जब बाबा मातंग , उर्वा और अन्य 2 मातंग पुरुष शहद इकठ्ठा कर रहे थे ठीक उसी समय एक अन्य स्थान पर 6 मातंग महिलाएं इंधन के लिए लकड़ियाँ चुन रही थी क्योंकि वहीँ उनका उस दिन के लिए निर्धारित कार्य था | उनमे से एक लड़की उर्मी थी जिसकी उम्र बीस साल से एक दो साल ऊपर ही होगी | बचपन से ही उर्मी को दौरे आने की समस्या थी | उस दिन भी जब वह अन्य 5 मातंग महिलाओं के साथ लकड़ी चुनने गई तो उसे दौरा आ गया | उसके जबड़े जकड गए और उसका शरीर थरथराने और झटके खाने लगा | कुछ देर के लिए उसकी याददाश्त चली गई और वह अजीब व्यवहार करने लगी | हर बार की तरह उसे दौरा आने से पहले ही अंदाजा हो गया था कि उसे दौरा आने वाला था | उसने पहले ही अपने साथ आई अन्य महिलाओं को सचेत कर दिया था और अपने आपको एक सुरक्षित स्थान पर पहुंचा लिया था ताकि उसे दौरे से कोई चोट न पहुंचे | दौरा समाप्त होने के बाद वह थकान के कारण एक पेड़ के नीचे लेट गई | अन्य महिलाये लकड़ियाँ चुनने लगीं |
जिस समय उसे दौरा आया हनुमान जी उसके पास आ गए थे | अश्विन जो स्वास्थ्य के जुड़वां देवता हैं वे वहां पर हनुमान जी से पहले ही पहुँच गए थे | उन्होंने हनुमान जी को प्रणाम किया और कहा – “हे सर्वशक्तिमान हनुमान , हम जानते हैं कि मातंग आपको बहुत प्रिये हैं और आप उनको किसी समस्या से ग्रस्त नहीं देख सकते | लेकिन उर्मी के रोग में उसकी सहायता करने में हम असमर्थ हैं | अपनी पूरा ज्ञान प्रयोग करने के पश्चात् भी हम इसके दौरे ठीक नहीं कर पाए |”
धुप अच्छे से खिली हुई थी | सूर्य का प्रकाश पेड़ की पत्तियों से छनकर उर्मी के चेहरे पर पड़ रहा था | हनुमान जी ने उसकी तरफ देखा और फिर अश्विनो को बोले – “हे जुडवा देवो, हाँ मातंग मुझे अति प्रिये हैं | मै उर्मी को इसी समय स्वस्थ करना चाहता हूँ | किन्तु उर्मी को ठीक करने के लिए आपको इसका इतिहास जानना जरूरी है | आपको इसके पिछले जन्म के बारे में जानना आवश्यक है | अपनी आँखें बंद करो | मै आपको इसकी आत्मा की पिछले जन्म की यात्रा का दर्शन कराता हूँ |”
अश्विन देवों ने अपनी आँखे बंद की तो उन्हें यह दिखाई दिया :
उर्मी अपने पिछले जन्म में एक छोटे से गाँव में एक किसान की पत्नी थी | एक बार जंगल से कुछ वानर रास्ता भूल गए और उस गाँव में आ गए | गाँव के बच्चे और बेकार लोगों ने वानरों पर पथ्थर फेंकना शुरू कर दिया | एक छत से दूसरी , दूसरी से तीसरी , इस तरह बच्चों और बेकारों का टोला वानरों का पीछा करने लगा | यहाँ तक कि उन्होंने पास के खेतों में भी वानरों को चैन से नहीं बैठने दिया | तीन दिन तक यहीं सिलसिला चलता रहा और तीन दिन तक वानरों को कुछ खाने को नहीं मिला | वे दिन में यहाँ से वहां जान बचाकर भागते और रात को कहीं छुपकर बैठ जाते |
चौथे दिन वे बहुत ही थके हुए और परेशान थे | दोपहर हो चुकी थी लेकिन उन्हें न तो खाने को कुछ मिला न ही शांति से कहीं बैठने का अवसर मिला | वे उस किसान की पत्नी के घर की छत पर पहुंचे | यह घर गाँव की सीमा पर एकांत में था और चारो और से बाकी गाँव से हटकर था | उस छत पर वानरों ने तुलनात्मक रूप से अपने आपको सुरक्षित महसूस किया |लेकिन इससे पहले कि वे उस छत पर सुख की सांस लेते , उन्हें वहां पर किसी के होने का अहसास हुआ |
किसान का 9 साल का बेटा लकड़ी की सीढ़ी के सबसे उपरी पायदान पर कुछ इस तरह खड़ा हुआ था कि सिर्फ उसका सिर मुंडेर से ऊपर निकला हुआ था और वह कौतुहल से छत पर बैठे वानरों को देख रहा था | जब वानरों ने उसको देखा तो उसको वहां से डराकर भगाने के लिए सारे वानर एक साथ दांत निकालकर चीखे | बच्चा डर गया और सीढ़ी से उसकी पकड़ छूट गई | वह नीचे गिर गया और सीधे जमीन पर टकराया | गिरते ही वह अचेत हो गया | गाँव के हकीम को बुलाया गया | बच्चे का पिता यानी किसान भी खेतों से दौड़ा दौड़ा घर पहुंचा | हकीम ने अपना इलाज शुरू किया लेकिन बच्चे की हालत गंभीर थी |
जब ग्रामवासियों को पता चला कि वानरों के कारण एक बच्चा घायल हो गया है तो वे वानरों को मारने के लिए हाथ में लाठियां लेकर बड़ी संख्या में इकठ्ठे हो गए | वानर उस छत से भाग खड़े हुए और गाँव वालों ने उनको जान से मारने के इरादे से पीछा करना शुरू कर दिया |
वानर बुरी तरह पिट गए किन्तु वे भागते रहे | छिपने के लिए उन्हें कोई स्थान नजर नहीं आ रहा था | कुछ घंटे बाद वे उसी किसान की छत पर वापिस आ गए क्योंकि वही एक घर था जिसकी छत अन्य किसी घर के साथ नहीं जुडी हुई थी | जब भीड़ छत पर चढ़ने के लिए किसान के घर आई तो किसान की पत्नी ने उनको वहां से चले जाने को कहा | उसने उनमे से किसी को भी ऊपर नहीं चढ़ने दिया | उसने सबको वहां से यह कहकर चले जाने की प्रार्थना की कि उसका बेटा जिंदगी और मौत के बीच झूझ रहा है | जो बच्चे उसकी छत पर पत्थर फेंक रहे थे वह उन पर चिल्लाई | वह तब तक अपने घर के दरवाजे से नहीं हिली जब तक कि उस भीड़ का आखिरी व्यक्ति भी वहां से नहीं चला गया |
हकीम ने गर्म पानी माँगा | वह अन्दर गई और गर्म पानी चूल्हे पर रख दिया | उसकी छठी इंद्री संकेत दे रही थी कि कुछ गलत होने वाला है लेकिन वह अपने आपको विश्वास दिला रही थी कि उसके बच्चे को केवल हल्की सी चोट लगी है और वह जल्द ठीक हो जायेगा | जब पानी गर्म हो गया तो वह हकीम के पास एक गिलास पानी ले गई | हकीम बच्चे के हाथ रगड़ रहा था | वह भूल गया कि उसने गर्म पानी क्यों मंगवाया था | उसे खुद नहीं पता था कि वह क्या कर रहा है | वह सिर्फ दिखावा कर रहा था कि वह जो कुछ कर रहा है उसे उसका पूरा ज्ञान है | बच्चे को कोई बाहरी चोट नहीं लगी थी | चोट मस्तिष्क के अन्दर लगी थी | किसान और उसकी पत्नी को हकीम पर पूरा विश्वास था |
पत्नी गर्म पानी देकर रसोई में आ गई | अपने आपको यह विश्वास दिलाने के लिए कि सब कुछ पहले जैसा ही है और अपने डर को दबाने के लिए वह रसोई में कुछ काम ढूँढने लगी | वह खाना पहले ही बना चुकी थी | कोई काम बाकी नहीं था | उसके मन में एक विचार आया | उसने कुछ खाना और खेतो में से लाये गए कुछ ताजे फल लिए | वह सीढ़ी से ऊपर चढ़ी और खाना तथा फल वानरों के लिए छत पर फेंक दिया |
उस क्षण श्री हनुमान जी किसी जंगल में ध्यान कर रहे थे | हर क्षण हजारों लोग वानरों को भोजन खिलाते हैं लेकिन जब किसान की पत्नी ने वानरों को भोजन दिया तो हनुमान जी को सूचना घंटी बजती सुनाई दी | वे तुरंत ध्यान की मुद्रा से उठे और समय के देवता काल को बुलाया | जब काल हाजिर हुए तो हनुमान जी ने पूछा – “काल ! मै अपने प्रभु के चरणों के ध्यान में मग्न था कि तभी मुझे एक सुचना घंटी सुनाई दी | ऐसी घंटी तब सुनाई देती है जब कोई भक्त कड़ी तपस्या करता है | मुझे बताइए कि अभी अभी मुझे प्रसन्न करने के लिए कड़ा तप किसने किया | मै अपने प्रभु के ध्यान में मग्न था अतः मै नहीं देख पाया |”
काल ने उत्तर दिया – “हे सर्व शक्तिमान हनुमान , मुझे भी वह कम्पन सुनाई दिया जो आपने सुना | एक किसान का घर इस कम्पन का उद्गम स्थल था | मै सिर्फ इतना देख पाया कि किसान की पत्नी ने कुछ वानरों को भोजन दिया जो उसके घर की छत पर बैठे थे और तीन दिन से भूखे थे |”
“हे काल ऐसी घंटी तब बजती है जब मेरे या भगवान् विष्णु के प्रति असाधारण भक्ति का प्रदर्शन होता है | अगर यह घंटी किसान की पत्नी द्वारा वानरों को भोजन देने से बजी है तो ये वानर कौन हैं जिनको भोजन दिया गया है | वे कोई साधारण वानर नहीं हो सकते | क्या वे मातंगों के वानर हैं ?” हनुमान जी ने पूछा |
“हे हनुमान , मातंग तो इस किसान के घर से बहुत दूर रहते हैं | वे यहाँ नहीं आ सकते | मुझे तो वे साधारण वानर ही लगते हैं अन्यथा वे जंगल का रास्ता कैसे भूलते ? मै किसान की पत्नी द्वारा इन वानरों को फल खिलाने के कार्य में कुछ असाधारण नहीं देखता | मै आपको यह घटना फिर से दिखाता हूँ | आप स्वयं देख लीजिये |” काल चूँकि समय के देव है , उन्होंने उस घटना को हनुमान जी को फिर से ज्यों का त्यों दिखा दिया |
किसान के घर हुई घटना को देखने के बाद हनुमान जी बोले – “हे काल, वानर साधारण हैं लेकिन किसान की पत्नी द्वारा किया गया कार्य असाधारण है | जब कोई स्त्री अपनी रसोई में जाती है तब वह अपने परिवार के बारे में यह सोचती है कि सबने खाना खाया या नहीं | जब किसान की पत्नी अपनी रसोई में गई तब उसे अपनी छत पर बैठे वानरों का भी विचार आया |अर्थात उसने वानरों को केवल इसलिए अपने परिवार का सदस्य समझा क्योंकि वे उसकी छत पर बैठे थे |उसने वानरों को भोजन शुद्ध प्रेम की पवित्र भावना के साथ दिया |”
“वह आपकी परम भक्त लगती है हनुमान जी |” काल ने टिपण्णी की |
“वह मेरी पूजा नहीं करती क्योंकि उसके गाँव में यह भ्रान्ति फैली हुई है कि महिलाओं को मेरी पूजा नहीं करनी चाहिए | वह इस भ्रान्ति में विश्वास नहीं करती किन्तु उसे गाँव की परम्पराओं का निर्वाह करना पड़ता है | वह मेरी पूजा भले ही न करती हो लेकिन वह बहुत ही सत्कर्मी स्त्री है | उसका हर कार्य एक परम भक्त द्वारा किए जाने वाले कार्यों जैसा ही है | हे काल ! जब वह किसी कठिनाई में आएगी तब वह मेरी पूजा नहीं करेगी | अतः मुझे पता नहीं चलेगा कि वह कठिनाई में है | मै आपको यह उतरदायित्व देता हूँ कि जब भी यह स्त्री कठिनाई में हो , आप मुझे सूचित करें ताकि मै इसकी रक्षा कर सकूँ |”
किस जीव के भविष्य में क्या आने वाला है यह काल को भली भांति पता है | काल ने किसान के बच्चे के भविष्य की गणना की और बोले – “हे हनुमान जी , यह स्त्री को आपकी आवश्यकता इसी समय है | उसका बच्चा बेहोश है और जैसा कि मै साफ़ देख सकता हूँ ठीक 6 घंटे और तीस मिनट में उसकी मृत्यु हो जाएगी | केवल आप ही इतने शक्तिशाली हैं कि मृत्यु को हराकर इस बच्चे के जीवन की रक्षा कर सकें |”
हनुमान जी ने जैसे ही यह सुना वे वहां से ओझल हो गए और तुरंत किसान के घर पहुंचे |
[सेतु की टिप्पणी : रामायण काल में हनुमान जी पवन वेग से उड़ते थे लेकिन जब उन्हें चिरंजीवी होने का वरदान मिला तब वे समय के बंधन से मुक्त हो गए | अब वे असीम गति से चलते हैं अर्थात उन्हें एक स्थान से दुसरे स्थान पर पहुँचने में बिलकुल भी समय नहीं लगता चाहे दूरी लाखो मील की हो या एक मील की ]
गाँव के मानकों के अनुसार किसान का घर अच्छे से बना हुआ था | बच्चा बरामदे में पड़ी खाट पर लिटा रखा था | हकीम और बच्चे का पिता उसके पास बैठे हुए उसकी मूर्छा तोड़ने का प्रयास कर रहे थे | किसान की पत्नी चिंता में घर के एक कोने से दुसरे कोने में आ जा रही थी | हनुमान जी ने मनुष्य की नजर से बच्चे को देखा | बच्चे के शरीर पर कहीं भी चोट दिखाई नहीं दी | कही से भी खून नहीं निकला था | शायद चोट मस्तिष्क के अन्दर लगी थी | हनुमान जी ने स्वास्थ्य के जुड़वाँ देवों अश्विन को बुलाया |
अन्य देवों की तरह अश्विन भी जीवो के लिए अदृश्य हैं | नश्वर संसार की कोई भी वस्तु वे भेद सकते हैं | उदाहरण के तौर पर वे एक पक्की दीवार को बिना तोड़े उसके अन्दर से गुजर सकते हैं | मस्तिष्क की सर्जरी करने के लिए उनको मष्तिष्क को कहीं से काटने की जरूरत नहीं पड़ती | उनके औजार बिना काटे मस्तिष्क के अन्दर घुस सकते हैं |उन्होंने बच्चे के मस्तिष्क की सर्जरी की लेकिन बच्चे को होश नहीं आया | अश्विन बोले –“हे हनुमान , मस्तिष्क में एक चोट लगी थी जिसे हमने ठीक कर दिया है | अब बच्चे का शरीर और मस्तिष्क पूरी तरह ठीक है फिर भी यह होश में नहीं आया है | हमें लगता है कि यह बच्चा अब होश में नहीं आ सकता क्योंकि इसकी चेतना अगले जन्म की ओर प्रस्थान कर चुकी है | अब इसकी चेतना को इस शरीर में लाना संभव नहीं है | अब इसकी चेतना दूसरा शरीर ही धारण करेगी |”
हनुमान जी ने अश्विनों को धन्यवाद दिया और उन्हें जाने की आज्ञा दे दी | अगर किसी के शरीर से खून बह गया हो तो कहा जा सकता है कि वह मरेगा | अगर कोई किसी खतरनाक अवस्था में हो तब कहा जा सकता है कि वह मरेगा | लेकिन जैसा कि अश्विनो ने घोषित किया था , बच्चे का शरीर तथा मस्तिष्क दोनों स्वस्थ थे | कम से कम किसी मनुष्य की आँखों से देखने से तो उस बच्चे के आस पास कोई खतरा भी नहीं नजर आ रहा था | फिर भी वो बच्चा मरने वाला था ! क्या कोई ऐसा खतरा वहां पर था जिसे मनुष्य की आँखों से देखना असंभव हो ? अगर वह बच्चा मरता तो कोई भी इंसान भगवान् , शैतान या फिर किसी अदृश्य शक्ति को दोष देता | लेकिन हनुमान जी के लिए तो कुछ भी अदृश्य नहीं है | वे सब कुछ देख सकते है | वे बच्चे की मौत का कारण जानकर उसे बचा सकते थे | उन्होंने एक पल के लिए कुछ सोचा और पुनः काल यानि समय के देवता को बुलाया |
साधारण जीव समय को नहीं देख सकते | वे केवल इसे महसूस कर सकते है | वे महसूस कर सकते हैं कि समय कभी नहीं रुकता | यह हमेशा एक ही दिशा में चलता है और वो दिशा है भविष्य की दिशा | यह कभी भूतकाल की तरफ नहीं चलता | हनुमान जी के लिए समय भी किसी अन्य वस्तु की तरह ही दिखाई देता है | जब उन्होंने काल को बुलाया और काल वहां प्रकट हुए तो उन्हें समय दिखाई देने लगा | समय पतले धागों का एक विशाल जाल है | यह जाल एक विशालकाय मकड़ी के जाले की तरह ही है | सभी जीव तथा वस्तुएं इस विशालकाय समय के जाल में फंसी हुई हैं | जहाँ मकड़ी के जाल के धागे स्थिर होते हैं , समय के जाल के धागे गतिशील होते हैं |ये धागे एक ही दिशा में चलते रहते हैं और वो दिशा है भविष्य की दिशा | समय के जाल के धागों का एक गुच्छा एक गतिशील पट्टे की तरह काम करता है | चाहे मनुष्य खड़ा हो , बैठा हो , सो रहा हो , भाग रहा हो , नाच रहा हो या कुछ भी कर रहा हो वह समय के अदृश्य धागों के गुच्छों पर हमेशा चलता रहता है |
जब काल वहां पर प्रकट हुए तो हनुमान जी ने बच्चे की ओर देखा क्योंकि अब काल का जाल नजर आ रहा था जिसमे हम सब फंसे होते हैं | हनुमान जी ने कहा – “हे काल , मै देख सकता हूँ कि बच्चा सुविधापूर्वक समय के धागों पर लेटा हुआ है | मुझे कोई धागा टूटा हुआ नहीं दिखाई दे रहा | फिर क्या कारण है कि यह बच्चा 6 घंटों में मरने वाला है ?”
काल ने बताया – “भगवन , जिन समय के धागों पर यह बच्चा लेटा हुआ है उन धागों को ध्यान से देखिये | ये धागे गतिमान हैं और बच्चे को आगे की ओर ले जा रहे हैं | आगे एक चरम अंत (डेड एंड ) है | यह बच्चा 6 घंटे में उस चरम अंत पर पहुँच जाएगा | वो देखिये वो रहा चरम अंत ...”
हनुमान जी ने ध्यान से उस चरम अंत (डेड एंड) की ओर दृष्टि डाली जिसकी ओर काल संकेत कर रहे थे | वास्तव में वह डेड एंड नहीं बल्कि समय के धागे वहां नीचे की तरफ 90 डिग्री का तीव्र मोड़ ले रहे थे | यह मोड़ एक डेड एंड की तरह लग रहा था जहाँ से वह बच्चा गिरने वाला था | केवल हनुमान जी ओर काल यह देखने में सक्षम थे कि बच्चा समय के धागों पर गतिमान है और 6 घंटे में उस मोड़ से नीचे गिरने वाला है | मनुष्य की आँखों से तो केवल यह दिखाई दे रहा था कि बच्चा एक खाट पर आराम से लेटा हुआ है | अगर बच्चा मरता तो किसी भी मनुष्य को केवल यही दिखाई देता कि उसकी सांस थम गई है | केवल हनुमान जी और काल ही समय के उस जाल के खतरों को देख पा रहे थे |
हनुमान जी ने कहा –“अगर हम इस बच्चे को समय के धागों पर बने इस खतरनाक मोड़ से गिरने से बचा ले तो इसकी जान बच सकती है |”
काल बोले –“अगर यह बच्चा धागे के इसी गुच्छे पर रहेगा जिस पर इस समय है तो वह अवश्य उस मोड़ पर पहुंचेगा और गिर जाएगा | इसका जीवन बचाने के लिए हमें इसको समय के धागों के दुसरे गुच्छे पर स्थानांतरित करना पड़ेगा |”
हनुमान जी बोले –“वह तो सरल कार्य है , काल ! आप कोई भी समय के धागों का खाली गुच्छा ढूंढकर इस बच्चे को वहां स्थानांतरित कर सकते हैं |”
काल बोले –“हे हनुमान! हम इस बच्चे को किसी भी खाली पड़े गुच्छे पर स्थानांतरित नहीं कर सकते | बच्चे का कोई रक्त सम्बन्धी ही अपने समय के धागे इस बच्चे को दान कर सकता है | उन दान किए गए धागों पर ही हम इस बच्चे को स्थानांतरित कर सकते हैं |”
“बच्चे की माता अपने समय के कुछ धागे अपने बच्चे को प्रसन्नता से दान करेगी | बच्चे का जीवन बचाने के लिए कितने धागों की आवश्यकता है ?” हनुमान जी ने पूछा |
काल ने उतर दिया –“हे हनुमान जी , किसी भी मनुष्य को सुरक्षित जीवन जीने के लिए कम से कम 7 समय के धागों की आवश्यकता होती है | बच्चे की माँ भली औरत है इसलिए उसके पास 13 समय के धागे हैं | बच्चे को 7 धागों पर स्थानांतरित करने की आवश्यकता है | बच्चे को 7 धागे दान करने के पश्चात् माता के पास केवल 6 धागे बचेंगे और उसका जीवन खतरे में आ जायेगा |”
हनुमान जी ने पूछा – “क्या बच्चे का पिता एक दो धागे दान कर सकता है ?”
“नहीं हनुमान जी | उसके पास केवल समय के 7 धागे हैं | वह एक भी धागा दान करने की अवस्था में नहीं है |” काल ने बताया |
“इसका अर्थ है कि या तो पुत्र का जीवन बच सकता है या माता का | दोनों एक साथ जीवित नहीं रह सकते ? क्या इन दोनों को बचाने का मार्ग आपको दिखाई दे रहा है ?” हनुमान जी ने पूछा |
काल ने उत्तर दिया – “हे हनुमान , एक साधारण मनुष्य अपने समय के धागे केवल अपने रक्त सम्बन्धियों को दान कर सकता है | लेकिन कोई तपस्वी अपने समय के धागे किसी को भी दान कर सकता है | अगर हमें कोई ऐसा तपस्वी मिल जाए जो मोक्ष के मार्ग पर हो तो वह अपने धागे सीधे इस बच्चे को या उसकी माता को दान कर सकता है |”
हनुमान जी बोले –“हे काल , जाओ और किसी पास के जंगल में ऐसे तपस्वी का पता लगाओ जो मुझसे मिलने की इच्छा रखता हो | उसे सुचना दो कि मैं यहाँ हूँ | अगर मुझसे मिलना है तो वह तुरंत यहाँ आ जाए | उसे यह भी बता देना कि यहाँ पर उसकी आवश्यकता है |”
काल वहां से ओझल हो गए और पास के एक जंगल में तपस्या कर रहे एक तपस्वी के सामने प्रकट हुए | तपस्वी को जब बताया गया कि किसान के घर में स्वयं हनुमान जी पधारे हैं तो वह तुरंत वहां आने के लिए तैयार हो गया | वह तेजी से जंगल से उस गाँव की तरफ चल पड़ा जहाँ पर किसान का घर था |
इस दौरान हनुमान जी किसान के घर की छत पर चले गए जहाँ भूखे और डरे हुए वानर किसान की पत्नी द्वारा दिया गया भोजन ग्रहण कर रहे थे |वे वानरों के सामने वानर के रूप में ही प्रकट हुए | वानरों ने तुरंत उनको पहचान लिया |हनुमान जी ने उनको आशीर्वाद दिया और जंगल जाने का रास्ता बताया | उन्होंने वानरों को सूर्य अस्त होने तक छत पर ही रहने की सलाह दी और सूर्यास्त के बाद जंगल में लौट जाने को कहा | सूर्यास्त तक हनुमान जी भी वानरों के साथ छत पर ही रहे | उन्होंने वानरों के साथ विभिन्न विषयों पर वार्तालाप किया और उनके पिछले जन्म के कर्मों के बारे में भी बताया जिनके कारण वे जंगल का रास्ता भूले और गाँव वालों के हाथों दण्डित हुए |
[सेतु की टिप्पणी : हम हनुमान जी और वानरों के बीच हुए वार्तालाप को यहाँ पर सम्मिलित नहीं कर रहे हैं अन्यथा यह अध्याय बहुत बड़ा हो जाएगा | इस वार्तालाप का इस अध्याय से सीधा कोई सम्बन्ध भी नहीं है इसलिए हम इन्हें अलग से प्रकाशित करेंगे ]
सूर्यास्त के बाद वानरों ने जंगल की तरफ हनुमान जी द्वारा बताये मार्ग पर यात्रा प्रारंभ कर दी और हनुमान जी छत से नीचे आ गए | तपस्वी अभी तक नहीं पहुंचा था | बच्चे के जीवन के आखिरी 10 मिनट बचे थे | हनुमान जी ने काल को बुलाया और पूछा – “हे काल ! तपस्वी कहाँ है ? अगर वह यहाँ 10 मिनट के अन्दर नहीं पहुंचे तो बच्चा मर जायेगा !”
काल ने उत्तर दिया –“हनुमान जी , तपस्वी जितना तेज आ सकता है इधर आ रहा है लेकिन उसे 30 मिनट के करीब समय और लगेगा | जब तक तपस्वी नहीं आता हमें बच्चे को बचाने के लिए कोई दूसरा रास्ता ढूंढना होगा | अगर अभी के लिए बच्चे की माता अपने समय के 7 धागे बच्चे को दान कर दे तो उसकी जान बच जाएगी | उसके बाद यह माता तपस्वी के आने तक अपने बचे 6 धागों से जीवन जी लेगी | तपस्वी आने के बाद अपना एक धागा इस माता को देकर इसके जीवन को खतरे से बाहर निकाल देगा |”
हनुमान जी ने बच्चे और उसकी माता की तरफ देखा | माता अपने बच्चे के पास ही बैठी हुई थी | हनुमान जी बोले –“काल ! माता यह प्रार्थना कर रही है कि उसकी जान ले ली जाए लेकिन बच्चे की जान बचा ली जाए | इसका अर्थ है कि वह अपने समय के धागे अपने बच्चे को दान करने के लिए तैयार है | आप उसके 7 धागे लेकर बच्चे को उन पर स्थानातरित कर दीजिये | यह आपके लिए कठिन कार्य नहीं है |”
काल ने बच्चे की माता की तरफ देखा और बोले – “हे हनुमान जी , उस समय के धागे के गुच्छे को देखिये जिस पर यह माता विराजमान है | वह अपने 13 के 13 धागों को कसकर पकडे हुए है | उसे 7 धागों को ढीले छोड़ना होगा, मै बलस्वरूप उसके धागे नहीं खींचूंगा | अगर उसकी प्रार्थना सच्ची है और वह सच में ही अपना जीवन अपने पुत्र के लिए न्योछावर करना चाहती है तो मुझे समझ नहीं आता उसने अपने सभी धागों को इतना कसकर क्यों पकड़ा हुआ है | इससे तो यही पता चलता है कि उसे अपने बच्चे से ज्यादा अपनी जान प्रिये है |”
“नहीं काल, ऐसा नहीं है !” हनुमान जी ने बताया – “वह अपने बच्चे से बहुत प्यार करती है | वह प्रेम से अपना जीवन अपने पुत्र का जीवन बचाने के लिए न्योछावर कर सकती है | समस्या है उसका अपने पुत्र के प्रति लगाव | “प्रेम” और “लगाव” दो अलग अलग चीजे हैं | जहाँ प्रेम मनुष्य को मुक्ति की ओर ले जाता है वही लगाव केवल भय पैदा करता है | इसी लगाव से जन्मे भय का परिणाम है कि वह अपने सभी धागों को कसकर पकडे हुए है |”
“तो उसे अपने लगाव का त्याग करना होगा हनुमान जी | तभी उसकी अपने धागों से पकड़ ढीली पड़ेगी और तभी मै उसके धागे उसके बच्चे को दे पाऊंगा |”
समय तेजी से निकल रहा था | अब केवल 4 मिनट बचे थे | वह बच्चा 4 मिनट में मृत्यु को प्राप्त होने वाला था | हनुमान जी ने कुछ सोचा और पवनदेव यानी हवा के देवता को बुलाया | जब पवनदेव प्रकट हुए तो हनुमान जी ने कहा – “हे पवनदेव ! मै आपसे आग्रह करता हूँ कि आप इस बच्चे के शरीर का तुरंत त्याग कर दें |”
पवनदेव यह सुनकर चकित हुए | उन्होंने अपने हाथ जोड़े और बोले –“हे सर्वशक्तिमान हनुमान , आप सभी भक्तों के रक्षक हैं | आप मुझे इस बच्चे के शरीर का त्याग करने के लिए क्यों कह रहे हैं ? जैसे ही मैं इसके शरीर का त्याग करूँगा , वह मर जाएगा | उसके जीवन में जो 4 मिनट बचे हुए हैं उन 4 मिनट तो कम से कम उसको जीने दीजिये | उसके बाद जैसा उसके भाग्य में लिखा है , मै उसके शरीर को छोड़ दूंगा | आप मुझे अभी उसको छोड़ने के लिए क्यों कह रहे हैं ?”
हनुमान जी बोले –“हे पवनदेव , चर्चा के लिए समय नहीं है | आप कृपा तुरंत इस बच्चे की देह का त्याग कर दीजिये |”
पवनदेव ने उसी समय उस बच्चे की देह का त्याग कर दिया | फलस्वरूप बच्चे की सांस रूक गई | हकीम ने उसे मरा घोषित कर दिया | बच्चे का पिता रोने लगा | माता अविश्वास से सुन्न सी हो गई | किसान के रोने की आवाज सुनकर पडोसी उसके घर में दौड़े चले आये | किसान की पत्नी लगभग तीन मिनट तक अविश्वास में सुन्न रही | चौथे मिनट में वह फूट पड़ी | जब उसके मन मस्तिष्क में यह विश्वास हो गया कि उसका बच्चा मर गया है उसकी सभी आशाएं और आशाओं से जन्मे सभी भय ख़त्म हो गए | परिणामस्वरूप उसका अपने समय के धागों से पकड़ ढीली हो गई | हनुमान जी ने काल की तरफ इशारा किया |
काल तुरंत हरकत में आये और बच्चे की माता के समय के 7 धागों को बच्चे की तरफ ले गए | इस तरह बच्चा उन 7 धागों पर स्थानांतरित हो गया और वह पुनर्जीवित हो गया | दुःख की चीखें ख़ुशी में तब्दील हो गई | हनुमान जी ने सुख की सांस ली | काल और पवनदेव ने हनुमान जी की बुद्धिमत्ता को प्रणाम किया | भगवान् विष्णु वैकुण्ठ से मुस्कुराए | हनुमान जी ने अपने भगवान विष्णु जी (श्री राम ) को वही से प्रणाम किया |
लेकिन कार्य अभी पूरा नहीं हुआ था | किसान की पत्नी का जीवन अभी भी खतरे में था क्योंकि अपने जीवन के 7 धागे अपने पुत्र को दान करने के पश्चात् उसके पास केवल 6 धागे बचे थे | वह उस समय किसी बीमारी के लक्षण तो नहीं महसूस कर रही थी किन्तु आवश्यक 7 धागे न होने के कारण उसके पास अंदरूनी अथवा बाहरी कोई भी संकट किसी भी समय आ सकता था | काल ने हनुमान जी को भरोसा दिलाया – “हे हनुमान जी , मै इस महिला का भविष्य देख सकता हूँ , इसके साथ अगले 3 घंटे तक तो कुछ भी बुरा घटित नहीं होगा | तब तक वह तपस्वी आकर अपने समय का एक धागा इसे दान कर देगा |”
“हे काल, वह तपस्वी इस समय कहाँ है ? क्या वह गाँव में प्रवेश कर चुका है ? उसे यहाँ पहुँचने में ओर कितना समय लगेगा ?” हनुमान जी ने काल से पूछा |
“वह नजदीक ही है हनुमान जी | उसे यहाँ पहुँचने में 20 मिनट और लगेंगे |” काल ने सूचना दी –“जब वह तपस्वी इस घर में पहुंचेगा तब तपस्वी और इस बच्चे की माता एक दुसरे के नजदीक होंगे | किन्तु इनके बीच समय के धागों का आदान प्रदान हो इसके लिए यह आवश्यक है कि तपस्वी और इस माता की आत्माएं भी नजदीक आयें |”
“उसमे क्या समस्या है ,काल ? आप इतना चिंता में क्यों हैं ? जब वह तपस्वी यहाँ आएगा वह खाना मांगेगा | किसान की पत्नी भली औरत है | वह तपस्वी की सेवा करेगी | तपस्वी खुश होकर इसे कोई वरदान देना चाहेंगे | इस प्रकार उनकी आत्माएं पास आ जाएँगी | उस क्षण आप उनके बीच समय के धागों का आदान प्रदान कर देना |” हनुमान जी बोले |
“हे हनुमान जी , यह गाँव अज्ञानी , निराशावादी और स्वयं को अत्यंत ज्ञानी मानने वाले दम्भी लोगों का गाँव है | इस घर में इतने सारे स्त्री – पुरुष इकठ्ठा हैं | मुझे भय है कि वे तपस्वी के आते ही उनके बारे में इधर उधर की मूर्खतापूर्ण बातें करना शुरू कर देंगे | तपस्वी तो क्रोधित नहीं होंगे लेकिन इन स्त्री पुरुषों की बातों से इस बच्चे की माता के मन में अनावश्यक शंकाएं पैदा हो जायेंगी और शायद वह पूर्ण समर्पण भाव के साथ तपस्वी की सेवा नहीं कर पाएगी | परिणामस्वरूप उसकी आत्मा तपस्वी की आत्मा के नजदीक नहीं आ पाएगी और मै उनके बीच समय के धागों का आदान प्रदान नहीं कर पाऊंगा |” काल ने अपना भय जाहिर किया |
हनुमान जी मुस्कुराये – “हे काल , मै इस महिला के घर आया हूँ तो यह तो पक्का है कि यह महिला साधारण नहीं है | यह भली औरत केवल अपनी आत्मा की आवाज सुनती है | वह इन इकठ्ठा हुए स्त्री पुरुषो की अज्ञान भरी बातों पर ध्यान नहीं देगी | वह तपस्वी की सेवा पूर्ण समर्पण के साथ करेगी , आप इस बारे में निश्चिन्त रहें |”
तपस्वी किसान के घर कुछ मिनट बाद पहुँच गया | जैसा कि काल चिंता जाहिर कर रहे थे , किसान के घर इकठ्ठा हुए पड़ोसियों ने तपस्वी के बारे में इधर उधर की बातें शुरू कर दी | तपस्वी घर में प्रवेश कर गए और भोजन की इच्छा जाहिर की | उनकी आँखे उस घर में हनुमान जी को ढूंढ रही थी | जैसे ही उन्होंने भोजन की इच्छा जाहिर की , उन दम्भी अज्ञानियों के समूह से एक आवाज़ आई – “सूर्य अस्त हो चुका है | असली तपस्वी सूर्यास्त के पश्चात् भिक्षा नहीं मांगते | लगता है तुम असली तपस्वी नहीं हो |”
जैसे ही तपस्वी हनुमान जी को ढूंढते हुये थोडा और अन्दर आये , उन दम्भी अज्ञानी लोगों में से किसी ने कहा – “असली तपस्वी जंगल की पत्तियां खाकर गुजारा करते है और तुम यहाँ स्वादिष्ट भोजन करने आए हो ! तुम्हारी जिह्वा तुम्हारे बश में नहीं है , तुम कैसे तपस्वी हो ?”
तपस्वी ने उन अज्ञानी स्त्री पुरुषों की मूर्खतापूर्ण बातों पर ध्यान नहीं दिया | उन्होंने फिर से खाने की इच्छा जाहिर की और घर में थोडा और अंदर आ गए | अंततः उन्हें घर के आँगन में हनुमान जी खड़े दिखाई दिए | वहां पर उपस्थित अज्ञानी भीड़ को हनुमान जी के उपस्थित होने का तनिक भी आभास नहीं था | तपस्वी आँगन में आए और हनुमान जी को साष्टांग प्रणाम किया | जब भीड़ ने तपस्वी को आँगन में पसरते देखा तो एक ने कहा –“अरे ओ बुरे तांत्रिक ! यहाँ पर किसके सामने पसर रहे हो ? यहाँ कोई नहीं है | यहाँ पर अपनी कौन सी गन्दी तंत्र विद्या का प्रयोग कर रहे हो ? निकल जाओ इस घर से |”
हनुमान जी ने तपस्वी को आशीर्वाद दिया और बोले – “उठो तपस्वी ! मै प्रसन्न हूँ ! ये अज्ञानी लोगों का झुण्ड जो बातें कर रहा है उस पर ध्यान मत दो | इन स्वार्थो मनुष्यों के मन में ऐसे दम्भी विचार ही उपजते हैं | किन्तु किसान की पत्नी भली औरत है | जाओ और उसे अपनी आत्मा को आपकी आत्मा से जोड़ने का अवसर प्रदान करो ताकि काल आपके समय के कुछ धागे उसे प्रदान कर सके |”
किसान और उसकी पत्नी बरामदे में बच्चे के समीप बैठे थे | पत्नी गर्म पानी का गिलास अपने हाथ में थामे हुए थी जिसमे से बच्चा पानी की घूंट भर रहा था | हकीम ने बच्चे को गर्म पानी पिलाने को कहा था | वे पड़ोसियों से घिरे हुए थे | तपस्वी सीधे बरामदे में गए और किसान की पत्नी से बोले – “हे भली औरत ! तुम इस घर की मालकिन लगती हो | मै घुमक्कड़ तपस्वी हूँ और इस समय पास के जंगल में ठहरा हुआ हूँ | कृपा मुझे खाने के लिए कुछ दे दे उसके बाद मै जंगल में वापिस चला जाऊँगा |”
किसान की पत्नी ने खड़े होकर तपस्वी को प्रणाम किया | वह बोली – “बाबा मै इस घर की मालकिन नहीं हूँ | मै भी आपकी ही तरह घुमक्कड़ हूँ | मेरी आत्मा एक जन्म से दुसरे जन्म तक चलती जा रही है और इस जन्म में मेरा ठिकाना यह घर है | मै इस घर की मालकिन कैसे हो सकती हूँ ? यह घर तो मेरी आत्मा की यात्रा में एक ठिकाना मात्र है |”
तपस्वी जी उस गृहस्थ महिला के मुख से ज्ञान के ऐसे शब्द सुनकर बहुत प्रसन्न हुए | महिला ने अपने पड़ोसियों को नम्रता पूर्वक वहां पर तपस्वी के बैठने के लिए थोडा स्थान खाली करने को कहा | उसने वहां एक चटाई बिछाई और तपस्वी को वहां बैठने का आग्रह किया | उसने तपस्वी को अपनी रसोई में उपलब्ध सबसे अच्छा खाना खिलाया | जब पड़ोसियों ने किसान और उसकी पत्नी को तपस्वी की सेवा करते देखा तो वे वहां से एक एक करके खिसकने लगे|
जब तपस्वी ने भोजन समाप्त किया तो किसान की पत्नी बोली – “हे ज्ञानी महाराज , बहुत अँधेरा हो चुका है | अब आपका वापिस जंगल में जाना सुरक्षित नहीं होगा | कृपा हमारे घर में ठहर जाएँ | सुबह होने पर आप जंगल में जा सकते है |”
तपस्वी ने वहां ठहरने के आग्रह को नम्रतापूर्वक ठुकरा दिया किन्तु वे किसान और उसकी पत्नी द्वारा की गई सेवा से अत्यंत प्रसन्न थे | इस तरह किसान की पत्नी की आत्मा तपस्वी के समीप आ गई | काल ने तपस्वी के समय के कुछ धागे किसान की पत्नी को प्रदान कर दिए | इस तरह किसान की पत्नी का जीवन भी सुरक्षित हो गया |
इस घटना के पश्चात् किसान की पत्नी का जीवन शांति से बीता | कोई कठिनाई उसको अथवा उसके परिवार को छू भी नहीं पाई क्योंकि हनुमान जी ने उनकी रक्षा की | इस घटना के बाद किसान की पत्नी के जीवन में दो बदलाव आए –
(1) क्योंकि तपस्वी द्वारा दान किये गए कुछ समय के धागे उसके जीवन का आधार बने , उसका व्यवहार भी कुछ कुछ तपस्वियों जैसा हो गया | वह गृहस्थ की तरह भोग और आनंद के पीछे भागने की बजाये एक तपस्वी की भांति मोक्ष की इच्छा रखने लगी |
(2) चूँकि उसने अपने समय के 7 धागे अपने पुत्र को दान किये थे और वो 7 धागे उसके पुत्र के जीवन का आधार बने थे , वह अपने पुत्र के साथ अत्यधिक जुड़ाव महसूस करने लगी | इसी अत्यधिक लगाव के कारण उसे मोक्ष नहीं मिला | लगाव इतना तीव्र था कि मृत्यु के पश्चात् भी उसकी आत्मा दूसरा जन्म लेने की बजाये अपने पुत्र के आस पास भटकती रही | जब उसका पुत्र बूढा होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ तब जाकर उस माँ की आत्मा ने नया जीवन धारण किया |
उसके पुत्र की बुढा होकर हुई मृत्यु के पश्चात् उसकी आत्मा ने मातंग समुदाय में जन्म लिया ताकि वह अपने मोक्ष की इच्छा पूरी कर सके | उसका नाम रखा गया “उर्मी” | उसके पुत्र ने भी लगभग उसी समय दूसरा जन्म किसी दुसरे स्थान पर ले लिया | इस तरह वह माँ और उसका बच्चा इस जन्म में लगभग एक ही उम्र के है और अलग अलग स्थानों पर रहते हैं | अर्थात वे इस जन्म में बिछुड़े हुए हैं , साथ साथ नहीं है | उसकी आत्मा यह नया जन्म पूर्णतः स्वीकार नहीं कर रही थी क्योंकि वह अपने बेटे से बिछुड़ गई थी | इसी कारण उसके नए जन्म यानी उर्मी के शरीर में उसको दौरे आते थे | जब हनुमान जी मातंग समुदाय में आये उसके दुसरे दिन भी उसे दौरा आया जब वह अन्य मातंग महिलाओं के साथ लकड़ियाँ चुनने गई |
[सेतु की टिप्पणी: वह लड़का जो पिछले जन्म में किसान का बेटा था , अब वह दिल्ली नामक शहर में रहता है जो भारत देश में है | अगले अध्याय में आप पढेंगे कि कैसे हनुमान जी ने उर्मी के दौरे की समस्या हल की और उस समय उस लड़के ने दिल्ली में क्या अनुभव किया |
हनुमान जी की लीलाओं का यह अध्याय यही समाप्त होता है |
जिस समय उसे दौरा आया हनुमान जी उसके पास आ गए थे | अश्विन जो स्वास्थ्य के जुड़वां देवता हैं वे वहां पर हनुमान जी से पहले ही पहुँच गए थे | उन्होंने हनुमान जी को प्रणाम किया और कहा – “हे सर्वशक्तिमान हनुमान , हम जानते हैं कि मातंग आपको बहुत प्रिये हैं और आप उनको किसी समस्या से ग्रस्त नहीं देख सकते | लेकिन उर्मी के रोग में उसकी सहायता करने में हम असमर्थ हैं | अपनी पूरा ज्ञान प्रयोग करने के पश्चात् भी हम इसके दौरे ठीक नहीं कर पाए |”
धुप अच्छे से खिली हुई थी | सूर्य का प्रकाश पेड़ की पत्तियों से छनकर उर्मी के चेहरे पर पड़ रहा था | हनुमान जी ने उसकी तरफ देखा और फिर अश्विनो को बोले – “हे जुडवा देवो, हाँ मातंग मुझे अति प्रिये हैं | मै उर्मी को इसी समय स्वस्थ करना चाहता हूँ | किन्तु उर्मी को ठीक करने के लिए आपको इसका इतिहास जानना जरूरी है | आपको इसके पिछले जन्म के बारे में जानना आवश्यक है | अपनी आँखें बंद करो | मै आपको इसकी आत्मा की पिछले जन्म की यात्रा का दर्शन कराता हूँ |”
अश्विन देवों ने अपनी आँखे बंद की तो उन्हें यह दिखाई दिया :
उर्मी अपने पिछले जन्म में एक छोटे से गाँव में एक किसान की पत्नी थी | एक बार जंगल से कुछ वानर रास्ता भूल गए और उस गाँव में आ गए | गाँव के बच्चे और बेकार लोगों ने वानरों पर पथ्थर फेंकना शुरू कर दिया | एक छत से दूसरी , दूसरी से तीसरी , इस तरह बच्चों और बेकारों का टोला वानरों का पीछा करने लगा | यहाँ तक कि उन्होंने पास के खेतों में भी वानरों को चैन से नहीं बैठने दिया | तीन दिन तक यहीं सिलसिला चलता रहा और तीन दिन तक वानरों को कुछ खाने को नहीं मिला | वे दिन में यहाँ से वहां जान बचाकर भागते और रात को कहीं छुपकर बैठ जाते |
चौथे दिन वे बहुत ही थके हुए और परेशान थे | दोपहर हो चुकी थी लेकिन उन्हें न तो खाने को कुछ मिला न ही शांति से कहीं बैठने का अवसर मिला | वे उस किसान की पत्नी के घर की छत पर पहुंचे | यह घर गाँव की सीमा पर एकांत में था और चारो और से बाकी गाँव से हटकर था | उस छत पर वानरों ने तुलनात्मक रूप से अपने आपको सुरक्षित महसूस किया |लेकिन इससे पहले कि वे उस छत पर सुख की सांस लेते , उन्हें वहां पर किसी के होने का अहसास हुआ |
किसान का 9 साल का बेटा लकड़ी की सीढ़ी के सबसे उपरी पायदान पर कुछ इस तरह खड़ा हुआ था कि सिर्फ उसका सिर मुंडेर से ऊपर निकला हुआ था और वह कौतुहल से छत पर बैठे वानरों को देख रहा था | जब वानरों ने उसको देखा तो उसको वहां से डराकर भगाने के लिए सारे वानर एक साथ दांत निकालकर चीखे | बच्चा डर गया और सीढ़ी से उसकी पकड़ छूट गई | वह नीचे गिर गया और सीधे जमीन पर टकराया | गिरते ही वह अचेत हो गया | गाँव के हकीम को बुलाया गया | बच्चे का पिता यानी किसान भी खेतों से दौड़ा दौड़ा घर पहुंचा | हकीम ने अपना इलाज शुरू किया लेकिन बच्चे की हालत गंभीर थी |
जब ग्रामवासियों को पता चला कि वानरों के कारण एक बच्चा घायल हो गया है तो वे वानरों को मारने के लिए हाथ में लाठियां लेकर बड़ी संख्या में इकठ्ठे हो गए | वानर उस छत से भाग खड़े हुए और गाँव वालों ने उनको जान से मारने के इरादे से पीछा करना शुरू कर दिया |
वानर बुरी तरह पिट गए किन्तु वे भागते रहे | छिपने के लिए उन्हें कोई स्थान नजर नहीं आ रहा था | कुछ घंटे बाद वे उसी किसान की छत पर वापिस आ गए क्योंकि वही एक घर था जिसकी छत अन्य किसी घर के साथ नहीं जुडी हुई थी | जब भीड़ छत पर चढ़ने के लिए किसान के घर आई तो किसान की पत्नी ने उनको वहां से चले जाने को कहा | उसने उनमे से किसी को भी ऊपर नहीं चढ़ने दिया | उसने सबको वहां से यह कहकर चले जाने की प्रार्थना की कि उसका बेटा जिंदगी और मौत के बीच झूझ रहा है | जो बच्चे उसकी छत पर पत्थर फेंक रहे थे वह उन पर चिल्लाई | वह तब तक अपने घर के दरवाजे से नहीं हिली जब तक कि उस भीड़ का आखिरी व्यक्ति भी वहां से नहीं चला गया |
हकीम ने गर्म पानी माँगा | वह अन्दर गई और गर्म पानी चूल्हे पर रख दिया | उसकी छठी इंद्री संकेत दे रही थी कि कुछ गलत होने वाला है लेकिन वह अपने आपको विश्वास दिला रही थी कि उसके बच्चे को केवल हल्की सी चोट लगी है और वह जल्द ठीक हो जायेगा | जब पानी गर्म हो गया तो वह हकीम के पास एक गिलास पानी ले गई | हकीम बच्चे के हाथ रगड़ रहा था | वह भूल गया कि उसने गर्म पानी क्यों मंगवाया था | उसे खुद नहीं पता था कि वह क्या कर रहा है | वह सिर्फ दिखावा कर रहा था कि वह जो कुछ कर रहा है उसे उसका पूरा ज्ञान है | बच्चे को कोई बाहरी चोट नहीं लगी थी | चोट मस्तिष्क के अन्दर लगी थी | किसान और उसकी पत्नी को हकीम पर पूरा विश्वास था |
पत्नी गर्म पानी देकर रसोई में आ गई | अपने आपको यह विश्वास दिलाने के लिए कि सब कुछ पहले जैसा ही है और अपने डर को दबाने के लिए वह रसोई में कुछ काम ढूँढने लगी | वह खाना पहले ही बना चुकी थी | कोई काम बाकी नहीं था | उसके मन में एक विचार आया | उसने कुछ खाना और खेतो में से लाये गए कुछ ताजे फल लिए | वह सीढ़ी से ऊपर चढ़ी और खाना तथा फल वानरों के लिए छत पर फेंक दिया |
उस क्षण श्री हनुमान जी किसी जंगल में ध्यान कर रहे थे | हर क्षण हजारों लोग वानरों को भोजन खिलाते हैं लेकिन जब किसान की पत्नी ने वानरों को भोजन दिया तो हनुमान जी को सूचना घंटी बजती सुनाई दी | वे तुरंत ध्यान की मुद्रा से उठे और समय के देवता काल को बुलाया | जब काल हाजिर हुए तो हनुमान जी ने पूछा – “काल ! मै अपने प्रभु के चरणों के ध्यान में मग्न था कि तभी मुझे एक सुचना घंटी सुनाई दी | ऐसी घंटी तब सुनाई देती है जब कोई भक्त कड़ी तपस्या करता है | मुझे बताइए कि अभी अभी मुझे प्रसन्न करने के लिए कड़ा तप किसने किया | मै अपने प्रभु के ध्यान में मग्न था अतः मै नहीं देख पाया |”
काल ने उत्तर दिया – “हे सर्व शक्तिमान हनुमान , मुझे भी वह कम्पन सुनाई दिया जो आपने सुना | एक किसान का घर इस कम्पन का उद्गम स्थल था | मै सिर्फ इतना देख पाया कि किसान की पत्नी ने कुछ वानरों को भोजन दिया जो उसके घर की छत पर बैठे थे और तीन दिन से भूखे थे |”
“हे काल ऐसी घंटी तब बजती है जब मेरे या भगवान् विष्णु के प्रति असाधारण भक्ति का प्रदर्शन होता है | अगर यह घंटी किसान की पत्नी द्वारा वानरों को भोजन देने से बजी है तो ये वानर कौन हैं जिनको भोजन दिया गया है | वे कोई साधारण वानर नहीं हो सकते | क्या वे मातंगों के वानर हैं ?” हनुमान जी ने पूछा |
“हे हनुमान , मातंग तो इस किसान के घर से बहुत दूर रहते हैं | वे यहाँ नहीं आ सकते | मुझे तो वे साधारण वानर ही लगते हैं अन्यथा वे जंगल का रास्ता कैसे भूलते ? मै किसान की पत्नी द्वारा इन वानरों को फल खिलाने के कार्य में कुछ असाधारण नहीं देखता | मै आपको यह घटना फिर से दिखाता हूँ | आप स्वयं देख लीजिये |” काल चूँकि समय के देव है , उन्होंने उस घटना को हनुमान जी को फिर से ज्यों का त्यों दिखा दिया |
किसान के घर हुई घटना को देखने के बाद हनुमान जी बोले – “हे काल, वानर साधारण हैं लेकिन किसान की पत्नी द्वारा किया गया कार्य असाधारण है | जब कोई स्त्री अपनी रसोई में जाती है तब वह अपने परिवार के बारे में यह सोचती है कि सबने खाना खाया या नहीं | जब किसान की पत्नी अपनी रसोई में गई तब उसे अपनी छत पर बैठे वानरों का भी विचार आया |अर्थात उसने वानरों को केवल इसलिए अपने परिवार का सदस्य समझा क्योंकि वे उसकी छत पर बैठे थे |उसने वानरों को भोजन शुद्ध प्रेम की पवित्र भावना के साथ दिया |”
“वह आपकी परम भक्त लगती है हनुमान जी |” काल ने टिपण्णी की |
“वह मेरी पूजा नहीं करती क्योंकि उसके गाँव में यह भ्रान्ति फैली हुई है कि महिलाओं को मेरी पूजा नहीं करनी चाहिए | वह इस भ्रान्ति में विश्वास नहीं करती किन्तु उसे गाँव की परम्पराओं का निर्वाह करना पड़ता है | वह मेरी पूजा भले ही न करती हो लेकिन वह बहुत ही सत्कर्मी स्त्री है | उसका हर कार्य एक परम भक्त द्वारा किए जाने वाले कार्यों जैसा ही है | हे काल ! जब वह किसी कठिनाई में आएगी तब वह मेरी पूजा नहीं करेगी | अतः मुझे पता नहीं चलेगा कि वह कठिनाई में है | मै आपको यह उतरदायित्व देता हूँ कि जब भी यह स्त्री कठिनाई में हो , आप मुझे सूचित करें ताकि मै इसकी रक्षा कर सकूँ |”
किस जीव के भविष्य में क्या आने वाला है यह काल को भली भांति पता है | काल ने किसान के बच्चे के भविष्य की गणना की और बोले – “हे हनुमान जी , यह स्त्री को आपकी आवश्यकता इसी समय है | उसका बच्चा बेहोश है और जैसा कि मै साफ़ देख सकता हूँ ठीक 6 घंटे और तीस मिनट में उसकी मृत्यु हो जाएगी | केवल आप ही इतने शक्तिशाली हैं कि मृत्यु को हराकर इस बच्चे के जीवन की रक्षा कर सकें |”
हनुमान जी ने जैसे ही यह सुना वे वहां से ओझल हो गए और तुरंत किसान के घर पहुंचे |
[सेतु की टिप्पणी : रामायण काल में हनुमान जी पवन वेग से उड़ते थे लेकिन जब उन्हें चिरंजीवी होने का वरदान मिला तब वे समय के बंधन से मुक्त हो गए | अब वे असीम गति से चलते हैं अर्थात उन्हें एक स्थान से दुसरे स्थान पर पहुँचने में बिलकुल भी समय नहीं लगता चाहे दूरी लाखो मील की हो या एक मील की ]
गाँव के मानकों के अनुसार किसान का घर अच्छे से बना हुआ था | बच्चा बरामदे में पड़ी खाट पर लिटा रखा था | हकीम और बच्चे का पिता उसके पास बैठे हुए उसकी मूर्छा तोड़ने का प्रयास कर रहे थे | किसान की पत्नी चिंता में घर के एक कोने से दुसरे कोने में आ जा रही थी | हनुमान जी ने मनुष्य की नजर से बच्चे को देखा | बच्चे के शरीर पर कहीं भी चोट दिखाई नहीं दी | कही से भी खून नहीं निकला था | शायद चोट मस्तिष्क के अन्दर लगी थी | हनुमान जी ने स्वास्थ्य के जुड़वाँ देवों अश्विन को बुलाया |
अन्य देवों की तरह अश्विन भी जीवो के लिए अदृश्य हैं | नश्वर संसार की कोई भी वस्तु वे भेद सकते हैं | उदाहरण के तौर पर वे एक पक्की दीवार को बिना तोड़े उसके अन्दर से गुजर सकते हैं | मस्तिष्क की सर्जरी करने के लिए उनको मष्तिष्क को कहीं से काटने की जरूरत नहीं पड़ती | उनके औजार बिना काटे मस्तिष्क के अन्दर घुस सकते हैं |उन्होंने बच्चे के मस्तिष्क की सर्जरी की लेकिन बच्चे को होश नहीं आया | अश्विन बोले –“हे हनुमान , मस्तिष्क में एक चोट लगी थी जिसे हमने ठीक कर दिया है | अब बच्चे का शरीर और मस्तिष्क पूरी तरह ठीक है फिर भी यह होश में नहीं आया है | हमें लगता है कि यह बच्चा अब होश में नहीं आ सकता क्योंकि इसकी चेतना अगले जन्म की ओर प्रस्थान कर चुकी है | अब इसकी चेतना को इस शरीर में लाना संभव नहीं है | अब इसकी चेतना दूसरा शरीर ही धारण करेगी |”
हनुमान जी ने अश्विनों को धन्यवाद दिया और उन्हें जाने की आज्ञा दे दी | अगर किसी के शरीर से खून बह गया हो तो कहा जा सकता है कि वह मरेगा | अगर कोई किसी खतरनाक अवस्था में हो तब कहा जा सकता है कि वह मरेगा | लेकिन जैसा कि अश्विनो ने घोषित किया था , बच्चे का शरीर तथा मस्तिष्क दोनों स्वस्थ थे | कम से कम किसी मनुष्य की आँखों से देखने से तो उस बच्चे के आस पास कोई खतरा भी नहीं नजर आ रहा था | फिर भी वो बच्चा मरने वाला था ! क्या कोई ऐसा खतरा वहां पर था जिसे मनुष्य की आँखों से देखना असंभव हो ? अगर वह बच्चा मरता तो कोई भी इंसान भगवान् , शैतान या फिर किसी अदृश्य शक्ति को दोष देता | लेकिन हनुमान जी के लिए तो कुछ भी अदृश्य नहीं है | वे सब कुछ देख सकते है | वे बच्चे की मौत का कारण जानकर उसे बचा सकते थे | उन्होंने एक पल के लिए कुछ सोचा और पुनः काल यानि समय के देवता को बुलाया |
साधारण जीव समय को नहीं देख सकते | वे केवल इसे महसूस कर सकते है | वे महसूस कर सकते हैं कि समय कभी नहीं रुकता | यह हमेशा एक ही दिशा में चलता है और वो दिशा है भविष्य की दिशा | यह कभी भूतकाल की तरफ नहीं चलता | हनुमान जी के लिए समय भी किसी अन्य वस्तु की तरह ही दिखाई देता है | जब उन्होंने काल को बुलाया और काल वहां प्रकट हुए तो उन्हें समय दिखाई देने लगा | समय पतले धागों का एक विशाल जाल है | यह जाल एक विशालकाय मकड़ी के जाले की तरह ही है | सभी जीव तथा वस्तुएं इस विशालकाय समय के जाल में फंसी हुई हैं | जहाँ मकड़ी के जाल के धागे स्थिर होते हैं , समय के जाल के धागे गतिशील होते हैं |ये धागे एक ही दिशा में चलते रहते हैं और वो दिशा है भविष्य की दिशा | समय के जाल के धागों का एक गुच्छा एक गतिशील पट्टे की तरह काम करता है | चाहे मनुष्य खड़ा हो , बैठा हो , सो रहा हो , भाग रहा हो , नाच रहा हो या कुछ भी कर रहा हो वह समय के अदृश्य धागों के गुच्छों पर हमेशा चलता रहता है |
जब काल वहां पर प्रकट हुए तो हनुमान जी ने बच्चे की ओर देखा क्योंकि अब काल का जाल नजर आ रहा था जिसमे हम सब फंसे होते हैं | हनुमान जी ने कहा – “हे काल , मै देख सकता हूँ कि बच्चा सुविधापूर्वक समय के धागों पर लेटा हुआ है | मुझे कोई धागा टूटा हुआ नहीं दिखाई दे रहा | फिर क्या कारण है कि यह बच्चा 6 घंटों में मरने वाला है ?”
काल ने बताया – “भगवन , जिन समय के धागों पर यह बच्चा लेटा हुआ है उन धागों को ध्यान से देखिये | ये धागे गतिमान हैं और बच्चे को आगे की ओर ले जा रहे हैं | आगे एक चरम अंत (डेड एंड ) है | यह बच्चा 6 घंटे में उस चरम अंत पर पहुँच जाएगा | वो देखिये वो रहा चरम अंत ...”
हनुमान जी ने ध्यान से उस चरम अंत (डेड एंड) की ओर दृष्टि डाली जिसकी ओर काल संकेत कर रहे थे | वास्तव में वह डेड एंड नहीं बल्कि समय के धागे वहां नीचे की तरफ 90 डिग्री का तीव्र मोड़ ले रहे थे | यह मोड़ एक डेड एंड की तरह लग रहा था जहाँ से वह बच्चा गिरने वाला था | केवल हनुमान जी ओर काल यह देखने में सक्षम थे कि बच्चा समय के धागों पर गतिमान है और 6 घंटे में उस मोड़ से नीचे गिरने वाला है | मनुष्य की आँखों से तो केवल यह दिखाई दे रहा था कि बच्चा एक खाट पर आराम से लेटा हुआ है | अगर बच्चा मरता तो किसी भी मनुष्य को केवल यही दिखाई देता कि उसकी सांस थम गई है | केवल हनुमान जी और काल ही समय के उस जाल के खतरों को देख पा रहे थे |
हनुमान जी ने कहा –“अगर हम इस बच्चे को समय के धागों पर बने इस खतरनाक मोड़ से गिरने से बचा ले तो इसकी जान बच सकती है |”
काल बोले –“अगर यह बच्चा धागे के इसी गुच्छे पर रहेगा जिस पर इस समय है तो वह अवश्य उस मोड़ पर पहुंचेगा और गिर जाएगा | इसका जीवन बचाने के लिए हमें इसको समय के धागों के दुसरे गुच्छे पर स्थानांतरित करना पड़ेगा |”
हनुमान जी बोले –“वह तो सरल कार्य है , काल ! आप कोई भी समय के धागों का खाली गुच्छा ढूंढकर इस बच्चे को वहां स्थानांतरित कर सकते हैं |”
काल बोले –“हे हनुमान! हम इस बच्चे को किसी भी खाली पड़े गुच्छे पर स्थानांतरित नहीं कर सकते | बच्चे का कोई रक्त सम्बन्धी ही अपने समय के धागे इस बच्चे को दान कर सकता है | उन दान किए गए धागों पर ही हम इस बच्चे को स्थानांतरित कर सकते हैं |”
“बच्चे की माता अपने समय के कुछ धागे अपने बच्चे को प्रसन्नता से दान करेगी | बच्चे का जीवन बचाने के लिए कितने धागों की आवश्यकता है ?” हनुमान जी ने पूछा |
काल ने उतर दिया –“हे हनुमान जी , किसी भी मनुष्य को सुरक्षित जीवन जीने के लिए कम से कम 7 समय के धागों की आवश्यकता होती है | बच्चे की माँ भली औरत है इसलिए उसके पास 13 समय के धागे हैं | बच्चे को 7 धागों पर स्थानांतरित करने की आवश्यकता है | बच्चे को 7 धागे दान करने के पश्चात् माता के पास केवल 6 धागे बचेंगे और उसका जीवन खतरे में आ जायेगा |”
हनुमान जी ने पूछा – “क्या बच्चे का पिता एक दो धागे दान कर सकता है ?”
“नहीं हनुमान जी | उसके पास केवल समय के 7 धागे हैं | वह एक भी धागा दान करने की अवस्था में नहीं है |” काल ने बताया |
“इसका अर्थ है कि या तो पुत्र का जीवन बच सकता है या माता का | दोनों एक साथ जीवित नहीं रह सकते ? क्या इन दोनों को बचाने का मार्ग आपको दिखाई दे रहा है ?” हनुमान जी ने पूछा |
काल ने उत्तर दिया – “हे हनुमान , एक साधारण मनुष्य अपने समय के धागे केवल अपने रक्त सम्बन्धियों को दान कर सकता है | लेकिन कोई तपस्वी अपने समय के धागे किसी को भी दान कर सकता है | अगर हमें कोई ऐसा तपस्वी मिल जाए जो मोक्ष के मार्ग पर हो तो वह अपने धागे सीधे इस बच्चे को या उसकी माता को दान कर सकता है |”
हनुमान जी बोले –“हे काल , जाओ और किसी पास के जंगल में ऐसे तपस्वी का पता लगाओ जो मुझसे मिलने की इच्छा रखता हो | उसे सुचना दो कि मैं यहाँ हूँ | अगर मुझसे मिलना है तो वह तुरंत यहाँ आ जाए | उसे यह भी बता देना कि यहाँ पर उसकी आवश्यकता है |”
काल वहां से ओझल हो गए और पास के एक जंगल में तपस्या कर रहे एक तपस्वी के सामने प्रकट हुए | तपस्वी को जब बताया गया कि किसान के घर में स्वयं हनुमान जी पधारे हैं तो वह तुरंत वहां आने के लिए तैयार हो गया | वह तेजी से जंगल से उस गाँव की तरफ चल पड़ा जहाँ पर किसान का घर था |
इस दौरान हनुमान जी किसान के घर की छत पर चले गए जहाँ भूखे और डरे हुए वानर किसान की पत्नी द्वारा दिया गया भोजन ग्रहण कर रहे थे |वे वानरों के सामने वानर के रूप में ही प्रकट हुए | वानरों ने तुरंत उनको पहचान लिया |हनुमान जी ने उनको आशीर्वाद दिया और जंगल जाने का रास्ता बताया | उन्होंने वानरों को सूर्य अस्त होने तक छत पर ही रहने की सलाह दी और सूर्यास्त के बाद जंगल में लौट जाने को कहा | सूर्यास्त तक हनुमान जी भी वानरों के साथ छत पर ही रहे | उन्होंने वानरों के साथ विभिन्न विषयों पर वार्तालाप किया और उनके पिछले जन्म के कर्मों के बारे में भी बताया जिनके कारण वे जंगल का रास्ता भूले और गाँव वालों के हाथों दण्डित हुए |
[सेतु की टिप्पणी : हम हनुमान जी और वानरों के बीच हुए वार्तालाप को यहाँ पर सम्मिलित नहीं कर रहे हैं अन्यथा यह अध्याय बहुत बड़ा हो जाएगा | इस वार्तालाप का इस अध्याय से सीधा कोई सम्बन्ध भी नहीं है इसलिए हम इन्हें अलग से प्रकाशित करेंगे ]
सूर्यास्त के बाद वानरों ने जंगल की तरफ हनुमान जी द्वारा बताये मार्ग पर यात्रा प्रारंभ कर दी और हनुमान जी छत से नीचे आ गए | तपस्वी अभी तक नहीं पहुंचा था | बच्चे के जीवन के आखिरी 10 मिनट बचे थे | हनुमान जी ने काल को बुलाया और पूछा – “हे काल ! तपस्वी कहाँ है ? अगर वह यहाँ 10 मिनट के अन्दर नहीं पहुंचे तो बच्चा मर जायेगा !”
काल ने उत्तर दिया –“हनुमान जी , तपस्वी जितना तेज आ सकता है इधर आ रहा है लेकिन उसे 30 मिनट के करीब समय और लगेगा | जब तक तपस्वी नहीं आता हमें बच्चे को बचाने के लिए कोई दूसरा रास्ता ढूंढना होगा | अगर अभी के लिए बच्चे की माता अपने समय के 7 धागे बच्चे को दान कर दे तो उसकी जान बच जाएगी | उसके बाद यह माता तपस्वी के आने तक अपने बचे 6 धागों से जीवन जी लेगी | तपस्वी आने के बाद अपना एक धागा इस माता को देकर इसके जीवन को खतरे से बाहर निकाल देगा |”
हनुमान जी ने बच्चे और उसकी माता की तरफ देखा | माता अपने बच्चे के पास ही बैठी हुई थी | हनुमान जी बोले –“काल ! माता यह प्रार्थना कर रही है कि उसकी जान ले ली जाए लेकिन बच्चे की जान बचा ली जाए | इसका अर्थ है कि वह अपने समय के धागे अपने बच्चे को दान करने के लिए तैयार है | आप उसके 7 धागे लेकर बच्चे को उन पर स्थानातरित कर दीजिये | यह आपके लिए कठिन कार्य नहीं है |”
काल ने बच्चे की माता की तरफ देखा और बोले – “हे हनुमान जी , उस समय के धागे के गुच्छे को देखिये जिस पर यह माता विराजमान है | वह अपने 13 के 13 धागों को कसकर पकडे हुए है | उसे 7 धागों को ढीले छोड़ना होगा, मै बलस्वरूप उसके धागे नहीं खींचूंगा | अगर उसकी प्रार्थना सच्ची है और वह सच में ही अपना जीवन अपने पुत्र के लिए न्योछावर करना चाहती है तो मुझे समझ नहीं आता उसने अपने सभी धागों को इतना कसकर क्यों पकड़ा हुआ है | इससे तो यही पता चलता है कि उसे अपने बच्चे से ज्यादा अपनी जान प्रिये है |”
“नहीं काल, ऐसा नहीं है !” हनुमान जी ने बताया – “वह अपने बच्चे से बहुत प्यार करती है | वह प्रेम से अपना जीवन अपने पुत्र का जीवन बचाने के लिए न्योछावर कर सकती है | समस्या है उसका अपने पुत्र के प्रति लगाव | “प्रेम” और “लगाव” दो अलग अलग चीजे हैं | जहाँ प्रेम मनुष्य को मुक्ति की ओर ले जाता है वही लगाव केवल भय पैदा करता है | इसी लगाव से जन्मे भय का परिणाम है कि वह अपने सभी धागों को कसकर पकडे हुए है |”
“तो उसे अपने लगाव का त्याग करना होगा हनुमान जी | तभी उसकी अपने धागों से पकड़ ढीली पड़ेगी और तभी मै उसके धागे उसके बच्चे को दे पाऊंगा |”
समय तेजी से निकल रहा था | अब केवल 4 मिनट बचे थे | वह बच्चा 4 मिनट में मृत्यु को प्राप्त होने वाला था | हनुमान जी ने कुछ सोचा और पवनदेव यानी हवा के देवता को बुलाया | जब पवनदेव प्रकट हुए तो हनुमान जी ने कहा – “हे पवनदेव ! मै आपसे आग्रह करता हूँ कि आप इस बच्चे के शरीर का तुरंत त्याग कर दें |”
पवनदेव यह सुनकर चकित हुए | उन्होंने अपने हाथ जोड़े और बोले –“हे सर्वशक्तिमान हनुमान , आप सभी भक्तों के रक्षक हैं | आप मुझे इस बच्चे के शरीर का त्याग करने के लिए क्यों कह रहे हैं ? जैसे ही मैं इसके शरीर का त्याग करूँगा , वह मर जाएगा | उसके जीवन में जो 4 मिनट बचे हुए हैं उन 4 मिनट तो कम से कम उसको जीने दीजिये | उसके बाद जैसा उसके भाग्य में लिखा है , मै उसके शरीर को छोड़ दूंगा | आप मुझे अभी उसको छोड़ने के लिए क्यों कह रहे हैं ?”
हनुमान जी बोले –“हे पवनदेव , चर्चा के लिए समय नहीं है | आप कृपा तुरंत इस बच्चे की देह का त्याग कर दीजिये |”
पवनदेव ने उसी समय उस बच्चे की देह का त्याग कर दिया | फलस्वरूप बच्चे की सांस रूक गई | हकीम ने उसे मरा घोषित कर दिया | बच्चे का पिता रोने लगा | माता अविश्वास से सुन्न सी हो गई | किसान के रोने की आवाज सुनकर पडोसी उसके घर में दौड़े चले आये | किसान की पत्नी लगभग तीन मिनट तक अविश्वास में सुन्न रही | चौथे मिनट में वह फूट पड़ी | जब उसके मन मस्तिष्क में यह विश्वास हो गया कि उसका बच्चा मर गया है उसकी सभी आशाएं और आशाओं से जन्मे सभी भय ख़त्म हो गए | परिणामस्वरूप उसका अपने समय के धागों से पकड़ ढीली हो गई | हनुमान जी ने काल की तरफ इशारा किया |
काल तुरंत हरकत में आये और बच्चे की माता के समय के 7 धागों को बच्चे की तरफ ले गए | इस तरह बच्चा उन 7 धागों पर स्थानांतरित हो गया और वह पुनर्जीवित हो गया | दुःख की चीखें ख़ुशी में तब्दील हो गई | हनुमान जी ने सुख की सांस ली | काल और पवनदेव ने हनुमान जी की बुद्धिमत्ता को प्रणाम किया | भगवान् विष्णु वैकुण्ठ से मुस्कुराए | हनुमान जी ने अपने भगवान विष्णु जी (श्री राम ) को वही से प्रणाम किया |
लेकिन कार्य अभी पूरा नहीं हुआ था | किसान की पत्नी का जीवन अभी भी खतरे में था क्योंकि अपने जीवन के 7 धागे अपने पुत्र को दान करने के पश्चात् उसके पास केवल 6 धागे बचे थे | वह उस समय किसी बीमारी के लक्षण तो नहीं महसूस कर रही थी किन्तु आवश्यक 7 धागे न होने के कारण उसके पास अंदरूनी अथवा बाहरी कोई भी संकट किसी भी समय आ सकता था | काल ने हनुमान जी को भरोसा दिलाया – “हे हनुमान जी , मै इस महिला का भविष्य देख सकता हूँ , इसके साथ अगले 3 घंटे तक तो कुछ भी बुरा घटित नहीं होगा | तब तक वह तपस्वी आकर अपने समय का एक धागा इसे दान कर देगा |”
“हे काल, वह तपस्वी इस समय कहाँ है ? क्या वह गाँव में प्रवेश कर चुका है ? उसे यहाँ पहुँचने में ओर कितना समय लगेगा ?” हनुमान जी ने काल से पूछा |
“वह नजदीक ही है हनुमान जी | उसे यहाँ पहुँचने में 20 मिनट और लगेंगे |” काल ने सूचना दी –“जब वह तपस्वी इस घर में पहुंचेगा तब तपस्वी और इस बच्चे की माता एक दुसरे के नजदीक होंगे | किन्तु इनके बीच समय के धागों का आदान प्रदान हो इसके लिए यह आवश्यक है कि तपस्वी और इस माता की आत्माएं भी नजदीक आयें |”
“उसमे क्या समस्या है ,काल ? आप इतना चिंता में क्यों हैं ? जब वह तपस्वी यहाँ आएगा वह खाना मांगेगा | किसान की पत्नी भली औरत है | वह तपस्वी की सेवा करेगी | तपस्वी खुश होकर इसे कोई वरदान देना चाहेंगे | इस प्रकार उनकी आत्माएं पास आ जाएँगी | उस क्षण आप उनके बीच समय के धागों का आदान प्रदान कर देना |” हनुमान जी बोले |
“हे हनुमान जी , यह गाँव अज्ञानी , निराशावादी और स्वयं को अत्यंत ज्ञानी मानने वाले दम्भी लोगों का गाँव है | इस घर में इतने सारे स्त्री – पुरुष इकठ्ठा हैं | मुझे भय है कि वे तपस्वी के आते ही उनके बारे में इधर उधर की मूर्खतापूर्ण बातें करना शुरू कर देंगे | तपस्वी तो क्रोधित नहीं होंगे लेकिन इन स्त्री पुरुषों की बातों से इस बच्चे की माता के मन में अनावश्यक शंकाएं पैदा हो जायेंगी और शायद वह पूर्ण समर्पण भाव के साथ तपस्वी की सेवा नहीं कर पाएगी | परिणामस्वरूप उसकी आत्मा तपस्वी की आत्मा के नजदीक नहीं आ पाएगी और मै उनके बीच समय के धागों का आदान प्रदान नहीं कर पाऊंगा |” काल ने अपना भय जाहिर किया |
हनुमान जी मुस्कुराये – “हे काल , मै इस महिला के घर आया हूँ तो यह तो पक्का है कि यह महिला साधारण नहीं है | यह भली औरत केवल अपनी आत्मा की आवाज सुनती है | वह इन इकठ्ठा हुए स्त्री पुरुषो की अज्ञान भरी बातों पर ध्यान नहीं देगी | वह तपस्वी की सेवा पूर्ण समर्पण के साथ करेगी , आप इस बारे में निश्चिन्त रहें |”
तपस्वी किसान के घर कुछ मिनट बाद पहुँच गया | जैसा कि काल चिंता जाहिर कर रहे थे , किसान के घर इकठ्ठा हुए पड़ोसियों ने तपस्वी के बारे में इधर उधर की बातें शुरू कर दी | तपस्वी घर में प्रवेश कर गए और भोजन की इच्छा जाहिर की | उनकी आँखे उस घर में हनुमान जी को ढूंढ रही थी | जैसे ही उन्होंने भोजन की इच्छा जाहिर की , उन दम्भी अज्ञानियों के समूह से एक आवाज़ आई – “सूर्य अस्त हो चुका है | असली तपस्वी सूर्यास्त के पश्चात् भिक्षा नहीं मांगते | लगता है तुम असली तपस्वी नहीं हो |”
जैसे ही तपस्वी हनुमान जी को ढूंढते हुये थोडा और अन्दर आये , उन दम्भी अज्ञानी लोगों में से किसी ने कहा – “असली तपस्वी जंगल की पत्तियां खाकर गुजारा करते है और तुम यहाँ स्वादिष्ट भोजन करने आए हो ! तुम्हारी जिह्वा तुम्हारे बश में नहीं है , तुम कैसे तपस्वी हो ?”
तपस्वी ने उन अज्ञानी स्त्री पुरुषों की मूर्खतापूर्ण बातों पर ध्यान नहीं दिया | उन्होंने फिर से खाने की इच्छा जाहिर की और घर में थोडा और अंदर आ गए | अंततः उन्हें घर के आँगन में हनुमान जी खड़े दिखाई दिए | वहां पर उपस्थित अज्ञानी भीड़ को हनुमान जी के उपस्थित होने का तनिक भी आभास नहीं था | तपस्वी आँगन में आए और हनुमान जी को साष्टांग प्रणाम किया | जब भीड़ ने तपस्वी को आँगन में पसरते देखा तो एक ने कहा –“अरे ओ बुरे तांत्रिक ! यहाँ पर किसके सामने पसर रहे हो ? यहाँ कोई नहीं है | यहाँ पर अपनी कौन सी गन्दी तंत्र विद्या का प्रयोग कर रहे हो ? निकल जाओ इस घर से |”
हनुमान जी ने तपस्वी को आशीर्वाद दिया और बोले – “उठो तपस्वी ! मै प्रसन्न हूँ ! ये अज्ञानी लोगों का झुण्ड जो बातें कर रहा है उस पर ध्यान मत दो | इन स्वार्थो मनुष्यों के मन में ऐसे दम्भी विचार ही उपजते हैं | किन्तु किसान की पत्नी भली औरत है | जाओ और उसे अपनी आत्मा को आपकी आत्मा से जोड़ने का अवसर प्रदान करो ताकि काल आपके समय के कुछ धागे उसे प्रदान कर सके |”
किसान और उसकी पत्नी बरामदे में बच्चे के समीप बैठे थे | पत्नी गर्म पानी का गिलास अपने हाथ में थामे हुए थी जिसमे से बच्चा पानी की घूंट भर रहा था | हकीम ने बच्चे को गर्म पानी पिलाने को कहा था | वे पड़ोसियों से घिरे हुए थे | तपस्वी सीधे बरामदे में गए और किसान की पत्नी से बोले – “हे भली औरत ! तुम इस घर की मालकिन लगती हो | मै घुमक्कड़ तपस्वी हूँ और इस समय पास के जंगल में ठहरा हुआ हूँ | कृपा मुझे खाने के लिए कुछ दे दे उसके बाद मै जंगल में वापिस चला जाऊँगा |”
किसान की पत्नी ने खड़े होकर तपस्वी को प्रणाम किया | वह बोली – “बाबा मै इस घर की मालकिन नहीं हूँ | मै भी आपकी ही तरह घुमक्कड़ हूँ | मेरी आत्मा एक जन्म से दुसरे जन्म तक चलती जा रही है और इस जन्म में मेरा ठिकाना यह घर है | मै इस घर की मालकिन कैसे हो सकती हूँ ? यह घर तो मेरी आत्मा की यात्रा में एक ठिकाना मात्र है |”
तपस्वी जी उस गृहस्थ महिला के मुख से ज्ञान के ऐसे शब्द सुनकर बहुत प्रसन्न हुए | महिला ने अपने पड़ोसियों को नम्रता पूर्वक वहां पर तपस्वी के बैठने के लिए थोडा स्थान खाली करने को कहा | उसने वहां एक चटाई बिछाई और तपस्वी को वहां बैठने का आग्रह किया | उसने तपस्वी को अपनी रसोई में उपलब्ध सबसे अच्छा खाना खिलाया | जब पड़ोसियों ने किसान और उसकी पत्नी को तपस्वी की सेवा करते देखा तो वे वहां से एक एक करके खिसकने लगे|
जब तपस्वी ने भोजन समाप्त किया तो किसान की पत्नी बोली – “हे ज्ञानी महाराज , बहुत अँधेरा हो चुका है | अब आपका वापिस जंगल में जाना सुरक्षित नहीं होगा | कृपा हमारे घर में ठहर जाएँ | सुबह होने पर आप जंगल में जा सकते है |”
तपस्वी ने वहां ठहरने के आग्रह को नम्रतापूर्वक ठुकरा दिया किन्तु वे किसान और उसकी पत्नी द्वारा की गई सेवा से अत्यंत प्रसन्न थे | इस तरह किसान की पत्नी की आत्मा तपस्वी के समीप आ गई | काल ने तपस्वी के समय के कुछ धागे किसान की पत्नी को प्रदान कर दिए | इस तरह किसान की पत्नी का जीवन भी सुरक्षित हो गया |
इस घटना के पश्चात् किसान की पत्नी का जीवन शांति से बीता | कोई कठिनाई उसको अथवा उसके परिवार को छू भी नहीं पाई क्योंकि हनुमान जी ने उनकी रक्षा की | इस घटना के बाद किसान की पत्नी के जीवन में दो बदलाव आए –
(1) क्योंकि तपस्वी द्वारा दान किये गए कुछ समय के धागे उसके जीवन का आधार बने , उसका व्यवहार भी कुछ कुछ तपस्वियों जैसा हो गया | वह गृहस्थ की तरह भोग और आनंद के पीछे भागने की बजाये एक तपस्वी की भांति मोक्ष की इच्छा रखने लगी |
(2) चूँकि उसने अपने समय के 7 धागे अपने पुत्र को दान किये थे और वो 7 धागे उसके पुत्र के जीवन का आधार बने थे , वह अपने पुत्र के साथ अत्यधिक जुड़ाव महसूस करने लगी | इसी अत्यधिक लगाव के कारण उसे मोक्ष नहीं मिला | लगाव इतना तीव्र था कि मृत्यु के पश्चात् भी उसकी आत्मा दूसरा जन्म लेने की बजाये अपने पुत्र के आस पास भटकती रही | जब उसका पुत्र बूढा होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ तब जाकर उस माँ की आत्मा ने नया जीवन धारण किया |
उसके पुत्र की बुढा होकर हुई मृत्यु के पश्चात् उसकी आत्मा ने मातंग समुदाय में जन्म लिया ताकि वह अपने मोक्ष की इच्छा पूरी कर सके | उसका नाम रखा गया “उर्मी” | उसके पुत्र ने भी लगभग उसी समय दूसरा जन्म किसी दुसरे स्थान पर ले लिया | इस तरह वह माँ और उसका बच्चा इस जन्म में लगभग एक ही उम्र के है और अलग अलग स्थानों पर रहते हैं | अर्थात वे इस जन्म में बिछुड़े हुए हैं , साथ साथ नहीं है | उसकी आत्मा यह नया जन्म पूर्णतः स्वीकार नहीं कर रही थी क्योंकि वह अपने बेटे से बिछुड़ गई थी | इसी कारण उसके नए जन्म यानी उर्मी के शरीर में उसको दौरे आते थे | जब हनुमान जी मातंग समुदाय में आये उसके दुसरे दिन भी उसे दौरा आया जब वह अन्य मातंग महिलाओं के साथ लकड़ियाँ चुनने गई |
[सेतु की टिप्पणी: वह लड़का जो पिछले जन्म में किसान का बेटा था , अब वह दिल्ली नामक शहर में रहता है जो भारत देश में है | अगले अध्याय में आप पढेंगे कि कैसे हनुमान जी ने उर्मी के दौरे की समस्या हल की और उस समय उस लड़के ने दिल्ली में क्या अनुभव किया |
हनुमान जी की लीलाओं का यह अध्याय यही समाप्त होता है |
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आत्मा पर भ्रम की परतें
अध्याय पढने के बाद यह पर्यवेक्षण करना आवश्यक है कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं | अगर आप कुछ ऐसा महसूस कर रहे हैं -"वाह! मैंने कुछ नया पाया |" अथवा "वाह, मैंने कुछ नया सीखा |" अथवा "मेरी अपने प्रभु के प्रति भक्ति ओर भी बढ़ गई|" इत्यादि तो आप अपने प्रभु की ओर एक कदम भी नहीं बढ़ें हैं | आप उतनी ही दूरी पर अटके हुए हैं |
अगर अध्याय पढने के बाद आप कुछ ऐसे महसूस कर रहे हैं जैसे आपके अन्दर से कुछ बाहर निकलकर गिर पड़ा हो और आप आत्मा से हल्का महसूस कर रहे हों तो आप अपने प्रभु की तरफ कम से कम एक कदम बढ़ चुके हैं |"
आपकी आत्मा एक आईने की तरह है जिसके ऊपर इस बाहरी संसार के कारण धुल चढ़ गई है | अगर अध्याय पढने के बाद आप ऐसा महसूस कर रहे हैं कि आपने कुछ नया पा लिया है तो उसका अर्थ है कि आपने अपनी आत्मा पर एक और परत चढ़ा ली है | आप प्रभु के साक्षात् दर्शन तभी कर सकते हैं जब आप ये परतें हटायें |
अतः अगर आप इस समय आत्मा से हल्का महसूस नहीं कर रहे हैं तो आप कुछ समय बाद फिर आकर यह अध्याय पढ़िए |