मारते हैं , पुनः सोते हैं और अगली सुबह उठकर देखते हैं कि अभी कोई नहीं मरा है | और ऐसा अनंत काल तक चलता रहता है | इसे कहते हैं काल का वह असीमित फंदा जिसका नाम महामाया है |



“शुक्र के षडयंत्र का केवल एक ही तोड़ था वो यह कि जब भगवान् राम को एकतरफा मार्ग से ले जाया जाए तो हमारे लोक की कोई अन्य आत्मा साधारण रास्ते से जाए और उन्हें अपने साथ सुरक्षित ‘वर्तमान’ में वापिस ले आये | शुक्र जानता था कि हमारी तरफ कोई भी ऐसा नहीं था जिसे पाताल का रास्ता मालुम हो | और युद्ध के नियमों के अनुसार कोई देवता भगवान् राम की सहायता करने नहीं आ सकते थे | अपने षड़यंत्र को और भी पक्का करने के लिए शुक्र ने मुझे और लक्ष्मण को भी भगवान् राम के साथ अपहृत करके पाताल में ले जाने का निर्णय लिया , क्योंकि उसे शक था कि भगवान् राम के करीब होने के कारण शायद हमने उनसे पाताल जाना सीख लिया हो |



“जिस एकतरफा रास्ते से शुक्र हमें अपहृत करना चाह रहा था वह रास्ता स्वपनलोक से होकर जाता है | उसके षडयंत्र की सफलता के लिए हम तीनो - भगवान् राम , लक्ष्मण और मै - को उस रात निद्रा में होना था |





“उसका षड्यंत्र पहले चरण में थोडा सा पटरी पर उतर गया | कारण बने उसके अपने असुर | असुरों ने रावण को कई मायनों में शक्तिशाली बनाया था तो कई मायनों में कमजोर भी कर दिया था | उसके अपने भाई विभीषण ने उसका साथ ऍन समय पर छोड़ दिया था क्योंकि असुरों ने रावण के स्वभाव को अहंकारी और अशिष्ट कर दिया था | इतना ही नहीं , उसके कई वफादार लोग उसके विरुद्ध हो गए थे और वे अन्दर ही अन्दर उसके विरुद्ध कार्य कर रहे थे | वे विभीषण को गुप्त सूचनाएँ पहुंचा रहे थे जो हमारी तरफ हो गया था | उस रात भी विभीषण को गुप्त सूचना मिली कि रावण भगवान् राम के अपहरण की योजना बना रहा है | उस सूचना में पाताल का उल्लेख नहीं था | विभीषण ने मुझको चौकन्ना कर दिया जिसके कारण मै जागता रहा और उस तम्बू के बाहर पहरा देता रहा जहाँ भगवान् राम और लक्ष्मण सो रहे थे |





“शुक्र का मुझे अपहृत करने का षडयंत्र असफल हो गया क्योंकि मैं सोया ही नहीं , लेकिन वह भगवान् राम और लक्ष्मण का अपहरण करने में कामयाब हो गया | यह शुक्र का कोई अचानक बनाया हुआ षड्यंत्र नहीं था | भगवान् राम ने बाद में मुझे बताया कि शुक्र उस रात के लिए लम्बे समय से घटनाओं को अंजाम दे रहा था ताकि वह भगवान् राम को उस स्थिति में ले जाए जिसे “सपने के अन्दर सपना” कहते हैं | नींद में जाने से पहले विभीषण उनको तम्बू में मिलने आया था | मानवलोक में निंद्रा को प्राप्त होने के बाद वे स्वपनलोक पहुंचे जहाँ उन्हें विभीषण फिर से तम्बू में दिखाई दिए | स्वपनलोक में भी वे निद्रा में चले गए | इसे कहते हैं “सपने के अन्दर सपना” स्थिति | स्वपनलोक में निद्रा में चले जाने के बाद वे “पाताल के स्वपनलोक” पहुंचे जहाँ पर उन्हें फिर से विभीषण दिखाई दिए | लेकिन वास्तव में वे
विभीषण नहीं अपितु विभीषण के रूप में “अहि” था जो उनको वहां से पाताल ले गया |



“देर रात विभीषण को सूचना मिली कि रावण “भगवान् राम के अपहरण” की ख़ुशी में आनंद के अतिरेक में झूम रहा है | विभीषण इस सूचना के साथ मेरे पास दौड़े दौड़े आये | मैंने कहा - “ऐसा कैसे संभव है? मैं यहाँ द्वार पर pपूरी तरह चौकन्ना हूँ | मैं यहाँ से एक पल के लिए भी नहीं हिला हूँ |”



“हमने तम्बू के अन्दर जाकर देखा तो भगवान् राम और लक्षमण आराम से सो रहे थे | किसी अनहोनी का कोई चिन्ह भी मौजूद नहीं था | “देखा, मैंने कहा था न ! आपकी सूचना गलत है |” मैंने राहत की सांस ली |





“लेकिन विभीषण को सूचना की सत्यता पर पूर्ण विश्वास था | उसके सूत्र भरोसे लायक थे | उसने भगवान् राम को जगाने की कोशिश की | वह नहीं जगा सका | जब कोई आत्मा स्वपनलोक में जाती है तो उसे तुरंत देह में बुलाया जा सकता है , देह की इन्द्रियों को आह्वान देकर | लेकिन भगवान् राम और लक्षमण की (परम) आत्माएं पाताल में ले जाई जा चुकी थी और हमारी तरफ कोई ऐसा नहीं था जिसे पाताल से आत्मा को वापिस लाना आता हो |





“जब तक मैं अपने प्रभु भगवान् राम से नहीं मिला था , मुझे तो कुछ भी नही आता था | उनकी कृपा से ही मुझे एक एक करके अपनी शक्तियों का बोध हुआ था | जब भगवन राम और लक्षमण का अपहरण हुआ तब मुझे पाताल के बारे में कुछ भी मालुम नहीं था | फिर मैंने सोचा - “कोई सर्वशक्तिशाली भगवान् का अपहरण कैसे कर सकता है? यह निश्चित ही भगवान् राम की कोई लीला होगी जिसका उद्देश्य मेरी आंतरिक शक्तियों को उजागर करना होगा जैसा कि अब तक होता आ रहा है |”





“मैं भगवान् राम के चरणों में बैठकर उनका ध्यान करने लगा | मैंने एक दृश्य देखा कि कुछ विचित्र से प्राणी अन्य दो विचित्र प्राणियों के चारों और खड़े हैं | मेरी आत्मा मुझे बता रही थी कि मध्य में उपस्थित वे दो विचित्र प्राणी मेरे भगवान् राम और लक्षमण हैं | शीघ्र ही मैं गहरी साधना में चला गया और मैंने स्वयं को एक विचित्र द्वार के समक्ष पाया | आश्चर्य यह था कि द्वारपाल ने मुझे पिता कहकर पुकारा | और मुझे भी पिता का संबोधन अटपटा नहीं लगा |मुझे भी अनुभव हो रहा था कि वह मेरा ही पुत्र था | उसका नाम मकरध्वज था |



“क्या आपको समझ में आया , हे बुद्धिमान मातंगो , कि मेरे साथ क्या हो रहा था ? मेरी आत्मा ने अग्निकुश नामक पाताल के एक जीव की देह में प्रवेश कर लिया था और वह मकरध्वज अग्निकुश का पुत्र था | इससे मेरा काम और भी आसान हो गया | उसने मुझे “अपहृत आत्माओं” - भगवान् राम और लक्ष्मण  - जो अहि और महि द्वारा पाताल की दो देहों में कैद कर रखे थे , तक पहुँचाया | भगवान् राम मुझे तुरंत पहचान गए | मैं उन्हें मानवलोक ले आया - उस रास्ते से नहीं जो शुक्र चाहता था , अपितु उस रास्ते से जिसका प्रयोग करके मैं पाताल पहुंचा था |  फलस्वरूप हम सब सुरक्षित मानवलोक में लौट आये , वो भी समय और स्थान के सही निर्देशांको पर , जहाँ रावण की सेना के सभी मुख्य योद्धाओं की मृत्यु हो चुकी थी | इस तरह भगवान् राम को काल के फंदे में फंसाने का शुक्र का षड्यंत्र असफल हो गया |

 [सेतु टिपण्णी : मकरध्वज श्री हनुमान जी का पुत्र नहीं था | अगर आपको यह समझ में नहीं आया है तो कृपा यह अध्याय फिर से पढ़ें | अगर आपको यह समझ में आ गया है तो आप इस अज्ञानता के युग में चुनिन्दा भाग्यवान आत्माओं में से एक हैं | जब आप इस सत्य को किसी को बताएं तो कृपा इसे अंशमात्र भी नहीं तोड़े मरोड़े क्योंकि बड़े बड़े मिथकों की शुरुआत छोटी छोटी विकृतियों से ही होती है | ]



इस तरह यजमान बसंत को चरण पूजा में प्रसाद के रूप में पाताल का ज्ञान मिला | उसकी अपने परिवार के रत्न वापिस पाने की इच्छा अभी भी अधूरी थी |

हनुमान जी की लीलाओं का यह अध्याय यही समाप्त होता है |

बुधवार, 30 दिसंबर 2015

अध्याय 7 (वह फल है अथवा सूर्य..?? चिरंजीवी हनुमान जी ने खोला राज..)

यजमान बसंत का परिचय देते हुए बाबा मातंग ने चरण
पूजा आरम्भ की, “हे प्रभु हनुमान ! जब 41 साल पहले
आप आये थे बसंत एक बच्चा था | उस समय हमारा
डेरा सप्त कन्या पर्वत श्रंखला के एक पर्वत पर था |
वही पर पिछली बार की चरण पूजा हुई थी | यहाँ
उपस्थित सभी ब्राह्मणों , जिनमे से मै भी एक हूँ , ने
आपसे परम ज्ञान की प्राप्ति वही पर की थी |
हमने वह पर्वत श्रंखला क्यों छोड़ी , यह एक बहुत ही
पीड़ादायक घटना है | उस घटना को फिर से याद
करना मात्र भी मेरे लिए पीड़ादायक है किन्तु उस
घटना का वर्णन किये बिना बसंत का परिचय पूर्ण
नहीं होगा |”

बाबा मातंग ने एक गहरी सांस ली और बताने लगे - “हे
हनुमान जी , 41 साल पहले जब आपने हमसे विदा ली
थी उसके बाद कुछ ही महीने बीते थे कि बाबा
मातंग भी विष्णु लोक प्रस्थान कर गए | उसके बाद मैं
बाबा मातंग बना | बाबा पद के साथ जुडी हुई
जिम्मेदारियों को निभाना कठिन नहीं था
क्योंकि उस समय सभी वयस्क मातंग आपसे सीधे परम
ज्ञान प्राप्त किये हुए थे | उन सबको पता था कि
तन -मन - विवेक की सम्पूर्ण पवित्रता के साथ कैसे
जीवन जीया जाता है | बाबा बनने के बाद मेरी
पहली परीक्षा लेकिन ज्यादा दूर नहीं थी | एक
शाम रात्रि के भोजन के पश्चात् मैंने घाटी में एक
अजीब सा सन्नाटा अनुभव किया | भोजन के बाद मै
अपनी कुटिया में गया और हस्तिकर्ण ले आया |

सेतु टिपण्णी : हस्तीकरण मातांगो का एक शंख के
आकार का ऐसा यन्त्र होता है जो अति धीमी
आवाज भी पकड़ लेता है | इतनी धीमी आवाज जिसे
कि मानव के कान नहीं सुन पाते |

“मैंने असुरों की फुसफुसाहट को सुना | दर्जनों असुरों
का एक झुण्ड पर्वत के शिखर की ओर इकठ्ठा था |
हस्तिकर्ण की मदद से उनकी फुसफुसाहट को नीचे
घाटी में आराम से सुना जा सकता था | मैंने उनको
कहते सुना - “कितना सुनहरा अवसर है | ... कितने
समय बाद ... कितना सुनहरा अवसर ...”

“बुराई को अनुभव करने का अवसर ही तो असुर हमेशा
ढूंढते रहते है | यह तो निश्चित था कि पर्वत पर कोई
बुरी घटना होने वाली थी | कुछ ही मिनट बाद यह
भी पता चल गया कि वे किस अवसर के बारे में बातें
कर रहे थे | हमने एक विमान को पर्वत में टकराते देखा
| विमान में सफ़र कर रही दर्जनों आत्माए अपनी देहो
से बाहर हो गई और विमान आग के गोले में बदल गया
|

[सेतु टिपण्णी : यहाँ पर जिस विमान दुर्घटना का
जिक्र हुआ है यह संभवतः मर्तिनेयर फ्लाईट संख्या
138 का जिक्र है जो 4 दिसम्बर 1974 को सप्त
कन्या पर्वत पर दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी | यह
इंडोनेशिया से कोलोम्बो होते हुए मक्का जा रही
एक चार्टर्ड फ्लाईट थी | सेतु द्वारा श्री लंका के
अधिकारीयों के साथ पुष्टि किये गए दस्तावेजों के
अनुसार इस दुर्घटना में 182 हज यात्री और 9 चालक
दल के सदस्य मारे गए थे |]

“घाटी का सन्नाटा अब जंगल के पक्षियों और पशुओं
की चीखों में बदल गया था | मैंने बाबा मातंग के रूप
में अपना पहला महत्वपूर्ण निर्णय लिया | मैंने सभी
मातांगो को वह पर्वत छोड़कर सप्तकन्या श्रंखला के
सबसे दूर स्थित पर्वत पर स्थानातरित होने का
निर्देश दिया क्योंकि मुझे पता था कि पौह फटते
ही वहां “बाहर वाले लोग” और “राजा के सैनिक”
दुर्घटना का विश्लेषण करने के लिए आ जायेंगे |
(राजा के सैनिक का अर्थ है श्री लंका के सुरक्षा
बल )

“उस समय बसंत के पिता के अलावा सभी मातंग
उपस्थित थे | वह अपने पूर्वजों से बात करने के लिए
पर्वत शिखर की ओर गया हुआ था | जब घबराए हुए
पक्षी कुछ समय बाद अपने अपने घोंसलों में बैठ गए तब
मैंने पक्षियों के द्वारा बसंत को सन्देश भेजा |
विमान दुर्घटना उसके बहुत समीप हुई थी किन्तु वह
सुरक्षित था | मैंने उसको तुरंत नीचे घाटी में उतर आने
को कहा |

“हे हनुमान जी , आपको तो पता है कि हम मातंग
लोग केवल एक ही भौतिक खजाना अपने पास रखते
हैं --- उन रत्नों का खजाना जो मातंगों के हर
परिवार को पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत में मिला है| ये
रत्न हमें अपने पूर्वजों से संपर्क साधने में सहायक होते
हैं | जब भी कोई धर्मसंकट आता है तो हम अपने
पूर्वजों से संपर्क साधते हैं जो हम मानते हैं कि वे अब
भी समय के नकारात्मक निर्देशांकों (भूतकाल) में
जीवित हैं |

“पर्वत से जल्दी जल्दी उतरने के प्रयास में बसंत के
पिता अपने रत्न खो बैठे | अँधेरा घना था और बसंत के
पिता के पास जो मशाल थी उसका प्रकाश इतना
नहीं था कि रत्न ढूंढे जा सकते | लम्बे प्रयास के
पश्चात् भी जब उसे रत्न नहीं मिले तो मैंने उसे वहां
चट्टानों पर निशान लगाकर नीचे उतर आने को कहा
ताकि हम रत्न बाद में ढूंढ सकें |

“हमने रातो रात वह स्थान खाली कर दिया और
सप्त कन्या श्रंखला के सबसे दूर स्थित पर्वत पर चले
आये | कुछ महीने बाद जब हम दोबारा उस स्थान पर
लौटे तो हमने देखा कि “बाहरी लोगो” और सैनिकों
ने हमारे डेरे को तहस नहस कर दिया था | हम उस
स्थान पर गए जहाँ पर बसंत के परिवार के रत्न खो गए
थे | कई दिनों तक हमने उन रत्नों को ढूँढने की
कोशिश की लेकिन असफल रहे | मुझे आभास हुआ कि
किसी बाहरी मनुष्य ने वे रत्न वहां से चोरी कर लिए
थे | उस बाहरी मनुष्य के लिए वे रत्न केवल मूल्यवान
पत्थर भर थे लेकिन बसंत के परिवार के लिए तो वे रत्न
उनके पूर्वजों से संपर्क साधने का एकमात्र मार्ग थे |

“कुछ ही समय में मुझे आभास हो गया कि रत्नों के
गुम होने के साथ साथ कुछ ओर भी गुम होता चला
जा रहा था | मातंग उन रत्नों के खो जाने की वजह
से अपने मोक्ष का मार्ग भी भटकते जा रहे थे | जब
भी वे अपने दैनिक कार्य के लिए इधर उधर जाते वे उन
रत्नों की खोज करते थे |दिन भर दिन उनका स्वभाव
उन बाहरी मानवों जैसा होता जा रहा था जो
हमेशा भौतिक वस्तुओं के पीछे लगे रहते हैं | फिर मैंने
निर्णय लिया कि सभी मातंग परिवार अपने अपने
रत्न नदी में फेंक देंगे ताकि वे बसंत मातंग के परिवार के
समकक्ष हो सकें | इस निर्णय को लागू करने के लिए
आपकी आज्ञा लेने के लिए मैंने एक पूजा का
आयोजन किया | लेकिन आपने आज्ञा नहीं दी |
आपने परामर्श दिया कि मैं बसंत के परिवार को गोद
ले लूँ ताकि मेरे रत्न वे भी प्रयोग कर सकें | मैंने वैसा
ही किया | उन खोये हुए रत्नों की बुरी यादों को
पीछे छोड़ने के लिए सभी मातंगों ने सप्त कन्या पर्वत
श्रंखला का त्याग कर दिया और यहाँ आ गए |

“हे हनुमान जी , यह चरण पूजा के पहले यजमान बसंत
का परिचय मैंने दिया | उसके पिता अपने पूर्वजों की
उस धरोहर को खोने के सदमे को कभी भुला न सके |
उसकी देह बूढी होकर प्राणहीन हो गई लेकिन
उसकी आत्मा विष्णुलोक में नहीं गई | उसकी आत्मा
अब भी यहाँ है , देह हीन , केवल एक इच्छा लिए हुए --
अपने परिवार को वे रत्न वापिस लेते देखना | एक
आत्मा की केवल एक इच्छा हो और उसके कर्मों का
खाता बिलकुल खाली हो तो ऐसी आत्मा इस
कलियुग में नई देह नहीं धारण कर सकती | जैसे ही इस
आत्मा की एकमात्र इच्छा पूर्ण हो जायेगी , यह
विष्णुलोक चली जायेगी | लेकिन मेरी चिंता बसंत
को लेकर है | बचपन में इसके परिवार के ऊपर गुजरी इस
विपदा के कारण बहुत सारे असुरों और सुरों ने इसकी
आत्मा को प्रभावित किया है जिसके चलते इसके
कर्म खाते में बहुत सारे कर्म जमा हो गए हैं | इसीलिए
मैंने इसे चरण पूजा के पहले घंटे का यजमान बनाया है |
अगर जरुरत पड़े तो इसे हर रोज चरण पूजा का अवसर
प्रदान किया जाए ताकि इसके कर्मों का
परिष्करण हो सके |”

जैसे ही बाबा मातंग ने बसंत का परिचय समाप्त
किया , होतार उर्वा खड़ा हो गया | उसने पूछा - “हे
हनुमान जी , मैं यह जानने को उत्सुक हूँ को वे रत्न इस
समय कहाँ हैं ? क्या वे उसी मनुष्य के पास हैं जिसने
उनको सप्त कन्या पर्वत से चोरी किया था ? क्या
बसंत के परिवार को वे रत्न वापिस मिल पायेंगे ? अगर
नहीं तो बसंत के पिता की आत्मा को मुक्ति कैसे
मिलेगी ?”
हनुमान जी मुस्कुराये | यह मुस्कराहट इस बात का
इशारा थी कि प्रश्न का उतर सीधा नहीं होने
वाला है | हनुमान जी ने उत्तर दिया - “अगर उन
रत्नों को पाने की इच्छा यहाँ है तो रत्न भी यहाँ हैं
|”
“लेकिन यह कलियुग है , प्रभु ! कलियुग में प्रकट की हुई
इच्छाएं संख्या में अपरिमित है | और उसके ऊपर उन
इच्छाएं के मध्य विरोधाभास है सो अलग | उदाहरण
के तौर पर जिस मनुष्य ने वे रत्न चुराए थे उसकी इच्छा
और बसंत के परिवार की इच्छा अवश्य
विरोधाभासी होंगी | दोनों तरफ ही रत्न लेने की
इच्छा होगी ! और मुझे संदेह है कि असुर भी उसी
मनुष्य का साथ दे रहे हैं जिसने वे रत्न चुराए थे | तभी
तो हमें वे रत्न प्राप्त नहीं हुए !” उर्वा इस उम्मीद में
यह सब बोला कि हनुमान जी से उसे कोई सरल उत्तर
प्राप्त होगा |
हनुमान जी ने उत्तर दिया - “जिस मनुष्य ने वे रत्न
चुराए थे उसके जीवन में शांति भंग हो गई | किसी
ज्ञानी पुरुष के कहने पर उसने उन रत्नों को एक डिब्बे
में डालकर नदी में फेंक दिया | वह डब्बा तैरते हुए समुद्र
में पहुंचा , फिर सालों समुद्र में रहकर डब्बा क्षीण
हुआ और समुद्रतल में डूब गया |”
“तो वे रत्न समुद्रतल में हैं !” उर्वा की आँखे एकबारगी
तो चमक उठी लेकिन अगले ही क्षण आये विचार ने
वो चमक सोख ली - “लेकिन वहां से रत्न वापिस कैसे
आयेंगे ?”
हनुमान जी पुनः मुस्कुराये और अपने शब्द दोहराए -
“अगर उन रत्नों को प्राप्त करने की इच्छा यहाँ है तो
वे रत्न भी यही हैं |”
“लेकिन ... यह ... कलियुग है ... “ उर्वा बुदबुदाया |
बाबा मातंग ने उलझन में फंसे उर्वा को समझाया -
“हम इस समय हनुमंडल के अन्दर खड़े हैं और यहाँ पर
सतयुग जैसा है | अगर यहाँ कोई इच्छा प्रकट की
जाती है तो वह बिना किसी विरोधाभासजनित
अवरोध के पूर्ण हो जायेगी | वे रत्न जहाँ भी हों वे
यही हनुमंडल में आ जायेंगे |”
जब बाबा मातंग ने अपना वक्तव्य पूर्ण किया ,
हनुमंडल के बाहर खड़े असुरों और ऊपर उड़ रहे सुरों में
हलचल दिखाई दी | बाबा को अहसास हुआ कि उस
हलचल का स्त्रोत वे नहीं अपितु बसंत था जो अपनी
जगह पर आँखे बंद किये बैठा था और होंठों से कुछ
बुदबुदा रहा था | स्पष्टत: वह रत्न प्राप्त करने की
इच्छा प्रकट कर रहा था | बाबा तुरंत बोले - “रुको ,
रुको , ऐसा मत करो |”
सबने बसंत की तरफ जिज्ञासा भरी दृष्टि से देखा ,
विशेषतः उर्वा ने | बाबा मातंग बोले - “बसंत , तुम्हे
पता है तुमने अभी अभी कितनी इच्छाएं प्रकट की ?
हज़ार से भी ज्यादा ! हाँ ! इच्छाएं जागृत मन से ही
नहीं अपितु अर्द्ध-जागृत और सुप्त मन से भी प्रकट
होती हैं | जब तुम अभी अभी अपने जागृत मन से रत्न
वापिस पाने की इच्छा व्यक्त कर रहे थे , उन्ही कुछ
पलों में तुम्हारा अर्द्धजागृत तथा सुप्त मन उस
त्रासदीपूर्ण घटना से लेकर आज तक की रत्नों से
जुडी तुम्हारी सभी स्मृतियों को खंगाल रहा था |
कुछ ही पल में तुमने हज़ारों इच्छाएं प्रकट कर दी |
अगर तुम्हे अपनी रत्न वापिस पाने के इच्छा पूर्ण
करनी है तो तुम्हे केवल वही इच्छा प्रकट करनी
होगी -- उसके साथ कोई भावना अथवा कोई अन्य
इच्छा जोड़े बिना | इस समय तुम ऐसा नहीं कर
पाओगे | तुम्हे सबसे पहले अपने कर्मों को परिष्कृत
करना पड़ेगा | अतः जब तक मै अर्पण की प्रक्रिया
पूर्ण न कर लूँ , कृपा शांत बैठे रहो |”
“मै क्षमा चाहता हूँ |” बसंत खड़ा होकर बोला -
“अब मैं आपके विद्वतापूर्ण शब्दों से प्रबुद्ध हो गया हूँ
| मैं शांति से बैठूँगा | कृपा प्रक्रिया शुरू करें |”
जब बसंत अपनी जगह पर वापिस शांति से बैठ गया ,
बाबा मातंग ने अर्पण की प्रक्रिया शुरू की | हनुमान
जी को संबोधित करते हुए बोले - “हे हनुमान जी !
अगर बसंत की आत्मा यहाँ एक मातंग के रूप में
उपस्थित है तो यह इसके पिछले कर्मों के कारण है |
आज इसकी आत्मा जो भी है वह वस्तुतः इसके पिछले
कर्मों का कुल जोड़ है | बसंत फलों की एक टोकरी
अर्पण के लिए लाया है | यह फल भी इसके पिछले
कर्मों का कुल जोड़ हैं | आज इसकी आत्मा अपनी
सभी इच्छाओं को त्यागने की इच्छा रखती है और
अपने सभी पिछले कर्मों को आपके पवित्र चरणों में
समर्पित करना चाहती है | यजमान बसंत की तरफ से
मै यह फल एक एक करके आपके चरणों में अर्पित करने के
लिए खड़ा हुआ हूँ |”
हनुमान जी ने अपना मुख हिलाकर अर्पण की
आज्ञा दी और आँखे बंद करके ध्यान में चले गए |



तीन ब्राह्मण बाबा मातंग की सहायता के लिए
खड़े हुए | तीनों के पास एक एक खाली टोकरी थी |
उनमे से एक सीधे हनुमान जी के पास गया और उनके
चरणों में एक खाली टोकरी रख दी |
हनुमान जी के सामने एक आयताकार जलाशय
बनाया गया था | दूसरा ब्राह्मण उस जलाशय के उन
दो कोनों में से एक के पास गया जो हनुमान जी के
नजदीक थे और वहाँ एक खाली टोकरी रख दी | इस
टोकरी के चारों ओर लाल रंग का कपडा और लाल
धागे लिपटे हुए थे | तीसरा ब्राह्मण उन दो किनारों
में से दुसरे किनारे पर गया और वहां एक खाली
टोकरी रख दी | यह टोकरी श्वेत रंग के कपडे और श्वेत
धागों से लिपटी होने के कारण श्वेत थी |
जब तीनों ब्राह्मण अपने अपने स्थान पर वापिस लौट
गए तब हनुमान जी ने बसंत द्वारा लाई हुई टोकरी में
से एक फल उठाया | उन्होंने फल को अपने माथे पर
लगाया और कुछ मिनट तक उसी अवस्था में रहे | इस
दौरान उनकी आँखे बंद थी और हनुमंडल में भी
सन्नाटा था |
बाबा मातंग धीरे से जलाशय के पास आये और उसकी
परिक्रमा करने लगे | उर्वा बाबा मातंग की
गतिविधियों को बहुत ही पैनी दृष्टि से देख रहा
था | जलाशय का एक चक्कर पूरा करने के बाद बाबा
मातंग थोड़े से हनुमान जी के चरणों की ओर चले | तुरंत
एक असुर हनुमंडल के अन्दर घुस आया | उर्वा ने देखा
कि कुछ अन्य असुरों ने भी हनुमंडल में घुसने का प्रयास
किया और सुरों में भी हलचल हुई |

बाबा मातंग तुरंत पीछे हट गए और फिर
से जलाशय की परिक्रमा करने लगे | वह
असुर जो अन्दर घुस आया था , पुनः
बाहर चला गया |
जब बाबा मातंग ने दूसरी परिक्रमा पूर्ण
की, फिर से वैसा ही हुआ | एक - दो
असुर हनुमंडल के अन्दर घुस आये और सुरों में
भी गतिशीलता आई |
बाबा मातंग ने इस तरह 7 परिक्रमाए की
और अंततः फल को जलाशय के एक कोने
पर रखी लाल टोकरी में डाल दिया |
बाबा वेदी के पास आ गए जहाँ ब्राह्मण
अग्निदेव को पवित्र द्रव की आहुति दे
रहे थे | उर्वा भी वही आ गया | बाबा
और उर्वा श्लोक उच्चारण करने लगे | ये
श्लोक वस्तुतः बाबा और उर्वा के बीच
हुआ वार्तालाप का हिस्सा थे जो कुछ
यूँ थी :
होतर उर्वा ने कहा - “बाबा , पहला
फल लाल टोकरी में गया है न कि
हनुमान जी के चरणों में रखी टोकरी में |
क्या इसका अर्थ यह है कि चरण पूजा में
अर्पण का सबसे पहला प्रयास असफल
रहा ?”
बाबा मातंग बोले - “नहीं होतर |
प्रयास सफल था | अगर मै उस फल को
हनुमान जी के चरणों में अर्पित करने का
प्रयास करता तो एक असुर हनुमान जी
का असम्मान करने में सफल हो जाता |
वह वास्तविक असफलता होती | मैंने
सफलतापूर्वक ऐसा होने से बचा लिया
और फल को लाल टोकरी में दाल दिया
|”
“लेकिन वह फल हनुमान जी को अर्पित
नहीं हुआ ना बाबा|”
“हाँ तुम कह सकते हो कि वह फल छंटनी
प्रक्रिया में होकर बाहर निकल गया |
वह फल हनुमान जी को अर्पित करने
योग्य नहीं था |”
“हे बाबा , यहाँ पर उपस्थित मातंगों के
ज्ञान लाभ के लिए कृपया विस्तार में
बताइये कि वह फल हनुमान जी को
अर्पित करने योग्य क्यों नहीं था |
कृपया बताएं कि जब आपने फल को अपने
माथे से लगाया तो आपने क्या देखा ?
और जब आपने जलाशय की परिक्रमा
की तो आपने क्या अनुभव किया?”
बाबा ने उत्तर दिया - “हे होतर , जब मैंने
उस फल को अपने माथे से लगाया तो
बसंत के उन कर्मों को देखा जिनको वह
फल प्रतिबिंबित कर रहा है | मैंने बसंत के
हज़ारों कर्मों को देखा | उनमे से कुछ
कर्म किसी और के प्रभाव में नहीं बल्कि
स्वयं बसंत की आत्मा की इच्छाओं के
प्रभाव में किये गए थे | लेकिन कुछ कर्म
सुरों और असुरो के प्रभाव में किये गए थे |
अतः फल का वास्तविक स्वामित्व बसंत
की आत्मा, कुछ सुरों तथा कुछ असुरों के
बीच बंटा हुआ था | फल के उन सभी
स्वामियों में से केवल उस स्वामी को
वह फल प्रभु को अर्पित करने या न करने
का अधिकार है जिसका हिस्सा उसमे
सबसे अधिक है | इस फल में सबसे ज्यादा
हिस्सा उस असुर का है जो हनुमंडल के
अन्दर घुस आया था | अगर मैं उस फल को
प्रभु के चरणों में अर्पित करने का प्रयास
करता तो वह असुर यहाँ उपस्थित देहों में
किसी भी देह में घुस जाता और फिर
या तो वह प्रभु को असम्मानित करने
की कोशिश करता अथवा पूजा में कोई
और अवरोध पैदा करता | मैंने
सफलतापूर्वक ऐसा होने से बचा लिया |
अतः चरण पूजा में अर्पण का प्रथम
प्रयास सफल कहा जाएगा |”
उर्वा ने पुछा - “बाबा , कृपा हमें बताएं
कि वह असुर बसंत के कर्मों में भागीदार
कैसे बन बैठा ?”
बाबा मातंग ने उत्तर दिया -“जब मैंने उस
फल को अपने माथे पर लगाया , तब मैंने
बसंत के बहुत सारे कर्मों को देखा | उन
कर्मों में से मैं 3 का वर्णन करता हूँ
जिससे यह समझ में आएगा कि वह बसंत के
कर्मों में भागीदार कैसे है |
“मैंने देखा कि एक दिन बसंत एक वृक्ष
की शाखा पर चढ़ रहा था | उसे आभास
था कि एक पक्षी का घोंसला उस
शाखा पर है | दुर्घटना से उसका पैर
घोंसले पर पड़ गया | घोंसले के अन्दर
पक्षी के अंडे थे जो फूट गए | बसंत को
बहुत पछतावा हुआ | उसे विश्वास नहीं
हो रहा था कि उसका पैर घोंसले पर
चला कैसे गया जबकि उसे आभास था
कि घोंसला शाखा पर है | पक्षी के अंडे
तोड़ने के अपराधबोध में उसने स्वयं को
बहुत बुरा भला कहा |
“वास्तव में अंडे उसने नहीं तोड़े थे | एक
असुर ने उसकी देह का उपयोग करके वह
बुरा कार्य किया था | उर्वा , यहाँ पर
ध्यान देने वाली बात यह है कि उस असुर
ने बसंत की केवल देह को अपने अधीन
किया था | बसंत का विवेक स्वयं उसके
नियंत्रण में था | विवेक से हम क्या बुरा
है और क्या भला इसका निर्णय लेते हैं |
बसंत को उस बुरे कार्य का पछतावा था
| जब उसका पैर घोंसले पर पड़ा तब उसे
अहसास था कि उससे बुरा कार्य हो
गया है | अर्थात उसका विवेक उसके स्वयं
के अधीन था | असुर ने केवल उसकी देह
को अधीन किया था |
“जब कोई असुर किसी देह का उपयोग
करके बुरा कार्य करने में सफल हो जाता
है तो वह उसी देह के आस पास मंडराता
रहता है , इस ताक में कि उसे फिर से
कोई बुरा कार्य करने का अवसर प्राप्त
हो और वह उस देह का उपयोग वह बुरा
कार्य करने के लिए करे | इतना ही नहीं ,
वह बुरे कार्य का अवसर पैदा करने के
लिए भी उस देह तथा मन को चालाकी
से प्रयोग करने की कोशिश करता है |
यही असुरों का स्वभाव है |
“वह असुर भी फिर से बुरा कार्य करने के
अवसर की ताक में बसंत की देह के आस
पास मंडराता रहा | और फिर अवसर भी
आया | कुछ दिन बाद बसंत एक मधुमक्खी
के छाते से शहद तोड़ रहा था | पास में
एक पक्षी का घोंसला कुछ इस प्रकार
स्थित था कि बसंत को वह एक बेवजह
का अवरोध लगा | उसने लात मारकर वह
घोंसला नीचे गिरा दिया ताकि वह
आसानी से शहद इकठ्ठा कर सके | जब
उसने सारा शहद तोड़ लिया तब उसने
नीचे पड़े घोंसले को देखा | उसमे जो अंडे
थे वे फूट गए थे | उसे अहसास हुआ कि
घोंसले को गिराने का उसका निर्णय
सही नहीं था | “मै इतना बुरा कार्य
कैसा कर सकता हूँ ? मै उस घोंसले को
बिना गिराए भी अपना शहद तोड़
सकता था |” उसे बहुत पछतावा हुआ |
वास्तव में वह बुरा कार्य उसने नहीं
बल्कि असुर ने उसकी देह का उपयोग
करके किया था | यहाँ पर ध्यान देने
वाली बात यह है कि इस बार असुर ने न
केवल उसकी देह को अपने अधीन किया
था , बल्कि उसके विवेक को भी अपने
अधीन कर लिया था | तभी तो उसने
अपने विवेक से घोंसला गिराने का बुरा
निर्णय लिया | वह बाद में पछताया
क्योंकि उसका “संस्कार” असुर ने अपने
अधीन नहीं किया था | उसे अपने
संस्कार के अनुसार वह कार्य बुरा लगा

इसीलिए वह पछताया |


“कुछ महीने बाद मैंने बसंत को अपने कार्य
हेतु एक विशेष पक्षी का पंख लाने के
लिए कहा | जब उसे कई घंटों तक कोई
पंख नहीं मिला तो उसने पंख के लिए उस
विशेष पक्षी को मारने का निश्चय
किया | उस शाम जब वह पंख लेकर मेरे
पास आया तो मैं तुरंत समझ गया कि
उसने एक पक्षी की हत्या की है | जब
मैंने उसके लिए सजा घोषित की , वह
मुझसे बहस करने लगा | उसने तर्क दिया,
उस पक्षी को किसी न किसी दिन
मरना ही था , रोज इस संसार में पता
नहीं कितने पक्षी मासाहारी
प्राणियों का आहार बनते हैं | उसे अपने
बुरे कर्म का ज़रा सा भी पछतावा नहीं
था | अर्थात असुर ने न केवल उसकी देह,
मन तथा विवेक को अपने अधीन कर
लिया था , उसका संस्कार भी असुर के
अधीन हो गया था |
“क्या तुम्हे अब समझ आ रहा है होतर कि
वह असुर बसंत के कर्मों में भागीदार कैसे
बना ? क्या तुम्हे अब समझ आ रहा है कि
क्या होता अगर मै वह फल प्रभु के चरणों
में अर्पित करने की कोशिश करता?”
बाबा का श्लोक था |
उत्तर में उर्वा का श्लोक था - “हाँ हे
मातंगों में श्रेष्ठ! अब मै समझ गया हूँ कि
वह असुर हनुमंडल में कैसे प्रविष्ट कर गया
था ! अगर आप हनुमान जी के चरणों में
वह फल अर्पित करने का प्रयास करते तो
वह असुर आज फिर एक, और बड़ा , बुरा
कर्म करने में सफल हो जाता | और फिर
वह और भी ज्यादा शक्ति से बसंत की
देह के पास मंडराता रहता |”
बाबा ने उर्वा को संबोधित करते हुए एक
और श्लोक का उच्चारण किया - “हे
मातांगो के भविष्य के रक्षक , हे उर्वा ,
बताओ कि अब जबकि मैंने उस असुर के
द्वारा एक और बड़ा बुरा कार्य करने
का प्रयास असफल कर दिया है तो
इसका क्या असर होगा ?”
उर्वा ने उत्तर दिया - “अब वह असुर बसंत
के आस पास मंडराना बंद कर देगा
क्योंकि यह असुरों को स्वाभाव है --
जब कोई आत्मा उन्हें बुरा कार्य नहीं
करने देती है तो वे किसी अन्य स्थान पर
अपना अवसर तलाशने निकल जाते हैं |”
उर्वा और बाबा अब वेदी से उठ गए
जबकि अन्य ब्राह्मणों ने अग्निदेव को
आहुति देने का क्रम जारी रखा | उर्वा
होतर के लिए निर्धारित स्थान पर बैठ
गए और बाबा ने बसंत द्वारा अर्पण के
लिए लाइ गई फलों की टोकरी में से एक
फल और उठा लिया | हनुमान जी अब
भी ध्यान में थे और उनकी आँखें बंद थी |
बाबा ने दुसरे फल के लिए प्रक्रिया को
दोहराया | अंततः उन्होंने दूसरा फल भी
लाल टोकरी में डाल दिया | एक के बाद
एक 3 दर्जन से अधिक फलों को लाल
टोकरी में ही स्थान मिला | उसके बाद
एक फल श्वेत टोकरी में डाला गया (एक
फल श्वेत टोकरी में तब डाला जाता है
जब उस फल का सबसे ज्यादा स्वामित्व
किसी सुर के पास हो |)
लगभग 3 घंटे बीत गए | बसंत की टोकरी
में अब केवल 1 फल बचा था | लाल
टोकरी में ज्यादातर फल गए थे जबकि
एक दो फल श्वेत टोकरी में दिखाई दे रहे
थे | जब कोई फल श्वेत या लाल टोकरी
में गिरता था तब बसंत की आत्मा हल्का
महसूस कर रही थी क्योंकि उसको सुरों
और असुरों के प्रभावों से छुटकारा मिल
रहा था |
बाबा मातंग चिंतित दिखाई दे रहे थे |
उसका कारण यह था कि हनुमान जी के
पवित्र चरणों में रखी टोकरी अब भी
पूरी तरह खाली थी | अभी तक एक भी
फल इस योग्य नहीं मिला था जिसे
हनुमान जी को अर्पित किया जा सके
| यह शुभ संकेत नहीं था , विशेषकर
इसलिए कि यह चरण पूजा का सबसे
पहला अर्पण था |
यह बाबा मातंग के “मातंग पवित्रता” के
दंभ को भी चोट थी | वह हमेशा
उदाहरण देते थे कि “बाहर वाले
मनुष्य” (अर्थात जो मातंग नहीं हैं) किस
प्रकार सुरों तथा असुरों के अत्यधिक
प्रभाव में रहते हैं | लेकिन वहां , उन्ही के
कुल का , एक मातंग , एक भी ऐसा फल
लाया प्रतीत नहीं हो रहा था जो
हनुमान जी को अर्पित करने योग्य हो |
जब बाबा मातंग ने बसंत की टोकरी से
अंतिम फल उठाकर अपने माथे से लगाया
तो उनकी सारी आशाओं पर पानी फिर
गया | जिन कर्मों का प्रतिबिम्ब वह
फल था , उनमे से ज्यादातर कर्म सुरों
और असुरों के प्रभाव में प्रतीत हो रहे थे |
उन्होंने जलाशय की परिक्रमा आरम्भ
की | 7 बार परिक्रमा करने के बाद
निष्कर्ष निकला कि वह फल भी लाल
टोकरी में डालने योग्य ही था |
बाबा मातंग उस फल को लाल टोकरी में
डालने को झुके ही थे कि उन्हें अच्छा
विचार आया | वे जलाशय की 8 वी
बार परिक्रमा करने लगे |
फल केले का था | 8 बार जलाशय की
परिक्रमा करने के पश्चात् उन्होंने फल
को अपने हाथ में इधर उधर घुमाया | ऐसा
प्रतीत हो रहा था कि वे कुछ आंकलन
कर रहे थे | उन्होंने केले के छिलके को एक
तरफ से छीला और छीले हुए छिलके को
लाल टोकरी में डाल दिया क्योंकि वह
किसी असुर के मुख्य स्वामित्व में था |
उन्होंने कई बार जलाशय की परिक्रमा
की | हर बार केले के एक भाग को अलग
किया , आंकलन किया कि वह भाग
किसके स्वामित्व में है और उसी अनुसार
उस भाग को टोकरियों में रखते चले गए |
अंततः उन्हें केले का एक ऐसा छोटा
भाग ढूंढ लिया जिस पर बसंत की
आत्मा का पूर्ण स्वामित्व था | उन्होंने
केले के उस भाग को हनुमान जी के चरणों
में रखी टोकरी में रख दिया |
चरण पूजा का पहला अर्पण जो यजमान
बसंत की तरफ से था , पूर्ण हुआ | हनुमान
जी ने अपनी आँखे खोली | उन्होंने
अर्पित किये गए केले के छोटे से टुकड़े की
ओर देखा और मुस्कुरा दिए | बाबा
मातंग विनम्रता से बोले - “हे प्रभु , मुझे
क्षमा करें | मैंने अपने कुल में अधिकतम
पवित्रता के मानक बनाए रखने की
कोशिश की है | लेकिन बसंत कुछ विशेष
परिस्तिथियों में पला बढ़ा है जो सप्त
कन्या पर्वत में रत्न खो जाने के बाद शुरू
हुए | इसके कर्म सुरों और असुरों ने
अत्यधिक मात्रा में प्रभावित किए हैं |
यह फल का एक टुकड़ा ही यह आपको
अर्पण कर पाया है | मैं प्रार्थना करता
हूँ कि आप उसे अर्पण के लिए ओर अवसर
प्रदान करें | जब तक चरण पूजा चलती है
तब तक हर रोज एक घडी बसंत को
यजमान बनाया जाए ताकि वह अपने
कर्मों का परिष्करण कर सके |”
हनुमान जी मुस्कुरा भर दिए | उन्होंने
एक शब्द भी नहीं बोला |
बाबा मातंग ने धीमी आवाज में बड़ी
विनम्रता से कहा - “हे प्रभु , मै अब होतर
उर्वा को अनुरोध करता हूँ कि वे
कपिद्रष्ट को हनुमंडल के अन्दर सादर ले
आयें |
कपिद्रष्ट , “होतर” की तरह ही एक पद
होता है जो किसी वानर को मिलता
है | कपिद्रष्ट के बिना अर्पण पूर्ण नहीं
होता | बाबा मातंग के निर्देशानुसार
उर्वा कपिद्रष्ट वानर को हनुमंडल के
अन्दर ले आया |
कपिद्रष्ट ने हनुमान जी के आसन के
चारों और परिक्रमा लगाईं | यह हनुमान
जी को प्रणाम कहने का उसका तरीका
था | उसके पश्चात् वह हनुमान जी के
सामने बैठ गया और अपनी मासूम दृष्टि
से हनुमान जी को एकटक निहारने लगा
| हनुमान जी मुस्कुराये और बोले - “हे
कपिद्रष्ट , बसंत मातंग ने मुझे यह फल का
एक टुकड़ा श्रद्धा से अर्पित किया है |
मैं इसको आपके मुख के माध्यम से आहूत
करना चाहता हूँ |”
कपिद्रष्ट ने हनुमान जी के चारों ओर
एक और परिक्रमा लगाईं और फिर
हनुमान जी के चरणों में रखी टोकरी में
से फल के टुकड़े को उठा लिया | फल
खाने के पश्चात् उसने हनुमान जी का
आभार व्यक्त करने के लिए उनके आसन
की एक और परिक्रमा की | हनुमान जी
ने अपने पेट पर हाथ रखा और बोले -
“क्या स्वादिष्ट अर्पण है |” (जैसे कि
कपिद्रष्ट वानर ने नहीं बल्कि उन्होंने
ही फल खाया हो |)
कपिद्रष्ट के मुख से चीख निकली | वह
कह रहा था - “हे प्रभु , आप वो हैं जो इस
संसार में चिरंजीवी फल खाने के लिए
प्रसिद्ध हैं -- वह फल जो आकाश में
लटकता है और इतना दैदीप्यमान है कि
इस संसार के सभी फल उसी से प्रकाशित
होते हैं | वह फल जो इतनी दूरी पर लटका
हुआ है कि नश्वर प्राणी उस तक नहीं
पहुँच सकते | अगर कोई उस तक पहुँचने का
प्रयास करता है तो वह फल अपनी आभा
से उसे जला देता है | जिन प्रभु ने
प्रसिद्ध रूप से उस फल का सेवन किया है
, उन प्रभु को यह केले का छोटा सा
टुकड़ा कैसे स्वादिष्ट लग सकता है ? मै
मानता हूँ कि आप अपने भक्तों को
प्रसन्न करने के लिए ऐसा कह रहे हैं |”
वानर की उस चीख से उर्वा की आँखें
चमक उठी | उसे एक ऐसा प्रश्न ध्यान में
आ गया था जो वह हमेशा पूछना
चाहता था | उसने एक भी पल व्यर्थ
नहीं किया | तुरंत पूछा - “हे प्रभु हनुमान
, हम मातांगो को यह विशेष वरदान है
कि हम वानरों से वार्तालाप कर सकते हैं
| बहुत सारी चीजें जो उन्हें दिखाई देती
हैं वे लगभग वैसी ही हैं जैसी हमें दिखाई
देती हैं | लेकिन कई बार जो उन्हें दिखाई
देता हैं वह हमें समझ में नहीं आता |
उदाहरण के तौर पर वे सूर्य को एक
सितारे के रूप में नहीं देखते | उन्हें आकाश
में सूर्य की जगह एक बड़ा फल लटकता
नजर आता है जिसे वे चिरंजीवी फल
कहते हैं | रात्री में जब हम मनुष्य
सितारों से भरा आसमान देखते हैं ,
वानरों को उसकी जगह फलों का बाग़
नजर आता है | मैंने बाबा से कहानियाँ
सुनी हैं कि आपने भी एक बार सूर्य को
फल समझ लिया था और उसे खाने का
प्रयास ... किया ... था ...”
इससे पहले कि उर्बा अपना प्रश्न पूरा
करता, कपिद्रष्ट फिर से चीखा | वह कह
रहा था - “प्रयास नहीं किया था
बल्कि खा ही लिया था | अगर आप
चिरंजीवी फल की ओर किसी तरह
जाने का प्रयास करोगे तो वह आपको
भस्म कर देगा | आप उसे नहीं खा पायेंगे ,
वह आपको खा जाएगा | लेकिन हनुमान
जी ने सफलता पूर्वक उसका सेवन किया
था और चिरंजीवी हो गए |”
उर्वा शांतिपूर्वक बोला - “हाँ
कपिद्रष्ट महाशय , आप ठीक कह रहे हैं |
हनुमान जी अपनी देह को विखंडित
करने का योग कर रहे थे | उन्होंने सूर्य की
ओर उड़ान भरकर सफलतापूर्वक उस योग
में सिद्धि प्राप्त की ... अर्र ... मेरा
मतलब है चिरंजीवी फल की ओर उड़ान
भरकर |”
कपिद्रष्ट फिर से चीखा , इस बार बड़े
ही नम्रतापूर्वक , प्रभु हनुमान जी की
ओर मुख करके | वह कह रहा था - “हे प्रभु
, ये मनुष्य अजीब बाते करते हैं .... zzz…
zzz ...”
कपिद्रष्ट को शायद चक्कर आ रहे थे ---
और उसका कारण या तो फल का वो
टुकड़ा था जो उसने खाया था और या
पवित्र द्रव की आहुति से निकलने वाला
धुआ था | वह हनुमान जी के पास गया ,
उनके आसन से अपना सिर टिकाया और
हनुमान जी के चरणों के समीप निद्रा में
चला गया |

हनुमान जी ने सोते हुए वानर की ओर
वात्सल्य से देखा | फिर उन्होंने आसमान
की ओर देखा | सुर जो वहां पर छत जैसा
आभास दे रहे थे, ने स्वयं को इस तरह इधर
उधर किया कि मातांगो को सूर्य
दिखाई देने लगा | हनुमंडल में उपस्थित
सभी (कपिद्रष्ट को छोड़कर ) ने सूर्य
को प्रणाम किया | बाबा मातंग
बुदुबुदाये - “आह ! चरण पूजा का पहला
सूर्योदय |”
हनुमान जी ने उर्वा से पूछा - “हे
होतार, तुम्हे वहां क्या दिखाई दे रहा
है ?”
“सूर्य, प्रभु! “ उर्वा ने तुरंत उत्तर दिया ,
“वह दैत्याकार आग का गोला जिसके
चारों ओर हमारी पृथ्वी घुमती है |”
हनुमान जी ने पुछा - “तुम इसको कैसे देख
रहे हो ? इसको देखने के लिए किस यन्त्र
का प्रयोग कर रहे हो ? स्मरण है न कि
तुम एक आत्मा हो | और आत्मा को कुछ
भी अनुभव करने के लिए एक यन्त्र की
आवश्यकता होती है ?”
उर्वा ने उत्तर दिया - “मैं इसे अपनी
आँखों से देख रहा हूँ प्रभु ! अपनी त्वचा
से महसूस कर रहा हूँ | अपने मन से इसे समझ
रहा हूँ | मेरा तन-मन ही वह यंत्र है
जिसका उपयोग करके मेरी आत्मा
इसका (सूर्य का) अनुभव कर रही है |”
“तुम अपना यंत्र बदलने का प्रयास क्यों
नहीं करते ? सिर्फ यह देखने के लिए कि
क्या सूर्य सभी यंत्रों से एक जैसा ही
दिखाई देता है?”

“यन्त्र बदलू ? प्रभु ... क्या आपका अर्थ
है कि मैं अपना मानव शरीर त्यागकर
कोई और शरीर धारण कर लुं? मै देह बदलने
की विद्या में निपुण नहीं हूँ प्रभु |
लेकिन मै सीखना अवश्य चाहूँगा कि देह
कैसे बदली जाती है ... ठीक उस तरह जैसे
मै अपने वस्त्र बदलता हूँ |” उर्वा ने हाथ
जोड़कर कहा |

हनुमान जी ने उर्मी की ओर देखा | वह
पूजा में उपस्थित गण की पहली पंक्ति में
बैठी थी | उर्मी हनुमान जी से निर्देश
पाने की प्रतीक्षा में हाथ जोड़कर
खड़ी हो गई | उसे निर्देश नहीं , एक
प्रश्न मिला , “उर्मी , तुम्हे वहां क्या
दिखाई दे रहा है?”

“सूर्य, प्रभु ! ... आग का दैत्याकार
गोला जिसके चारों ओर हमारी पृथ्वी
घूमती है |”

“क्या तुम देखना चाहोगी कि वहां
वानरों को क्या दिखाई देता है?”
“हाँ प्रभु ,मेरी इच्छा ... है ...”
जैसे ही उर्मी ने “इच्छा” शब्द बोला ,
उसकी आँखें फ़ैल गई और उसकी जीभ
हकलाने लगी | वह अचेत हो रही थी |
उसके आस पास बैठी अन्य मातंग औरतों
ने खड़े होकर उसकी देह को सहारा
दिया | कुछ पल बाद उर्मी की देह धरा
पर अचेत लेटी हुई थी जबकि वानर
कपिद्रष्ट जो हनुमान जी के पास
सोया था वह जाग गया | वास्तव में
उर्मी की आत्मा वानर की देह में प्रवेश
कर गई थी जबकि वानर की आत्मा
अभी तक स्वपनलोक में ही थी |
हनुमान जी ने उर्मी , जो कि वानर की
देह में थी , से पूछा - “तुम्हे क्या दिखाई
दे रहा है वहां आकाश में?”
“फल ... प्रभु ... चिरंजीवी फल !” उत्तर
आया |

हनुमान जी ने उर्वा का रुख किया जो
कि उसके सामने खोले जा रहे रहस्य को
समझने की पूरी कोशिश कर रहा था |
हनुमान जी बोले - “जैसे ही तुम अपना
यन्त्र अर्थात देह बदलते हो तुम्हारे अनुभव
भी बदल जाते हैं |”
“लेकिन वास्तविकता क्या है प्रभु ?”
उर्वा विश्वासहीन आवाज में बोला -
“वह सूर्य है , जैसा हम मनुष्यों को
दिखता है अथवा वह एक फल है जैसा
वानरों को दिखता है?”
“वानर देह के लिए वह एक फल है और
मानव देह के लिए सूर्य | अन्य देहों के
लिए कुछ ओर !”
उर्वा आगे भी कुछ पूछना छह रहा था
लेकिन प्रश्न के लिए उसे सही शब्द नहीं
मिल रहे थे | इसलिए वह अपेक्षा कर रहा
था कि हनुमान जी “वास्तविकता” के
बारे में थोडा वर्णन और करें | हनुमान
जी ने उसे निराश नहीं किया | वे बोले
-“मुझे त्रिदेवों ने इस धरा पर वानर देह में
क्यों भेजा , मानव देह में क्यों नहीं ?
क्योंकि आत्माएं , जब किसी देह में
ज्यादा समय तक रहती हैं तो वे यह भूल
जाती हैं कि वे आत्मा हैं | वे स्वयं को
देह समझने लगती हैं |”

सभी मातंग एकाग्रता से हनुमान जी के
शब्दों को सुन रहे थे | हनुमान जी आगे
बोले - “आप लोग इस समय मानवों में
सबसे अधिक ज्ञानी हैं और आप भी इस
रहस्य को समझने में कठिनाई महसूस कर
रहे हैं जो मैं आपके सामने खोल रहा हूँ |
संसार के अन्य मानवो के बारे में विचार
कीजिये | वे वानरों के साथ वार्तालाप
नहीं कर सकते | वे वानरों का पक्ष नहीं
जानते | वे सब लोग सूर्य को केवल सूर्य के
रूप में देखते हैं और उन्होंने यह मत बना
लिया है कि जो वे देखते हैं केवल वही
एक वास्तविकता है | वे अन्य
वास्तविकताओं, जैसे कि वानरों को
दिखाई देने वाली वास्तविकता , से
अनभिज्ञ हैं | उन्होंने सुदूर अंतरिक्ष में
खोज करने के बड़े बड़े यंत्र बना लिए हैं
किन्तु वे भूल गए हैं कि मुख्य यन्त्र तो
उनका अपना तन-मन है | जिन चीजों
को वे यंत्र कहते हैं वे तो केवल मुख्य यन्त्र
अर्थान्त तन मन का विस्तार भर हैं |
भगवान राम जानते थे कि जैसे जैसे संसार
कलियुग की ओर बढेगा मनुष्य अन्य
वास्तविकताओं से पूर्णत: अंधे हो जायेंगे
| इसीलिए उन्होंने इच्छा जताई कि
सभी मनुष्य मुझे वानर रूप में पूजें | अगर
आप यह नहीं समझते कि मनुष्यों को
अनुभव होने वाली वास्तविकता अलग है
और वानरों को होने वाली अलग , तो
मेरी पूजा अधूरी है |”

जिस तन्मयता से मातंग हनुमान जी को
सुन रहे थे वह तब टूटी जब मातंग महिलायें
जहाँ बैठी थी वहां हलचल शुरू हुई | उर्मी
कराह रही थी | उसकी आत्मा उसकी
देह में वापिस आ रही थी | कपिद्रष्ट
वानर भी उठ गया था | बाबा मातंग ने
पूजा की प्रक्रिया चालू करना ठीक
समझा | वह बोले - “हे प्रभु , अब जबकि
फल अर्पण हो चुके हैं , यजमान बसंत आपके
चरणों में लाल चूरा अर्पित करने की
इच्छा रखते हैं |”

लाल चूरा हनुमान जी की हर पूजा में
आवश्यक है | मातंग इस चूरे को विभिन्न
पत्तियों से बनाते हैं | बाबा मातंग ने
बसंत की अर्पण की टोकरी के पास रखी
लाल चूरे की प्याली उठाई | कपिद्रष्ट
वानर बाबा के पास आकर बैठ गया |
बाबा ने पूरा लाल चूरा कपिद्रष्ट वानर
पर उड़ेल दिया | कपिद्रष्ट पवित्र लाल
चूरे में स्नान करके आनंदित लग रहा था |
हनुमान जी मुस्कुराये और बोले - “मुझे वह
दिन आज भी याद है जब भगवान् राम ने
मुझे लाल चुरा स्वयं अपने तन पर उड़ेलने
का निर्देश दिया था | भगवान् राम ने
मुझे बताया था कि यह लाल चूरा
मनुष्यों को यह स्मरण दिलाएगा कि
उनकी वास्तविकता ही मात्र
वास्तविकता नहीं है | वानरों की
अपनी अलग वास्तविकता है और अन्य
प्राणियों की अलग | लेकिन कलियुग के
इस पड़ाव पर इस संसार में केवल मुट्ठी भर
लोग ही ऐसे हैं जो इस रहस्य को समझ
सकते हैं | बाकी लोगों को केवल भगवान्

कल्कि ही यह रहस्य समझा सकते हैं |”


मातांगो के हाव भाव से ऐसा लग रहा
था कि उन्हें हनुमान जी द्वारा बताया
रहस्य समझ में आ गया था | बाबा बोले -
“यजमान बसंत का अर्पण अब पूर्ण हुआ |
अब मै 6 ब्राह्मणों से आग्रह करता हूँ कि
वे इन तीन टोकरियों को उठाकर
हनुमंडल से बाहर ले जाएँ और फलों को
बाहर प्रतीक्षा कर रहे वानरों में बाँट दें
| (एक लाल टोकरी , एक श्वेत और एक
वह जो हनुमान जी के चरणों में रखी थी
|”

दो ब्राह्मण लाल टोकरी के साथ
दक्षिण दिशा की ओर से हनुमंडल से
निकले , दो ब्राह्मण श्वेत टोकरी के
साथ उत्तर दिशा से और दो ब्राह्मण
प्रभु की टोकरी के साथ पूर्व दिशा से
हनुमंडल से बाहर निकले | उनका इन्तजार
बाहर सैकड़ों की संख्या में उपस्थित
वानर कर रहे थे जो चरण पूजा के फल
खाने को तत्पर थे |

हनुमान जी की लीलाओं का यह
अध्याय यही समाप्त होता है |