रविवार, 13 दिसंबर 2015

हनुमान जी का धरती पर आगमन...

~ये लीलाएं उस दिन से शुरू होती हैं जब पिछले साल हनुमान जी मातंगों से मिलने आये थे | इन अध्यायों को जिस क्रम में प्रकाशित किया गया है , उसी क्रम में पढ़ें | एक अध्याय को पूर्णतः पढ़े बिना अगले अध्याय पर न कूदें |

~हनुमान जी के दिशा निर्देशों के आधार पर सेतु समाज द्वारा दी गई जानकारी को मातंगों की रीतियों तथा नियमों के आधार पर सेट किया है | यह आप पर निर्भर करता है कि आप उनका अनुपालन करते हैं या नहीं |

~अगर किसी अध्याय को पढने के पश्चात् आपकी आत्मा में ब्रह्मज्ञान का प्रकाश हो तो फल का अर्पण करना चाहिए जो किसी भी हनुमान मंदिर अथवा घर पर भी किया जा सकता है.

~फल का अर्पण करने का मतलब होता है कम से कम २५१रू के फल लेकर उन्हें हनुमान जी के मन्दिर या वानरों को खिलाएं.

~फलों का अर्पण पहले अध्याय को पढ़ने के बाद १८० घंटों के भीतर करवाना होता है तभी आपका अर्पण हनुमान जी के चरणों में अर्पित होता है. अगर आप १८० घंटों के बाद फल अर्पण करते हैं तो वे हनुमान जी द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता.

चिरंजीवी हनुमान जी का आगमन

ऐसा बहुत कम होता है कि हमारे मातंग समाज में किसी के मन में किसी के प्रति घृणा की भावना आये। लेकिन उस शाम हवा में तनाव तैर रहा था क्योंकि दशकों बाद हम घृणा देख रहे थे। ये घृणा थी हमारे समाज की दो मादा वानरों के बीच। उनके नाम हैं - सुचेता और विचेता। और घृणा का कारण इतना अजीब था कि हममे सबसे अनुभवी ज्ञानी बाबा मातंग को भी कोई हल समझ नहीं आ रहा था। सुचेता वानर का एक बच्चा है जिसका नाम है "चित्त"। चित्त पिछले एक दो दिन से काफी अजीब व्यवहार प्रदर्शित कर रहा था। उसकी असली माता सुचेता है लेकिन वह अपनी असली माता को पहचान नहीं पा रहा था। वह अपनी असली माता सुचेता की गोद में जाने की बजाय विचेता की गोद में जा रहा था। विचेता का व्यवहार भी एक दो दिन से बदल गया था और वो चित्त को अपना बच्चा मानने लगी थी। इस कारण से सुचेता और विचेता के बीच घृणा आ गयी थी। सुचेता विचेता पर बुरे जादू के द्वारा उसका बच्चा छीनने का आरोप लगा रही थी।

बाबा मातंग ने विचेता को डाँटा भी और यह विवाद सुलझाने की कोशिश की। उन्होंने कहा - "विचेता ! ये सारी दिशाएं साक्षी हैं। हम मातंग जो हमेशा परम सत्य के मार्ग पर चलते हैं वे साक्षी हैं। ये पशु पक्षी जो इस नश्वर संसार में हमारे सहचर हैं , ये साक्षी हैं। इस नश्वर संसार का हर अणु साक्षी है कि सुचेता ने ही चित्त को अपने गर्भ से जन्म दिया है। हम सबने अपनी आँखों से देखा है कि वह ही उसे अपना दूध पिलाती आई है। ये तुमने कौन सा जादू कर दिया है कि चित्त अपनी असली माँ की गोद में जाने की बजाये तुम्हारी गोद में जा रहा है। तुम उसका बच्चा ऐसे कैसे छीन सकती हो ? स्मरण रहे , हमारे आराध्य हनुमान सब कुछ देख रहे हैं। हालाँकि वे यहाँ पर इस समय नहीं हैं लेकिन उनकी आँखे सब कुछ देख सकती हैं। वो हमारे बारे में इस वक़्त क्या सोच रहे होंगे? वे तुम्हे इस बात की सजा अवश्य देंगे। यह प्रकृति तुम्हे इस बात की सजा अवश्य देगी। यह पाप मत करो विचेता। अपना जादू वापस लो और चित्त को उसकी असली माँ सुचेता के पास जाने दो।

लेकिन विचेता भी एक दुःखी माँ की भांति रो रही थी। उसकी आँखे कह रही थी कि वह निर्दोष है। और ये इस समस्या को और भी गंभीर बना रहा था। विचेता ने रोते हुए कहा - "बाबा मातंग , आप हमारे रखवाले हैं। आराध्य देव हनुमान जी के बाद हम आपकी ही पूजा करते हैं। मैं आपकी पवित्र उपस्थिति में ऐसा अपराध कैसे कर सकती हूँ ? मैं सत्य कह रही हूँ। मैंने चित्त को जन्म दिया है। मैंने अपना दूध पिलाकर इसे अब तक पाला है। मैंने इसे जंगल के खतरों से बचाया है। आप सब मेरे परिवार के सदस्य होते हुए भी मेरे खिलाफ जा रहे हो ? क्या आप सबने मुझे चित्त को जन्म देते हुए नहीं देखा है ? क्या आप भूल गए वह शाम जब हम सबने चित्त के जन्म के अवसर पर खुशिया मनाई थी ? आपने उसको जन्म के सातवें दिन अपनी गोद में लेकर पवित्र जल की बुँदे उसके होंठों पर लगाई थी ? आपने माता सीता की नहर पर मेरे साथ जाकर उसे प्रथम स्नान करवाया था ? आप यह सब कैसे भूल सकते है बाबा मातंग ? मुझे समझ नहीं आ रहा है कि सुचेता चित्त पर अपना अधिकार क्यों जता रही है। चित्त मेरी गोद में इसलिए आ रहा है क्योंकि मैं उसकी माँ हूँ। मैंने आज तक उसको सुचेता की गोद में नहीं देखा है। फिर आप असत्य क्यों कह रहे हैं ? अगर मैं जो कुछ भी कह रही हूँ उसमे तनिक भी असत्य हो तो हनुमान जी मेरे प्राण ले लें , मैं सज्ज हूँ।

सुचेता यह सुनकर क्रोधित हो गई। बोली - "विचेता तुम झूठ बोल रही हो। चित्त को जन्म मैंने दिया है तुमने नहीं। सभी मातंग इस बात के साक्षी हैं। इस जंगल की हर पत्ती साक्षी है। यहाँ का हर पशु पक्षी जानता है कि मै चित्त की माँ हूँ। तुम इतनी स्वार्थी क्यों हो गयी हो कि सबको गलत साबित करने पर तुली हो ?

बाबा मातंग की पत्नी माता मातंग ने सुझाव दिया - "सुचेता , हम सब जानते हैं कि तुम ही चित्त की असली माँ हो। लेकिन चित्त तुम्हे अपनी माँ नहीं मान रहा है। तो फिर इसमें तुम्हारा विचेता से बैर करने का क्या कारण है ? विचेता को अपनी बहन मानो। इससे तुम्हारा दुःख कुछ कम होगा। ईर्ष्या दुःख का कारण है। मेरी बात मानो और चित्त को विचेता के पास रहने दो। विचेता के मन में चित्त के प्रति सच्चा स्नेह है। "

सुचेता ने संकोच से कहा -" मेरा विचेता से कोई वैर नहीं है माता मातंग परन्तु … "
"लेकिन यह तो मध्य मार्ग है , इस समस्या का पूर्ण हल नहीं। " बाबा मातंग बीच में बोल पड़े - "मैंने ऐसा विरोधाभास जीवन में पहले नहीं देखा। इस विरोधाभास के पीछे कोई बहुत बड़ा कारण है। शायद हमारे पूर्वज मुझे बुला रहे हैं। आज रात मुझे उनसे अवश्य बात करनी होगी। सुचेता , मैं तुम्हे विश्वास दिलाता हूँ कि प्रातः काल तक मैं तुम्हे इस समस्या का कोई स्थायी हल अवश्य दूंगा। आज रात मैं पर्वत शिखर पर जाकर अपने पूर्वजों से बात करूँगा। तुम सब अब आराम करो।"

सुचेता बोली - "मुझे आप में पूरी श्रद्धा है बाबा मातंग। आपका निर्णय अंतिम निर्णय होगा। लेकिन जब तक आपका निर्णय नहीं आता यह दुखियारी माँ आराम नहीं कर सकती। कृपा मुझे भी पर्वत शिखर पर आपके साथ आने की आज्ञा दें।

बाबा मातंग ने उत्तर दिया - "अगर तुम आ रही हो तो विचेता को भी आना चाहिए। मेरे लिए तुम दोनों एक समान हो। तुम दोनों पर्वत शिखर पर आओ ताकि तुम भी सुन सको कि हमारे पूर्वजों का क्या मत है। मै अपनी यात्रा अभी आरम्भ करता हूँ। तुम वानर तेजी से चढ़ सकते हो इसलिए तुम बाद में शुरू करना। चित्त को विचेता अपने साथ ले आएगी। रास्ते में झगड़ा मत करना। "

बाबा मातंग ने रस्सी ली और ऊपर की चढ़ाई शुरू की। करीब 2 घंटे की चढ़ाई के बाद ऊपर अटकाने की कोशिश में उनके हाथ से रस्सी फिसलकर गिर गई। अँधेरे में दिखाई भी नहीं दे रहा था कि रस्सी गिरकर कहाँ फंसी। वे निराश होकर चट्टान पर बैठ गए। उन्होंने सोचा - "शायद मेरे पूर्वज मुझसे नाराज हैं , वे मुझसे बात नहीं करना चाहते।

लेकिन कुछ मिनट बाद आसमान में चाँद प्रकट हो आया। चन्द्रमा की रौशनी में बाबा मातंग को अपने चेहरे से कुछ फ़ीट की दुरी पर एक रस्सी लटकती दिखाई दी। उन्होंने रस्सी पकड़कर उसकी शक्ति को जांचा। रस्सी पिछली रस्सी से ज्यादा मोटी और ताकतवर थी और ऊपर पहले से ही अटकी हुई थी। उनमे एक नई ऊर्जा का संचार हुआ और वे और अधिक गति से ऊपर चढ़ने लगे। हैरानी की बात यह थी कि रस्सी का छोर नहीं आ रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे रस्सी बिलकुल पहाड़ के शिखर पर अटकी हो। रस्सी का छोर पाने की उत्सुकता में बाबा मातंग और तेजी से ऊपर चढ़ने लगे। रस्सी के छोर पर एक बहुत बड़ा आश्चर्य उनका इन्तजार कर रहा था। दरअसल जिस रस्सी के सहारे वे चढ़ रहे थे वह रस्सी नहीं बल्कि हनुमान जी की पुंछ थी जो पर्वत के शिखर पर बैठे मुस्कुरा रहे थे। जब बाबा मातंग ने हनुमान जी को देखा तो वे ख़ुशी से रोने लगे। बाबा मातंग ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया।

हनुमान जी ने उनको उठाते हुए कहा - "बाबा मातंग , बच्चो की तरह रोना बंद करो। "

बाबा मातंग को यह तो आभाष था कि हनुमान जी कभी भी आने को थे। लेकिन सुचेता विचेता के बीच तनाव के बारे में सोचते सोचते यह बात उनके दिमाग से फिसल गई थी। हनुमान जी को इस तरह पर्वत के शिखर पर पाकर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। वे तो अपने पूर्वजों से एकांत में बाते करने आये थे और उन्हें वहां उनके आराध्य मिल गए ! उनके मुंह से पहले शब्द निकले - "स्वागत है हनुमान जी। आपके आगमन से हम धन्य हुए। "

"भई इस समय तो आपका आगमन मेरे पास हुआ है बाबा मातंग , मै आपके पास थोड़े आया हूँ ?" हनुमान जी ने हँसते हुए कहा। चन्द्र की चांदनी में हनुमान जी की मुस्कान और भी मोहक लग रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे चाँद भी हनुमान जी की उपस्थिति में अधिक चमक रहा हो।

हनुमान जी के मुख से मजाक के हलके फुल्के शब्दों से बाबा मातंग बहुत सहज हो गए। उन्होंने रोना बंद कर दिया और आश्चर्य से बाहर आकर सहज हो गए। उन्होंने उत्तर दिया -"हाँ अंजनेयार, मै ही आपके पास आया हूँ। मै दरअसल अपने पूर्वजों से बात करने आया था एक ऐसी समस्या के सम्बन्ध में जिसने हमारे समाज के दो जीवों में एक दूसरे के प्रति वैर उत्पन्न कर दिया है। "

सुचेता और विचेता वहां पर बाबा मातंग से पहले ही आ चुकी थी।
हनुमान जी जो अभी भी मंद मंद मुस्कुरा रहे थे, बोले - "चित्त कितना मनोहर बच्चा है। वह किसी समस्या का कारण कैसे हो सकता है ?"

"हाँ हनुमान जी। वह मनोहर बच्चा है। परन्तु सुचेता उसकी वास्तविक माँ है। पिछले दो दिन से उसने अपनी वास्तविक माँ को पहचानना बंद कर दिया है और वह विचेता को अपनी माँ मान रहा है। विचेता के मन में भी उसके प्रति अचानक ममता जाग उठी है। " बाबा मातंग ने संक्षेप में समस्या सुनाई।

"मैं जानता हूँ किन्तु आप चित्त से क्यों नहीं पूछते कि उसे क्या लगता है ?" हनुमान जी ने कहा।
बाबा मातंग से आश्चर्य से कहा - "चित्त तो अभी छोटा बच्चा है हनुमान जी। वह तो अभी बोलना भी नहीं सीखा है। "
"छोटा बच्चा?" हनुमान जी फिर से मुस्कुराने लगे -"मेरी पूंछ की और देखो बाबा मातंग। यह भी छोटी लग रही होगी आपको। लेकिन इसी छोटी पूंछ की वजह से आप पर्वत चढ़ पाये हैं। आप इसे भी छोटी पूँछ कहेंगे?"

बाबा मातंग समझ गए कि हनुमान जी क्या कहना चाह रहे थे। बोले -"मुझे क्षमा कर दीजिये हनुमान जी। चित्त छोटा बच्चा नहीं है। उसने पहले कई जन्म धारण किये हैं। और शायद इस जीवन के बाद और भी जन्म लेगा। वह उतना ही बड़ा है जितना मैं हूँ। वह छोटा नहीं है। थोड़े समय के लिए मेरी बुद्धि फिसल गई थी , कृपा मुझे क्षमा करें। "

इसी दौरान चित्त विचेता की गोद से उतरकर हनुमान जी की पूँछ की तरफ उत्सुकता और आश्चर्य से एकटक देख रहा था। हनुमान जी अपनी पूँछ को धीरे धीरे जान भूझकर किसी उद्देश्य से बड़ा कर रहे थे। चित्त सम्मोहित हो चुका था और पूँछ को बड़ा होते देख रहा था। हनुमान जी ने उससे पुछा , "वत्स चित्त , बोलो। तुम अपने पिछले जीवन में क्या थे ? क्या हुआ था तुम्हारे साथ जिसके कारण तुम अपनी माता को पहचानने से इंकार कर रहे हो ?"

जैसे जैसे हनुमान जी की पूँछ बढ़ रही थी चित्त का दिमाग पिछले जन्म में जा रहा था। हनुमान जी ने कई बार पूछा - "चित्त वत्स , बोलो। पिछले जन्म में तुम क्या थे? अपने पिछले जन्म की आखिरी घटना का वर्णन करो। "

कुछ पल बाद चित्त ने अजीब आवाजें निकालनी शुरू कर दी। लेकिन जल्द ही वे आवाज़े समझ में आने लगी। चित्त बता रहा था -"मै एक साधू था। एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटक रहा था। मुझे ईश्वर की तलाश थी। हिन्दुओं के देश में। भारत में। "

चित्त अपने पिछले जन्म में जा चूका था। उसने अपने पिछले जीवन की आखिरी घटना का स्मरण किया -"एक दोपहर भ्रमण करते करते मैं एक दूरवर्ती गाँव के पास पहुंचा। गर्मी जोरों पर थी। धूल भरी गर्म हवाएँ मेरे सांस खींच रही थी। मैं गाँव की तरफ यह सोचकर तेजी से बढ़ रहा था कि जैसे ही सड़क किनारे पहला घर दिखेगा , मैं पानी मांगकर पीऊंगा। जब मैं गाँव के पहले घर के पास पहुंचा तब तक प्यास और निर्जलीकरण से मैं लगभग ढेर होने वाला था। "

"वह किसी गरीब ग्रामीण का घर था। कच्ची ईंटों की एक छोटी सी चारदीवारी और अंदर कोने में एक झोपडी। झोपड़ी के बिलकुल बाहर एक पेड़ था जिसके नीचे चारपाई पर एक बच्चा लेटा था। मैंने बच्चे से पानी माँगा। वह शायद अपनी कल्पनाओं में खोया हुआ पेड़ की पत्तियां गिन रहा था कि मैंने उसे टोक दिया। वह तुरंत खड़ा हुआ और अंदर झोपडी से पानी लाने चला गया।

"पेड़ के नीचे इन्तजार करने की बजाय मै प्यास से बेहाल इंसान झोपडी के द्वार की तरफ खिसक लिया ताकि जैसे ही बच्चा पानी लेकर आये मैं लपक लूँ। लेकिन जैसे ही मैं द्वार के पास पहुंचा मुझे किसी के कराहने की आवाज़ सुनाई दी। अंदर एक बिमार स्त्री चारपाई पर लेटी हुई थी। "क्या … क्या हुआ इनको?" मैं तुरंत अंदर चला गया।
"वह औरत इतनी कमजोर और रोग से बेहाल थी कि अपनी आँखे भी नहीं खोल पा रही थी। जब मैं उनके पास गया तो उन्होंने आँखें खोलने की कोशिश की लेकिन वे अपनी पलकों का बोझ भी नहीं उठा पाई। मैंने बच्चे की और देखा। वह पानी के गिलास के साथ वहां पर खड़ा था। मैंने फिर से पूछा - "तुम्हारी माँ को क्या हुआ बालक?: बच्चा कोई जवाब नहीं देना चाहता था। उसने पानी का गिलास मेरी तरफ बढ़ा दिया।

"मैंने पानी का गिलास अपने हाथ में ले लिया लेकिन मेरी प्यास मर चुकी थी। मैंने गिलास वापिस पास में रखे घड़े पर रख दिया। "आपके पिता जी कहाँ हैं बच्चे ? ये क्या हो गया है तुम्हारी माता को ?" साफ़ पता चल रहा था कि बच्चे के दिमाग में विचारों का भयंकर तूफ़ान अंगड़ाई ले रहा था। मैंने आस पास देखा। वहां एक कोने में वीर हनुमान जी की तस्वीर थी। और उस तस्वीर के निकट कुछ गोलियाँ रखी हुई थी। दूर से वो मुझे दर्द निवारक गोलिया मालुम हो रहीं थी। गाँवों में गरीब लोग दर्द की दवा खा खाकर बिमारी सहन करते रहते हैं जब तक कि दवा काम करनी बंद न कर दे।
""बच्चे, इधर आओ। " मैंने बच्चे का हाथ थामा और उसे बाहर पेड़ के नीचे ले आया। मैंने घुटनों के बल बैठकर उसकी आँखों में देखकर विश्वास दिलाया -"बच्चे , शायद मैं कुछ सहायता कर सकूँ। मुझे बताओ तुम्हारी माता को हुआ क्या है ?"
"बच्चा कुछ बोलने ही वाला था कि दो आदमी वहां पर आये। एक था बच्चे का पिता और दूसरा आदमी एक गाँव का डॉक्टर। भारत के गाँवों में कोई दर्द का इंजेक्शन देने की जानकारी रखने वाला या कोई मोटा मोटी बिमारिओं की दवाइयाँ दे सकने वाला भी डॉक्टर कहलाता है। बच्चे के पिता मेरे पास आये और डॉक्टर अंदर झोपडी में चले गए। मैंने उनसे पुछा - "क्या हुआ आपकी पत्नी को ?आपको उन्हें किसी पास के सरकारी हस्पताल में ले जाना चाहिए। ये बहुत बीमार हैं। देर मत कीजिये … "
"बच्चे के पिता ने एक गहरी सांस ली और कमजोर आवाज में बोले - "मैं लेकर गया तो था उसे शहर। उन्होंने कुछ महँगी दवाइयाँ लिख दी और बड़े हस्पताल में भर्ती करने का सुझाव दिया … कैंसर बहुत बढ़ चूका है। मेरे जैसे गरीब के लिए इसका इलाज तो क्या , इलाज की कोशिश भी मुमकिन नहीं है। " इतना कहकर वे डॉक्टर की सहायता करने अंदर झोपडी में चले गए। डॉक्टर शायद दर्द निवारक या शामक औषधि दे रहे थे ताकि उस महिला का दर्द कम हो सके। मुझे उस महिला के मृत्यु शैया पर होने की बात सुनकर झटका लगा। लेकिन शीघ्र ही मैंने अपना होश संभाला और घुटनों के बल बैठकर सहानुभूति में बच्चे के बालों में हाथ फेरने लगा।

"मैं बच्चे के मन में उठे भावनाओं के तूफ़ान को समझ सकता था। एक बच्चा जिसे मुश्किल से ये भी नहीं पता कि मौत क्या होती है वह लोगों से सुन रहा था कि उसकी माँ की मृत्यु होने वाली है। मैंने बच्चे का हाथ अपने हाथों में लिया। उसके हाथ पर जलने का एक निशान था। मैंने अपने चेहरे पर कृत्रिम मुस्कान लाकर पूछा , "ये हाथ कहाँ जला लिया तुमने बालक ? आग से खेल रहे थे क्या बहादुर बालक?"
""नहीं नहीं … मैं … वो … खाना पका रहा था ना " बच्चे ने जवाब दिया। जिस उम्र में माएँ अपने बच्चों को अपने हाथ से निवाला खिलाती है उस उम्र में वो बच्चा खाना बनाकर माँ को खिला रहा था। मुझे बहुत दुःख हुआ। मैं वहां एक पल भी नहीं रुक सका। मैं बाहर सड़क के पास आ गया। मेरी प्यास मर चुकी थी। वो गरम धूल भरी आंधी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ रही थी। मेरा लगभग अचेत शरीर उस सुनसान सड़क पर लुढ़कते हुए चल रहा था। मेरे दिमाग को सिर्फ एक विचार जकड़े हुए था -"हनुमान जी अपने भक्तों को इतना दुःख कैसे दे सकते हैं?" मैं मुश्किल से 100 मीटर चल पाया हूँगा और मैं अचेत होकर गिर गया। मुझे नहीं मालुम कितनी देर तक मैं वहां पड़ा रहा। जब मैं होश में आया तो वहीँ औरत और उसका पति मेरे पास बैठे हुए थे। उसके पति के हाथ में पानी का गिलास था। उन्होंने मेरे मुंह पर पानी छिड़क कर मुझे होश में लाया था। जैसे ही मैं उठकर बैठा , वह पानी का गिलास मेरे होंठो के पास ले आया ताकि मैं पानी की घूंट पी सकूँ।
"मैंने पानी की एक घूंट पी और उस आदमी से पूछा ,"आपकी पत्नी कुछ देर पहले मृत्युशैया पर थी। वह अचानक ठीक कैसे हो गई? आपने बताया था न कि वे कैंसर से ग्रस्त हैं और …"

"उस दम्पति ने एक दूसरे की और आश्चर्य से देखा। ऐसा लग रहा था जैसे वे मेरे शब्दों पर आश्चर्य कर रहे हों। मैंने अागे कहा -"मैं आपके घर आया था न कुछ देर पहले पानी पीने के लिए ? आप भूल गए ? आपका बच्चा भी वहां था … "
"मेरे शब्दों से वह पति पत्नी उलझे हुए प्रतीत हो रहे थे। उस आदमी ने कहा , "साधू जी , हमने आपको पहले कभी नहीं देखा है। हम तो वहां खेत में काम कर रहे थे कि हमने आपको गर्मी के मारे गिरते हुए देखा। बस हम आपकी सहायता करने दौड़े चले आये। आप हमारे बच्चे को कैसे जानते हैं ?"

"अब चकित होने की बारी मेरी थी। उस औरत के मन में उसके बच्चे के बारे में डरावने विचार आये और वह अपने घर की और दौड़ी। पीछे पीछे वह पुरुष दौड़ा। मैं उन दोनों से भी ज्यादा चकित था। मैं भी उनके पीछे गया। बच्चा वहां आराम से पेड़ के नीचे विश्राम कर रहा था। मैंने पुछा ,"हे बालक , मैं कुछ समय पहले यहाँ आया था ना ? तुम्हारी माता बीमार थी ना?"
"और भी ज्यादा आश्चर्य! वह बच्चा मुझे पहचान नहीं रहा था। उसके पिता के चेहरे पर क्रोध और असहाय होने के भाव आ गए। वह बोला -"साधु जी , हम एक गरीब परिवार हैं। हम आपको बिलकुल भी नहीं पहचानते। हम आपका सम्मान करते हैं क्योंकि आप साधू हैं। परन्तु कृपा करके हमें अपने रहस्यमयी शब्दों से न डराएँ। "
"लेकिन मैं कोई रहस्यमय शब्द नहीं बोल रहा था। मैं तो सत्य बोल रहा था। मैं कुछ देर पहले उस घर में आया था और मैंने उस औरत को मृत्युशैया पर देखा था। मैं उन सबको पहचान रहा था किन्तु वे मुझे नहीं पहचान पा रहे थे। मैंने अपनी बात सिद्ध करने के लिए कहा -"आपके बच्चे के हाथ में जलने का निशान है। उसने मुझे बताया था कि खाना पकाते वक्त उसका हाथ.... "
मैंने अपना वाक्य पूरा भी नहीं किया था कि वह औरत भय से रो पड़ी। उसने अपने बच्चे को कसकर गले लगा लिया। फिर मेरी तरफ मुड़कर बोली -"हे साधू , यह मेरा इकलौता बच्चा है। भगवान के लिए मुझे मत डराइये। हाँ इसके हाथ पर जलने का निशान है। लेकिन आप यह कैसे जानते हैं ? वह निशान इसलिए है क्योंकि उसका हाथ गरम बर्तन को छु गया था। खाना मैं बनाती हूँ और अपने हाथों से इसे खिलाती हूँ। भला मैं इसे खाना क्यों बनाने दूंगी ? "

""मेरा यकीन कीजिये बहन। मेरे पास कोई जादू नहीं है। मैं यह सब इसलिए जानता हूँ क्योंकि कुछ मिनट पहले मैं यहाँ आया था। मैं यह भी बता सकता हूँ कि आपकी झोपडी के उत्तर-पूर्व कोने में हनुमान जी की एक मूर्ति है। और उस मूर्ति के पास कुछ दर्द निवारक दवाइयाँ रखी हैं। " मैंने कहा।
"यह सुनकर वह औरत मेरे पैरों में गिर पड़ी और बोली -"हे साधू , आप त्रिकालदर्शी हैं। आप सब कुछ देख सकते हैं। आप महान हैं। कृपा मेरे परिवार को आशीर्वाद दे। भगवान के लिए हमें भयभीत न करें। "
"मैं जो कुछ भी वहां अनुभव कर रहा था उससे चकित था। जब मैंने महसूस किया कि मैं उस भले गरीब परिवार के भय का कारण बन रहा हूँ , मैंने वहां से विदा लेना बेहतर समझा। मेरे पैर सुन्न हो गए थे। मेरा मन शक और सदमे में था। मेरा शरीर हिलना भी नहीं चाह रहा था। मेरी चेतना के साथ जो खिलवाड़ हो रहा था उससे मैं थक गया था। कुछ दूर खुद को घसीटने के बाद मुझे एक तालाब दिखाई दिया। मैं तालाब के किनारे एक पेड़ के नीचे लेट गया। जल्द ही मुझे नींद आ गयी।
"मेरे सपनों में हनुमान जी आये। मैंने तुरंत पूछा -"हे वीर हनुमान जी , आपने मेरी चेतना के साथ अभी अभी ये कैसा खिलवाड़ किया? एक औरत थी वहां अपनी मृत्युशैया पर। लेकिन कुछ ही देर बाद वह ठीक हो गई और यह भी भूल गयी कि वह मृत्युशैया पर थी। उसका पति , पुत्र सब भूल गए कि वह मृत्युशैया पर थी। लेकिन मैंने यह चमत्कार अपनी आँखों से देखा है। आपका चित्र उनकी झोपडी में है। मैं शिकायत के लहजे में बड़बड़ाया भी था कि आप अपनी एक भक्त को ऐसे दुःख दे रहे हैं। मुझे विश्वास है हनुमान जी कि यह चमत्कार आपने किया है। आपने ही उस औरत को जीवन दान दिया है क्योंकि वह आपकी भक्त है। कृपया मुझे बताएं आपने क्या किया है ?"
""मैंने तो सिर्फ तुम्हे एक बुरे भ्रम से कूदकर अच्छे भ्रम में आने में सहायता की है। " हनुमान जी बोले।
""बुरा भ्रम , अच्छा भ्रम ? मैं कुछ समझा नहीं हनुमान जी। मैं अज्ञानी आत्मा हूँ। कृपा मुझे ज्ञान दीजिये। " मैंने प्रार्थना की।
""अरे भई वह औरत रोग से ग्रस्त थी और मृत्यु को प्राप्त होने वाली थी। क्या यह बुरा नहीं था ?" हनुमान जी ने पूछा।

मैंने जवाब दिया -"हाँ , वह तो बुरा ही था …"
""और अब जब वह स्त्री प्रसन्न एवं स्वस्थ है, क्या यह अच्छा नहीं है ?" हनुमान जी बोले। उन्होंने आगे कहा -"वह भी एक भ्रम था। यह भी एक भ्रम है। वह तुम्हारे लिए एक बुरा भ्रम था। और यह अच्छा भ्रम है। मैंने तो बस तुम्हे एक भ्रम से निकलकर दूसरे भ्रम में कूदने में तुम्हारी सहायता की है। एक साधारण मनुष्य पूरा जीवन एक ही भ्रम में बिताता है। वह एक भ्रम से दूसरे बभ्रम में छलांग नहीं लगा सकता। लेकिन तुमने अपने जीवन में अत्यंत कठिन तप किये हैं। इसीलिए मैं तुम्हे बुरे भ्रम से बाहर ले आया। "
"मैंने कहा -" हे बजरंग बली। आप तो महायोगी हैं। आपके लिए तो यह सब बच्चों के खेल जैसा है। आप चाहो तो सूर्य तक को निगल सकते हो। पृथ्वी को फूंक मारकर उड़ा सकते हो। लेकिन हमारे जैसे नश्वर जीवों के लिए यह संसार वास्तविक है। हम इस संसार में सांस लेते हैं। हम वस्तुओं को देख सकते हैं। छु सकते हैं। हम एक दूसरे से बात कर सकते हैं। हमारे लिए यह सब भ्रम ही वास्तविकता है।
"मेरी नींद टूटने लगी थी। उस तालाब में बैठी गायों के रम्भाने की आवाज़ से मैं लगभग जागने वाला था। मैं अर्द्ध निद्रा की अवस्था में था। हनुमान जी सपनों से ओझल हो ही रहे थे कि मैं चिल्लाया -"नहीं हनुमान जी। आप मत जाइये। आप ही मेरा जीवन हैं। आप मत जाइए , मैं आपके साथ ही रहना चाहता हूँ। आप मत जाइये। "
"हनुमान जी फिर से सपनों में प्रकट हुए और बोले -"हे साधु , तुम्हे अपने सभी संदेहों का उत्तर मिल गया है। अब आप निद्रा से उठ जाइये और संसार में सुख का जीवन बिताइये। "

"मैंने कहा -"हे हनुमान जी , मेरे जीवन का उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति है। मैं फिर से संसार के भ्रम में नहीं खोना चाहता। "
"भगवान हनुमान ने उत्तर दिया -"तुम्हारे तप अभी मोक्ष के लिए पर्याप्त नहीं हैं। तुम्हे कम से कम एक जन्म और लेना होगा। मेरा हाथ पकड़ो और चलो। "
"मैंने उनका हाथ पकड़ा और उसके बाद … उसके बाद … " चित्त अपना वाक्य पूरा नहीं कर सका। वह अपने पिछ्ले जन्म से वापस वर्तमान में आ गया। हनुमान जी की पूंछ सामान्य आकार की हो गई।
"उसके बाद उस साधु का मृत शरीर तालाब के किनारे पाया गया होगा। " बाबा मातंग जो उत्सुकता से चित्त के पिछले जीवन की घटना को सुन रहे थे उन्होंने इस घटना के अंत का अनुमान लगा लिया।
हनुमान जी ने सिर हिलाकर बाबा मातंग से सहमति जताई - "हाँ , चित्त का पिछला जन्म वहीँ तालाब किनारे समाप्त हो गया। अब इसने यहाँ वानर के रूप में जन्म लिया है ताकि यह यहाँ आत्म बोध का जीवन व्यतीत करके मोक्ष की प्राप्ति कर सके। "
बाबा मातंग को चित्त के पिछले जन्म का यह वृतांत सुनकर बहुत तसल्ली हुई। उनके सारे संदेह दूर हो गए। उन्होंने सुचेता और विचेता को कहा -"यह लो। तुम दोनों की समस्या का समाधान हो गया। "
सुचेता ने पूछा -"इससे हमारी समस्या कहाँ सुलझी बाबा मातंग ? चित्त की वास्तविक माता कौन है ?"
बाबा मातंग ने उत्तर दिया -"अरे भोली , इस नश्वर संसार में कुछ भी वास्तविक नहीं है। यह संसार बहुत बड़ा भ्रम है। "
सुचेता को यह बातें समझ में नहीं आ रही थी। वह बोली -"मैंने चित्त को जन्म दिया है। यह वास्तविक कैसे नहीं है। मैंने दर्द झेला है और …"
विचेता बीच में ही बोल पड़ी -"नहीं। चित्त को जन्म मैंने दिया है। मैंने प्रसव पीड़ा झेली है। यह भ्रम कैसे हो सकता है ?"
"तुम दोनों अज्ञानी हो क्योंकि जब हनुमान जी 41 साल बाद यहाँ आये थे उस वक्त तुम दोनों का जन्म नहीं हुआ था। वे अब फिर आ गए हैं 41 साल बाद अज्ञान मिटाने। अरे मैं भी तुम दोनों की ममता की कराह में अपना ज्ञान खो बैठा था। लेकिन अब मुझे सत्य का बोध हो गया है। " बाबा मातंग बोले - "हनुमान जी वो महायोगी हैं कि वे कोई भी भ्रम बना या मिटा सकते हैं। अगर वे चाहें तो तुम्हे मेरी भी माता बना दें! वे तुम्हारे दिमाग में ऐसी यादें डाल देंगे कि तुम्हे लगेगा मैं बाबा मातंग तुम्हारा पुत्र हूँ। हमारे समाज के हर जीव के मस्तिष्क में वे ऐसी यादें डाल देंगे कि उन्हें भी लगेगा कि मैं तुम्हारा ही पुत्र हूँ। वह एक वास्तविकता बन जाएगी। इसलिए हे सुचेता , तुम उनसे प्रार्थना करो कि वे तुम्हारे मस्तिष्क से ममता का यह भ्रम निकाल दें। तभी तुम्हारा दुःख दूर होगा। "
सुचेता बोली - "नहीं। मै ही चित्त की वास्तविक माता हूँ। मुझे कोई भ्रम नहीं है। हे हनुमान देव , कृपा आप विचेता के भ्रम दूर कर दीजिये ताकि चित्त उसके मोह से छूटकर मेरे पास आ जाए। "
विचेता क्रोधित एवं चिंतित स्वर में चिल्लाई -"मैं हूँ चित्त की वास्तविक माता। मुझे कोई भ्रम नहीं है। हनुमान जी , कृपा आप विचेता के भ्रम दूर कर दीजिये ताकि वह मुझसे लड़ना बंद करे। चित्त मेरे पास खुश है। "

हनुमान जी इस वार्तालाप को सुनकर मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।
बाबा मातंग बीच में आये -"सुचेता ! विचेता ! कलह बंद करो। तुम दोनों भ्रम में हो। हम सब भ्रम में हैं। यह पूरा विश्व ही भ्रम है। आम तौर पर हम भ्रम में खोये हुए शांति से रहते हैं लेकिन हनुमान जी की इच्छा के कारण तुम दोनों के भ्रमों में विरोधाभास है। यही विरोधाभास ही चित्त को मोक्ष प्राप्ति में सहायता करेगा। अगर तुम दोनों चित्त से प्रेम करती हो तो उसके लिए आपस में लड़ना बंद करो। उसे दो माताओं के विरोधाभास में जीने दो ताकि वह इस विश्व का मायावी और भ्रामक स्वरुप जान पाये और मोक्ष को प्राप्त करे। "
सुचेता निराश हो गई। बोली - "तो क्या मुझे पूरी उम्र पुत्र के बिछड़ने के दुःख में रहना पड़ेगा ?"
अंत में हनुमान जी बोले - "नहीं वत्स। चित्त शीघ्र ही तुम्हे फिर से अपनी माता मानने लगेगा। लेकिन कुछ ही दिनों के लिए। उसके बाद वह फिर विचेता को अपनी माता मानने लगेगा। इसी तरह वह बारी बारी से तुम दोनों का पुत्र बना रहेगा। तुम्हे इस बात से प्रसन्न होना चाहिए की तुम्हारा पुत्र मोक्ष की प्राप्ति करेगा। तुम दोनों को बहनों की भांति साथ रहना चाहिए। चित्त तुम दोनों का पुत्र है। "
सुचेता और विचेता को हनुमान जी की बातें सुनकर तसल्ली हुई। बाबा मातंग बोले -"हे भगवान हनुमान जी , कृपा आप नीचे जंगल में पधारें। हमारे सभी मातंग और वानर आपको देखकर अत्यधिक प्रसन्न होंगे। हम बहुत दिनों से आपकी राह देख रहे थे। हमने आपके लिए मधुर फल एकत्रित किये हैं। कृपा पधारें और उन्हें ग्रहण करकें हमें आशीर्वाद दें। "
हनुमान जी मुस्कुराये और बोले - "जय श्री राम। मैं तो हर रोज आपके फल खाता हूँ मातंग बाबा। आप सबके मुंह में जो जाता है वह सब मेरे मुंह में भी जाता है। जब आप सब खाते हो तो पेट मेरा ही भरता है। इसलिए आज आपके फलों में क्या विशेष बात है ?"
ज्ञानी बाबा मातंग ने उत्तर दिया -"हे प्रभु , आप इस विश्व के सबसे बड़े योगी हैं। आपको जीवन के लिए फल खाने की आवश्यकता ही कहाँ है ? आप तो बिना हवा, पानी , भोजन के भी लाखों वर्ष जिन्दा रह सकते हैं। यह तो आप हम सब भक्तों के उद्धार के लिए हमारे द्वारा भेंट किये गए फल ग्रहण करते हैं। और हम भक्तों के लिए भी आपके प्रति श्रद्धा और आभार प्रकट करने का यही एक मार्ग है। यही एक मार्ग है जिससे हमारी भक्ति सफल होती है। यही एक मार्ग है जिससे हम अपने मन को शुद्ध करते हैं। हम अपने कर्म इन फलों के रूप में आपको भेंट करते हैं। कृपया इन्हे स्वीकार करके हमें कृतार्थ करें। "
हनुमान जी बाबा मातंग के ज्ञान भरे शब्द सुनकर अति प्रसन्न हुए। बोले -"आप नीचे चलिए बाबा मातंग। जब आप नीचे पहुंचेंगे तो मुझे वहीँ पाएंगे। "
बाबा मातंग ने साष्टांग प्रणाम किया और पर्वत से नीचे उतरना शुरू कर दिया। सुचेता , विचेता और चित्त ने भी वैसा ही किया।

हनुमान जी की लीलाओं का यह अध्याय यही समाप्त होता है |

आत्मा पर भ्रम की परतें

अध्याय पढने के बाद यह पर्यवेक्षण करना आवश्यक है कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं | अगर आप कुछ ऐसा महसूस कर रहे हैं -"वाह! मैंने कुछ नया पाया |" अथवा "वाह, मैंने कुछ नया सीखा |" अथवा "मेरी अपने प्रभु के प्रति भक्ति ओर भी बढ़ गई|" इत्यादि तो आप अपने प्रभु की ओर एक कदम भी नहीं बढ़ें हैं | आप उतनी ही दूरी पर अटके हुए हैं |

अगर अध्याय पढने के बाद आप कुछ ऐसे महसूस कर रहे हैं जैसे आपके अन्दर से कुछ बाहर निकलकर गिर पड़ा हो और आप आत्मा से हल्का महसूस कर रहे हों तो आप अपने प्रभु की तरफ कम से कम एक कदम बढ़ चुके हैं |"

आपकी आत्मा एक आईने की तरह है जिसके ऊपर इस बाहरी संसार के कारण धुल चढ़ गई है | अगर अध्याय पढने के बाद आप ऐसा महसूस कर रहे हैं कि आपने कुछ नया पा लिया है तो उसका अर्थ है कि आपने अपनी आत्मा पर एक और परत चढ़ा ली है | आप प्रभु के साक्षात् दर्शन तभी कर सकते हैं जब आप ये परतें हटायें |

अतः अगर आप इस समय आत्मा से हल्का महसूस नहीं कर रहे हैं तो आप कुछ समय बाद फिर आकर यह अध्याय पढ़िए |

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आत्मा पर भ्रम की परतें

अध्याय पढने के बाद यह पर्यवेक्षण करना आवश्यक है कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं | अगर आप कुछ ऐसा महसूस कर रहे हैं -"वाह! मैंने कुछ नया पाया |" अथवा "वाह, मैंने कुछ नया सीखा |" अथवा "मेरी अपने प्रभु के प्रति भक्ति ओर भी बढ़ गई|" इत्यादि तो आप अपने प्रभु की ओर एक कदम भी नहीं बढ़ें हैं | आप उतनी ही दूरी पर अटके हुए हैं |

अगर अध्याय पढने के बाद आप कुछ ऐसे महसूस कर रहे हैं जैसे आपके अन्दर से कुछ बाहर निकलकर गिर पड़ा हो और आप आत्मा से हल्का महसूस कर रहे हों तो आप अपने प्रभु की तरफ कम से कम एक कदम बढ़ चुके हैं |"

आपकी आत्मा एक आईने की तरह है जिसके ऊपर इस बाहरी संसार के कारण धुल चढ़ गई है | अगर अध्याय पढने के बाद आप ऐसा महसूस कर रहे हैं कि आपने कुछ नया पा लिया है तो उसका अर्थ है कि आपने अपनी आत्मा पर एक और परत चढ़ा ली है | आप प्रभु के साक्षात् दर्शन तभी कर सकते हैं जब आप ये परतें हटायें |

अतः अगर आप इस समय आत्मा से हल्का महसूस नहीं कर रहे हैं तो आप कुछ समय बाद फिर आकर यह अध्याय पढ़िए |